देवदासी प्रथा पर निबंध | Essay on Devadasi System

देवदासी प्रथा पर निबंध

देवदासी प्रथा पर निबंध | Essay on Devadasi System

वर्ष 2019 में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) मुंबई तथा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइसेंज (TISS), बेंगलुरु द्वारा देवदासी प्रथा पर अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के अनुसार कर्नाटक देवदासी (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम, 1982 के 36 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस कानून के संचालन हेतु नियमों को जारी करना बाकी है जो कहीं न कहीं इस कुप्रथा को बढ़ावा देने में मददगार सिद्ध हो रही है। अध्ययन के अनुसार, मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर लड़कियाँ इस कुप्रथा के लिये सबसे आसान शिकार हैं।

प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में तमाम सामाजिक कुरीतियों का बोलबाला रहा है जिनमें से एक है देवदासी प्रथा। यद्यपि समय के साथ व्यापक वैज्ञानिक चेतना के विकास के कारण कई प्रथाएं लुप्त हो गई हैं फिर भी 21वीं सदी में व्याप्त ये सामाजिक कुरीतियां समाज को शर्मसार करने वाली हैं।

 प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में तमाम सामाजिक कुरीतियों का बोलबाला रहा है जिनमें से एक है देवदासी प्रथा। 

गौरतलब है कि इस प्रथा के अंतर्गत देवताओं को प्रसन्न करने हेतु सेविका के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करना होता है। इस प्रथा के अनुसार, एक बार देवदासी बनने के बाद ये बच्चियाँ न तो किसी से विवाह कर सकती हैं न ही सामान्य जीवन निर्वाह कर सकती हैं। ध्यातव्य है कि इसी प्रथा के अंतर्गत शूद्रों की पुत्रेच्छा या कोई मिन्नत/मनौती पूर्ण होने पर उन्हें एक — कन्या मंदिर को दान देनी होती थी। विदित है कि रजस्वला होने तक ये कन्याएँ मंदिर से संबंधित देख-भाल, साफ-सफाई, पूजा पाठ, मंदिरों में नृत्य तथा अन्य प्रबंधन संबंधी कार्य संभालती थीं। कन्याओं के रजस्वला होने के पश्चात् वे मंदिर के देवताओं से ब्याह दी जाती थीं। ब्याह के पश्चात् ही ये कन्याएं ‘Servant of God’ यानी ‘देव की दासी’ कहलाती थीं। विवाह के पश्चात् उनको यह विश्वास दिलाया जाता था कि पुरुषों में देवी-देवताओं का अंश होता है इसलिये विवाहित होने के नाते इन स्त्रियों को मदिर के प्रमुख पुजारी, व्यवस्थापक मंडल के अधिकारियों तथा अभावशाली सामंत या कुलीन लोगों के साथ संभोग करना पड़ता था। 

भारत में सर्वप्रथम देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप प्रदान कर दिया गया था। 

इस प्रथा का प्रचलन दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रधानरूप से था। यद्यपि इसमें काफी कमी आई है, परंतु फिर भी यह प्रथा वर्तमान में भी महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के कोल्हापुर, शोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बीजापुर के अतिरिक्त तमिलनाडु तथा ओडिशा आदि में जारी है। 

देवदासी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में इस शब्द का साफ-साफ उल्लेख दिखाई पड़ता है। भारत में सर्वप्रथम देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप प्रदान कर दिया गया था। इतिहास एवं नृविज्ञान के वैज्ञानिकों एवं विद्वानों के अनुसार देवदासी प्रथा का सर्वप्रथम प्रचलन 6वीं सदी में शुरू हुआ था।

बहरहाल ‘देवदासी प्रथा’ की समस्या वर्तमान में भी कुछ जगहों पर प्रचलित है। देवदासी प्रथा या कोई भी सामाजिक कुरीति केवल कानूनों के द्वारा खत्म नहीं की जा सकती। इस हेतु व्यापक जनजागरूकता तथा चेतना की आवश्यकता है। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ बनाने हेतु पितृसत्तात्मक सोच एवं रूढ़िवादी सोच से टकराना, वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। इन सामाजिक कुरीतियों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही पराजित किया जा सकता है। 

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