प्रजातान्त्रिक विकेंद्रीकरण पर निबंध | Essay on democratic decentralization in hindi

प्रजातान्त्रिक विकेंद्रीकरण पर निबंध

प्रजातान्त्रिक विकेंद्रीकरण  (लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण )पर निबंध | Essay on democratic decentralization in hindi

गांधीवादी जीवन दर्शन के अनुसार लोकतन्त्र का मूलमंत्र विकेन्द्रीकरण है, क्योंकि केन्द्रीकरण द्वारा सत्ता कुछ इने-गिने व्यक्तियों में सीमित हो जाती है, जबकि लोकतन्त्र का तात्पर्य ही यह है कि जनता का शासन, जनता द्वारा ही किया जाए. लोकतन्त्र की उक्त मूल भावना को कार्यान्वित करने के लिए गांधीजी ने कहा था कि विकेन्द्रीकरण केवल राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में भी होना चाहिए. आर्थिक क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण का प्रतीक चरखा है और कुटीर उद्योग उसके माध्यम हैं. इस दृष्टि से उपभोक्ता यदि उत्पादक भी है तो वह आर्थिक विकेन्द्रीकरण की भावना को सार्थक करता है.

विकेन्द्रीकरण की परम्परा 

राजनीति अथवा प्रशासन के क्षेत्र में गांधीजी सत्ता को निम्नतम स्तर तक पहुँचाने के पक्षधर थे. ग्राम पंचायतें सत्ता के विकेन्द्रीकरण की भावना की प्रतिनिधित्व करती हैं. नगरपालिकाएँ भी इसी परम्परा में अगला सोपान हैं, लोकतन्त्र के प्रहरी ब्रिटेन के निवासी भी विकेन्द्रीकरण के पक्षधर रहे हैं. नगरपालिकाएँ, जिला परिषद् आदिक स्वायत्तशासी संस्थाएँ उन्हीं की देन हैं. ब्रिटिश शासकों ने स्वायत्तशासी संस्थाओं की स्थापना करके सत्ता के विकेन्द्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया. 

इतिहास साक्षी है कि इस परम्परा की जड़ें हमको भारत के अतीत में मिलती हैं. वाल्मीकि रामायण में भी छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है. महाभारत काल में भी अनेक छोटे-छोटे राज्य हुआ करते थे. भरत मुनि प्रणीत ‘नाट्यशास्त्र’ में भी जनपदों का उल्लेख पाया जाता है. भारत जैसे विशाल देश में सत्ता के विकेन्द्रीकरण द्वारा ही शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाया जा सकता है. इतना अवश्य है कि वे समस्त राज्य किसी केन्द्रीय शक्ति से जुड़े भी हों और उसके प्रति उत्तरदायी भी हों. इसी को आजकल संघ राज्य या फेडरल संघ कहा जाता है, प्राचीन भारत में राजसूय यज्ञ केन्द्रीय शक्ति की प्रतिष्ठा के लिए किया जाता था. 

प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण 

भारत के संविधान निर्माताओं का ध्यान विकेन्द्रीकरण की ओर बराबर केन्द्रित रहा और इसी को लक्ष्य करके उन्होंने संघीय राज्य की परिकल्पना की. राज्यों को पर्याप्त अधिकार दिए जाएँ, जिससे वे अपना विकास कर सकें; परन्तु साथ-साथ वे कतिपय विषयों के लिए केन्द्र पर आश्रित रहें और उसी को अपनी शक्ति का स्रोत माने. इसी दृष्टि से रेलवे, संचार माध्यम, विदेश नीति, सुरक्षा आदि विषय केन्द्र के अधीन रखे गए तथा राष्ट्रपति को व्यापक अधिकार प्रदान कर दिए गए. 

संविधान निर्माताओं की भावना कुछ भी रही हो, परन्तु व्यावहारिक रूप में महामहिम राष्ट्रपति को राज्यपाल नियुक्त करने का, लोकसभा एवं विधानसभा भंग करके राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल शासन लागू करने का अधिकार है, वह चाहे जब संविधान को निरस्त कर सकता है आदि. इस प्रकार राज्यों की लगाम केन्द्र के हाथ में है. राष्ट्रपति को उक्त अधिकार वस्तुतः किसी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए प्रदान किए गए थे, परन्तु राजनीतिक निहित स्वार्थपरता के फलस्वरूप इन अधिकारों का दुरुपयोग किया जाने लगा. जब चाहे जिस राज्यपाल को बदला जाने लगा है. राज्यपाल केन्द्र के मुखापेक्षी बन गए. यह परम्परा एक कदम आगे बढ़ी और राज्य के मुख्यमन्त्रियों की नियुक्तियाँ भी दिल्ली में होने लगी. इस प्रकार राज्य एक प्रकार से केन्द्र की कठपुतली समझे जाने लगे. स्वाभिमानी व्यक्तियों को यह स्थिति सहन नहीं हुई और राज्यों को अधिक शक्ति एवं अधिकार दिए जाने की मांग उठाई जाने लगी. इतना ही नहीं, कई मुख्यमंत्रियों ने केन्द्र के प्रति टकराव की स्थिति उत्पन्न कर दी. बंगाल, तमिलनाडू सदृश कुछ राज्यों ने अपनी शासन-व्यवस्था इस प्रकार बना ली मानो वे केन्द्र के प्रति उत्तरदायी ही नहीं हैं, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर ने अपने कई व्याख्यानों में राज्यों को अधिक अधिकार देने की माँग का समर्थन किया. 8 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली में देश के नीतिगत स्वरूप में बुनियादी बदलाव के लिए नया कार्यक्रम पेश करते हुए उन्होंने कहा कि जन स्वराज्य प्राप्त करने के लिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है तथा इसके लिए कुछ आर्थिक तथा प्रशासनिक अधिकार स्थानीय निकायों को सौंपने होंगे, जिससे राष्ट्र निर्माण में लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित हो सके. इससे राज्यों को भी अधिक स्वायत्तता मिल सकेगी तथा संघीय अवधारणा के अन्तर्गत केन्द्र और राज्यों के बीच बेहतर सूझबूझ सुनिश्चित हो सकेगी. 

राज्यों को अधिकार देने के साथ कतिपय बड़े राज्यों को विभाजित करके छोटे राज्य बनाने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है. इन मांगों के सन्दर्भ में उनका कहना था कि छोटे राज्य बनाए जाने के मसले पर उनकी सांस्कृतिक आकांक्षाओं तथा प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए राज्यों के साथ विचार-विमर्श करके दोबारा गौर किया जाना चाहिए. 

छोटे राज्य और अधिक अधिकार 

कई उत्तरदायी विचारकों तथा राजनीतिक नेताओं की यह मान्यता है कि देश और समाज के व्यापक हित के लिए छोटे राज्यों का गठन किया जाना चाहिए. इससे क्षेत्रीय असन्तुलन दूर होगा और विकास एवं प्रशासन सम्बन्धी निर्णयों में जनता की, निम्नतम स्तर के लोगों की, भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी. 

देश में झारखण्ड, उत्तरांचल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे छोटे राज्य तो हैं ही, लेकिन कुछ इनसे भी छोटे राज्य हैं, जो केन्द्र शासित प्रदेश हैं—पांडिचेरी, चंडीगढ़ आदि, परन्तु दूसरी और क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़े राज्य भी हैं, यथा-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि. राज्यों की संख्या वैसे तो पर्याप्त है, परन्तु इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है. 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया गया था. उस समय कुछ छोटे राज्यों का विभाजन हो गया और कुछ बड़े राज्य ज्यों के त्यों बने रहे. भाषायी राज्यों के गठन के सम्बन्ध में हम इस निर्णय के गुण-दोषों का विवेचन न करके केवल इतना ही निवेदन करेंगे कि भाषायी राज्यों के गठन ने कई नए राज्यों के निर्माण की माँग को जन्म दिया है. गोरखालैण्ड, वनांचल ओर ब्रजप्रदेश के रूप में नए राज्यों के गठन की मांग उठाई जाती रही है. अन्य राज्यों की तो बात ही क्या है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों को भाषायी नहीं, क्षेत्रीय जनता की आकांक्षा के आधार पर विभाजित करने की आवश्यकता का अनुभव तो किया जा रहा है, परन्तु इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है.

औचित्य 

बड़े राज्यों का विभाजन करके छोटे राज्यों का गठन करने के लिए संवैधानिक बाधा कोई नहीं है. संविधान संशोधन विधेयक आसानी से पारित किया जा सकता है, परन्तु इसके विरोध में जो कुछ कहा जाता है तथा जो तर्क उपस्थित किए जाते हैं, उन पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है. उनका तर्क है कि नए राज्यों यानी छोटे राज्यों के गठन से प्रशासनिक व्यय भार में वृद्धि हो जाएगी. इसके जवाब में कहा जाता है कि एक बार पृथक् व्यवस्था हो जाने के बाद नवगठित छोटे राज्य अपनी आर्थिक व्यवस्था को सन्तुलित करने और उसको सँभालने में सक्षम हो जाएँगे. छोटे राज्यों के गठन की आवश्यकता पर बल देने का एक अन्य कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों की सरकारें, उनके मुख्यमंत्री और मंत्रिमण्डल के सदस्य तथा उच्च पदस्थ प्रशासनिक अधिकारी समस्त जनपदों की समस्याओं को पूरी तत्परता के साथ एवं तत्काल हल नहीं कर पाते हैं. अतएव अनेक क्षेत्र तथा वहाँ की जनता विकास कार्यों से वंचित बनी रहती है, अतएव छोटे राज्यों के समर्थकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में वहाँ की जनता क्षेत्रीय विकास कार्यों को गति प्रदान करने में भागीदार हो सकेगी. वहाँ की जनता की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी कि हमारी उपेक्षा की जाती है और साथ-साथ उसको लाभान्वित होने का भी अवसर मिल जाएगा. राज्यों को अधिक अधिकार दिए जाने के उपरान्त केन्द्र और राज्यों के मध्य सम्बन्ध क्या दिशा लेंगे, इस प्रक्रिया द्वारा इन सम्बन्धों में बेहतर सूझबूझ का परिचय मिलेगा अथवा नहीं, इस सम्बन्ध में मतभेद हो सकता है, परन्तु यह सुनिश्चित है कि राज्यों तथा क्षेत्रीय जनता की एक बड़ी मांग पूरी हो जाएगी और वे विकास कार्यों में निजी भागीदारी का अनुभव करेंगे तथा विकास कार्यों को गति प्राप्त हो जाएगी. 

संघीय व्यवस्था में सत्ता के विकेन्द्रीकरण का प्रश्न राज्यों को अधिक प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार दिये जाने की मांग के साथ जुड़ा हुआ है. यह बात भी सामने आ चुकी है कि विकास कार्यों के लिए दी जाने वाली राशि राज्यों अथवा निकायों को सीधी न देकर विविध माध्यमों से प्रदान की जाती है. धनराशि के प्राप्त करने में अधिकारियों को भयंकर लालफीताशाही का सामना करना पड़ता है और धनराशि के एक बड़े भाग को बीच के लोग चट कर जाते हैं. फलतः जिनके लिए ये विकास कार्य नियोजित किए जाते हैं, वे इनके लाभों से वंचित रह जाते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा दी गई सहायता के प्रत्येक रुपये में से 80 पैसे रास्ते में ही रह जाते हैं. कतिपय राज्यों के मुख्यमंत्रियों का यह भी कहना है कि वित्तीय सहायता के सन्दर्भ में केन्द्र भेदभाव बरतता है. वित्तीय सहायता देने वाले अधिकारी स्वभावतः अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रति विशेष उदार रहते हैं. 

अनौचित्य 

सिद्धान्त रूप में हम भले ही स्वीकार कर लें कि अधिक अधिकार एवं स्वायत्तता प्राप्त होने पर राज्यों में केन्द्र के प्रति सूझबूझ बढ़ेगी तथा संघीय भावना दृढ़ होगी, परन्तु पिछले अनुभव यही बताते हैं कि ऐसा करने से राज्यों में स्वतन्त्रता की भावना विकसित होगी और वे अपनी बढ़ी हुई शक्ति के आधार पर केन्द्र की उपेक्षा करेंगे. हम जरा-जरा सी बात पर राष्ट्र हित की उपेक्षा करने लगते हैं, तब कैसे कहा जाए कि शक्तिशाली राज्य केन्द्र की मजबूती के लिए प्रतिबद्ध बने रहेंगे ? तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री वर्तमान स्थिति में ही केन्द्र की उपेक्षा कर देते हैं. 

भारत का पुराना इतिहास भी यह बताता है कि सामन्त जिस राज्य द्वारा नियुक्त किए जाते थे, उसी के विरुद्ध विद्रोह कर देते थे. इस बात की सम्भावना अधिक है कि शक्तिशाली राज्य केन्द्र से टकराव के लिए हर घड़ी तैयार रहा करें और केन्द्र को विवश करें कि वह अपने प्रभुत्व की रक्षा के लिए सैनिक कार्यवाही करने को विवश हो जाए. वह स्थिति गृहयुद्ध जैसी स्थिति हो जाएगी और संघीय भावना कोसों दूर पड़ जाएगी. 

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर शासन-प्रशासन में अधिकतम जनता की भागीदारी का औचित्य निर्धारित होता है, परन्तु दूसरी ओर सामान्य मनोवृत्तियों तथा देशवासियों के स्वार्थबद्ध व्यवहार को देखकर अनेक शंकाएँ सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. दोनों स्थितियों के मध्य समन्वय का यह रास्ता समझ में आता है कि छोटे-छोटे राज्यों का गठन तो कर दिया जाय, परन्तु उनके अधिकारों में वृद्धि करने का अधिकार केन्द्र के पास सुरक्षित रहे. केन्द्र का पंजा इतना मजबूत होना चाहिए कि वह समस्त राज्यों को बाँधे रख सके. स्वायत्तता प्रदान करते ही स्वतन्त्रता की मांग उठाई जाएगी—अभी तक तो ऐसा ही हुआ है. पंजाब में पहले विकास के नाम पर विशेष अधिकारों की मांग की गई, फिर आत्म-निर्णय की मांग उठाई गई और अन्ततः एक स्वतन्त्र राज्य खालिस्तान की मांग सामने रख दी गई. स्वायत्व की मांग करने वाले राज्यों की भी कहानी बहुत कुछ इसी प्रकार की है. हम विकेन्द्रीकरण का समर्थन करते हैं, परन्तु उसी सीमा तक कि भारत की अखण्डता अक्षुण्ण बनी रहे और पार्टीबाजी का अनावश्यक बल प्राप्त न हो.

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