भारतीय प्रजातंत्र : शक्ति और सीमा पर निबंध

भारतीय प्रजातंत्र : शक्ति और सीमा पर निबंध

भारतीय प्रजातंत्र : शक्ति और सीमा पर निबंध

भारतीय प्रजातंत्र का सूर्योदय 26 जनवरी, 1950 को हुआ. जब भारत एक सम्प्रभुतासम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित हुआ. हमारे राजनीतिक चिन्तक एवं स्वतंत्रता के कर्णधार हमेशा सजग थे कि स्वतंत्रता की खुली धूप प्रत्येक देशवासी तक पहुँचे. इस कार्य को सफलता प्रदान करने के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली से अच्छा और क्या हो सकता था. इसकी सफलता पर काफी सन्देह व्यक्त किए गए थे, लेकिन यहाँ की राजनीतिक रूप से प्रबुद्ध जनता ने सभी सन्देहों को निर्मूल साबित कर दिया. भारतीय प्रजातंत्र की उभरती नई शक्तियों ने न केवल इसे जीवित रखा है, बल्कि पल्लवित भी किया है. 

(1) भारतीय जनता में राजनीतिक जागरूकता आई है तथा वह मतदान की प्रणाली में प्रशिक्षित हुई है, उसकी लोकतंत्र में अटूट आस्था है. यही कारण है कि 1952 से 1999 तक यहाँ चुनाव नियमित रूप से होते आए हैं. पड़ोसी देशों के समान यहाँ अधिनायकवादी शक्तियों को प्रश्रय नहीं मिला. हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने की शक्ति है. तमाम चुनावी हिंसा एवं हेराफेरी के बावजूद लोगों का विश्वास अभी तक इस पर बना हुआ है. 

(2) भारत में राजनीतिक क्रांति मतपेटी के माध्यम से होती है. इसका उदाहरण 1977 में मिला जब 30 साल से चले आ रहे कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी गई 

और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के अध्येता डॉ. सुभाष कश्यप के शब्दों में, “भारतीय मतदाता किसी भी दल को सत्ता से वंचित कर सकता है 

और अपने देश की राजनीतिक संरचना तथा इतिहास के प्रवाह को बदल सकता है, यही तथ्य लोकतंत्र का सार है” इसका उदाहरण 1980, 1989, 1991 तथा 1996, 1995, 1999 के लोक सभा चुनावों में मिल चुका है. 

स्पष्ट है कि भारत में हिंसक क्रान्ति की आशंका निर्मूल है. 

(3) लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण लोकतंत्र को सबल बनाता है. हमारे देश में लोकतंत्र ग्रामीण स्तर से ही पाया जाता है. ग्राम पंचायत एवं पंचायत समिति इसके प्रमाण हैं. नगरीय क्षेत्रों में नगरपालिका है. इस तरह भारतीय नागरिकों को लोकतंत्र की प्राथमिक शिक्षा स्वायत्तशासी ग्रामीण एवं नगरीय संस्थाओं से मिल रही है. 

(4) प्रेस की स्वतंत्रता प्रजातंत्र के लिए एक आवश्यक तत्व है. भारत में प्रेस स्वतंत्र है. इसका अपवाद आपातकाल (1975-76) है, जिसके परिणामस्वरूप इन्दिरा गांधी को 1977 के आम चुनाव में भीषण पराजय का मुँह देखना पड़ा था. 

(5) स्वतंत्र न्यायपालिका ने भारतीय लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यह नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करती है. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार के विवाद में मई 1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारतीय संसद मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित नियमों में ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती है जिससे संविधान का आधारभूत ढाँचा प्रभावित होता हो. आजकल तो भारतीय जनता का विश्वास एकमात्र न्यायपालिका पर ही टिका हुआ है, कई जनहित मामलों पर अपनी दो टूक राय देकर न्यायपालिका यह सिद्ध कर चुकी है. 

(6) पंथनिरपेक्षता हमारी राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न अंग है. कभी-कभी साम्प्रदायिक दंगों के कारण इस पर आघात हुआ है, 

(7) लोकतांत्रिक नेतृत्व ने भी भारतीय प्रजातंत्र को सम्बल दिया है. पण्डित नेहरू, श्री शास्त्री एवं श्रीमती गांधी जैसे करिश्माई नेताओं ने लोकतंत्र में यहाँ की जनता के विश्वास को दृढ़ किया है. 

(8) समाज के प्रत्येक वर्ग को शासन में भागीदारी का अवसर प्राप्त हुआ है, इससे राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है,

सीमाएँ 

भारतीय प्रजातंत्र की उपर्युक्त शक्तियों के बावजूद इसकी कई सीमाएँ भी हैं. चुनौतियाँ स्वतंत्रता के स्वर्ण जयन्ती वर्ष में भी मुँह बायें खड़ी हैं. अगर इनका हल समय रहते ईमानदारी से नहीं खोजा गया तो लोकतंत्र के सामने गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. 

(1) सामाजिक एवं आर्थिक असमानता –(i) वयस्क मतदान के फलस्वरूप चुनाव प्रक्रिया बहुत महँगी हो गई है. फलतः – (क) एक बहुत बड़ा वर्ग वोट देकर सन्तोष कर लेता है वह शासन सत्ता में पहुंचने का स्वप्न भी नहीं देख पाता है. (ii) पूँजी एवं पूँजीपति के हाथ में वास्तविक शक्ति आ गई है, (ख) राजनीति भ्रष्टाचार व्यवसाय का पर्याय बन गई है. अनेक घोटाले अपनी कहानी स्वयं कहते हैं. (iii) वोट के लालच के कारण भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जाती है, (ग) देश का नैतिक एवं चारित्रिक पतन हो गया है. (घ) अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ी है. इसी के साथ गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असामाजिक कार्यों में वृद्धि हुई है. (ङ) वोट प्राप्ति के प्रयासों ने राजनीति का अपराधीकरण एवं अपराधों का राजनीतिकरण कर दिया है. 

(2) बहुदलीय राजनीति बहुदलीय व्यवस्था के फलस्वरूप सरकारें अस्थायी होने लगी हैं. यानी राजनीति एवं प्रशासन में अस्थिरता आ गई है. गठबंधन सरकारें बनने लगी हैं, परन्तु यह सार्थक विकल्प सिद्ध नहीं हो पा रही हैं. 

(3) क्षेत्रवाद एवं भाषावाद-क्षेत्रवाद उत्तरोत्तर उग्र रूप धारण करता जा रहा है. क्षुद्र स्वार्थवश राजनीतिक दल क्षेत्रीयता के नारों को बुलन्द करते हैं. इससे एक राष्ट्रवाद की अवधारणा को धक्का लगता है. अलगाववाद को बढ़ावा मिलता है. भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से संकीर्णता और अधिक पल्लवित हुई है. इसके फलस्वरूप उत्तराखण्ड, झारखण्ड, गोरखालैण्ड एवं बोरोलैण्ड आदि अलग राज्यों की माँग जोरों पर है. इसके लिए क्षेत्रीय असन्तुलन भी जिम्मेदार है. कुछ राज्यों में आर्थिक विकास दर तेज है तो कुछ में नगण्य. क्षेत्रीयता की भावना को दबाने के लिए क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करना आवश्यक है. आरक्षण ने जाति-संघर्ष को बल प्रदान किया है. पड़ौसी शत्रु बनते जा रहे हैं.

(4) साम्प्रदायिकता एवं जातिवाद- अल्पसंख्यक शब्द ने मुसलमानों के मन में भय की भावना भर दी है और वे मुख्य राष्ट्रीय धारा से पृथक् रहने लगे हैं. इससे देश में साम्प्रदायिक दुर्भावना एक स्थायी रोग बन गई है. 

साम्प्रदायिकता का अर्थ है-अन्य समुदाय के लोगों के प्रति धार्मिक भाषाई या सांस्कृतिक आधार पर असहिष्णुता की भावना रखना साम्प्रदायिकता का विष कभी-कभी बाह्य या आंतरिक शक्तियों द्वारा घोल दिया जाता है. इसका निवारण जनता की सतर्कता एवं विवेक द्वारा ही किया जा सकता है.

भारतीय समाज जाति पर आधारित समाज है. इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, लेकिन देखा गया है, ज्यों-ज्यों आर्थिक सम्पन्नता बढ़ी है त्यों-त्यों जाति बंधन कमजोर हुए हैं. अतः आर्थिक समस्याओं के साथ ही यह समस्या भी जुड़ी हुई है. हमारे सत्तालोलुप राजनीतिक दलों ने जातिवाद को बढ़ाने की कोशिश की है. इससे बचने के लिए लोगों को शिक्षित करने की आवश्यकता है. 

(5) हिंसा एवं आतंकवाद-हिंसा एवं आतंकवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में अराज कता, अस्थिरता और अविश्वास पैदा करते हैं. आन्दोलन की राजनीति हिंसा एवं आतंक वाद को जन्म देती है. फलतः लोकतन्त्र के सामने बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है. 

कश्मीर आतंकवाद की आग में जल रहा है, उत्तरपूर्व वर्षों से सुलग रहा है. पंजाब में बडी कठिनाई से उग्रवाद पर नियंत्रण पाया गया है. दिल्ली और उत्तर प्रदेशों में रेल के डिब्बों एवं सार्वजनिक स्थानों या विस्फोट होने लगे हैं. इसके लिए देश को हमेशा सजग रहना होगा. समय रहते अगर इसकी परवाह नहीं की गई तो वही नासूर बन जाएगा. 

(6) भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार देश में महामारी की तरह फैलता जा रहा है, जो इसे रोकना चाहता है वह भी इसका शिकार हो जाता है. बड़े पदाधिकारियों से लेकर अदना कर्मचारी तक इसमें लिप्त हैं. आए दिन समाचार मिलता है कि कोई नेता अमुक घोटाले में संलग्न है. इसके लिए किसी न किसी रूप में हर कोई जिम्मेदार है. भ्रष्टाचार को मान्यता मिल रही है, कोई चाहे किसी भी तरह से धन अर्जित कर ले समाज उसे सम्मान देता है. नेताओं की वोट विषयक सीमाओं के फलस्वरूप घोटाले पनप रहे हैं.

उपसंहार 

सभी कठिनाइयों के बावजूद लोकतंत्र ने भारत में अपना अस्तित्व बचाये रखा है, यह भी अपने-आप में एक उपलब्धि है. आवश्यकता है कि सदाचरण, सद्विचार एवं दृढ़ इच्छा शक्ति से लोकतंत्र के पौधे को सींचते रहें जिससे इसके स्वादिष्ट फल देश का हर नागरिक पा सके. 

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