चक्रवात पर निबंध |चक्रवात UPSC | Essay on cyclone in hindi

चक्रवात पर निबंध

चक्रवात पर निबंध |चक्रवात UPSC | Essay on cyclone in hindi

चक्रवात (Cyclones) प्राकृतिक आपदा का वह स्वरूप होता है, जो अपनी विनाशलीला के लिए जाना जाता है। जब ये आते हैं, तो व्यापक तबाही फैलाते हैं। इनके कारण हमें जान-माल की क्षति होती है तथा सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। प्रचंड चक्रवात जहां-जहां पहुंचते हैं, विनाश को साथ लेकर पहुंचते हैं। 

इनके वेग से भवनों की छतें आकाश में उड़ जाती हैं। मकानों में दरारें पड़ जाती हैं। पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं। बिजली के खंभे, टॉवर आदि – ध्वस्त हो जाते हैं, जिससे विद्युत आपूर्ति एवं संचार व्यवस्था ठप हो | जाती है। ये स्थानीय मौसम को भी प्रभावित करते हैं। इनका एक पक्ष यह भी है कि कुछ चक्रवात जैसे शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात वर्षा लाने के कारण लाभकारी भी सिद्ध होते हैं। 

चक्रवात से अभिप्राय पवनों के उस चक्र से है, जिसमें अंदर की ओर वायुदाब कम और बाहर की ओर अधिक होता है। हवाएं परिधि से केंद्र की ओर चलने लगती हैं। चक्रवातों का आकार गोलाकार, अण्डाकार अथवा अंग्रेजी के वर्ण ‘V’ जैसा होता है। चक्रवाती हवाएं उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सूइयों के विपरीत, तो दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सूइयों के अनुरूप चलती हैं। भूगोल के जानकारों ने ‘गतिक सिद्धांत’ एवं ‘ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत’ के आधार पर चक्रवातों की उत्पत्ति बताई है।

उत्पत्ति एवं स्थिति के आधार पर चक्रवातों को जिन दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है, वे हैं-(1) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones) (2) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropi cal Cylones)। इन दोनों प्रकार के चक्रवातों की अपनी अलग अलग विशेषताएं हैं, अलग-अलग इनके प्रभाव क्षेत्र हैं। 

जैसा कि नाम से ही विदित होता है, शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति तथा प्रभाव क्षेत्र शीतोष्ण कटिबंध में ही है। उत्तरी गोलार्ध में इस प्रकार के चक्रवातों का आगमन केवल शीत ऋतु में होता है, जबकि जलभाग अधिक होने के कारण ये दक्षिणी गोलार्ध में वर्ष पर्यंत आते रहते हैं। ध्रुवीय सीमाय सिद्धांत (Polar Front Theory) के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति दो विभिन्न ताप तथा आर्द्रता वाली राशियों के विपरीत दिशा से आकर मिलने से होती है। कम तापमान तथा आर्द्रता वाली वायुराशि ध्रुवीय प्रदेशों से तथा अधिक तापमान एवं आद्रता वाली वायुराशि उपोष्ण कटिबंध से आती हैं। मिलन के फौरन बाद ये दोनों वायु राशियां एक-दूसरे में विलीन नहीं होती हैं, बल्कि इनके बीच कुछ समय तक फासला बना रहता है, जो कि ध्रुवीय वाताग्र (Polar Font) कहलाता है। आठ से दस किमी. की ऊंचाई वाले इस प्रकार के चक्रवातों का व्यास सामान्य रूप से 500 से 600 किमी. तक होता है तथा ये अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में अण्डाकार होते हैं। ऐसे चक्रवातों का पवन वेग जहां शीत ऋतु में 40 से 60 किमी. प्रति घंटा होता है, वहीं ग्रीष्म ऋतु में यह 15 से 20 किमी. प्रति घंटा ही होता है। 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात मौसम में बदलाव लाते हैं। इनके आने से जहां घने बादल छा जाते हैं, वहीं जहां तापमान बढ़ जाता है, वहीं वायुदाब घट जाता है। ये अपने साथ वर्षा भी लाते हैं। वर्षा कई कई दिनों तक धीरे-धीरे होती रहती है। इनके प्रभाव से बर्फ एवं ओला वृष्टि भी होती है। चूंकि इसमें वायु एवं वर्षा की गति मंद रहती है, अतः ये विनाशकारी नहीं माने जाते। भारत में शीत ऋतु में इन चक्रवातों द्वारा होने वाली वर्षा उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा जैसे प्रांतों में गेहूं की फसल के लिए फायदेमंद साबित होती है। 

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात अपने विनाशकारी स्वरूप के लिए अधिक जाने जाते हैं, क्योंकि इनमें वर्षा एवं वायु की गति प्रचंड होती है। उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों से अभिप्राय उन चक्रवातों से है, जो उष्ण कटिबंध में उत्पन्न एवं विकसित होते हैं। ये चक्रवात ग्रीष्म ऋतु में आते हैं। इनका व्यास 80 से 300 किमी. तक होता है तथा पवन वेग 32 से 120 किमी. प्रति घंटा या इससे भी अधिक हो सकता है। उष्ण कटिबंधीय विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय अवदाब एवं उष्ण कटिबंधीय तूफान इस प्रकार के चक्रवात के वे तीन वर्ग हैं, जिनका निधारण तीव्रता, आकार एवं स्वभाव के आधार पर किया गया है। 

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के आने से पहले वायु शांत हो जाती है तथा पक्षाभ स्तरीय (Cirrostratus) मेघ छा जाते हैं। वायु दाब कम होने लगता है। इस प्रकार के चक्रवात प्रायः समुद्री भाग में ही उत्पन्न होते हैं तथा वहीं विकसित भी होते हैं। ऐसे चक्रवातों की पवनें चक्राकार मार्ग में गति करती हैं, जो कि अत्यंत घातक होती हैं। ऐसे चक्रवातों द्वारा वर्षा बहुत देर तक तो नहीं होती, किंतु वर्षा एवं वायु की गति अत्यंत तीव्र होने के कारण यह विनाशकारी सिद्ध होती है। हालांकि इनमें वर्षा के साथ हिम तथा ओलावृष्टि नहीं होती है। 

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के विनाशकारी परिणामों को जानने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि अलग-अलग प्रभाव क्षेत्रों में ये अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं। कैरीबियन सागर में जहां ये हरीकेन (Hurricane) के नाम से जाने जाते हैं, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका तथा मैक्सिको में इन्हें टारनेडो (Tornado) के नाम से जाना जाता है। चीन सागर में ये टाइफून (Typhoons) कहलाते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट के समीप इन्हें वाइली विलीज (Willy Wilies) कहा जाता है। हिन्द महासागर में इन्हें चक्रवात (Cy clones) कहा जाता है। 

यह कहना असंगत न होगा कि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात अपने साथ विनाश और तबाही लाते हैं। इसकी मुख्य वजह है वायु एवं वर्षा की गति अत्यंत तीव्र होना। ये बेहद शक्तिशाली होते हैं तथा इनकी गति 120 किमी. प्रतिघंटा से भी ज्यादा होती है। कुछ तबाही मचाने वाले चर्चित तूफान रीटा, कैटरीना, बीटा एवं विल्मा आदि इसी के उदाहरण हैं। टारनेडो (Tornado) तो विनाश का पर्याय  माना जाता है। यह आकार में जितना लघु होता है, परिणाम की दृष्टि से उतना ही अधिक विनाशकारी होता है। इसमें वायु की गति 800 किमी. प्रति घंटे तक पहुंच जाती है। इस प्रकार के तूफानों के कारण मकानों में दरारें पड़ जाती हैं, छतें उड़ जाती हैं, पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं। विद्युत लाइनें ध्वस्त हो जाती हैं। संचार व्यवस्था ठप हो जाती है। आवागमन रुक जाता है। तटीय भागों में तो इनकी विनाशलीला अपने चरम पर पहुंच जाती है। समुद्री मछुआरों को जान-माल की बड़ी क्षति उठानी पड़ती है। 

चक्रवात प्रकृति का वह कोप है, जिसे टाला नहीं जा सकता। हां, समय रहते इसकी आहट को भांप कर इसके विनाशकारी प्रभाव एवं प्रकोप को कुछ कम किया जा सकता है। इसके लिए हमें राडार एवं उपग्रहीय व्यवस्था की मदद से एक ऐसा प्रभावी तंत्र विकसित करना होगा, जो समय रहते हमें आगाह कर दे और हम तूफान के आने से पहले अपनी सुरक्षा के मुकम्मल इंतजाम कर लें। हम इस दिशा में आगे बढ़ भी रहे हैं। साथ ही यह भी आवश्यक है कि चक्रवातों के विनाशकारी परिणामों से उबरने के लिए आपदा प्रबंधन को और बेहतर बनाया जाए। 

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