साइबर क्राइम पर निबंध | साइबर अपराध पर निबंध | साइबर क्राइम | Essay on Cyber Crime

साइबर क्राइम पर निबंध

साइबर क्राइम पर निबंध | साइबर अपराध पर निबंध | साइबर क्राइम (Cyber Crime) अथवा साइबर विश्व : इसके आकर्षण और चुनौतियां (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2000) अथवा साइबर अपराध : एक जटिल समस्या (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2013) अथवा साइबर क्राइम : एक वैश्विक समस्या 

अस्सी के दशक में इंटरनेट के आगमन के साथ जहां सूचना और संचार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए, वहीं वैश्विक अंतर्संबंधों के समीकरण भी बदल गये। इंटरनेट ने सुविधाओं के द्वार भी खोले। जहां ऑनलाइन डाटा प्रोसेसिंग, चैटिंग, ब्लागिंग तथा ईमेल से सूचनाओं के आदान-प्रदान में गति आई, वहीं बैंकिंग, शोध, शिक्षा, कारोबार आदि के क्षेत्रों में भी सुगमता बढ़ी। टिकटों की बुकिंग से लेकर खरीदारी तक इंटरनेट के माध्यम से होने लगी। 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस इंटरनेट ने सूचना एवं संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव लाकर जीवन को सुगम बनाया तथा ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा को सार्थकता प्रदान की, उसका दरुपयोग आपराधिक मानसिकता के लोगों ने शरू कर दिया। ‘साइबर क्राइम’ उन आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की देन है, जो इंटरनेट का गलत इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए करते हैं। यानी अपराध के विषैले दंश से अब इंटरनेट भी अछूता नहीं रहा है। चूंकि इंटरनेट का विश्वव्यापी संजाल पूर्णतः स्वतंत्र है, अतएव इस पर निगरानी या नियंत्रण रख पाना टेढ़ी खीर है। इसका लाभ आपराधिक प्रवृत्ति के लोग उठाने से नहीं चूकते हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे साइबर क्राइम का ग्राफ ऊपर की तरफ बढ़ रहा है। आए दिन लोग साइबर क्राइम का शिकार बन रहे हैं। एक अच्छे व प्रभावी माध्यम को कलंकित करने का खेल साइबर क्राइम के रूप में शुरू हो गया। इस समस्या से भारत ही नहीं, सारा विश्व ग्रस्त एवं चिंतित है। 

साइबर क्राइम से आशय उन अपराधों से है, जो इंटरनेट, कंप्यूटर एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित होते हैं। जानकारों का कहना है कि सामान्यतः कोई भी ऐसा काम, जिससे कंप्यूटर प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता हो, साइबर क्राइम की परिधि में आता है। वस्तुतः साइबर क्राइम को एक ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसे इंटरनेट की सहायता से किया जाता है। कहने का आशय यह है कि कोई भी ऐसा अपराध, जिसका उद्देश्य कंप्यूटर के काम में बाधा डालना हो, साइबर अपराध है। ‘द आर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (ओईसीडी) ने साइबर अपराध को इस प्रकार परिभाषित किया है—“बिना पूर्व अनुमति के आंकड़ों के संसाधन और संचरण से संबंधित कोई भी गैरकानूनी, अनैतिक, अनधिकृत काम साइबर अपराधों की श्रेणी में आता है।” 

‘साइबर क्राइम’ उन आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की देन है, जो इंटरनेट का गलत इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए करते हैं।” 

साइबर अपराधों का दायरा बहुत व्यापक है, क्योंकि ये विश्व स्तर पर घटित होते हैं। कहीं भी बैठकर इन्हें अंजाम दिया जा सकता है। ये दूसरे प्रकार के अपराधों को कारित करने में भी सहायक की भूमिका निभाते हैं। वायरस के जरिये व्यवस्था को बाधित करना, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, आपत्तिजनक प्रसारण, ईमेल पर धमकी देना या परेशान करना, पैसों की मांग करना, आतंकवादी गतिविधियों का संचालन, कंप्यूटर से संबंधित प्रापर्टी को नष्ट करना, किसी कंपनी या व्यक्ति के डाटाबेस को चुरा लेना, साइट हैक करना, इंटरनेट के जरिये ठगी करना जैसे कुकृत्य साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। 

अश्लील साइट्स भी साइबर अपराध का ही अंग हैं|इन्होंने अश्लीलता को बढ़ाया है। घरों तक इनकी पहुंच बढ़ी है। इससे सांस्कृतिक क्षरण शुरू हुआ है। युवा पीढ़ी तेजी से इस अश्लीलता की गिरफ्त में आ रही है। अश्लील साइटें सांस्कृतिक एवं वैचारिक प्रदूषण फैलाने का काम कर रही हैं। इसने उस अपसंस्कृति को जन्म दिया है, जिसकी मजबूत पकड़ आज के युवा पर इस कदर बन गई है कि उसे अच्छे-बुरे का फर्क करने की समझ नहीं रह गई। 

कैसी विडंबना है, जीवन को सुलभ और आसान बनाने वाली इंटरनेट तकनीक का ज्यों-ज्यों विकास हो रहा है, त्यों-त्यों इससे जुड़े खतरे भी बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद का है। इंटरनेट आतंकवादियों के लिए मददगार साबित हो रहा है। यह गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान का सुरक्षित एवं त्वरित जरिया बन रहा है। जहां आतंकवादियों ने इंटरनेट को कट्टरपंथ फैलाने का हथियार बना लिया है, वहीं यह आतंकवाद के प्रशिक्षण में भी सहायक बन रहा है। साइबर हमलों की संभावना बढ़ी है। 

आतंकवादी गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान के रोज नये-नये तरीके निकाल कर सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष चुनौतियां पेश किया करते हैं। शाब्दिक संदेशों के पकड़े जाने का ज्यादा खतरा रहता है, इसे ध्यान में रखकर आतंकवादियों ने संदेशों का आदान-प्रदान ‘कोडित’ और ‘इनक्रिप्टेड’ संदेशों के जरिये करना शुरू कर दिया है, जिन्हें ‘विकोडित’ कर उनके अर्थ को समझ पाना सुरक्षा एजेंसियों के नुमाइंदों के लिए आसान नहीं होता है। आतंकवाद में इंटरनेट की बढ़ती भूमिका को लेकर अमेरिका जैसा विकसित देश भी चिंतित है। एक अमेरिकी रिपोर्ट में बताया गया है कि अग्रणी पंक्ति के विश्व के आतंकवादी संगठनों ने संदेशों के आदान-प्रदान के लिए ‘स्टेगैनोग्राफी’ का प्रयोग शुरू कर दिया है इसके जरिये इनक्रिप्टेड संदेशों को इलेक्ट्रॉनिक फाइलों में छिपाया जाता है। आतंकवादी अपनी योजनाओं के खाके एवं अन्य गोपनीय संदेशों को चैट रूम, अश्लील वेबसाइटों के बुलेटिन बोर्ड और अन्य ऐसी वेबसाइटों में रख रहे हैं, जिन पर शक आसानी से नहीं होता।

इंटरनेट बैंकिंग में भी साइबर अपराध के घातक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। ‘क्लोन वेबसाइटों ने तहलका मचा रखा है। खातों से रकम चोरी की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि अच्छी और त्वरित सेवा के लिए जाने जानेवाले अनेक बैंकों ने अपने ग्राहकों को यह बताना शुरू कर दिया है कि वे बैंकिंग से संबंधित कोई भी निजी सूचना या जानकारी इंटरनेट पर कदापि न जारी करें। कुल मिलाकर यह देखने को मिल रहा है कि साइबर अपराधों ने इंटरनेट के चेहरे को नकारात्मक बनाना शुरू कर दिया है। 

साइबर क्राइम सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। यह तो विश्वभर की समस्या है। इंटरनेट पर पहचान छुपाए रखने की सुविधा साइबर अपराधों के संदर्भ में अभिशाप बन गई है। इसी वजह से इसका दुरुपयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह साइबर अपराधों का मुख्य केंद्र बन गया है। अपराधी तो इसके दुरुपयोग में लिप्त ही हैं, कतिपय 

ऐसे लोग भी साइबर अपराधों के दायरे में आकर काम कर रहे हैं, जिनका मकसद ‘खिलवाड़ करना होता है। इस प्रवृत्ति के पनपने से स्थिति और बिगड़ रही है। साइबर अपराधों से जुड़ी एक विशिष्टता यह भी है कि ये पलक झपकते होते हैं। यानी इन्हें अंजाम देने में समय नहीं लगता है। माउस की एक क्लिक के साथ एक बड़ा अपराध हो जाता है। भारत में वर्ष 2018 में साइबर क्राइम की लगभग 3500 घटनाएं सामने आईं जबकि यह आंकड़ा 2016 में लगभग 2500 था। 

साइबर अपराधों पर नियंत्रण एवं निगरानी रख पाना एक दुश्वारियों भरा काम है। चूंकि ये नये किस्म के अपराध हैं, अतएव इनकी कानूनी घेराबंदी भी मजबूत नहीं हो पाई है, दूसरे इसका क्षेत्र पूरा विश्व है। बहुत दूर किसी देश में बैठा हुआ अपराधी अपराध कर सकता है। समस्या यह पैदा होती है कि जिस देश में अपराध होता है, वहां की पुलिस कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं होती है। आपराधिक दायित्व सुनिश्चित करने में भी मुश्किल आती है। अक्सर ऐसे अपराधों की सुनवाई में यह मुश्किल पेश आती है कि मुख्य अपराधी का निर्धारण किस प्रकार किया जाए। आरोप इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर पर तय किया जाए अथवा सामग्री उपलब्ध कराने वाली वेबसाइट पर। 

साइबर अपराधों पर अंकुश एवं इनसे बचाव के लिए विश्व के सभी देश कानून बनाने में जुटे हैं। भारत भी इस दिशा में प्रयासरत है। भारत सरकार ने अगस्त 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पारित करके इस दिशा में प्रयास किए और सूचना प्रौद्योगकी को भी कानूनी दायरे में लाने का काम किया। इस किस्म के अपराधों पर नियंत्रण के लिए ‘साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल’ और ‘साइबर क्राइम रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट यूनिट’ की स्थापना देश में की गई है। इन तमाम प्रयासों के बावजूद दोष सिद्ध कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। अतः अपराधी बच निकलते हैं। साइबर अपराधों से जुड़े थाने भी देश में गिने-चुने हैं। अतः अपराध दर्ज कराने में भी मुश्किल आती है। लोगों को इस बारे में पर्याप्त जानकारी भी नहीं है। एक खास बात यह भी है कि इस तरह के अपराध अनपढ़ या गंवार नहीं करते हैं। इस तरह के अपराधों को करने में पढ़ा-लिखा तबका आगे है, जो सुनियोजित तरीके से साइबर अपराधों को करता है, और सुबूत भी नहीं छोड़ता है। हाईप्रोफाइल लोग साइबर अपराधों में अधिक लिप्त देखे जा रहे हैं, जिससे स्थिति और भयावह हुई है। 

साइबर अपराध सनसनीखेज तो होते ही हैं, आर्थिक क्षति भी ज्यादा पहुंचाते हैं। इन अपराधों के जरिये जहां आर्थिक क्षति पहुंचाई जाती है, वहीं इनसे बचाव और सुरक्षा में भी काफी खर्च आता है। भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये की क्षति साइबर अपराधों के कारण होती है तथा सुरक्षा के इंतजामों में भी करोड़ों खर्च हो जाते हैं। अमेरिका, जहां कि साइबर अपराध के मामले सबसे ज्यादा होते हैं, में प्रतिवर्ष इन अपराधों के कारण 10 बिलियन डॉलर का नुकसान होता है। इंग्लैण्ड में ब्रिटिश बैंकिंग एसोसिएशन ने साइबर अपराध के कारण प्रतिवर्ष 8 बिलियन डॉलर के नुकसान की बात स्वीकारी है। वर्ष 2019 की आधिकारिक साइबर क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 तक पूरी दुनिया को प्रतिवर्ष लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होगा। 2015 तक यह आंकड़ा 3 ट्रिलियन डॉलर तक था। साइबर क्राइम से जुड़ी इस तरह की समस्याओं से विश्व का हर मुल्क परेशान है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। 

“इसमें कोई दो राय नहीं कि कंप्यूटर और इंटरनेट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सुंदरतम् सौगातें हैं। इन्होंने जीवन को आसान बनाते हुए पूरी दुनिया को जोड़ने का काम किया है। यदि इस तकनीक को नकारात्मक एवं आपराधिक स्पर्श देने वालों की हरकतों को नियंत्रित कर लिया जाए, तो इसका सुरक्षित प्रयोग समाज के लिए अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध होगा।” 

साइबर अपराधों का वर्चस्व भारत में भी दिनोंदिन बढ़ रहा है। इस प्रकार के अपराधों ने हमारी संस्कृति को जहां प्रतिकूल रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है, वहीं नैतिकता पर भी कुठाराघात किया है। तकनीक और विकास के नकारात्मक एवं विद्रूप पहलू की नुमाइंदगी साइबर क्राइम कर रहे हैं। 

जहां तक साइबर अपराधों से निपटने का प्रश्न है, तो यह अकेले भारत के वश की बात नहीं है, क्योंकि इन अपराधों का क्षेत्र विश्वव्यापी है। इससे निपटने के लिए एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय कानून की तो जरूरत है ही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा का एक मजबूत तंत्र भी विकसित किए जाने की जरूरत है। इसमें भारत सहित विश्व के 

सभी देशों को सहयोग देना होगा। यह सम्मिलित पहल जितनी जल्दी | हो, उतना ही बेहतर है, अन्यथा साइबर अपराध से जुड़े खतरे बढ़ते 

ही जाएंगे। इन खतरों में सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद का है। जिस तरह से इंटरनेट आतंकवाद के प्रचार-प्रसार एवं आतंकी घटनाओं का अंजाम देने में मददगार की भूमिका निभा रहा है, उससे तो यही लगता है कि आनेवाले दिनों में आतंक फैलाने के लिए बम का नहीं ‘की बोर्ड’ का इस्तेमाल होगा। इस खतरे के प्रति समूचे विश्व को चेतना होगा। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि कंप्यूटर और इंटरनेट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सुंदरतम् सौगातें हैं। इन्होंने जीवन को आसान बनाते हुए पूरी दुनिया को जोड़ने का काम किया है। यदि इस तकनीक को नकारात्मक एवं आपराधिक स्पर्श देने वालों की हरकतों को नियंत्रित कर लिया जाए, तो इसका सुरक्षित प्रयोग समाज के लिए अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध होगा। इसकी जनोपयोगी छवि दूषित नहीं हो पाएगी। अतः यह जरूरी हो गया है कि समूचा विश्व इसके घातक परिणामों पर लगाम कसने में तत्परता दिखाए। 

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