Essay on current topics in Hindi-पेड न्यूज (Paid News) पर निबंध | पेड न्यूज किसे कहते हैं

पेड न्यूज (Paid News) पर निबंध

Essay on current topics in Hindi -पेड न्यूज (Paid News)  पर निबंध

बाजारवाद का हमला लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर भी हो चुका है। पेड न्यूज (Paid News) से आशय, पैसे लेकर अखबार की जगह को बेचने से है। विडंबना यह है कि यह पत्रकारिता जैसे उस क्षेत्र से जुड़ी एक गंभीर समस्या है, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। कल तक जो समाचार पत्र ‘प्रहरी’ की भूमिका निभाते थे, समाज और देश को दिशा-बोध कराने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे तथा जनविश्वास का केंद्र थे, यकीनन ‘पेड न्यूज’ जैसी विद्रूप परंपरा की शुरुआत के कारण उनकी विश्वसनीयता एवं गंभीरता घटी है। कहना गलत न होगा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आई इस तरह की विकृतियों के कारण ही पत्रकारिता के क्षरण की शुरुआत हो चुकी है, जो कि पत्रकारिता के लिए – तो खतरे की घंटी है ही, लोकतंत्र की जीवंतता के लिए भी अशुभ एवं अहितकर है। वस्तुतः पेड न्यूज स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं उद्देश्यपरक पत्रकारिता पर तो कुठाराघात है ही, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मर्यादाओं के साथ एक तरह का अतिचार भी है। 

यकीनन ‘पेड न्यूज’ चिन्ता का विषय है। समस्याओं की फेहरिस्त में शामिल होने वाली यह नई समस्या दबे पांव आई और धीरे-धीरे अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। इसके भयावह परिणाम चुनावों में देखने को मिले, जब प्रत्याशियों से पैसे लेकर अखबार की जगह बेचे जाने का सिलसिला शुरू हुआ। सिर्फ अखबार ही नहीं, टीवी चैनल भी पैसा कमाने की इस होड़ में शामिल हो गये और स्याह को सफेद करने का सिलसिला शुरू हो गया। अखबार और टीवी चैनल एक निश्चित अनुपात से अधिक मात्रा में उन प्रत्याशियों को कवरेज देने लगे, जिनसे पैसे लिये गये, वहीं उन प्रत्याशियों को कवरेज के संबंध में हाशिए पर डाल दिया गया, जो इस खेल में सम्मिलित नहीं हुए। इस प्रवृत्ति से स्थिति और बिगड़ी। पेड न्यूज के रूप में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए मीडिया के दुरुपयोग की शुरुआत हुई। अब इस प्रवृत्ति को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों में बाधक एवं चिंतनीय अवयव के रूप में देखा जा रहा है। 

“पेड न्यूज (Paid News) से आशय, पैसे लेकर अखबार की जगह को बेचने से है।” 

पेड न्यूज की शिकायतें चुनाव आयोग को भी मिलीं तथा संसद में भी इसके खिलाफ आवाज उठाई गई। मूल्य आधारित निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रबल पक्षधर पत्रकार स्व. प्रभाष जोशी ने तो बकायदा इसके खिलाफ मुहिम तक छेड़ी और लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन प्रयासों से सरकार के ऊपर दबाव बना और इसके लिए प्रेस परिषद ने परांजॉय गुहा और श्रीनिवास रेड्डी की सदस्यता वाली एक उपसमिति का गठन भी किया। यहां भी उन अखबारी घरानों ने दबाव बनाने का पूरा प्रयास किया और अपने करे-धरे पर पर्दा डालने के लिए इस समिति की रिपोर्ट को दबवाने की कोशिश की। कुल मिलाकर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। वस्तुतः इस प्रवृत्ति में लिप्त बड़े अखबारी घराने नहीं चाहते हैं कि पेड न्यूज पर कोई निष्पक्ष रिपोर्ट आए और उनकी पोल-पट्टी खुले। इसीलिए जांच को प्रभावित किया गया और कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। 

वस्तुतः पेड न्यूज उस बाजारवाद की देन है, जिसने पैसा कमाने की होड़ को बढ़ाया है। यही कारण है कि अब पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। अब पत्रकारिता का स्वरूप ‘मिशनरी’ न होकर, औद्योगिक हो गया है, यानी मुनाफा कमाने के सर्वोच्च ध्येय के साथ इसे उद्योग के रूप में देखा जाने लगा। इसी व्यावसायिक होड़ में अखबार ‘प्रोडक्ट’ बन गये और एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में उनकी मार्केटिंग शुरू हो गई। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में जहां मूल्य एवं मानव हित पीछे चले गये, वहीं पेशागत ईमानदारी, निष्पक्षता एवं निर्भीकता का भी कोई स्थान नहीं रहा। निष्पक्ष पत्रकारिता पर निहित स्वार्थ भारी पड़ने लगे। पत्रकारिता रूपी साधना को अर्थ लोभियों ने खंडित कर दिया।

मीडिया से जुड़ा वर्तमान परिदृश्य देखने पर हम पाते हैं कि सभी बड़े अखबारों एवं टीवी चैनलों की बागडोर कार्पोरेट जगत के हाथों में है। मीडिया जगत पूरे तौर पर कार्पोरेट कल्चर से आच्छादित है। पहले अखबारों की नीतियां प्रबुद्ध संपादक निर्धारित करते थे। अच्छे साहित्यकारों को ससम्मान संपादक की कुर्सी पर बैठाया जाता था। कार्पोरेट कल्चर की चपेट में अखबारों के आने के बाद से यह चलन बंद हो गया है। अब अखबार का मालिक ही संपादक बन गया है और अधिक से अधिक लाभ अर्जित करना उसका मुख्य मकसद बन गया है। पेड न्यूज इसी मकसद को पूरा करने का माध्यम है।

संभवतः पत्रकारिता पर बाजारवाद के हमले की संभावना को पत्रकारिता के पुरोधा स्व. बाबूराव विष्णु पराड़कर ने बहुत पहले भांपते हुए कहा था— “एक समय ऐसा आएगा, जब हिन्दी पत्र रोटरी पर छपेंगे, संपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगी, सब कुछ होगा, किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगी, संपादक, संपादक न होकर मालिक का नौकर होगा।” अब संपादक खुद मालिक ही बनने लगे हैं और जहां मालिक संपादक नहीं है, वहां सचमुच उनकी स्थिति नौकर जैसी ही है। संपादन से ज्यादा वह अर्थ प्रबंधन में लिप्त रहता है। मीडिया जगत में अर्थ की अहमीयत इतनी अधिक बढ़ गई है कि संवाद सूत्र और संवाददाताओं से विज्ञापन एजेंटों की तरह काम लिया जाने लगा है। वे विज्ञापन जुटाते हैं और जरूरत पड़ने पर इसके लिए भयादोहन तक करने से नहीं चूकते। विज्ञापन से होने वाली आय से उन्हें कमीशन दिया जाता है। 

‘पेड न्यूज’ जो कि बाजारवाद की देन है, पत्रकारिता की शुचिता को तो नष्ट कर ही रही है, लोकतंत्र के लिए भी घातक है। इसने निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी सवालिया निशान लगाया है। सच तो यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता को सरकार से उतना खतरा नहीं है, जितना कि बाजारवाद से है। 

“कल तक जो मीडिया आम आदमी का समझा जाता है था और जो बढ़-चढ़कर जनहितों की पैरोकारी करता था, वही मीडिया आज पैसों, सत्ता और बड़े लोगों के साथ कदमताल करता नजर आ रहा है।” 

जो मीडिया सच का साथी माना जाता था, जिसकी पहचान सच और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने को लेकर बनी थी, बाजारवाद के हमले के कारण उसकी प्राथमिकताओं का बदलना यकीनन दुखद है। चुनावों में पेड न्यूज के बढ़ते प्रभाव से चुनाव आयोग चिंतित है तथा इस समस्या के निवारण के लिए प्रयासरत भी है। चनाव आयोग का मानना है कि यह मतदाताओं के सही और निष्पक्ष खबर पाने के अधिकार का हनन है। इस समस्या से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने एक ‘विजलेंस सेल’ भी बनाई है, जो उन खबरों के प्रकाशन एवं प्रसारण पर नजर रखती है, जो ‘पेड न्यूज’ के दायरे में आती हैं। शिकायतें मिलने पर नोटिस भी भेजी जाती हैं और आरोप सही पाए जाने पर पेड न्यूज के रूप में खर्च की गई रकम को चुनावी खर्च में जोड़ा जाता है। पेड न्यूज को चुनाव आयोग ने गंभीर किस्म की चुनावी अनियमितता माना है। वह चुनाव के समय जिला निर्वाचन अधिकारियों को अखबारों और टीवी चैनलों की चुनाव संबंधी खबरों की निगरानी के लिए निर्देशित भी करता है। चुनाव आयोग इन सारे प्रयासों के बावजूद यदि पेड न्यूज पर प्रभावी अंकुश नहीं लगा पा रहा है, तो इसका मुख्य कारण यह है कि अभी तक मीडिया घरानों पर नकेल कसने का कोई प्रावधान नहीं है। इस तरह के मामलों में चुनाव आयोग की तरफ से उम्मीदवार को नोटिस जारी की जाती है और उससे पूछा जाता है कि क्यों न कवरेज को विज्ञापन के तौर पर लिया जाए और इसे चुनावी खर्च में लिया जाए। सीधे-सीधे टीवी चैनलों और अखबारों पर शिकंजा कसने का कोई प्रावधान नहीं है और इसी का लाभ मीडिया घराने उठा रहे हैं। भारतीय प्रेस परिषद भी इस दिशा में कोई ठोस व्यवस्था नहीं दे पा रहा है। 

पेड न्यूज एक जटिल समस्या है। इसका समाधान कर पाना अकेले चुनाव आयोग के वश की बात नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इस मीडिया में पनपी कुप्रवत्ति से बचाव के लिए राजनीतिक  दल मीडिया संगठन, प्रेस परिषद आदि मिलकर प्रयास करें और इसकी रोकथाम के उपाय सुनिश्चित करें। मूल्य आधारित पत्रकारिता के प्रति समर्पित स्वनाम धन्य पत्रकार आगे आएं। 

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