वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष पर निबंध | वर्तमान शिक्षा पद्धति पर निबंध |Essay on the merits and demerits of the present education system

वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष पर निबंध

वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष पर निबंध | वर्तमान शिक्षा पद्धति पर निबंध |Essay on the merits and demerits of the present education system

मानव जीवन में शिक्षा का विशेष महत्व है। शिक्षा ही वह आभूषण है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है अन्यथा शिक्षा के बगैर मनुष्य को पशु के समान माना गया है। शिक्षा के महत्व को समझते हुए ही प्रायः हर राष्ट्र व समाज में शैक्षणिक गतिविधियों को वरीयता दी जाती है। शिक्षा प्रदान करने के लिए जिस प्रणाली का विकास किया जाता है, वह शिक्षा प्रणाली कहलाती है। यानी एक विशेष रूप से विकसित एवं व्यवस्थित प्रणाली द्वारा दिया जाने वाला ज्ञान और कौशल ही शिक्षा कहलाता है। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली स्कूल कॉलेजों पर केन्द्रित एक व्यवस्थित प्रणाली है। 

“वर्ष 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार इस समय देश की कुल साक्षरता दर 73.0% है, जिसमें देश की मौजूदा शिक्षा प्रणाली का योगदान उल्लेखनीय है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में स्कूल कॉलेज खुलने से शिक्षा की पहुंच दूर-दराज के क्षेत्रों में बढ़ी है तथा शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है।” 

भारत की जो वर्तमान शिक्षा प्रणाली है, वह प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली से मेल नहीं खाती है। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली का ढांचा औपनिवेशिक है, जबकि प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली गुरुकुल आधारित थी, जिसके लिए ब्रह्मचर्य आश्रम का विधान बनाया गया था। ब्रह्मचर्य उस मार्ग को प्रशस्त करता था, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक स्तरों पर महान बनाता था। गुरुकुल आश्रम की समयावधि जीवन के प्रारंभिक 25 वर्षों तक निर्धारित की गई थी तथा इसे जीवन के प्रथम आश्रम के रूप में मान्यता प्रदान की गई थी। 

ब्रह्मचर्य आश्रम की शुरुआत गुरुकुल से होती थी, जहां उपनयन संस्कार के बाद बालक ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करता था। लैंगिक सयम बरतते हुए यह साधना का काल होता था। इसमें बालक वेदाध्ययन के साथ-साथ संयमित व अनुशासित जीवन व्यतीत करते हुए आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक उन्नति करता था। समावर्तन संस्कार ब्रह्मचर्य आश्रम का समापन संस्कार होता था, जिसके बाद बालक गुरु से विदा लेकर अपने घर लौटता था। विदेशी आक्रमणों और विदेशी हुकूमत के कारण भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली का मूल स्वरूप तिरोहित हो गया। औपनिवेशिक काल में भारत में एक नई शिक्षा प्रणाली का सूत्रपात हुआ, जिसका सूत्रधार लॉर्ड मैकाले को माना जाता है। देश की आजादी के बाद भी हमारी सरकार ने शिक्षा के औपनिवेशिक ढांचे को ही कायम रखा। इस तरह हम कह सकते हैं कि भारत की मौजूदा शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश सरकार की देन है।

भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली के जहां कुछ गुण हैं, वहीं कुछ दोष भी हैं। पहले इसके गुणों पर चर्चा कर लेना समीचीन रहेगा। ईसाई जब भारत आए तो अपने साथ आधुनिकता और वैज्ञानिक दृष्टि लेकर आए। इस आधुनिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टि से हमारा परिचय उस शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ही हुआ, जिसका सूत्रपात ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किया गया। इस तरह हमारी प्राच्य विद्याएं नेपथ्य में चली गईं और हमारी शिक्षा प्रणाली को आधुनिकता का संस्पर्श मिला। इससे अंध विश्वास, जादू-टोना जैसी कुरीतियों का प्रभाव भी कम हुआ। 

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में वैज्ञानिक दृष्टि और तार्किकता का विशेष स्थान है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति है, जिसमें हम प्रत्येक बात को तार्किकता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसते हैं। । इसमें प्रयोगों, शोधों एवं अनुसंधानों के जरिए हम ठोस नतीजों और निष्कर्षों पर पहुंच कर सटीक सिद्धान्तों को प्रतिपादित करते हैं। यह शिक्षा प्रणाली विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने वाली, वह | शिक्षा प्रणाली है, जो एक उन्नत और प्रगतिशील समाज तथा मजदत राष्ट्र के लिए आवश्यक है। इसमें व्यापकता भी काफी है और अध्ययन का क्षेत्र भी असीमित है। कला, विज्ञान और वाणिज्य इस शिक्षा प्रणाली के तीन प्रमुख घटक हैं, जिनके अंतर्गत सम्मिलित सैकड़ों विषयों का | ज्ञान हासिल कर हम अपना शैक्षणिक विकास कर सकते हैं। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली एक संशोधित एवं अद्यतन शिक्षा प्रणाली – तो है ही, यह ज्ञान-विज्ञान के नए-नए विषयों को भी समाहित करती चलती है। कम्प्यटर शिक्षा इसका ज्वलंत उदाहरण है. जिसन मानव जीवन को सहज, सुन्दर एवं सुविधाजनक बनाया है। 

शिक्षा के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने में भी भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली का विशेष योगदान रहा, क्योंकि इस शिक्षा प्रणाली के तहत ही देश में नए-नए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों एवं स्कूलों की स्थापना की गई तथा यह प्रक्रिया अनवरत जारी है। इससे शिक्षा का प्रचार प्रसार बढ़ने के साथ-साथ साक्षरता दर में भी इजाफा हुआ है। वर्ष 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार इस समय देश की कुल साक्षरता दर 73.0% है, जिसमें देश की मौजूदा शिक्षा प्रणाली का योगदान उल्लेखनीय है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बो में स्कूल-कॉलेज खुलने से शिक्षा की पहुच दूर-दराज के क्षेत्रों में बढ़ी तथा शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। साथ ही शिक्षा के प्रति आम लोगों का रुझान भी बढ़ा है। वे शिक्षा के महत्त्व को न सिर्फ समझ रहे हैं, अपितु इसकी ओर उन्मुख भी हुए हैं। 

भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली की एक खूबी यह भी है कि इसमें महिला साक्षरता की तरफ विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। यह सिलसिला वर्तमान शिक्षा प्रणाली की शुरुआत से ही प्रारंभ हो गया था, जोकि समय के साथ निरंतर आगे बढ़ता चला गया। भारतीय नारी ने घर की देहरी लांघ कर यदि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मजबूती से कदम बढ़ाए हैं, तो इसमें वर्तमान शिक्षा प्रणाली का महत्त्वपूर्ण योगदान है। महिलाओं के लिए इस शिक्षा प्रणाली के तहत अलग से स्कूल-कॉलेजों आदि की स्थापना की गई है, जिनका लाभ उन्हें मिल रहा है। महिला साक्षरता बढ़ने से आज समाज में महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ हुई है। वे स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनी हैं तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर रही हैं। महिला साक्षरता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है और वर्ष 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार इस समय भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 64.6% है। यहां तक पहुंचने में वर्तमान शिक्षा प्रणाली का महत्त्वपूर्ण योगदान है। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली के यदि कुछ गुण हैं, तो कुछ दोष भी है। दोषों की मुख्य वजह यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली का मूल ढाचा औपनिवेशिक है, जो कि भारतीय संस्कति की मल आत्मा स मल नहीं खाता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में उन शैक्षणिक एवं जीवन मूल्यों का नितांत अभाव है, जो हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली के प्राण तत्व थे। हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली की तुलना में वर्तमान शिक्षा प्रणाली न सिर्फ अधिक खर्चीली है, अपितु दोहरी भी है। एक तरफ जनसामान्य के लिए साधारण विद्यालय हैं, जिनकी शैक्षणिक गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं है, तो दूसरी तरफ अंग्रेजी के वर्चस्व वाले चमकदार कान्वेंट और पब्लिक स्कूल हैं, जो गुणवत्तायुक्त शिक्षा का वादा तो करते हैं, किन्तु इनकी भारी भरकम फीस एवं अन्य देनदारियां जनसामान्य के लिए वहनीय नहीं है। शिक्षा प्रणाली के इस दोहरेपन से शिक्षा का स्तर प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है। हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली में यह दोष नहीं था। शिक्षा वहनीय थी तथा गुरुकुलों में राजकुल व जनसामान्य के बच्चे एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था। 

“वर्तमान शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा दोष यह भी है कि यह रोजगारोन्मुख नहीं है। यानी इसमें कौशल और हुनर का अभाव है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटने वाली एजेंसियां बन गई हैं। ये शैक्षणिक संस्थान देश में बेरोजगारों की फौज को बढ़ा रहे हैं।” 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा दोष यह भी है कि यह रोजगारोन्मुख नहीं है। यानी इसमें कौशल और हुनर का अभाव है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटने वाली एजेंसियां बन गई हैं। ये शैक्षणिक संस्थान देश में बेरोजगारों की फौज को बढ़ा रहे हैं। बेरोजगारों की बढ़ती फौज के कारण युवा असंतोष बढ़ा है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली से शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों में न तो संयम है और न ही अनुशासन। नैतिकता का भी इनमें नितांत अभाव है। यही कारण है कि छात्र पथभ्रष्ट और उच्छृखल हो रहे हैं। 

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर अंग्रेजी का वर्चस्व अभी तक बना हुआ है, जिसकी मुख्य वजह यह है कि इसका ढांचा औपनिवेशिक है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि विदेशी माध्यम के द्वारा वास्तविक शिक्षा असंभव है। यदि हमने बापू की इस सीख पर ध्यान दिया होता, तो अपनी मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया होता, किन्तु हम ऐसा नहीं कर सके। इसका प्रतिकूल प्रभाव यह दिख रहा है कि अनेक मोर्चों पर हिन्दी माध्यम के छात्रों को मात खानी पड़ती है। 

स्वेट मार्डेन का यह कथन था“शिक्षा का मतलब केवल पढ़ना लिखना या सीख लेना ही नहीं है। इसका मतलब है, व्यक्तित्व का विकास। इसके बिना मनुष्य उन्नति की चोटी पर नहीं पहुंच सकता।” हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली मार्डेन के इस कथन की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरती है। इसमें व्यक्तित्व के विकास और निर्माण का कोई स्थान नहीं है। जबकि हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली में आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास पर विशेष ध्यान देकर शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का इस प्रकार निर्माण किया जाता था कि वह राष्ट्र और समाज के निर्माण में अपना यथेष्ट योगदान दे सके। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली द्वारा दी जा रही शिक्षा मनुष्य के ज्ञान में तो वृद्धि कर रही है, किन्तु उसके मस्तिष्क और व्यक्तित्व का विकास कर पाने में असफल है। इसमें नैतिकता, श्रेष्ठ जीवनमूल्यों, सामाजिक मूल्यों, दायित्व-बोध, सेवा-भाव, सरलता, नम्रता, आत्मनिर्भरता एवं शुचिता जैसे उन गुणों का अभाव है, जो श्रेष्ठ शिक्षा के प्रमुख अवयव होते हैं। निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली द्वारा दी जा रही शिक्षा जीवन और जीविका दोनों मोर्चों पर विफल है। यह न तो जीवन को सार्थक बना पा रही है और न ही जीविका का बन्दोबस्त ही कर पा रही है। ऐसे में इस शिक्षा प्रणाली को अर्थहीन माना जाने लगा है। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली को व्यावहारिक, सफल एवं आदर्श स्वरूप प्रदान करने के लिए हमें इसमें बदलाव लाना होगा। इसके दोषों को दूर करते हुए हमें एक ऐसी आदर्श शिक्षा प्रणाली का विकास करना होगा, जो कि जीवन को सार्थकता प्रदान करे और आजीविका का भी बन्दोबस्त करे। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम मौजूदा शिक्षा प्रणाली में अपनी प्राचीन शिक्षा प्रणाली के उन गुणों का समावेश करें, जिनके लिए उसकी एक विशिष्ट पहचान थी। हमें अपनी वर्तमान शिक्षा प्रणाली को उद्देश्यपरक बनाना होगा। इसका उद्देश्य सिर्फ डिग्रियां बांटना ही न हो, बल्कि आजीविका मुहैया कराना एवं व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी हो। इसे सुलभ और वहनीय बनाए जाने की भी जरूरत है, ताकि गुणवत्तायुक्त शिक्षा | से जनसाधारण वंचित न रह जाए। वस्तुतः शिक्षा की सबसे बड़ी और संवादी पुस्तक जीवन और जगत है। हमें एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास करना चाहिए जो जीवन व जगत दोनों को सार्थक बनाए। शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य को व्यष्टि और समष्टि के रूप में निरंतर बेहतर बनाते जाना है। अर्थात इसके द्वारा एक ऐसे समाज | की रचना करनी है, जिसमें मनुष्य और समाज दोनों लगातार पहले से | अधिक रचनाशील और विकासशील होते जाएं। हमारी शिक्षा प्रणाली | में इस रचनाशीलता और विकासशीलता को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किए जाने की जरूरत है। तभी जीवन और समाज सफल और सार्थक होगा। हमें जीवन मूल्य और शिक्षा की अर्थवत्ता के मध्य बेहतर समन्वय बैठाना होगा। हमें दो स्तरों पर अपनी शिक्षा प्रणाली में सुधार लाना होगा। पहले स्तर पर हमें शिक्षा को समयानुकूल बनाना होगा, तो दूसरे स्तर पर शिक्षा प्रणाली को मूल्य शिक्षा और नैतिक शिक्षा से जोड़ना होगा। इसका दोहरा लाभ भी हम उठाएंगे। जीवन और जीविका का समन्वय तो बना ही रहेगा, सामाजिक विसंगतियों पर भी अंकुश लगेगा। इस प्रकार विश्वमंच पर भारत की वापसी ‘विश्वगुरु’ के रूप में दोबारा होगी। 

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