संस्कृति और सभ्यता पर निबंध | Essay on Culture and Civilization

संस्कृति और सभ्यता पर निबंध

संस्कृति और सभ्यता पर निबंध

वस्तुत: संस्कृति और सभ्यता का अत्यंत करीबी रिश्ता है। यह दिश्ता कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा आत्मा और देह का होता है। दानों साथ-साथ चलते हैं, उनका सह-अस्तित्व होता है। एक के बिना दूसरा पूर्ण नहीं हो सकता है। नि:संदेह संस्कारों का संस्कृति से अटूट संबंध होता है। सच तो यह है कि संस्कारों का घनीभूत स्वरूप ही संस्कृति के रूप में सामने आता है। हम कह सकते हैं कि उच्च संस्कृति की आधारशिला संस्कार ही होते हैं। अच्छे संस्कारों से ही कोई संस्कृति सुरक्षित होती है। अत: सांस्कृतिक उन्नयन की प्रारंभिक इकाई संस्कार ही होते हैं। 

संस्कार हमें घर से मिलते हैं, उसके बाद विद्यालय और पाठशालाओं में। माता को प्रथम गुरू यों ही नहीं कहा गया है। परिवार में माता ही सबसे पहले बच्चों को संस्कार देती है। इन्हीं संस्कारों से उसके आचरण की नींव बनती है। फिर वह पाठशाला जाता है और श्रेष्ठ गुरूजनों के सान्निध्य में रहकर संस्कारों की पूजी हासिल करता है। इस तरह वह एक सुदर्शन व्यक्तित्व के रूप में निखरता है और समाज में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। ये संस्कार हमने एक दिन में पैदा नहीं किए हैं। परिष्कृत संस्कारों को व्यवहार में लाने में सदियां बीत चकी हैं। आज अगर हम अपनी संस्कृति पर गर्त करते हैं, तो इसके पीछे उन संस्कारों की महती भूमिका है, जिन्हें हमने एक लंबी अवधि में संचित किया है। 

आज हम अपनी जिस संस्कृति का बखान करते नहीं अघाते. उसके निर्माता हमारे वे तपस्वी-मनस्वी, विद्वान व विचारक है, जिन्होंने हमें संस्कार दिए। वे माताएं हैं, जो संस्कारों की घुट्टी अपने बच्चों को देकर अनमें जीवन मूल्यों की समझ पैदा करती हैं। सम्यता के विकास में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। स्पष्ट है कि यदि संस्कृति सही होगी, तो सभ्यता भी शालीन और सौम्य होगी, विकासपरक होगी तथा विकृतियों और विसंगतियों से रहित होगी।

संस्कृति और सम्यता के निर्माण में संस्कारों की अहमियत काफी होती है। प्रसंगवश एक दृष्टांत पर गौर करें। एक डाकू ने अपने आखिरी समय में अपना आक्रोश अपनी मां के प्रति व्यक्त करते हुए कहा कि यदि पहजी चोरी करते समय मां ने मुझे रोका होता, डांटा होता, सजा दी होती ओर चोरी करना बुरा है, समझाया होता तो मैं आज इतना बड़ा डाकू न बनता, इतनी हिंसा, मार-काट, लूट-पाट न करता और सम्मानित जीवन गुजारता। जाहिर है, उस डाकूमें इस बात की टीस थी कि संस्कारों के बीजारोपण में उसकी मां से चूक हुई और परिणाम यह सामने आया कि वह दुर्दात दस्तु बन गया और जीवन की अभिशप्त बना डाला। 

संस्कारों के सन्दर्भ में अब यहां गौर करने की बात यह है कि अगर लगातार अधिकांश माताएं ऐसी चूक करती तो हमारी संस्कृति लुटेरों की होती और सभ्यता बर्बर कहलाती। इस तरह हम कह सकते हैं कि संस्कार रूपी चेतना से ही संस्कृति निर्मित होती है। संस्कार जितने उज्ज्वल होंगे, जितने मजबूत होंगे, जितने मूल्यवान होंगे,संस्कृति भी उतनी ही उज्ज्वल और उच्च मूल्यों से युक्त होगी। जब संस्कृति में ये खूबियां होंगी, तो इसकी सुगंध सभ्यता में भी होगी। जब हम सुसंस्कृत होंगे, तभी सुसभ्य भी कहलाएंगे। 

सभ्यता और संस्कृति साथ-साथ चलते हैं। ये एक ही रथ के उन दो पहियों के समान हैं, जो संतुलन की दृष्टि से एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। सभ्यताएं धीरे-धीरे विकसित होती हैं, उसी के साथ-साथ संस्कृति भी समृद्धि होती है। सभ्यता हमें जड़ता से बाहर निकालती है और संस्कृति सभ्यता का पथ प्रदर्शन करती है। 

मात्र धार्मिक मूल्यों तक सीमित रख कर संस्कृति को नहीं देखा जा सकता है। धर्म, संस्कृति का एक अहम हिस्सा बेशक हो सकता है, मगर पूरी संस्कृति का नहीं। अच्छे विचार, उच्च मूल्य, सुरूचि, कला, साहित्य, संगीत, दर्शन, शौर्य, ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा-दीक्षा और जीवन के सूक्ष्म तत्व भी सांस्कृतिक अभ्युदय के लिए आवश्यक होते हैं। जब ये तत्व संस्कृति में होंगे तो सम्यता स्वतः ही उन्नतशील होती जाएगी। यही तत्व मिलकर सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण भी बनाते हैं। चूंकि सम्यता का विकास निरंतर जारी रहता है, अतएव इसमें कुछ घातक तत्वों के प्रवेश की संभावना बराबर बनी रहती है। ऐसे में सभ्यता के कलंकित होने की गुंजाइश भी रहती है। दिग्भ्रमित होने का खतरा भी मंडराया करता है। ऐसो में संस्कृति ही सभ्यता और समाज का दिशाबोध कराने का काम करती है। यह संक्रमण को फैलने नहीं देती है। संस्कृति का शब्दिक अर्थ ही है स्वच्छ और परिष्कृत करना। यदि संस्कृति का नियंत्रण न हो, तो सभ्यता और समाज पथभ्रष्ट हो सकते हैं।

इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि किसी भी देश को अस्थिर करने के लिए, कमजोर और विघटित करने के लिए सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला किया जाता है। जब संस्कृतियां तहस-नहस होती हैं, तो सभ्यता भी कमजोर पड़ती है, समाज भी संक्रमित होता है और राष्ट्र का पराभव होने लगता है। इतिहास साक्षी है कि भारत पर ऐसे हमले न सिर्फ बराबर होते आए हैं, बल्कि आज भी जारी हैं। भले ही इन हमलों के रूप अलग हों। प्राचीन भारतीय संस्कृति पर मध्य काल में हमले हुए, अंग्रेजों ने भी हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहा। इसका असर भी पड़ा। आज आंग्ल संस्कृति का प्रभाव हमारी संस्कृति पर काबिज है। फिर भी इन झंझावातों के बीच हम अपनी संस्कृति पर कायम हैं तथा जो प्रभाव आक्रान्ताओं ने डाला उससे उबरने में भी लगे हैं। इसलिए सभ्यता के स्तर पर भी हम संक्रमित नहीं हो पाए हैं, क्योंकि कमारी उन्नत संसकृति का रक्षा कवच हमारे साथ है। इतना ही नहीं, संस्कृतियों के टकराव व संघर्ष से नजदीकियां भी बढ़ी हैं। अच्छे मूल्यों और उपयोगी तत्वों का आदान-प्रदान भी हुआ। ‘जो जिससे मिला सीखा हमने’ की तर्ज पर जो आत्मसात करने योग्य था, उसे किया और जिसे तजना था, तजा। हमारे ङ्केसास्कातिल दान के लिए कितनी मौजू है ये पक्तिया 

“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून हिन्दुस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।”

यही हिन्दुस्तानी दिल आधुनिक संदर्भो में हमारी संस्कृति की आत्मा है। सभ्यता और संस्कृति के मामले में हम अन्य देशों से बहुत आगे हैं। यही हमारी विरासत है। 

हमारे देश में सभ्यता और संस्कृति का संतुलन बहुत ही सुंदर है। हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण किए बिना बहुमुखी विकास की धाराएं भी बहाने में लगे हैं। उन्नत सभ्यता केलिए जो आर्थिक विकास और विस्तार जरूरी होता है, वह हम कर रहे हैं। कृषि और उद्योग-धंधों को विस्तार दे रहे हैं। विज्ञान के पथ पर भी हम मजबूती से कदम बढ़ा रहे हैं। हमारे युवा वैज्ञानिकों की मेधा से विकसित देश भौंचक हैं। इन सब के बीच हम अपनी संस्कृति से भी विमुख नहीं हुए हैं। यही कारण है कि हमारी सभ्यता की श्रेष्ठता दूसरे मुल्कों के लिए प्रेरक है। हमारी इस बहुमुखी अभिव्यक्ति में सांस्कृतिक हस्तक्षेप बरकरार है। यही हमारी विशिष्टता है। हमारी वह मानव चेतना विलुप्त नहीं हुई है, जिसे संस्कृति ने विकसित किया है। इसी वजह से हम सहिष्णु, धर्म व पंथ निरपेक्ष बने हुए हैं। विविधता में एकता की पनी विशिष्टता को बनाए रखते हुए दूसरों के लिए नजीर बने हुए हैं।

 हमारी संस्कृति और सभ्यता ने उन राष्ट्रों तक का ध्यान अपनी ओर खींचा है, जिनमें अपनी संस्कृति का बड़ा दंभ रहा और जो उस पर इतराते रहे। अहिंसा के उपासक व प्रबल पैरोकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती दो अक्टूबर को अकारण ही यूएनओ ने ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित नहीं कर रखा है। यह अहिंसा हमारी संस्कृति का सूक्ष्म तत्व है, जिसे विश्व व्यापक पहचान मिली है। हमारी सभ्यता में निहित यह वह मूल अवयव है, जिसके मर्म को सिर्फ हमने जाना। 

सांस्कृतिक कट्टरता संस्कृति की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। संस्कृति का सहिष्णु होना आवश्यक है। यह सभ्यता के निर्माण के लिए भी जरूरी है। दूसरी संस्कृतियों के अच्छे तत्वों को आत्मसात कर लेने में कोई बुराई नहीं है। इससे मेल-जोल भी बढ़ता है और सांस्कृतिक उन्नयन भी होता है। संस्कृति को एक दायरे में बांधना उचित नहीं है। दूसरी संस्कृतियों से मिलकर संस्कृति को व्यापकता देनी चाहिए। संस्कृति के दरवाजों कोखुला रखकर इसे और उन्नत और गतिशील बनाया जा सकता है। दो संस्कृतियों का मिलन भले ही दोस्ती या शत्रुता में ही क्यों न हो, कुछ न कुछ नया तो मिलता ही है, जिससे सभ्यता के विकास पर भी असर पड़ता है। 

हर सिक्के के दो पहलू वाली बात संस्कृति और सभ्यता पर भी लागू होती है। ब्रिटिश हमारे यहां व्यापार करने आए और करने लगे हुकूमत। उनका आक्रमण हमारी संस्कृति पर भी हुआ, मगर हमने अपनी संस्कृति को संकीर्ण नहीं होने दिया उनकी संस्कृति के कुछ तत्वों को हमने आत्मसात किया। वैज्ञानिक दृष्टि और विचारधारा हमें उनसे मिली, जिसका लाभ हमारी सभ्यता को भी मिला। हम आधुनिक जीवन-शैली की ओर उन्मुख हुए। इसी प्रकार यूनानियों और मुगलों के संपर्क से हमने स्थापत्य कला, चित्रकारी कला आदि के बारे में सीखा। धर्म और दर्शन पर भी प्रभाव पड़ा। गंगा-जमुनी संस्कृति हमारी पहचान बनी। भजन-कीर्तन ओर संगीत से एक नई धारा फूटी, जिसे सूफी दर्शन के नाम से जाना गया। इसमें हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियों के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं। कहने का आशय यह है कि संस्कृतियों के मिलन से बोलचाल, भाषा, पहनावा, विचार, ज्ञान-विज्ञान,रूचियों तथा कला आदि में संवर्धन होता है। इससे सभ्यता भी प्रखर होती है। 

जहां हमने दूसरी संस्कृतियों से अच्छे और सूक्ष्म तत्वों को ग्रहण किया, वहीं दूसरों को देने में हम बहुत आगे रहे। आज भी हमारी संस्कृति का डंका सारे विश्व में बज रहा है। लोग भारतीय संस्कृति की ओर उन्मुख हैं। अवसाद, नैराश्य और अशांति में डूबे पश्चिमी मुल्कों के लोग भारतीय संस्कृति में जीवन का रस और दर्शन खोज रहे हैं। वे हमारी संस्कृति के कायल हो रहे हैं और हमारी खूबियों को अपना रहे हैं। हमारी संस्कृति की जीवंतता और वैविध्य अन्हें आकर्षित कर रहा है। योग, शाकाहार, आध्यात्मिक चिंतन और उत्सवधर्मिता जैसी हमारी सांस्कृतिक विशिष्टताओं के करीब विदेशी तेजी से आ रहे हैं। इससे इनकी सभ्यता भी प्रभावित हो रही है। 

सांस्कृतिक जीवंतता की दृष्टि से हम सदा आगे रहे। यह हमारी सभयता में भी परिलक्षित होती है। संस्कृति ने जो रास्ते निर्धारित किए, उन्हीं पर सभ्यता आगे बढ़ी। संस्कृति हमारे आत्मिक विकास का साधन बनी, तो सभ्यता के जरिए हमने भौतिक विकास किया। संस्कृति हमारी विरासत है, तो सभ्यता हमारी पूंजी। आवश्यकता इसकी है कि हम इन दानों को इतना सहेज कर रखें कि जड़ता और स्थिरता इन्हें छू न सकें। ये निरंतर विकसित होती रहें, गतिशील रहें और अपनी विशिष्टताओं के माध्यम से अपनी सशक्त उपस्थिति समूचे विश्व में दर्ज करवाती रहें।

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