भारत की सांस्कृतिक एकता पर निबंध | भारत की मौलिक एकता पर निबंध

भारत की सांस्कृतिक एकता पर निबंध

भारत की सांस्कृतिक एकता पर निबंध | भारत की मौलिक एकता पर निबंध (यूपी आरओ/एआरओ मुख्य परीक्षा, 2017) 

भारत की सांस्कृतिक एकता पर चर्चा करने से पूर्व यह जान लेना अत्यंत आवश्यक होगा कि संस्कृति’ क्या है? वस्तुतः संस्कृति का निर्माण संस्कारों से होता है। हम कह सकते हैं कि संस्कारों का विकसित या घनीभूत स्वरूप ही संस्कृति है। संस्कार जैसे होंगे, संस्कृति का स्वरूप भी वैसा ही होगा। 

संस्कारों की दृष्टि से भारतीय जनमानस आदिकाल से ही अत्यंत समृद्ध रहा है। जब दुनिया के तमाम देशों में सभ्यता का अंकुर फूटा भी न था, उस समय हम सुसभ्य थे और सभ्यता व संस्कृति के लिहाज से अत्यंत समृद्ध थे। वैदिक काल तो सांस्कृतिक उत्कर्ष का काल था। भारत ने अपनी सांस्कृतिक समृद्धता के बल पर ही विश्व में ‘विश्व गुरु’ की पहचान कायम की। 

 चूंकि हमें उदार व सहिष्णु संस्कार मिले, अतएव निरंतर हमारी संस्कृति में उदात्तता व उदारता का समावेश भी होता गया और हमारी सांस्कृतिक उदारता ही हमारी पहचान बनी। हमने बहुत पहले ही ‘वसधैव कटम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादन किया। इसे संस्कार के रूप में जिया और समय-समय पर इसके उदात्त दृष्टांत भी प्रस्तुत किये। फलतः विविधता के बाद भी हम सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बंधे रहे। देश में सांस्कृतिक एकता के अटूट बंधन ने हमारी सांस्कृतिक विरासत को मजबूती दी। 

“भारतीय संस्कृति विशिष्ट है। विविधता के बावजूद इसमें सामूहिक एकता के प्रबल तत्व हैं। ‘हम एक हैं और एक रहेंगे’ का संदेश इसमें निहित है।” 

स्व. प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू कहा करते थे कि विविधताओं के बावजूद हममें एकता है। वह भारत की सांस्कृतिक एकता की ही बात करते थे। निःसंदेह भारत विविधताओं से भरा देश है। यह विविधता भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक, भाषाई हर स्तर पर परिलक्षित होती है। 

भारत में जहां हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं हिमालय के रूप में मौजूद हैं, वहीं राजस्थान में मरुस्थलों का बोलबाला है। मैदान हैं तो पठार भी हैं, दोआब हैं, तो समंदर के किनारे भी हैं। घने जंगल और बीहड़ भी कम नहीं हैं। जाहिर है, यह भौगोलिक विविधता, सामाजिक विविधता को भी जन्म देती है। राजस्थान का पहनावा, रहन-सहन, खान-पान व रीति-रिवाजें वैसे नहीं हैं, जैसी की उत्तराखण्ड में रहने वालों की हैं। इसी प्रकार बंगाल के लोगों का जो पहनावा, रहन सहन, खान-पान व रीति-रिवाज है, वह पंजाब के लोगों में नहीं है। कर्नाटक व तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों के बाशिंदों का रहन सहन उत्तर प्रदेश के लोगों से नितांत भिन्न है। यहां तक कि भौगोलिक विविधता ने शारीरिक संरचना तक को विविधता प्रदान की है। रंग रूप, भेष-भाषा के स्तर पर जबरदस्त भिन्नता देखने को मिलती है। पंजाब का मूल निवासी अलग पहचान में आ जाता है, तो बंगाल का अलग। 

भाषाएं हमारे यहां अनेक हैं। क्षेत्र विशेष का प्रभाव भाषा पर साफ दिखता है। इस पुरानी कहावत में भारत की विविधता के ही दर्शन होते हैं—’कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।’ बानी यानी भाषाएं अनेक हैं, तो इसका प्रभाव साहित्य पर भी दिखता है। हर भाषा का अपना अलग-अलग रचना संसार है, साहित्य है, जिसकी श्रीवृद्धि उस भाषा विशेष के सर्जक किया करते हैं। 

धार्मिक स्तर पर भी हम विविधता को आत्मसात किये हुए हैं। हम धार्मिक स्तर पर अत्यंत सहिष्णु व उदार हैं और हर धर्म को सम्मान देते हैं। यही कारण है कि भारत में तमाम धर्म के लोग आए, पुष्पित-पल्लवित हुए और मिल-जुल कर भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाते रहे। 

जिस धर्म निरपेक्षता की बातें आज हो रही हैं या जिस धर्म निरपेक्षता को कतिपय विद्वान पश्चिम की देन बताते हैं, वह तो सदियों-सदियों से हमारी माटी में रची-बसी है। हमने हमेशा दूसरों को गले लगाया है, उन्हें सम्मान दिया है। भारत का ढांचा ही धर्मनिरपेक्षता पर टिका है। ‘काफिले बसते गये, हिन्दोस्तां बनता गया।’ जाहिर है, बगैर सहिष्णुता व उदारता के हिन्दोस्तां नहीं बन गया। अनेक धर्मों वाला देश है भारत, और जिस धर्म निरपेक्षता की बातें आज होती हैं, या जिसे स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान में सम्मिलित किया गया, वह तो हमारे यहां प्राचीनकाल से विद्यमान है। चाहे सूफी संत हों या अकबर जैसे शहंशाह सभी ने सर्वधर्म समभाव का ही पाठ पढ़ाया और मानवीय दृष्टिकोण को मजबूत बनाया। अशोक और हर्ष जैसे सम्राटों ने भी विभिन्न धर्म के विद्वानों की सभाएं करवायी और सभी धर्मों के प्रति आदर-भाव हेतु प्रेरित किया। 

यही जो हमारी सांस्कृतिक विरासत है, वह हमारी सांस्कृतिक एकता की सूत्रधार है। रंग, रूप, भेष, भाषा आदि स्तरों पर हम भले ही अलग हैं, पर इन तमाम विविधताओं को हमने एकता के धागे में पिरोकर रखा है और विविधताओं के बावजूद हमारी सांस्कृतिक एकता सर्वोपरि है।

जिस देश में इतनी विविधता हो, वहां सांस्कृतिक एकता की बात थोड़ा दुष्कर जरूर लगती है, पर इस सोच वालों को भारत आमंत्रण देता रहा है, अपनी सांस्कृतिक एकता को सामने रखकर। भारत की संस्कृति प्रेम के संस्कारों पर खड़ी है। विभिन्न धर्मों, विश्वासों, आस्थाओं, रीति-रिवाजों, संस्कारों, परम्पराओं, संगीत, कलाओं, साहित्य व लोक-कलाओं से मिलकर बनी है भारतीय संस्कृति। सच पूछा जाये तो जिस प्रकार नदियों के समागम स्थल ‘संगम’ को देखने के बाद नदियों के अलग-अलग जल की पहचान नहीं की जा सकती, उसी प्रकार भारतीय संस्कृति भी संगम है, विविधता का। 

भारतीय संस्कृति विशिष्ट है। विविधता के बावजूद इसमें सामूहिक एकता के प्रबल तत्व हैं। ‘हम एक हैं और एक रहेंगे’ का संदेश इसमें निहित है। हम धार्मिक ग्रंथों को न सिर्फ पूज्य मानते हैं, बल्कि दसरे धर्मों पर भी हमारी आस्था और विश्वास है। मजारों व गुरुद्वारों में हिन्दू-मुसलमान सभी जा सकते हैं। 

भारत की संस्कृति तो आत्मज्ञान पर केन्द्रित है और जब आत्म प्रकाश होता है, तो कोई पथभ्रष्ट कैसे हो सकता है या संकीर्ण होकर आचरण कैसे कर सकता है। हमने ‘जियो और जीने दो’ की संस्कृति को विकसित किया है। हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसा नहीं है कि इस पर आघात न किये गये हों। हमारे बीच में ही कुछ संकीर्ण, असहिष्णु, कट्टर और धर्मांध किस्म के लोगों ने समय-समय पर हमारी संस्कृति की जड़ पर कुठाराघात किया, पर इन्हें मुंह की खानी पड़ी। 

आज फिर भारत की सांस्कृतिक एकता के समक्ष चुनौतियां – खड़ी हो रही हैं और आतंकवाद, अलगाववाद व साम्प्रदायिकता के हमले भारतीय संस्कृति पर बढ़ गये हैं। वस्तुतः आजादी से पूर्व ही धार्मिक कट्टरता पनपने लगी थी और धर्म को आधार बनाकर संगठन खड़े किये जाने लगे थे। सन् 1906 में साम्प्रदायिक आधार पर मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, तो कट्टरपंथी हिन्दुओं में भी सुगबुगाहट बढ़ी, प्रतिक्रिया स्वरूप सन् 1916 में हिन्दू महासभा का गठन हो गया। धर्म व सम्प्रदाय की आग को अंग्रेजों ने भड़काने का काम किया और साम्प्रदायिक आधार पर भारत बँट गया। हिन्दुस्तान पाकिस्तान बन गये। भारतीय संस्कृति व रवायत पर यह एक करारा झटका था। इसके बाद भी विघटनकारी, फिरकापरस्त ताकतें सिर उठाती रहीं। और समय-समय पर हमारी संस्कृति को क्षति पहुंचाती रहीं। हाल के दौर में भी इसमें तेजी आई और अलगाववादी शक्तिया ने विघटनकारी गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर दिया तथा धम व निजी स्वार्थ की घुट्टी पिलाकर युवा पीढ़ी को बरगलाना शुरू कर दिया। आतंकवाद के रूप में हमारी संस्कृति को एक नयी चनौती मिली, खालिस्तान की मांग उठी, कश्मीर की मांग उठी, नक्सलियों के उत्पात बढ़े और भूमंडलीकरण ने भी भारतीय संस्कृति को चुनौती दी। संस्कृति पर वैचारिक हमला भी हुआ और पश्चिमी संस्कृति ने अपने पांव पसारने शुरू किये। जो संस्कृति परस्पर मेल-मिलाप से विकसित हुई थी, उसकी जड़ों में अलगाव का जहर डालने का काम कुछ विकृतचित लोगों ने जिन्हें राष्ट्रद्रोही की संज्ञा दी जा सकती है, शुरू कर दिया। क्षेत्रीयता और जातिवाद का हमला भी भारतीय संस्कृति पर हुआ, जिसमें राजनीतिज्ञों की भूमिका निहायत खराब रही। 

कट्टरता, असहिष्णुता, संकीर्णता न कभी भारत की संस्कृति का हिस्सा थी और न ही कभी उस पर छा पायी। हमारी संस्कृति की जड़ों को नैतिकता से सींचा गया है। 

हमारी संस्कृति पर विदेशियों ने हमला किया। उनकी नजर भारत की अकूत प्राकृतिक सम्पदा पर थी। मल्टीनेशनल कंपनियां स्वदेशी के सफाये पर उतर आयीं। आधुनिकीकरण की भी हवा चली। कुल मिलाकर भारत की न सिर्फ संस्कृति पर हमले तेज हुए, बल्कि हमारे राष्ट्रवाद व हमारी पहचान को भी धूमिल करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। हममें से कुछ ने धर्म और परंपरा का राजनीतिकरण शुरू कर दिया। संस्कृति के समानान्तर एक अपसंस्कृति को पनपने की कुचेष्टाएं और कुचक्र भी मौजूदा दौर में हो रहे हैं। अविवेकी राजनीति व धर्माधता, धर्म के उस स्वरूप को नष्ट कर रहे हैं, जो सबके लिए मंगल कामना करता है। विभिन्न विचारा व मान्यताओं का जो सहअस्तित्व समन्वय के रूप में हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग था, उसे बिगाड़ने की कोशिशें जारी हैं। 

पर हमारी वृक्ष रूपी संस्कृति की जड़ें इतनी आसानी से खोद पाना संभव नहीं है। गंगा में नाले भी मिलकर पवित्र हो जाते हैं। हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति हमारी विरासत है और यह विरासत हमसे इतनी आसानी से छीनी भी नहीं जा सकती है। जो यह करेगा वह मुंह की खाएगा। ये थपेड़े जो हमारी संस्कृति से टकरा रहे हैं, नष्ट हो जाएंगे और संस्कृति और परिमार्जित होती रहेगी। भारत की सांस्कृतिक एकता पुरानी है। हमने आदान-प्रदान से इसे संवारा-सजाया है। हमारे साहित्य में हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति बोलती है। 

हमने हमेशा सर्व कल्याण की कामना की है। हमारी सांस्कृतिक एकता अनूठी है। हमें इस पर गर्व है। जो संस्कृति हजारों वर्षों से सतत् और अवच्छिन्न है, उसे यूं मिटाया या बिगाड़ा नहीं जा सकता। यही हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता भी है। कट्टरता, असहिष्णुता, संकीर्णता न कभी भारत की संस्कृति का हिस्सा थी और न ही कभी उस पर छा पायी। हमारी संस्कृति की जड़ों को नैतिकता से सींचा गया है। विविधता | के बावजूद हम एकता और एकरूपता की डोर में बंधे हैं और यह बंधन | स्पष्ट है। एक खुशबू की तरह हमारी उदात्त संस्कृति की गमक पूरे देश में | फैली है। तात्कालिक कुछ नकारात्मक घटनाओं व प्रभावों ने जो धुंध | हमारी सांस्कतिक एकता पर छा रखी है, उसे फाड़ना होगा और इसके लिए बस जरूरी इतना है कि हम अपनी सांस्कृतिक एकता के प्रति न सिर्फ सजग, चेतन व सक्रिय रहें, बल्कि पूर्णतः समर्पित भी रहे। 

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