राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध |राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उपाय | राजनीति का अपराधीकरण का अर्थ | Essay on Criminalization of Politics

राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध

राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध |राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उपाय | राजनीति का अपराधीकरण का अर्थ |Essay on Criminalization of Politics

राजनीति का अपराधीकरण (Criminalisation of Politics) –देश की राजनीति में बढ़ते अपराध की दस्तकों ने हमारे समक्ष अनेक चुनौतियां पैदा की हैं। राजनीति के अपराधीकरण के रूप में जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आई है, वह है लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति घटता विश्वास। राजनीति पर अपराधियों के बढ़ते वर्चस्व के कारण विश्वास का यह संकट बढ़ा है। लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है और विडंबना यह है कि राजनीति के अपराधीकरण के कारण जनता का ही विश्वास इस पर से डगमगाने लगा है। स्थिति इस हद तक बिगड़ चुकी है कि हम ‘जनतंत्र’ को ‘गन तंत्र’ कहने लगे हैं। ‘मनी’, ‘माफिया’ और ‘मसल्स’ को राजनीतिक सफलता का आधार माना जाने लगा है। 

यह विडंबना ही है कि जिस देश में महात्मा गांधी जैसे महान दार्शनिक एवं राजनीतिक चिंतक ने धार्मिक विश्वासों- आस्तिकता, ईश्वर में अगाध श्रद्धा, आत्मबल की प्रधानता और श्रेष्ठता, अद्वैत की कल्पना, सर्वत्र चराचर जगत में एक ही सत्ता का व्याप्त होना, अहिंसा, सत्य, अस्तेय एवं अपरिग्रह आदि के सिद्धांतों को राजनीति के क्षेत्र में लागू किया हो, उस देश की राजनीति आज आपराधिक छवि के नेताओं एवं दागी मंत्रियों के कारण जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं कर पा रही है। 

लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है और विडंबना यह है कि राजनीति के अपराधीकरण के कारण जनता का ही विश्वास इस पर से डगमगाने लगा है। स्थिति इस हद तक बिगड़ चुकी है कि हम ‘जनतंत्र’ को ‘गन तंत्र’ कहने लगे हैं। 

भारत में राजनीति के अपराधीकरण की जड़ें काफी गहरी और पुरानी हैं। प्राचीन भारत में राजतंत्र के अलावा गुटतंत्र (Oligar chies) एवं गणतंत्र (Republics) भी अस्तित्व में थे, किन्तु प्रधानता राजतंत्र की थी। राजा निरंकुश न हो, इसीलिए राजनीति पर धर्म का अंकुश था, तथापि अनेक ऐसे पौराणिक दृष्टांत हमारे धर्मशास्त्रों में मिलते हैं, जिनमें राजाओं या शक्तिसम्पन्न लोगों ने ऐसा आचरण किया, जो अपराध की परिधि में आता था। विविध कालखंडों में राजनीति में अपराध विविध रूपों में व्याप्त रहा और मौजूदा समय में यह अपने भयावह रूप में सामने है। अपराधी से ‘माननीय’ बनने का चलन भारतीय राजनीति में बढ़ गया है। 

राजनीति में आपराधिक संरक्षणवाद की पहली घटना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के रूप में सामने आई और फिर शनैः-शनैः राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया घनीभूत होती गई। पिछले तीन दशकों में राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से शुरू हुई। इन तीन दशकों में जिस तरह से राजनीतिक आदर्श छिन्न भिन्न हुए, वह चिंतनीय है। इस दौर में भारतीय राजनीति के वीभत्स एवं आपराधिक चेहरे की पुष्टि ‘बोहरा समिति’ और ‘श्रीकृष्णा आयोग’ की रिपोर्टों से होती है। राजनीति और अपराध का गठजोड़ अनैतिक तरीकों से सत्ता हथियाने और सत्तासुख प्राप्त करने के लिए हुआ। चुनाव परिणामों को प्रभावित करने तथा बलपूर्वक सत्ता पाने की कुत्सित लालसा ने अपराधियों को राजनीतिज्ञों के करीब ला दिया। चुनावों में बाहुबल और काले धन का बोलबाला बढ़ गया। उचित-अनुचित की परवाह किए बगैर अपराधियों की मदद ली जाने लगी और उन्हें उपकृत करने के लिए सत्ता के माध्यम से उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाए जाने लगे। जिन्हें कैदखानों के सीखचों के पीछे होना चाहिए था, वे ‘किंगमेकर’ की भूमिका में राजनीति के क्षितिज पर मजबूती से जम गये। यहीं से स्थिति और बिगड़नी शुरू हुई। अपराधियों को लगा कि जब वे दूसरों की मदद कर उन्हें सत्ता सुख दिलवा सकते हैं, तो सीधे सीधे खुद ही इस सुख को क्यों न भोगें। इस अवधारणा के विकसित होने के बाद अपराधियों ने नेपथ्य से अपनी भूमिका को लगाम दी और सीधे-सीधे राजनीति के मंच पर वे सामने आ गये। इस संदर्भ में राजनीतिक पार्टियों ने भी नितांत अगंभीरता और एक तरह से देखा जाए तो ‘राजनीतिक अराजकता’ का परिचय देना शुरू किया। प्रत्याशियों के लिए अपराधियों की तलाश की जाने लगी। 

अपराध की राजनीति को बढ़ावा देने में मतदाता भी दोषी हैं। जिसे हम अपने प्रतिनिधि के रूप में सदन में भेजते हैं, उसके चरित्र, छवि, पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व का यथेष्ट मूल्यांकन नहीं करते हैं। हम जानते हैं कि जो स्वयं अलोकतांत्रिक हैं, वे लोकतंत्र की रक्षा क्या करेंगे, तथापि हम अपने ‘चयन’ से राजनीति के अपराधीकरण को प्रोत्साहित करते हैं। हालांकि यहां पर मतदाता को पूरे तौर पर दोषी ठहराना उचित नहीं है, क्योंकि वह विकल्पहीनता का शिकार है। उसके पास कोई विकल्प नहीं है। जब सभी चेहरे एक जैसे ही हों, तो उन्हीं में से किसी एक का चयन मतदाता की विवशता बन जाता है। स्थिति इतनी विकट है कि भारतीय राजनीति में शरीफ इंसान की कोई अहमियत ही नहीं रही। वह हाशिये पर है। कितना मौजूं है शायर मुनव्वर राना का ये शेर- 

शरीफ इंसान आखिर क्यों इलेक्शन हार जाता है किताबों में तो ये लिक्खा है कि रावण हार जाता है। 

राजनीति के अपराधीकरण के दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आम जनता की लोकतंत्र में आस्था घट रही है। लोकतंत्र की जीवंतता के लिए यह आवश्यक है कि शत-प्रतिशत मतदान न होने की वजह से विकास भी प्रभावित हो रहा है, क्योंकि मतदान और विकास का मजबूत रिश्ता है। चुनावों में काले धन के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसी दुरभि संधियां एवं सांठ-गांठ होती हैं, जो देश को खोखला बनाती हैं। भ्रष्टाचार का बढ़ता बोलबाला एवं मारक महंगाई इसी सब की देन है। अपराध और राजनीति के गठजोड़ ने अनैतिकता, अविश्वसनीयता, भ्रष्टाचार, अराजकता, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी तथा अलगाव एवं आतंक को बढ़ाया है, जिसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है। वह आहत है, हताश और त्रस्त है। 

राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण के बीच इसकी रोकथाम के प्रयास भी हो रहे हैं। चुनाव आयोग, इस समस्या या यूं कहें कि लोकतांत्रिक संकट को लेकर फिक्रमंद है। अदालतें भी गंभीर हैं। 29 जून 2002 को चुनाव आयोग द्वारा संसद तथा विधानमंडलों की सदस्यता हेतु चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए आपराधिक मामलों में मिली सजा, न्यायालय में लंबित आपराधिक मामलों की स्थिति, प्रत्याशी एवं उसके निकटतम संबंधियों की संपत्ति एवं आय का ब्यौरा, प्रत्याशी की शैक्षिक योग्यता आदि की घोषणा शपथ पत्र पर नामांकन के समय देने का दिशा निर्देश जारी किया गया। इसके अलावा 2019 के आम चुनाव में उम्मीदवारों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि वे अपने ऊपर लगे मुकदमों को लेकर विज्ञापन निकलवाएं। इसी प्रकार ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951′ उन अपराधों का उल्लेख है, जिनके आरोप में सजा पाए व्यक्ति को चुनाव हेतु अयोग्य माना जा सकता है। इस अधिनियम की धारा 8 में यह प्रावधान है कि भारतीय दंड संहिता, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, सीमा शुल्क अधिनियम, विदेशी मुद्रा (विनियमन) अधिनियम, विधि विरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम, आतंकवादी और विध्वंसकारी क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम, धार्मिक संस्था (दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम आदि के अन्तर्गत किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया व्यक्ति दोषसिद्धि की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक चुनाव के लिए अयोग्य माना जाएगा। अधिनियम की धारा 8(3) में यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति उपरोक्त अपराधों से भिन्न किसी अपराध के लिए सिद्ध दोष ठहराया गया हो तथा न्यूनतम दो वर्ष की सजा पाता है, तो वह दोषसिद्धि की तारीख से चुनाव के लिए अयोग्य माना जाएगा तथा वह अपने छोड़े जाने की तिथि से आगामी छह वर्ष की अतिरिक्त कालावधि के लिए अयोग्य होगा। 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में राजनीति में आपराधिक छवि के व्यक्तियों के प्रवेश को रोकने के लिए उपाय तो भरपूर किये गये हैं, किंतु लचीले कानून का लाभ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उठाते हैं। अपील के आधार पर छूट मिल जाती है। हालांकि पिछले दिनों माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील के आधार पर प्रत्याशियों को छूट दिए जाने को अवैधानिक घोषित किया जा चुका है। 1.2 जनवरी 2005 को प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय खंडपीठ ने राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने वाली इस व्यवस्था का प्रतिपादन किया। वर्ष 2013 के जुलाई माह में अपना फैसला सुनाते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि दो साल की सजा पाने वाले किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता रद्द की जा सकती है तथा जेल में बंद नेता को चुनाव से वंचित किया जा सकता है। अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उस धारा 8(4) को भी निरस्त कर दिया जो सरकार द्वारा वर्ष 1989 में बनाई गई थी तथा जिसमें यह प्रावधान था कि दोषी उच्च अदालत में अपील कर सदस्य बना रह सकता है। राजनीतिज्ञों को कोर्ट की यह व्यवस्था रास नहीं आई। सभी राजनीतिक दल इसके खिलाफ लामबंद होकर जहां कानून में संशोधन की बात करने लगे, वहीं संसद में बुलाई गई एक सर्वदलीय बैठक में न सिर्फ कोर्ट के फैसले पर असहमति जताई, बल्कि यह भी राय बनी कि ‘दागी नेता’ किसे कहा जाएगा यह कोर्ट नहीं, संसद तय करेगी। इससे समझा जा सकता है कि हमारे देश में राजनीति के अपराधीकरण से जुड़ी स्थितियां कितनी गंभीर हैं और प्रायः सभी राजनीतिक दल अपराधीकरण के दलदल में आकंठ डूबे हैं 

ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति पर आच्छादित अपराध के कुहासे को हटाया नहीं जा सकता। यह काम सिर्फ चुनाव आयोग के बूते संभव नहीं है। इस समस्या से निजात के लिए समग्र प्रयासों की जरूरत है। राजनीतिज्ञों, राजनीतिक दलों को आत्मनिरीक्षण कर अपने आचरण में सुधार लाकर जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी। जनता को जागना होगा तथा अपनी शक्ति एवं मतदान की ताकत से अवगत करवाना होगा। 

ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति पर आच्छादित अपराध के कुहासे को हटाया नहीं जा सकता। यह काम सिर्फ चुनाव आयोग के बूते संभव नहीं है। इस समस्या से निजात के लिए समग्र प्रयासों की जरूरत है। राजनीतिज्ञों, राजनीतिक दलों को आत्मनिरीक्षण कर अपने आचरण में सुधार लाकर जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी। जनता को जागना होगा तथा अपनी शक्ति एवं मतदान की ताकत से अवगत करवाना होगा। साथ ही न्यायिक सक्रियता को भी बढ़ाना होगा। यदि सम्मिलित प्रयास किए जाएं तो सूरत बदलने में देर न लगेगी और दुनिया का यह सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश राजनीतिक शुचिता और पारदर्शिता के लिए जाना जाएगा। 

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