राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध |Essay on Criminalization of Politics in Hindi

राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध

राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध |Essay on Criminalization of Politics in Hindi

भारतवर्ष में प्रस्तुत राजनीतिक वातावरण अधिकांशतः अपराधमय हो गया है. राजनीति और अपराध परस्पर इतने घुलमिल गए हैं कि इनके मध्य स्पष्ट विभाजक-रेखा खींचना बहुत कठिन हो गया है. राजनीति में बढ़ते अपराध पर या तो फातिहे पढ़े जाते रहे हैं अथवा नेतागण पाखण्डपूर्ण बयान देते रहते हैं अथवा घड़ियाली आँसू बहाते रहते हैं. आज स्थिति यह है कि बुद्धिजीवी राजनीति में प्रवेश करने से डरता है अथवा भयभीत होकर एक ओर चुपचाप बैठ गया है. जो लोग प्रवेश करते हैं अथवा उसमें टिके रहना चाहते हैं उनके लिए आवश्यक हो गया है कि वे अपराध-जगत् का सहयोग लें. आज हालत इतनी गम्भीर है कि राजनेताओं ने चुनाव बूथों पर कब्जा करने और मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए मुस्टंडों को पालते हैं. कोढ़ में खाज यह है कि ये मुस्टंडे कालान्तर में अपने मालिकों को ही धकिया कर स्वयं राजनीति में आ रहे हैं. ‘घूसन सिखई तोहि खाँउ’ वाली बात चरितार्थ हो रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में राजनीतिक जगत में शरीफ आदमी की जान आफत में हो गई है. 

विदेश से प्रकाशित होने वाले कई समाचार-पत्र प्रायः इस तरह की बातें प्रकाशित करते रहते हैं कि भारत के बारे में चर्चा करने का अर्थ अपराध और अपराधियों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखना है. विदेशी अखबार नवीसों की यह बात हमको भले ही कितनी भी बुरी लगे, परन्तु है बहुत कुछ सच. विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न स्तरों के होने वाले घोटालों एवं भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचार हमको यह बताते हैं कि वर्तमान समय में हमारी राजनीति का पूरी तरह अपराधीकरण हो चुका है, राजनीति और अपराध परस्पर इतने घुल-मिल गये हैं कि उनके मध्य लक्ष्मण रेखा खींचना असम्भव प्राय हो गया है—उनको एक-दूसरे से अलग करने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है. स्थानीय निवास से लेकर संसद तक के हमारे जन प्रतिनिधियों की छवि धूमिल हो चुकी है. अपवादों की बात छोड़ दीजिए, वे हर जगह रहते हैं. अस्तु. 

भयावह तस्वीर 

आज राजनीति में टिके रहने के लिए यह आवश्यक सा बन गया है कि अपराध-जगत् का सहयोग प्राप्त किया जाए. फलतः भारत की राजनीति में आज अनेक जाने माने अपराधी प्रतिष्ठित हो चुके हैं. प्रायः प्रत्येक राजनीतिक दल के नेता अन्य राजनीतिक दलों को माफियाओं का गिरोह बताते रहते हैं. 

हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारे राजनीतिक जीवन में अपराधवृत्ति का समावेश आरम्भ से ही रहा है. सन् 1948 में जयपुर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन में भ्रष्टाचार वाली बात सर्वप्रथम सामने आई थी. इसकी चर्चा करने वाले श्री महेशदत्त मिश्र को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से बाहर निकाल दिया गया था. उसके बाद जीप घोटाला सामने आया. उसको भी दबा दिया गया. 

सन् 1952 से भारतीय संविधान के अनुसार चुनावों की प्रक्रिया चली. संविधान की ओट में सभी प्रकार के व्यक्ति चुनावों में भागीदारी करने लगे और लोक व्यवहार की अनेक मर्यादाएँ टूटने लगी. स्थिति यह बन गई कि संविधान की शपथ लेने वाले व्यक्ति ही अपराध करने लगे. इस दुमुँही राजनीतिक परम्परा ने राजनीति और अपराध जगत का चोली-दामन का साथ कर दिया. उल्लेखनीय यह है कि अपराध और भ्रष्टाचार के प्रश्न को संसद में उठाने वाले सांसदों को दो बार बुरी तरह झिड़क दिया गया था. एक बार स्व. पं. जवाहरलाल नेहरू ने यह कह कर बोलने वाले को चुप कर दिया था—इन बातों को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर कहना बेहूदगी है. दूसरा अवसर तब था, जब स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी ने यह कह कर बात टाल दी थी कि भ्रष्टाचार तो अन्य देशों में भी है. अस्तु, विडम्बना यह है कि पुलिस के संरक्षण में येन केन प्रकारेण चुनाव सम्पन्न करा लेने को ही लोकतंत्र का सर्वस्व माना जाने लगा है और कहा जाने लगा है कि भारत में लोकतन्त्र की जड़ें जम गई हैं, जबकि यह भुला दिया गया है कि लोकतन्त्र के साथ अपराध-जगत् भी अपने को कितनी गहरी नींव देता जा रहा है. 

उत्तर प्रदेश की तस्वीर यह है कि यहाँ 1998 के लोकसभा चुनावों के दौरान कोई 100 गिरोह सक्रिय थे, जिनके लगभग 5000 लोग पूरे राज्य में जगह-जगह फैले हुए थे. लोक सभा चुनाव के अवसर पर इनमें से लगभग 100 व्यक्ति बमुश्किल जेल के सींखचों के पीछे भेजे जा सके थे. जबकि इतने ही लोग जमानत पाने में सफल हो गये थे. लगभग 300 व्यक्तियों के बारे में कहा गया था कि इनका कहीं पता नहीं चल रहा है. इस अवसर पर उ. प्र. में लगभग 5 लाख 25 हजार हथियार जमा कराए गए थे. यदि ये हथियार जमा न कराए गये होते, तो बूथों पर अधिकार करने के आँकड़े क्या होते ? फिर भी सैकड़ों अवैध बन्दूकें, पिस्तौल, देशी कट्टे और कारतूस पकड़े गये. इसके पाँच माह बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में अपराधियों और हथियारों का ग्राफ और भी ऊपर उठ गया था. निष्कर्ष स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में चुनावों में कुछ अपराधी तो सीधे ही उतर गये तथा कुछ ने चुनाव में सफलता प्राप्ति हेतु अपराधियों का सहारा लिया. बिहार के जातिवादी राज्य में स्थिति इससे भी अधिक भयावह है—वहाँ जातिवाद को सामंतवाद का संरक्षण प्राप्त है, वहाँ फर्जी वोट डाल लेना एक आम बात है. उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनावों के अवसरों पर लाठियों, बल्लमों, कट्टों आदि का बाहर निकल आना एक सामान्य घटना है, महाराष्ट्र में चुनावों में अण्डरवर्ल्ड माफिया गिरोहों के कार्यकर्ता पोशाकें बदलकर अपने उम्मीदवारों के लिए काम करते हैं, और कई ‘दगड़ी चालें चुनावों में भूमिका निभाती हैं.’ इस प्रकार एक ओर तो अपराधियों को पूर्ण राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, और दूसरी ओर सामाजिक वातावरण अधिकाधिक दूषित होता जा रहा है. इतना ही नहीं, प्रशासनिक तंत्र भी पूरी तरह इसकी चपेट में आ गया है. वह मूकदर्शक भी बन गया है तथा दूषित भी हो गया है. आज आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अनेक व्यक्ति राजनीति में सक्रिय दिखाई देते हैं. प्रायः समस्त राजनीतिक दल लोक सभा अथवा विधान सभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपराधियों को खुलेआम टिकट देते हैं. वर्षों तक अण्डरवर्ल्ड के सरगना रहे लोग अपनी नई पार्टियाँ बनाकर जनता के नायक बन गये हैं. इतना ही नहीं, अनेक अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है. ये लोग फल-फूल तो रहे ही हैं, साथ ही सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण को दूषित कर रहे हैं. परिणाम यह हुआ है कि प्रशासनिक तंत्र या तो मूकदर्शक बन गया है अथवा वह आपराधिक अपराधी गठजोड़ की कठपुतली बन कर रह गया है. इस स्थिति की भयावहता का अन्दाज इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व निर्वाचन आयुक्त श्री. बी. जी. कृष्णमूर्ति ने कहा कि “कानून तोड़ने वाले लोग ही कानून बनाने वाले लोग होते जा रहे हैं. मजे की बात यह है कि प्रत्येक राजनीतिक दल अन्य समस्त दलों को माफियाओं का दल बताता है. इसका कौन जवाब देगा कि शराफत का गबन कहाँ हो रहा है? जो भी हो, स्वस्थ लोकतान्त्रिक विकास में यह प्रवृत्ति एक अत्यन्त सकारात्मक भूमिका अदा करती रहती है.”

नैतिक पतन का कारण आपराधिक अथवा अपवित्र राजनीति 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद प्रथम तीन आम चुनावों तक तो ऐसा प्रतीत होता था कि भारत में स्वस्थ लोकतन्त्र की स्थापना हो गई है और वह इस देश में गहरी जड़ें पकड़ता जा रहा है, परन्तु सन् 1967 के बाद के निर्वाचनों में उक्त धारणा का खण्डन ही नहीं हुआ है, बल्कि भारतीय राजनीति में नैतिक एवं चारित्रिक पतन जड़ें पकड़ता जा रहा था. इस प्रक्रिया का आरम्भ तब हुआ, जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपनी स्थिति सुरक्षित रखने के लिए गांधी और नेहरू की पार्टी अखिल भारतीय कांग्रेस के भविष्य को दाँव पर लगा दिया. पहले उन्होंने मोरारजी देसाई, निजलिंगप्पा सदृश पुराने कर्मठ स्वतन्त्रता सेनानियों को कांग्रेस छोड़ने पर विवश किया और उसके बाद राष्ट्रपति के चुनाव में जिन लोगों ने श्री संजीव रेड्डी के नाम का प्रस्ताव किया, मतदान के समय उन्हीं के विरुद्ध वोट दिया और अन्य लोगों से वोट दिलवाये. नैतिक एवं राजनीति चारित्रिक पतन के इस अभूतपूर्व उदाहरण ने राजनीति को इस कदर गंदा कर दिया, जिसकी सफाई करना आज असम्भवप्राय बन गया है. 

उसके बाद श्रीमती गांधी ने सन् 1975 में आपातकाल की घोषणा करके तथा तानाशाही का ताण्डव करके भारत के अशिक्षित एवं निरीह देशवासियों को प्रकारान्तर से यह बता दिया कि लोकतंत्र का यह भी एक रूप हो सकता है. उनकी अकाल मृत्यु के बाद वंशवाद की राजनीति के समर्थकों ने उनके पुत्र श्री राजीव गांधी को नेतृत्व प्रदान कर दिया. राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व में राजनीतिक शून्यता का वातावरण बन गया.

आपातकालीन स्थिति की समाप्ति के बाद होने वाले चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गांधी पराजित हो गई थीं. दुबारा शक्ति में आने के लिए अपने बेटे संजय गांधी की सहायता से उन्होंने कतिपय असामाजिक तत्त्वों को एकत्र किया और चुनावों के समय उन्हें राजनीति में उतार दिया. उनमें कई व्यक्ति चुनावों में विजयी हुए. इस प्रकार अपराधियों के राजनीति में सक्रिय होने की अस्वस्थ परम्परा चल पड़ी. राजनीति में मुस्टंडों के आगमन की यही पृष्ठभूमि है. अपराधीकरण के सहायक रूप में आर्थिक घोटालों की परम्परा चल पड़ी, जिनसे भारत का बच्चा-बच्चा अवगत है. रिक्शे वाला भी यह कहता हुआ सुना जा सकता है कि जब हमारे आका भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तब हम ऐसा करते हैं तो क्या बुरा करते हैं ? स्थिति यह बन गई है कि देश से बड़ा दल है और दल से बड़ा व्यक्ति का घर है, जिसको सब प्रकार भरा पूरा करना हमारे राजनेताओं का प्रथम कर्त्तव्य एवं जीवन की प्राथमिकता बन गई है. ऐन केन प्रकारेण धनोपार्जन के लिए व्यक्ति जो कुछ भी कार्य कर सकता है वे सब हमारे देश की राजनीति के रक्त-मॉस बन गये हैं. 

दूसरी ओर मतदाता भी यह देखता है कि मैं अपना मत उस व्यक्ति को दूं, जो मेरे काम का व्यक्ति हो अथवा कुर्सी पर बैठने के बाद हमारे जा बेजा काम कर सके. कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय जनता भी भ्रष्टाचार एवं अपराध के प्रति प्रतिबद्ध होने लगी है. भारतीय राजनीति की पूर्व पीढ़ी का अध्येता यह भली प्रकार देख सकता है कि परतंत्र भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करने के लिए जहाँ सिद्धान्तों, अनुशासन, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, बहिष्कार, स्वदेशी एवं अहिंसा जैसे पवित्र अस्त्रों का सहारा लिया गया था, वहीं स्वतन्त्र भारत के निर्माण की राजनीति में आज हिंसक, असामाजिक एवं संदिग्ध चरित्र वाले, स्वार्थी एवं सत्ता-लोलुप व्यक्तियों का निर्बाध प्रवेश एवं बोलबाला हो रहा है. 

स्वतंत्रता के बाद होने वाले प्रथम चुनाव और वर्तमान में होने वाले चुनाव में नेताओं की मानसिकता एवं उनके सोच में कितना अन्तर आ गया है, उसका एक उदाहरण दिया जाता है. लोक सभा के प्रथम चुनाव में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में एक ऐसे व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बना दिया था, जिसकी पृष्ठभूमि आपराधिक थी. चुनाव प्रचार के दौरान पं. जवाहर लाल नेहरू को वास्तविकता का पता चल गया. चुनावी सभा में पं. नेहरू ने जनता से अपील में यह कहा था कि वह कांग्रेस प्रत्याशी को वोट न दें, क्योंकि वह तालाब के पानी को गंदा कर देने वाली मछली के समान है. आज स्थिति एकदम उलटी हो गई है. अब अपराधी नेता अपराधियों के लिए प्रचार करते हुए देखे जाते हैं. सब एक-दूसरे को अपराधी कहते हैं, यानी राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं. हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल हो जिसमें अपराधियों का वर्चस्व न हो और जिन्हें संरक्षण प्राप्त न हो. इस पर तुर्रा यह है कि प्रत्येक राजनेता अपराधीकरण के कारण भावी समाज पर पड़ने वाले कुप्रभाव के प्रति चिन्तित दिखाई देता है.

राजनीति में अपराधीकरण के कारण 

भारत में राजनीति में अपराधीकरण जिस ऊँचाई तक पहुंच गया है, उसको देखकर विदेशी लोग भी आश्चर्य चकित भी हैं और परेशान भी हैं, क्योंकि भारत में आने पर पर्यटकों की जान माल भी सुरक्षित नहीं रह गये हैं. इसका यथार्थ रूप क्या और कैसा है, इसकी चर्चा फिर कभी करेंगे. यहाँ हम उन कारणों पर विचार करते हैं, जिनके कारण राजनीति के अपराधीकरण ने यह दुःखद एवं लज्जाजनक स्थिति उत्पन्न कर दी है 

(1) सक्रिय राजनीति में भाग लेने के लिए तथा मतदाता होने के लिए हमारे संविधान ने किसी प्रकार की शैक्षिक योग्यता निर्धारित नहीं की है. फलतः मूों का नेतृत्व करने के लिए मूर्ख सक्षम माने जाते हैं. इतना ही नहीं, अशिक्षित लोग बहकावे में जल्दी आ जाते हैं और कुर्सी पर बैठकर जल्दी बहक भी जाते हैं. यही कारण है कि हमारा शासन राजनेता नहीं बल्कि नौकरशाह चलाते हैं. वह व्यक्ति जो रेडियो और रेडियोलोजी में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है, वह स्वास्थ्य मंत्री बनकर जनता का कितना कल्याण करेगा, सहज अनुमान करने की वस्तु है. 

(2) हमारे राजनेताओं ने ब्रिटिश शासकों से फूट डालो और राज्य करो (Divide and Rule) की शासन-पद्धति को ग्रहण किया और उसमें यह संशोधन एवं परिवर्द्धन कर दिया भ्रष्ट करो और शासन करो. इस नीति के सफल निर्वाह के लिए अपराधीकरण आवश्यक था और वह सिरमौर बन गया है. 

(3) हमारी चुनाव प्रणाली अत्यन्त व्ययसाध्य है. अतएव राजनीतिक प्रत्याशियों को उद्योगपतियों एवं व्यापारियों से आर्थिक सहायता लेना आवश्यक हो जाता है. इसके बदले उनको मनमाना मुनाफा कमाने, काला बाजार करने आदि की छूट देना एक प्रकार से ईमानदारी का सौदा बन जाता है. चुनाव में किए गए धन को वसूल करना भी अनिवार्य हो जाता है. इस प्रकार भ्रष्टाचार का यह दुश्चक्र अबाध गति से चलता रहता है. धन के बल पर चुनाव जीतने के लिए बूथों पर कब्जा करना, मतदाता को डराना-धमकाना, फर्जी मतदान कराना, विरोधी की हत्या कराना आदि के लिए मुस्तंडों की आवश्यकता को कौन नकार सकता है ? 

(4) क्षेत्रीय विषमता, स्थानीय स्वार्थ के कारण आपसी विद्वेष को बढ़ावा मिलता है. भाषायी प्रांतों के निर्माण की नीति ने क्षेत्रवाद को उत्पन्न किया है. 

(5) आरक्षण की नीति ने गली-गली में वर्ग-संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है. इससे स्वार्थपरता में वृद्धि हुई है, दलीय प्रतिबद्धता बढ़ी है तथा राष्ट्रीय भावना प्रायः लुप्त हो गई है. किसी ने ठीक ही कहा है कि स्वतन्त्रता के पूर्व देशभक्ति राष्ट्रीय भावना का लक्षण थी; अब वह एक व्यवसाय बन गई है. पवित्र वस्तु को अपवित्र साधनों के साथ सम्बद्ध करने से अपराध बुद्धि एवं अपराध-वृत्ति का जन्म होना सर्वथा स्वाभाविक है. 

(6) शासन, प्रशासन एवं उद्योग के त्रिगुट ने अपराध और अपराधियों को अभयदान कर रखा है. फलतः हर्षद मेहता जैसे घोटालेबाज निर्भय घूमते हैं, तथा लालू प्रसाद एवं चन्द्रास्वामी वातानुकूलित कारागारों में ऐश करते हैं. महत्त्वपूर्ण स्थलों पर बम विस्फोट होते हैं और उनको सामान्य घटना समझकर बातों में उड़ा दिया जाता है. 

कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति और अपराध के गठबन्धन ने जहाँ चुनावी हिंसा को व्यापक एवं अनिवार्य बुराई बना दिया है, वहीं समस्त क्षेत्रों में संगठित माफिया गिरोहों का आधिपत्य स्थापित हो गया है. सामाजिक एवं शिक्षा संस्थाएँ भी अब माफिया गिरोहों के चंगुल में आ गए हैं. समस्त गैरकानूनी एवं असामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने कराने के लिए माफिया गिरोह हाजिर रहते हैं, जो निर्धारित धनराशि लेकर अपेक्षित मनोरथ सिद्ध करने में सक्षम हैं. 

अपराधीकरण के कारण 

राजनीति में क्रमशः अपराध एवं अपराधियों के बढ़ते प्रभुत्व का प्रमुख कारण है चुनावों में धन का महत्त्व बढ़ जाना. इसी के साथ जनशक्ति का भी महत्त्व बढ़ गया है. हमारे देश के चुनाव इतने अधिक व्ययसाध्य हो गये हैं कि इनके लिए पर्याप्त साधन जुटाने के लिए भाँति-भाँति के गठबंधन एवं वायदे करने होते हैं और फिर उसे चुकाने के लिए कुछ भी करते हुए संकोच का प्रश्न ही नहीं उठता है. फलतः राजनीतिज्ञ क्रमशः धनशक्ति, बाहुबल एवं शक्ति प्रदर्शन हेतु दादाओं द्वारा समर्थन एवं सहयोग पर आश्रित होते गये हैं. इस प्रक्रिया में लगभग 30 करोड़ व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग विकसित हो गया है. जिसे हम नवधनाढ्य वर्ग कह सकते हैं और जो आज अचानक वैभव और ऐश का जीवन जीने लगा है अथवा उपभोक्ता संस्कृति का लाभ उठाने में प्रयत्नशील है. प्रगति और विकास के साथ देश में यदि समानता भी आई होती, और सामान्य जन की मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान दिया गया होता, तो स्थिति इतनी बुरी न होती. स्कूटर पर बैठकर राहजनी, लूटपाट आदि करने वाले अधिकांश युवक निम्न मध्यवर्ग से सम्बन्धित होते हैं, जो उपभोक्ता संस्कृति के शिकार होने के कारण ऐश का जीवन जीने के लिए सब कुछ कर गुजरने को तैयार रहते हैं. दूसरा कारण है-राजनीति का एक व्यवसाय बन जाना. लोग राजनीति में धन कमाने के लिए प्रवेश करते हैं. इस कारण राजनीति का सम्पूर्ण परिवेश सिद्धांतहीन हो गया है और सम्पूर्ण राजनीति का एकसूत्रीय कार्यक्रम धन संचय बन गया है. हास्यास्पद स्थिति यह है कि प्रत्येक दल गांधीवादी होने का दावा करता है, परन्तु गांधीवादी सिद्धान्तों के सर्वथा विपरीत आचरण करता है, फलतः हमारा राजनीतिक जगत् दुर्मुहे जन्तुओं से पट गया है और वहाँ धर्म ईमान की चर्चा गुनाह मानी जाती है. यही कारण है कि हमारे राजनेताओं की खालें गैंडों की खाले बन गई हैं जिन पर व्यंग्य वाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. यही कारण है कि हमारे समाज में तस्कर, लुटेरे, घूसखोर आदि प्रतिष्ठा के पात्र बन गये हैं. आज हमारे समाज ने यह सोचना बंद कर दिया है कि धन कैसे आया है ? हमारे समाज में किस प्रकार के व्यक्तियों का प्रभुत्व है, इसका प्रमाण हमारे सांसद एवं विधायक लोकसभा एवं विधानसभा के सदनों में देते हैं. गाली-गलौज करना, जूते-चप्पल फेंकना आदि लक्षण अपराधियों के माने गये हैं. हमारे शासकों की समस्त नीतियाँ घूम-फिर कर “भ्रष्ट करो और राज्य करो’ के प्रति उन्मुख हो गई हैं. पराकाष्ठा यह है कि हमारे महामहिम राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति में भी आरक्षण की नीति का समावेश करना चाहते हैं. मन्तव्य स्पष्ट है-शुद्ध योग्यता के लिए कोई भी स्थान रिक्त नहीं रह जाना चाहिए. 

आवश्यकता और योग्यता के प्रति शासन के उत्तरदायी न होने के कारण भी अपराध वृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है. पहले असंतोष प्रकट होता है, फिर विद्रोह. विद्रोह की सीमा जघन्य अपराध है ही. 

राजनीति के अत्यधिक प्रभाव ने प्रशासन को भी भ्रष्ट कर दिया है. इस प्रकार भ्रष्ट प्रशासन के माध्यम से राजनीति अपराधवृत्ति को प्रोत्साहन प्रदान करती है. इस दुष्प्रवृत्ति की चरम सीमा यह है कि इससे न्यायपालिका भी अछूती नहीं रही है. 

राजनीतिक गठजोड़ों ने भी अपने स्तर पर अपराधीकरण में वृद्धि की है. गठजोड़ों की राजनीति में समस्त सिद्धान्तों को तिलांजलि दे दी गई है. परस्पर विरोधी सिद्धान्तों वाले दलों तथा एक-दूसरे के जानी-दुश्मनों को एक साथ चलाने वाली पटरी केवल अपराधवृत्ति ही हो सकती है. भ्रष्टाचार रूपी सीमेण्ट इन्हें एक साथ चिपकाए रखता है. गठजोड़ की राजनीति में क्षेत्रीय एवं साम्प्रदायिक शक्तियों का ध्रुवीकरण तो हुआ ही है, साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों एवं राष्ट्रीय भावना का क्षरण भी हुआ है, इसने समस्त मानवमूल्यों एवं मानवाधिकारों को धता बता दिया है. क्षेत्रीयता साम्प्रदायिकता, जातीयता, स्वार्थपरता आदि की आधारभूमि पर अपराधी तत्त्वों का वर्चस्व स्वाभाविक है. 

राजनीतिज्ञ अपराधी गठजोड़ पर वोहरा रिपोर्ट (Vohra Panel Report on Politician Criminal Nexus) के निष्कर्षों का सार यह है कि देश के अपराधियों के गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं, तस्करों के गिरोहों, नशीली दवाओं के व्यापारियों और आर्थिक लाबियों का काफी विस्तार हो चुका है और इन्होंने अफसरशाही, सरकारी संस्थाओं, राजनीतिज्ञों, मीडिया के लोगों और महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ सम्पर्क का व्यापक जाल बना लिया है. इनमें से कुछ गिरोहों का विदेशी खुफिया एजेंसियों से भी सम्बन्ध है. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि चुनाव लड़ने में व्यय किया जाने वाला खर्च राजनीतिज्ञों को इन तत्त्वों की शरण में ले जाता है और इस तरह अपराधों की जाँच के काम में भी कोताही आ जाती है. बिहार, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि कुछ राजनीतिज्ञ हथियारबंद सेनाओं और गिरोहों के मुखिया बन जाते हैं और कुछ वर्षों में वे स्थानीय निकायों, विधानसभाओं या राष्ट्रीय संसद में प्रवेश करने में समर्थ हो जाते हैं. 

रिपोर्ट में आगे स्पष्ट कहा गया है कि अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्कों वाले तस्कारों के गिरोह हवाला और काले धन के जरिए समानान्तर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं, जिससे देश का आर्थिक ताना-बाना क्षत-विक्षत हो गया है. इन गिरोहों की ताकत इतनी ज्यादा है कि इन्होंने सरकारी मशीनरी तो भ्रष्ट कर दी है, इनके चंगुल में न्यायपालिका के लोग भी आने लगे हैं.

अंकुश लगाने के उपाय 

सर्वप्रथम मतदाताओं को वास्तविकता के प्रति जागरूक होना चाहिए. तदुपरान्त बहुत सोच-समझकर अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए. वे तटस्थ भाव से अपने मत का प्रयोग तभी कर सकेंगे जब वे बिना किसी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ, लोभ, लालच के वशीभूत नहीं होंगे. भ्रष्ट व्यक्तियों को चुनने वाले भी भ्रष्ट होने चाहिए. तभी तो यह लोकोक्ति सार्थक होती है you get the government you deserve अर्थात् तुम्हें वही शासन प्राप्त होता है जिसके तुम योग्य हो. हमारी चुनाव-प्रणाली में इस प्रकार के सुधार किये जाएँ कि वह इतनी व्ययसाध्य न रह जाए. यदि ऐसा हो जाएगा तो चारों ओर की जन समस्याओं को राष्ट्रीय समस्याओं का रूप देना चाहिए तथा राजनीतिक समस्याओं को भी इन पर आधारित किया जाना चाहिए. 

प्रत्येक राजनीतिक दल को सोच लेना चाहिए कि बस, अब बहुत हो गया. जब तक स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति राजनीति में नहीं जाएंगे, तब तक उद्धार असम्भव है. इसके साथ ही अपराधी पृष्ठभूमि वाले राजनीतिज्ञों को बहिष्कृत करने के प्रयत्न किए जाने चाहिए. 

सत्ता से जुड़े हुए अधिकारों तथा सुख-सुविधाओं में कमी की जानी चाहिए. इस संदर्भ में गांधीजी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक व्यवहार में लाया जाना चाहिए. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री शेषन ने इस दिशा में जो प्रयत्न किये थे, उन्हें पूरी निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए तथा इस संदर्भ से जुड़े अन्य प्रयत्न भी किए जाने चाहिए. 

राजनीति, नौकरशाही और माफिया के त्रिभुज ने देश को जकड़ रखा है और उसे उजाड़ दिया है—विशेषकर उसके नैतिक जगत् को. इस त्रिभुज के बल पर देश में समानान्तर सरकार विशेषकर अर्थव्यवस्था चलाई जा रही है. देश की खुफिया और कानून की देखभाल करने वाली व्यवस्था के मध्य तालमेल स्थापित करना परम आवश्यक है. 

यह भी आवश्यक है कि समस्त राजनीतिक दल अपने लिए एक समान आचार संहिता बना लें और तदनुसार आचरण करें. बुद्धिजीवी वर्ग जनता को सम्यक् मताधिकार प्रयोग के प्रति शिक्षित करे. चुप और तटस्थ रहने वाला बुद्धिजीवी कर्तव्यच्युत एवं उत्तरदायित्व विमुख माना जाता है. भावी सन्तान इसके लिए उसे कदापि क्षमा नहीं करेगी. राजनीति का अपराधीकरण जितना भयंकर रूप धारण कर चुका है, उसके निराकरण के लिए उतने ही दृढ़ संकल्प एवं इच्छाशक्ति की आवश्यकता है. हमारे देश के कर्णधार एवं नौनिहाल कदाचित् इस वास्तविकता को समझ सकें.

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