भ्रष्टाचार पर निबंध | Essay on Corruption in Hindi

भ्रष्टाचार पर निबंध

भ्रष्टाचार पर निबंध | Essay on Corruption in Hindi अथवा  भ्रष्टाचार : कारण और निवारण (Corruption : Reason and Remedy) अथवा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम और राजनीतिक संकट (यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2015) अथवा भ्रष्टाचार की अपसंस्कृति और हम 

भारत में भ्रष्टाचार की व्यापकता को देखते हुए तो अब ऐसा लगने लगा है कि मानो इस देश ने भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी हो। भ्रष्टाचार की विकट समस्या मौजूदा दौर में, समस्या से आगे बढ़ते हुए एक ‘अपसंस्कृति’ के रूप में आच्छादित होती दिख रही है। यानी हम भ्रष्टाचार की अपसंस्कृति में जी रहे हैं तथा इस विद्रूपताओं के आदी बन चुके हैं। यही कारण है कि अब देश में होने वाले गड़बड़-घोटाले हमें चौंकाते नहीं हैं और ये हमें रोजमर्रा की जिंदगी के सामान्य घटनाक्रम लगते हैं।

भारत में भ्रष्टाचार आज भी है और कल भी था। प्राचीन भारत में भी यह किसी न किसी स्वरूप में विद्यमान था। तभी तो ‘अर्थशास्त्र’ नामक ग्रंथ के सर्जक कौटिल्य को यह कहना पड़ा था— “सरकारी कर्मचारियों के आचरण के मामले में विशेष सतर्कता बरतना जरूरी है। कोई व्यक्ति अपनी जिहा पर रखे हए मध या विष के स्वाद के प्रति उदासीन रहे, ऐसा संभव नहीं है। यानी राजपुरुष, अर्थात् सरकारी अधिकारी निर्लिप्त भाव से न तो अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं, न अपने दायित्वों का निर्वाह कर सकते हैं। पानी में चलन फिरने वाली मछली कब, कैसे और कितना पानी पी जाती है, यह पता लगाना बहुत मुश्किल है। आशय यह है कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी शक्ति का प्रयोग करते समय कितना स्वार्थसाधन कर लेंगे, यह मालम करना अत्यंत कठिन है। अतः राजा को इनकी गतिविधिया पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए।’ 

वर्तमान संदर्भ में भ्रष्टाचार को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है-“जब राजनीतिक शक्ति का वैयक्तिक अथवा किसी गुट या वर्ग के स्वार्थ और लाभ के लिए इस ढंग से प्रयोग किया जाए कि विधि अथवा उच्च नैतिक प्रतिमानों का उल्लंघन हो, तो यह भ्रष्टाचार है।” 

“अर्थशास्त्र’ नामक उच्च कोटि के ग्रंथ में भ्रष्टाचार पर व्यक्त कौटिल्य के विचारों से यह ध्वनित होता है कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। कौटिल्य ने जिस समय अर्थशास्त्र की रचना की होगी, उस समय आज की तरह भोग की प्रवृत्तियां न तो चरम पर रही होंगी और न ही प्रशासन में आज के जैसी विकृतियां और विद्रूपताएं ही अस्तित्व में आई होंगी तथापि किसी-न-किसी स्तर पर भ्रष्टाचार विद्यमान रहा होगा, जिसकी रोकथाम के लिए उन्हें यह बात कहनी पड़ी। 

वर्तमान संदर्भ में भ्रष्टाचार को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- “जब राजनीतिक शक्ति का वैयक्तिक अथवा किसी गुट या वर्ग के स्वार्थ और लाभ के लिए इस ढंग से प्रयोग किया जाए कि विधि अथवा उच्च नैतिक प्रतिमानों का उल्लंघन हो, तो यह भ्रष्टाचार है।” संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार वह अनैतिक एवं भ्रष्ट आचरण है, जिसमें व्यक्ति अपने फायदे के लिए सत्ता-शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। भ्रष्टाचार को परिभाषित करने वाली यह स्थिति भारत में अब स्थाई रूप से प्रभाव में आ चुकी है तथा सिर्फ राजनीति या लोक-प्रशासन तक सीमित न रहकर आम आदमी के चरित्र से जुड़ चुकी है। 

भारत में भ्रष्टाचार को हवा देने वाला कोई एक कारण नहीं है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें हम आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक, न्यायिक एवं राजनीतिक श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं। उच्च जीवनशैली की ललक, अर्थ प्रधान सोच, अधिक मुनाफा कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति, कोटा-परमिट की विद्रूप एवं भ्रष्ट प्रणालियां तथा मुद्रा का प्रसार वे आर्थिक कारण हैं, जिनकी वजह से भ्रष्टाचार बढ़ा और पनपा है। 

भारत में भ्रष्टाचार का संजाल बहुत मजबूत है। जन्म से मरण तक फैले भ्रष्टाचार के संजाल में हम जकड़े हुए हैं। यह नित नए स्वरूपों में सामने आता है। इसके कुछ उग्र स्वरूप हैं—आए दिन हो रहे गबन-घोटाले, रिश्वतखोरी, जमाखोरी, कालाबाजारी, काला धन, भाई-भतीजावाद, पक्षपात, शासकीय पदों पर अयोग्यों की नियुक्तियां, मिलावटखोरी, कमीशनखोरी एवं कर चोरी आदि। अब प्रश्न यह उठता है कि भारत में भ्रष्टाचार को उद्गमित करने वाले कारक कौन हैं? आइये पहले इनकी पड़ताल की जाए। 

भारत में भ्रष्टाचार को हवा देने वाला कोई एक कारण नहीं है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें हम आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक, न्यायिक एवं राजनीतिक श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं। उच्च जीवनशैली की ललक, अर्थ प्रधान सोच, अधिक मुनाफा कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति, कोटा-परमिट की विद्रूप एवं भ्रष्ट प्रणालियां तथा मुद्रा का प्रसार वे आर्थिक कारण हैं, जिनकी वजह से भ्रष्टाचार बढ़ा और पनपा है। अब आते हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले सामाजिक कारणों पर। हमारे समाज में शुरू से दो वर्ग रहे हैं। पहला शोषक (शोषण करने वाला) और दूसरा शोषित (जिसका शोषण किया गया हो)। यह शोषणवादी सामाजिक संरचना बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार को उद्गमित करने में सहायक रही है। इसके अलावा कुछ सामाजिक कारण भी भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। जैसे उदारीकरण, वैश्वीकरण तथा बढ़ते बाजारवाद के कारण समाज का दृष्टिकोण भौतिकतावादी हो चुका है तथा लोगों में बेतहाशा भोगवादी प्रवृत्तियां पनपी हैं। स्थिति यह है कि हम कोई भी कीमत चुका कर जीवन को भौतिकता की चकाचौंध से भर लेना चाहते हैं। इससे भ्रष्टाचार तो बढ़ेगा ही। स्थिति इसलिए और बिगड़ी है कि हमारे सामाजिक मूल्यों में जबरदस्त गिरावट आई है तथा ईमानदारी एवं नैतिकता का ह्रास हुआ है। सामाजिक संस्कारों की डोर कमजोर होने से चरित्र में अनैतिकता ने गहरी पैठ बना ली है। इस सब का सम्मिलित प्रभाव बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ रहा है। समाज में विद्यमान सामंती प्रवृत्तियां एवं अशिक्षा भी वे कारण हैं, जिनसे भ्रष्टाचार को बल मिला है। भ्रष्टाचार को परवान चढ़ाने में वैधानिक कारणों की भी केंद्रीय भूमिका है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए न तो कानून पर्याप्त ही हैं तथा न ही ये असरदार हैं। यह कहना गलत न होगा कि इन कानूनों में खूबियां कम, खामियां ज्यादा हैं। अब आते हैं न्यायिक कारणों पर। आज न्याय न तो सस्ता है, न सुलभ। न्याय त्वरित भी नहीं है तथा न्याय क्षेत्र में व्यापक उदासीनता भी पाई जाती है। न्याय क्षेत्र में प्रतिबद्धता का भी अभाव है। इन बातों का लाभ भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को मिल जाता है और वे बच निकलते हैं। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले अनेक राजनीतिक कारण भी हैं। कुशल नेतृत्व का अभाव, भ्रष्टाचार से लड़ने में दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, राजनीति के क्षेत्र में शुचिता एवं नैतिकता का अभाव एवं राजनीति का अपराधीकरण एवं अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण आदि वे प्रमुख राजनीतिक कारण हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका निभाई है। मनी और मसल्स से आच्छादित आज की भारतीय राजनीति ने भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसमें नौकरशाह भी पीछे नहीं हैं। यानी प्रशासनिक कारणों से भी भ्रष्टाचार बढ़ा है। जब । अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त रहेंगे, तो मातहतों से निर्लिप्तता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? नौकरशाहों में अधिकतम भ्रष्ट बनने की ‘चूहा दौड़’ जारी है। इतना ही नहीं, भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को प्रशासित करने में भी कोताही बरती जाती है। 

भारत जैसे विकासशील देश पर भ्रष्टाचार के प्रभाव इतने यापक हैं कि स्थानाभाव के कारण इन्हें समग्रतः नहीं दिया जा सकता, तथापि कुछ प्रमुख प्रभावों का रेखांकन आवश्यक है। भ्रष्टाचार वह अजगर है, जो भारत के आर्थिक विकास एवं प्रगति को बड़ी बेरहमी से निगल रहा है। यह भ्रष्टाचार का ही प्रभाव है कि अपार मानव संसाधन, शक्ति एवं प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण यह देश निर्धनता, कुपोषण, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई एवं अशिक्षा जैसी भयावह समस्याओं से उबर नहीं पा रहा है। इतना ही नहीं, देश की अनेक समस्याओं के नियंत्रण एवं देश के विकास व उन्नयन के लिए चलाई जाने वाली अनेक योजनाओं पर भ्रष्टाचार पानी फेर देता है। रिश्वतखोरी, मिलावटखोरी, कालाधन, कालाबाजारी, जमाखोरी, कमशीनखोरी, पक्षपात, भाई-भतीजावाद, अयोग्य लोगों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठाना, कर चोरी, तस्करी, डुप्लीकेसी आदि सब प्रकार का भ्रष्टाचार हमारे देश को खोखला कर रहा है। 

ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रयास हमारे देश में सरकारी स्तर पर न किए गए हों। सरकार कानून बनाकर भ्रष्टाचार निवारण के उपाय सुनिश्चित करती रही है। विषय के संदर्भ में इन कानूनों पर नजर डाल लेना समीचीन होगा। सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए वर्ष 1947 में ‘भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम’ को लागू किया गया, जिसे बाद में ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988’ द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया। सरकार द्वारा बनाए गए कानून ‘भ्रष्टाचार निवारण अधनियम, 1988’ को ज्यादा व्यापक एवं असरदार बनाने के प्रयास किए गए। लोकसेवकों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार से संबंधित इस अधिनियम की धारा-2 में लोकसेवक की परिभाषा को व्यापक बनाया गया तथा दंड विधि संशोधन अधिनियम, 1952 तथा भारतीय दंड संहिता के कुछ उपबंधों को समेकित किया गया। एक मंत्री अथवा एक सरकारी सचिव के ऊपर भी इस अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। इसमें यह व्यवस्था भी की गई कि भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई विशेष न्यायाधीशों द्वारा की जाएगी। 

देश में भ्रष्टाचार रोधी प्रणाली को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से तीन दशक पुराने ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन की आवश्यकता महसूस की गई, तद्नुसार वर्ष 2018 के जुलाई माह में ‘भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम-2018’ (Prevention of Corruption (Amendment) Act-2018) को प्रभाव में लाया गया। इस संशोधन अधिनियम की जड़ें संयुक्त राष्ट्र के भ्रष्टाचार विरोधी समझौते में हैं। भारत ने इस समझौते पर वर्ष 2011 में हस्ताक्षर किए थे। ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988’ के प्रावधानों के तहत रिश्वत की मांग करने और स्वीकार करने को ही अपराध माना गया था, जबकि नए कानून में रिश्वत देने वाले को भी इसके दायरे में लाया गया है। यही सबसे प्रमुख संशोधन है। अब रिश्वत लेने वाले के साथ रिश्वत देने वाला भी समान रूप से जिम्मेदार होगा। रिश्वत देने वाले को अपनी बात रखने के लिए 7 दिन का समय दिया जाएगा, जिसे 15 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि रिश्वत किन परिस्थितियों में दी गई। इसमें जहां रिश्वत देने वाले को परिभाषित किया गया है, वहीं उन ईमानदार कर्मचारियों को संरक्षण देने का प्रावधान है, जो भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इसके प्रावधानों के तहत लोकसेवकों पर भ्रष्टाचार का मामला चलाने से पहले केंद्र के मामले में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की अनुमति लेनी होगी। अधिनियम में, रिश्वत और अनुचित लाभ का लेन-देन तीसरी पार्टी से कराए जाने की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘थर्ड पार्टी एक्टिविटी’ (Third Party Activity) को भी शामिल किया गया है। अनुचित लाभ के तहत तोहफे प्राप्त किए जाने को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। उन लोगों की सजा को सात साल से बढ़ाकर दस साल कर दिया गया है, जो बार-बार रिश्वत लेने के दोषी पाए जाएंगे। इन प्रावधानों से निश्चित तौर पर देश की भ्रष्टाचार रोधी प्रणाली मजबूत होगी। 

जून, 2005 से प्रभावी ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ भी भ्रष्टाचार से लड़ने में एक कारगर हथियार की भूमिका निभा रहा है। जनता द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ी जाने वाली लड़ाई में यह उपयोगी साबित हो रहा है। इस अधिनियम को और सशक्त बनाने एवं भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से ‘व्हिसिल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2011’ पारित हो चुका है तथा इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। इस अधिनिमय के तहत जहां सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार एवं शक्ति या विवेकाधिकार के दुरुपयोग की शिकायत मिलने पर कार्यवाही किए जाने का प्रावधान है, वहीं यह अधिनियम अपराधों का जनहित के लिए खलासा या प्रकटीकरण करने वाले व्यक्ति को वैधानिक संरक्षण प्रदान करता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हमारे संविधान में भी व्यवस्था दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 311 का संबंध सरकार के अधीन नौकरी करने वाले व्यक्तियों को बर्खास्त करने, सेवा समाप्त करने अथवा उनकी पदावनति करने से है। यह प्रावधान सरकारी नौकरी करने वाले उन लोगों पर लागू होता है, जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता है। भ्रष्टाचार निवारण से संबंधित कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण अधिनियम भी हमारे यहां अस्तित्व में हैं। मसलन, आयकर अधिनियम, – 1961, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1947, विशेष न्यायालय अधिनियम, 1992, केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003, जांच आयोग अधिनियम, 1952, विभिन्न राज्यों में लोकायुक्त अधिनियम, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 एवं आवश्यक वस्त (संशोधन) अधिनियम, 1993 आदि। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) एवं केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) जैसे निकाय भी भ्रष्टाचार निवारण की दिशा में प्रयासरत हैं। 

काले धन पर अंकुश के लिए मई, 2014 में जस्टिस एम. बी. शाह की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) के गठन को मंजूरी दी गई। विशेष जांच दल का उद्देश्य न केवल भारत में काला धन रखने वालों के विरुद्ध जांच और कार्यवाही करना था, बल्कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के विरुद्ध भी जांच एवं कार्यवाही करना था। 

भ्रष्टाचार एवं काले धन पर अंकुश के लिए सरकार द्वारा कानूनी स्तर पर कुछ नई और सराहनीय पहलें की गई हैं। यहां इनका उल्लेख आवश्यक है, क्योंकि इन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। 16 जनवरी, 2014 से ‘लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013’ देश में प्रभावी हो चुका है। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इसकी मांग नागरिक समाज द्वारा लंब समय से की जा रही थी, जो अब पूरी हो गई है। इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल एवं राज्य स्तर पर लोकायुक्त नियुक्त किए जाने का पथ प्रशस्त हुआ है। लोकपाल का क्षेत्राधिकार व्यापक है। न सिर्फ सभी श्रेणियों के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया गया है, बल्कि इसमें प्रधानमंत्री को भी लाया गया है। इस अधिनियम में भ्रष्टाचार के जरिए अर्जित सम्पत्ति की कुर्की करने और उसे जब्त करने के प्रावधान शामिल हैं, भले ही अभियोजन की प्रक्रिया चल रही हो। अधिनियम में प्रारंभिक पूछ-ताछ, जांच और मुकदमे के लिए स्पष्ट समय सीमा निर्धारित की गई है तथा विशेष न्यायालयों के गठन का भी प्रावधान है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत सीबीआई सहित किसी भी जांच एजेंसी को मामलों की निगरानी करने तथा निर्देश देने का लोकपाल को अधिकार होगा। 

काले धन पर अंकुश के लिए मई, 2014 में जस्टिस एम. बी. शाह की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) के गठन को मंजरी दी गई। विशेष जांच दल का उद्देश्य न केवल भारत में काला धन रखने वालों के विरुद्ध जांच और कार्यवाही करना था, बल्कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के विरुद्ध भी जांच एवं कार्यवाही करना था। इस विशेष जांच दल द्वारा काल धन की समस्या से निपटने के लिए एक समग्र कार्ययोजना तैयार की गई, जिसके तहत ढांचागत तंत्र विकसित किया गया, ताकि काला धन देश के बाहर ले जाकर विदेशी बैंकों में न जमा कराया जा सके। इसी क्रम में एक प्रभावशाली कानून के रूप में ‘काला धन (अघोषित विदेशी आय एवं आस्ति) और करारोपण अधिनियम, 2015’ [The Black Money (Undisclosed Foreign Income and Assets) and Imposition of Tax Act, 2015] को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 27 मई, 2015 को केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया जा चुका है। यह अधिनियम विदेशों में काला धन रखने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करता है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत विदेशों में अवैध धन या सम्पत्ति रखने वालों को 10 वर्ष तक की कड़ी सजा एवं जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। उक्त सरकारी पहलों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शामिल है। भारत संयुक्त राष्ट्र के भ्रष्टाचार  (United Nations Convention Against Corruption-UNCAC) का एक हस्ताक्षरकर्ता देश भी है। 

भारत में भ्रष्टाचार निवारण के लिए सर्वप्रथम हमें उन आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक, न्यायिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक कारणों को प्रभावहीन बनाना होगा, जो भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। 

इन कारणों का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। भ्रष्टाचार के कारणों को दूर करना ही इस समस्या का निवारण है। समस्या कोई भी हो, उसका समाधान निकाला जा सकता है, बशर्ते प्रयासों में दृढ़ता और पारदर्शिता हो। यह बात भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है। चूंकि यह समस्या समाज से बहुत गहराई से जुड़ गई है, अतएव सर्वप्रथम हमें इसके समाधान की शुरुआत भी परिवार और समाज के स्तर से करनी होगी। हमें पारिवारिक स्तर पर बच्चों में उच्च जीवन मूल्यों को विकसित करना होगा तथा उन्हें ऐसे संस्कारों से भरना होगा, जो उन्हें उन्नत चरित्रबल दें। वे उचित-अनुचित का फर्क समझें तथा जीवन में सत्य और निष्ठा को स्थान दें। 

शिक्षा को नैतिकता से जोड़ना होगा। शिक्षा के जरिये नैतिक मूल्यों की स्थापना पर जोर देना होगा। हमें बुनियादी शिक्षा के ढांचे में बदलाव लाना होगा तथा इस संदर्भ में राष्ट्रपिता बापू की उस विचारधारा को अपनाना होगा, जो आज भी प्रासंगिक है। बापू ने शिक्षा में नागरिक गुणों की जमकर पैरोकारी की थी। वह वर्तमान शिक्षा पद्धति को पसंद नहीं करते थे। बापू का मानना था कि शिक्षा जीवन से संबंधित होनी चाहिए तथा इसके जरिये नागरिक गुणों का विकास किया जाना चाहिए। शिक्षा वस्तुतः जीने की कला है और इसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न मूल्यों को समझने और उनमें एक तथा उनका मूल्याकन करने में समर्थ होगा। न्यायोचित एवं प्रसार मुक्त व्यवस्था तभी संभव है, जब शैक्षणिक स्तर पर प्रयास हो और । उसमें जीवन मूल्यों का समावेश हो। एक अच्छा नागरिक ही भाग के विरुद्ध बिगुल फूंक सकता है। 

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए यह जरूरी है कि हम सामाजिक मूल्यों के क्षरण को रोकें। सिर्फ कानून बनाकर भ्रष्टाचार की रोकथाम नहीं की जा सकती। हमें समाज निर्माण पर ध्यान देना होगा और इस काम को अंजाम देने के लिए, चिंतकों, मनस्वियों, विचारकों, साहित्यकारों, धर्माचार्यों व प्रबुद्ध लोगों को आगे आकर न सिर्फ समाज को भ्रष्टाचार के संक्रमण से बचाना होगा बल्कि उसे दिशा बोध कराना होगा। वैश्वीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, पश्चिमी सभ्यता के अनुकरण तथा भोगवादी प्रवृत्तियों के कारण जो भटकाव की स्थिति बनी है, उससे उबारने की मुहिम छेड़नी होगी। साथ ही राजनीति एवं लोक प्रशासन में स्वच्छता एवं पारदर्शिता लानी होगी। जरूरत समग्र प्रयासों की है। 

भारत को वैश्विक स्पर्धा में अग्रणी राष्ट्र बनाने तथा देश की | आर्थिक संवृद्धि एवं प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि हम भ्रष्टाचार | मुक्त भारत का निर्माण करें। भारत की उजली वैश्विक छवि के लिए | भी यह आवश्यक है कि हम भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कर इसके गौरव और गरिमा को बढ़ाएं। इसके लिए हमें उच्चतम स्तर की देश | भक्ति का दायित्व निभाना होगा तथा एडमंड बर्क के इस कथन की गंभीरता को समझना होगा— “सामान्य रूप से भ्रष्ट लोगों में आजादी का अस्तित्व अधिक समय तक कायम नहीं रह सकता।” 

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