कोरोना वायरस पर निबंध |Essay on Corona virus in Hindi

कोरोना वायरस पर निबंध

कोरोना वायरस पर निबंध |Essay on Corona virus in Hindi

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने यह कहा है कि आने वाले दशकों में अगर कोई चीज करोड़ों लोगों को मार सकती है, तो वो कोई वायरस होगा न कि कोई युद्ध अर्थात वर्तमान समय में मानव समुदाय को सर्वाधिक खतरा माइक्रोब्स से है न कि किसी मिसाइल से। अतः हमें इस तरह के किसी वायरस से सुरक्षा के लिए पहले से ही आवश्यक तैयारी करने की जरूरत है, क्योंकि अभी तक हमने इस दिशा में कोई विशेष तैयारी नहीं की है। गेट्स इबोला वायरस का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यह वायरस मानव समुदाय को ज्यादा क्षति नहीं पहुंचा सका। इसका यह मतलब नहीं है कि आने वाले भविष्य में भी कोई दूसरा वायरस इबोला के समान ही होगा। यह संभव है कि वह वायरस मानव समुदाय के लिए इबोला से भी बहुत ज्यादा खतरनाक साबित हो। वर्ष 2015 में गेट्स द्वारा दी गई यह चेतावनी आज कोरोनावायरस के संबंध में काफी प्रासंगिक सिद्ध हो रही है। 

कोरोनावायरस, वायरस का एक परिवार है, जो सामान्य सर्दी, जुकाम से लेकर गंभीर बीमारियों, जैसे मध्य-पूर्व श्वसन सिंड्रोम (MERS-COV) और गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (SARC-COV) के लिए उत्तरदायी है। यह वायरस जानवर और मानव दोनों को संक्रमित कर सकता है। कोरोनावायरस की पहली बार पहचान 1960 के दशक में की गई थी। वर्तमान ज्ञात ‘सार्स-कोव-2’ (SARC COV-20) कोरोनावायरस को लेकर अभी तक 7 प्रकार के कोरोनावायरस की पहचान की जा चुकी है, जिसमें 229E, NL63, OC43, HKU1, MERS-COV और SARS-COV शामिल हैं। कभी-कभी कोरोना वायरस जो जानवरों को संक्रमित करते हैं, वे विकसित होकर मानव को भी संक्रमित कर सकते हैं। हाल ही में इसके तीन उदाहरण मर्स-कोव, सार्स-कोव और सार्स-कोव-2 हैं। सार्स-कोव कोरोनावायरस का एक प्रकार है, जिसकी पहली बार पहचान नवंबर, 2002 में चीन में गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम कोरोनावायरस के रूप में की गई थी। यह वायरस वर्ष 2002-03 में 8,098 संक्रमण के मामलों के साथ, जिसमें 774 मृत्यु के मामले भी शामिल हैं, के साथ विश्वव्यापी प्रकोप के लिए उत्तरदायी था। इसके बाद वर्ष 2012 में पहली बार सऊदी अरब में मध्य-पूर्व श्वसन सिंड्रोम की पहचान की गई थी। यह वायरस सऊदी अरब के अतिरिक्त दर्जनों अन्य देशों में बीमारी का कारण बना, परंतु इस वायरस से संक्रमण के अब तक के सभी मामले अरब प्रायद्वीप या उसके आस-पास के देशों से ही संबंधित हैं। 

कोरोना वायरस पर निबंध

मर्स कोव के बाद 31 दिसंबर, 2019 को चीन के वुहान शहर में ‘सार्स-कोव-2’ नामक वायरस प्रकाश में आया। विशेषज्ञों के मुताबिक इस वायरस का स्रोत चीन के हुनान प्रांत स्थित सी-फूड होलसेल मार्केट है। 7 फरवरी, 2020 को दक्षिण चीन कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पैंगोलिन को इस वायरस का वाहक बनने की संभावना व्यक्त की। 

11 फरवरी, 2020 को सार्स-कोव-2 वायरस जनित बीमारी का नाम विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ‘कोविड-19’ के रूप में रखा गया। इस वायरस का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रसार अधिकांशतः करीबी संपर्क के कारण होता है। जब पीड़ित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो आस-पास के दूसरे व्यक्ति को इस वायरस का संक्रमण हो सकता है। सार्स-कोव-2 वायरस के संक्रमण के सामान्य लक्षणों में सांस लेने में तकलीफ, बुखार, खांसी, कफ इत्यादि शामिल हैं। अधिक गंभीर मामलों में निमोनिया, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम, गुर्दे की विफलता और यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है। इस वायरस के संक्रमण से मनुष्य का फेफड़ा प्रभावित होता है, जिससे ऑक्सीजन का प्रवाह रुकने लगता है। परिणामस्वरूप इस बीमारी से गंभीर रूप से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। गौरतलब है कि सार्स-कोव-2 वायरस से संक्रमित व्यक्ति के इलाज के लिए वर्तमान में कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है। अतः इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका ‘सतर्कता ही बचाव है’ के मूलमंत्र को अपने दैनिक जीवन में अपनाना है। इसके तहत अपने चेहरे को मॉस्क से ढंककर रखना, अपने हाथों को बार-बार साबुन से धोते रहना, सामाजिक दूरी को बनाए रखना तथा अनावश्यक घर से बाहर निकलने से बचना है। 

‘कोविड-19’ बीमारी ने समस्त विश्व में व्यापक हलचल की स्थिति पैदा कर दी है। इसने समूचे वैश्विक स्तर पर राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व पर्यावरणीय क्षेत्र में व्यापक बदलाव को प्रेरित किया है। इसमें कुछ बदलाव अच्छे रहे हैं, तो कुछ अत्यंत खराब। यदि राजनैतिक दृष्टिकोण से इस बीमारी की बात की जाए, तो वैश्विक राजनीति के संदर्भ में इसका प्रभाव अधिकांशतः नकारात्मक ही रहा है। यह बीमारी 207 से अधिक देशों में फैल चुकी है तथा 30 नवंबर, 2020 तक इस बीमारी से 6 करोड़ 40 लाख से अधिक लोग संक्रमित पाए गए हैं, जिनमें 14 लाख 85 हजार से अधिक लोग मृत्यु को वरण कर चुके हैं। किसी एक देश में सर्वाधिक संक्रमण के मामले क्रमशः अमेरिका, भारत, ब्राजील, रूस और फ्रांस में दर्ज किए गए हैं। इस बीमारी की भयानकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें समूची मानव जाति,  आधुनिक, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, आधुनिक जीवविज्ञान एक तरफ है, तो दूसरी तरफ अकेला एक वायरस। इस बीमारी ने एक देश का दूसरे देश के प्रति रिश्तों की गणित को बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिका का चीन के साथ रिश्ता इस महामारी के दौरान काफी तल्ख हो चुका है। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने इस महामारी से संबंधित जानकारी को छुपाया है। इस महामारी ने भारत-चीन के रिश्तों को भी आज काफी तल्ख बना दिया है, जिसकी परिणति गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच आपसी कटुता के रूप में देखी जा सकती है। इस महामारी ने रिश्तों की गणित को देशों के संदर्भ में ही नहीं बदला है, बल्कि वैश्विक संगठन, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के संदर्भ में भी बदला है। अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चीन के पक्ष में काम करने तथा इस महामारी के बारे में समय पर सूचित करने में विफल होने का आरोप लगाकर पहले तो संगठन को अमेरिका की ओर से दिए जाने वाले आर्थिक अनुदान पर रोक लगाया तथा बाद में संगठन के साथ अपने सभी तरह के संबंध समाप्त कर लिए। इस महामारी ने यूरोपीय संघ के अटूट संबंध को कमजोर करने में भी भूमिका निभाई है। महामारी के आरंभिक दौर में जब इटली इस बीमारी से बुरी तरह से प्रभावित था, तब उसे यूरोपीय संघ के देशों से समय पर मदद नहीं मिल पाई, जिससे इटली के नागरिकों के मन में यूरोपीय संघ के प्रति असंतोष का जन्म हुआ है। 

भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इसे महामारी घोषित – करने से बहुत पहले 17 जनवरी से ही क्षेत्रीय स्तर पर आवश्यक तैयारी और कार्यवाही शुरू कर दी थी। इसके साथ ही एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग के जरिए विदेशी यात्रियों की भी जांच की जाने लगी थी। भारत में कोविड-19 संक्रमण का पहला मामला 30 जनवरी, 2020 को केरल में प्रकाश में आया था। धीरे-धीरे संक्रमण के बढ़ते मामले और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इसे महामारी घोषित किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने 11 मार्च, 2020 को महामारी अधिनियम, 1897 को लागू किया। इसके तहत केंद्र सरकार ने विभिन्न राज्य सरकारों व केंद्रशासित प्रदेशों को सलाह दी कि वे अपने-अपने राज्य में इस अधिनियम की धारा-2 को लागू करें, जिससे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले दिशा-निर्देशों को उस राज्य व केंद्रशासित प्रदेश में लागू किया जा सके| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 15 मार्च, 2020 को सार्क के सभी देशों के नेताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक साझा रणनीति बनाने के लिए बातचीत की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने सभी देशों के स्वैच्छिक योगदान के आधार पर ‘कोविड-19 इमरजेंसी फंड’ बनाने का प्रस्ताव रखा। साथ ही भारत ने फंड के लिए शुरू में 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर भी दिए। प्रधानमंत्री के आह्वान पर 22 मार्च, 2020 को देशभर में जनता कर्फ्यू का आयोजन किया गया। इसके सफल आयोजन के उपरांत पूरे देश में 25 मार्च 2020 को 21 दिनों के लिए पूर्णबंदी (लॉकडाउन) की घोषणा की गई, जिसे समय-समय पर आवश्यकतानुसार बढ़ाकर 31 मई, 2020 तक जारी रखा गया। पूर्णबंदी की लंबी अवधि के बाद 8 जून, 2020 को अनलॉक-1 की घोषणा की गई, जिसके तहत कुछ शर्तों के साथ पूर्णबंदी को समाप्त करने की घोषणा की गई। इसके उपरांत क्रमशः अनलॉक-2, 3 इत्यादि के माध्यम से शर्तों के साथ अत्यधिक छूट प्रदान की गई। 

कोविड-19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है। महामारी के दौरान संपूर्ण देश में पूर्णबंदी लागू करने के दौरान जान है तो जहान है’ का नारा दिया गया था, जिसका तात्पर्य है कि महामारी से लोगों की जान बचाना पहली प्राथमिकता है। यदि लोगों की जान बच गई, तो पूर्णबंदी से लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था को हम बाद में भी खड़ा कर सकते हैं। पूर्णबंदी के दौरान उद्योग धंधों के बंद होने से देशव्यापी बेरोजगारी की समस्या पैदा होने लगी, प्रवासी मजदूरों का अपने गांवों की ओर पलायन होने लगा। इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने अपने पूर्व के नारे में बदलाव करते हुए “जान भी, जहान भी” का नारा दिया, जिसका आशय है हमें लोगों की जान बचाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और लोगों के रोजगार को भी बचाना है। इस दिशा में सरकार के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कई कदम उठाए। केंद्रीय बैंक ने रिवर्स रेपो रेट में एक-चौथाई कमी की, जिससे बैंक उद्यमियों को ज्यादा-से-ज्यादा ऋण दे सकें। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की, जिससे छोटे उद्यमियों व अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को पुनर्जीवित किया जा सके। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की घोषणा की, जिसके पांच स्तंभ हैं अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा, प्रौद्योगिकी संचालित प्रणाली, जनसांख्यिकी और मांग। इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय उत्पादों के खपत को बढ़ाना तथा आयात को कम करना है।

 कोविड-19 महामारी ने सामाजिक जीवन को सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही रूपों में प्रभावित किया है। इसका सकारात्मक प्रभाव यह है कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ी है। लोग पहले की अपेक्षा साफ-सफाई पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। लेकिन इस महामारी ने भारतीय समाज को नकारात्मक रूप से ज्यादा प्रभावित किया है। भारत में हाशिए पर रहने वाले वर्गों, महिलाओं और बच्चों को इस महामारी ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। देश में पूर्णबंदी की घोषणा से यात्रा व सांस्कृतिक समारोहों के आयोजन पर प्रतिबंध, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं और नियमित टीकाकरण में रुकावट ने समाज में चिंता और भय के वातावरण को जन्म दिया है। परिवार और दोस्तों के साथ सामाजिक दूरी, मनोरंजन व ऐसे अन्य स्थानों को बंद करना, बिना किसी योजना के विद्यालय व कॉलेज को बंद करने से बच्चों में अवसाद बढ़ने के साथ-ही-साथ शैक्षणिक गुणवत्ता में भी गिरावट देखने को मिली। स्वास्थ्य संबंधी अपर्याप्त बुनियादी ढांचा ने स्वास्थ्यकर्मियों की चिंता को भी बढ़ाया। 

कोविड-19 महामारी ने पर्यावरण को भी सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही रूपों में प्रभावित किया है। इसके सकारात्मक प्रभाव की बात की जाए तो इससे हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार देखने को मिला है। पूर्णबंदी के दौरान औद्योगिक गतिविधियों व परिवहन के साधनों के स्थगन से पी.एम. 2.5 और नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आने से हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है। समुद्र तटीय क्षेत्र भूमि, रेत, मनोरंजन और पर्यटन जैसी सेवाएं प्रदान करते हैं और इस कारण से ये तटीय समुदायों के अस्तित्व के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं। 

पूर्णबंदी के दौरान एक तरफ जहां पर्यटकों की कमी से तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण में कमी आई है, वहीं दूसरी तरफ इससे तटीय समुदाय की जीवन निर्वाह क्षमता विपरीत रूप में प्रभावित हुई है। पूर्णबंदी के दौरान परिवहन व उद्योगों के बंद होने से ध्वनि प्रदूषण के स्तर में सुधार आया है। इससे हृदय रोगियों को काफी राहत मिली है। पूर्णबंदी से औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों में कमी आने से नदियों के जल की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है। 

पूर्णबंदी ने पर्यावरण को नकारात्मक रूप से भी प्रभावित किया है। जैविक और अकार्बनिक कचरा अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरणीय समस्याओं, जैसे-मिट्टी का क्षरण, वनों की कटाई, आयु और जल प्रदूषण से संबंधित हैं। क्वॉरंटाइन और पृथक्करण जैसी सरकारी नीतियों ने लोगों में ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा दिया है। परिणामस्वरूप इससे जैविक अपशिष्ट काफी मात्रा में बढ़ा है। खाद्य पदार्थों के पैकेजिंग को बढ़ावा मिलने से अकार्बनिक कचरे की मात्रा बढ़ी है। इस दौरान मेडिकल अपशिष्ट की मात्रा भी बढ़ी है। पूर्णबंदी के दौरान विभिन्न गतिविधियों के प्रभावित होने से अपशिष्टों के पुनर्चक्रण का कार्य भी प्रभावित हुआ है। महामारी के दौरान अमेरिका ने अपने कुछ शहरों में पुनर्चक्रण कार्यक्रमों को इसलिए रोक दिया, क्योंकि कर्मचारियों के माध्यम से अपशिष्ट पुनर्चक्रण केंद्रों में कोविड-19 बीमारी के संक्रमण के प्रसार का डर था। 

वर्तमान समय में कोविड-19 बीमारी के समक्ष करीब हर देश  एक बड़े संघर्ष के दौर से गुजर रहा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आने वाले समय में भी मानव जाति इस वायरस के समक्ष इसी तरह से असहाय नजर आएगी। यहां पर चार्ल्स डार्विन के एक कथन का उल्लेख करना प्रासंगिक जान पड़ता है। उन्होंने कहा था, ‘एक मजबूत और बुद्धिमान नस्ल जीवित रहे या न रहे, परंतु वह जरूर जीवित रहेगी, जिसमें परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता होगी।’ डार्विन का यह कथन मानव की वास्तविक क्षमता की याद दिलाता है और वह है ‘अनुकूलन क्षमता’। मानव अपनी इसी अनुकूलन क्षमता से आदि मानव काल से लेकर आज तक विभिन्न समस्याओं पर विजय प्राप्त करते हुए निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है। आज मानव ने अंतरिक्ष तक पहुंच कायम करने का दुरूह कार्य भी संपन्न कर लिया है। ऐसी स्थिति में इस बात का पूरा विश्वास है कि मानव इस बीमारी पर भी फतह हासिल कर लेगा। 

कोविड-19 जैसी किसी महामारी से निपटने के लिए बिल गेट्स ने वर्ष 2015 में ही कुछ प्रमुख सुझाव दिए थे। यदि इन सुझावों को समय रहते अमल में लाया जाता, तो शायद मानव की वर्तमान महाविनाश लीला पर काफी अच्छी तरह से विजय पाया जा सकता था। गेट्स का प्रथम सुझाव था कि विश्व के नेताओं को नाटो जैसे संगठन से सीख लेकर भविष्य में किसी वैश्विक महामारी से बचने के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। गौरतलब है कि नाटो की कुछ फुलटाइम और आरक्षित सेनाएं होती हैं। उनका एक मोबाइल यूनिट भी होता है, जिसे त्वरित गति से कहीं पर भी भेजा जा सकता है। उनका दूसरा सुझाव था कि आर्थिक व स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से कमजोर देशों में बेहद मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना होगा, क्योंकि यहां संक्रमण फैलने का सबसे ज्यादा खतरा होता है। तीसरा सुझाव यह था कि हमें मेडिकल रिजर्व कॉर्स तैयार करना चाहिए तथा इसमें ऐसे लोगों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में समुचित प्रशिक्षण हो तथा जिन्हें अविलंब कहीं पर भी भेजा जा सके| चौथा सुझाव यह था कि जिस प्रकार सेना में सैनिकों की तैयारी की परख के लिए वारगेम्स होते हैं, ठीक उसी प्रकार से मेडिकल टीम की तैयारी की परख के लिए जर्मगेम्स जैसे सैमुलेशन तैयार करने होंगे। पांचवां सुझाव यह था कि वैक्सीन और इलाज के क्षेत्र में अत्यधिक शोध एवं अनुसंधान किए जाने की जरूरत है। हालांकि, उनका यह भी मानना था कि इन सभी चीजों की तैयारी के लिए काफी धन खर्च करना पड़ेगा, लेकिन किसी महामारी से हुए जन-धन की हानि की अपेक्षा इसकी लागत काफी कम होगी। 

कोविड-19 बीमारी के समक्ष आज जहां एलोपैथी नतमस्तक हो चुकी है, तब ऐसे समय में हम आयुर्वेद एवं योगाभ्यास के द्वारा काफी सीमा तक इस बीमारी का सामना कर रहे हैं। साथ ही नेचुरोपैथी का भी सहारा लिया जा रहा है। नेचुरोपैथी के अंतर्गत सुरक्षात्मक उपचार, जैसे व्यक्तिगत स्वच्छता, सामुदायिक साफ सफाई, अपने इलाके तक सीमित रहना, लंबी दूरी की यात्राओं को टालना और सार्वजनिक सभा जैसे कार्यक्रमों से बचना शामिल है। आज, जब इस बीमारी ने वैश्वीकरण की मूल भावना को गंभीर चोट पहुंचाई है, तब ऐसे समय में गांधीजी के ‘ग्लोकलाइजेशन’ के विचार को अपनाकर भी इस बीमारी से काफी सीमा तक बचा जा सकता है। इस विचार के अंतर्गत अपने निकटवर्ती गांव या पड़ोस के भीतर तक अपनी गतिविधियों को सीमित करके अपनी जरूरतों की पूर्ति की जा सकती है। इस विचार से जहां एक तरफ रोजगार अपने क्षेत्र में ही मिल सकेगा, वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण-अनुकूल होने के कारण सतत विकास को भी बढ़ावा दे सकेगा। गौरतलब है कि वर्तमान केंद्र सरकार का ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

इस प्रकार आज जब कोविड-19 बीमारी के व्यापक प्रसार के कारण पूरा विश्व भयाक्रांत है, तब ऐसे समय में भारत आयुर्वेदिक ओषधि, योग, उपयुक्त जीवन शैली, पौष्टिक खान-पान, वैचारिक संपन्नता जैसी बहुमूल्य प्राचीन संपदा के कारण एक बार फिर से विश्व गुरु के रूप में पूरी दुनिया में नेतृत्व करता हुआ प्रतीत हो रहा है। संभवतः भारत की इस बहुमूल्य प्राचीन संपदा का ही फल है कि इस बीमारी से विश्व के किसी अन्य देश की तुलना में भारत में मृत्यु दर काफी कम है। 

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