सहकारी संघवाद पर निबंध | Essay on Cooperative Federalism

सहकारी संघवाद पर निबंध

सहकारी संघवाद पर निबंध अथवा सहभागी पर निबंध

“सहकारी संघवाद उस उदार और जीवंत लोकतंत्र का द्योतक है, जिसकी मूल प्रकृति ही सहभागिता की है। इसमें सहयोग की भावना मुखर होती है और शक्तियों के विकेंद्रीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।” 

लोकतंत्र का पहला शब्द ‘लोक’ है, जो लोगों की सहभागिता को इंगित करता है। वस्तुतः लोकतंत्र की पहली और अनिवार्य शर्त ही सहभागिता है और यही इसका अस्तित्व भी है। यहीं से उद्भूत हुई है सहभागी अथवा सहकारी संघवाद की अवधारणा। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, सहभागी अथवा सहकारी संघवाद की अवधारणा पारस्परिक सहयोग को प्रोत्साहित करती है। सहकारी संघवाद की अवधारणा के अंतर्गत राष्ट्रीय, प्रांतीय एवं स्थानीय सरकारों के मध्य बेहतर समन्वय देखने को मिलता है और तीनों मिलकर लोक कल्याण का उद्यम करती हैं तथा समस्याओं का समाधान निकालने के लिए तत्पर रहती हैं। 

Essay on Cooperative Federalism

सहकारी संघवाद उस उदार और जीवंत लोकतंत्र का द्योतक है, जिसकी मूल प्रकृति ही सहभागिता की है। इसमें सहयोग की भावना मुखर होती है और शक्तियों के विकेंद्रीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस व्यवस्था में केंद्र सरकार शक्तिशाली भले हो, मगर वह राज्य सरकारों के प्रति न तो बाध्यकारी रवैया अपनाती है और न ही बाध्यकारी ढंग से अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों आदि को राज्य सरकारों पर थोपती है। सहकारी संघवाद के अंतर्गत केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारें परस्पर सहयोग, समन्वय और सहकारिता के आधार पर काम करती हैं। इसमें सहभागिता की भावना प्रबल होती है। एक पारदर्शी लोकतंत्र और मजवत राष्ट के लिए सहकारी संघवाद ही प्रासंगिक होता है क्योंकि राज्यों और स्थानीय सरकारों की उपेक्षा करके न तो लोकतंत्र में पारदर्शिता लाई जा सकती है और न ही राष्ट्र को मजबूती ही प्रदान की जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सशक्त राज्य ही मिलकर सशक्त राष्ट्र का निर्माण करते हैं। 

ग्रेनविल ऑस्टिन ने ‘भारतीय संघवाद को सहकारी संघवाद कहा है। जहां तक भारत में सहभागी अथवा सहकारी संघवाद का प्रश्न है, तो भारत के संविधान में सीधे-सीधे कहीं भी ‘सहकारी संघवाद’, के संबंध में कोई प्रावधान या उल्लेख नहीं मिलता है। भारतीय संविधान में संघात्मक प्रणाली की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार, भारत राज्यों का संघ है, परंतु भारतीय संघ की स्थापना राज्यों की आपसी सहमति या करार का परिणाम नहीं, बल्कि संविधान सभा की घोषणा है, जिसे भारत के लोगों की शक्ति प्राप्त है। राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ शक्तिशाली केंद्रीय सरकार के कारण भारतीय संविधान में प्रचुर एकात्मक लक्षण विद्यमान हैं। संभवतः इसीलिए भारतीय संविधान को अर्धसंघात्मक संविधान के रूप में अभिहित किया जाता है। डॉ. भीमराव अम्बेदकर के अनसार “संघ का अर्थ है, एक द्वैत हुकूमत (दोहरा शासन तंत्र) की स्थापना। मसौदा संविधान में द्वैत हुकूमत के तहत केंद्र में केंद्रीय सरकार होगी और परिधि में – राज्य सरकारें होंगी, जिनके पास वे संप्रभु शक्तियां होंगी, जिनका उपयोग वे संविधान द्वारा निर्दिष्ट क्षेत्रों में कर सकेंगी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का भी कहना था कि संघ की इकाइयों को काफी स्वायत्ता दी जाएगी। 

“भारतीय संविधान में भले ही कहीं भी ‘सहकारी संघवाद’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, किंतु इसमें यत्र-तत्र सहकारी संघवाद की अभिव्यक्तियां देखने को मिलती हैं।” 

भारतीय संविधान में भले ही कहीं भी ‘सहकारी संघवाद’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, किंतु इसमें यत्र-तत्र सहकारी संघवाद की अभिव्यक्तियां देखने को मिलती हैं। यहां इनके बारे में जान लेना समीचीन रहेगा। संविधान के अनुच्छेद 263 में यह उपबंध है कि राष्ट्रपति लोकहित में—(क) राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जांच करने और उन पर सलाह देने, (ख) राज्यों तथा राज्य और संघ के सामान्य हित के विषयों के अन्वेषण और उन पर विचार-विमर्श करने या (ग) इन विषयों पर समन्वय की सिफारिश करने के लिए अंतर्राज्यीय परिषद (Inter State Council) का गठन कर सकता है। इस प्रकार, अंतर्राज्यीय परिषद एक संवैधानिक निकाय है, जिसे सहकारी संघवाद की संवैधानिक अभिव्यक्ति भी कहा जाता है। अंतर्राज्यीय परिषद का गठन राष्ट्रीय विकास परिषद तथा सरकारिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 में अनुच्छेद 263 के अधीन किया गया। 

सहकारी संघवाद की एक अभिव्यक्ति क्षेत्रीय परिषद (Re gional Council) भी है। क्षेत्रीय परिषद का गठन संसद के अधिनियम द्वारा किया गया है। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के आधार पर भारत के राज्य क्षेत्र को 5 भागों में बांटा गया है तथा प्रत्येक के लिए एक क्षेत्रीय परिषद बनाई गई है। क्षेत्रीय परिषदों का मुख्य कार्य समान हित के विषयों पर विचार करना और सलाह देना है। पांच क्षेत्रीय परिषदों के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के राज्यों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1971 में पूर्वोत्तर परिषद बनाई गई, जिसमें असोम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम शामिल हैं। 

सहकारी संघवाद की अवधारणा से प्रेरित होकर समय-समय पर केंद्र और राज्यों के संबंधों पर विचार करने के लिए आयोगों का गठन भी किया जाता रहा है, जिनमें सरकारिया आयोग की कुछ सिफारिशों को मान्यता प्रदान की गई है। संघ-राज्य संबंधों तथा उनके बीच शक्तियों के वितरण पर विचार करने के लिए वर्ष 1983 में न्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में गठित आयोग ने वर्ष 1987 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में जहां अनुच्छेद 258 के अधीन संघ द्वारा राज्यों को शक्ति प्रदान करने के उपयोग को उदार बनाने की सिफारिश की गई, वहीं यह भी कहा गया कि समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने से पूर्व संघ व राज्य सरकारों के बीच विचार-विमर्श होना चाहिए। आयोग ने यह भी संस्तुति दी कि राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श के बाद ही की जानी चाहिए। रिपोर्ट में राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने को उचित तो ठहराया गया, किंतु यह भी कहा गया कि इसे अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए। एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश यह भी की गई कि राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए तथा राज्यों के वित्तीय नियंत्रण को मजबूत बनाया जाए। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान केंद्र सरकार की कुछ पहले भी सहकारी संघवाद की अवधारणा को बल प्रदान करने वाली हैं। पहली पहल ‘नीति आयोग’ के रूप में सामने आई है। केंद्र और राज्य स्तरों पर सरकार को नीति के प्रमुख कारकों के संबंध में प्रासंगिक, महत्त्वपूर्ण रणनीतिक एवं तकनीकी परामर्श उपलब्ध कराने के मूल उद्देश्यों के साथ योजना आयोग का स्थान लेने के लिए ‘नीति आयोग’ (NITI Aavog) का गठन किया गया है। ध्यातव्य है कि पहले ‘योजना आयोग’ में राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं होती थी, लेकिन संघीय ढांचे को मजबूत करते हुए ‘नीति आयोग’ में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। अब केंद्र से राज्यों की तरफ चलने वाले एकपक्षीय नीतिगत क्रम को एक महत्त्वपूर्ण विकासवादी परिवर्तन के रूप में राज्यों की वास्तविक और सतत भागीदारी से बदल दिया जाएगा। यही वास्तविक सहकारी संघवाद होगा। 

जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) भी सहकारी संघवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है, क्योंकि इसे केंद्र ने राज्यों को साथ लेकर शुरू किया है। इसके लिए सर्व-समावेशी जीएसटी परिषद का गठन किया गया। जीएसटी कानूनों के निर्धारण में सभी राज्यों की भागीदारी रही। केंद्र और राज्य दोनों एक समानता हासिल करने के लिए अपनी शक्तियों को साझा करने के लिए तैयार हुए। यह संघवाद की स्वीकार्य भावना को दर्शाता है। जीएसटी के रूप में जो आर्थिक एकीकरण सामने आया है, वह न सिर्फ आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि देश को बेहतर ढंग से बांध भी देगा। यह केंद्र और राज्यों द्वारा प्रदर्शित सहयोग की भावना से ही संभव हुआ है। यहां यह उल्लेख करना उचित रहेगा कि वित्त आयोग द्वारा 14वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि राज्यों का केंद्रीय कर राजस्व संग्रहण में अधिक हिस्सेदारी का अधिकार होना चाहिए। गौरतलब है कि वित्त आयोग भी सहकारी संघवाद की एक संवैधानिक अभिव्यक्ति है, जिसका गठन अनुच्छेद 280 के तहत किया जाता है। भारतीय संविधान में, राज्य सरकारों को संघ से वित्तीय सहायता की व्यवस्था की गई है, जिसका निर्धारण वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही किया जाता है। 

“हम जिस तरह से सहभागी अथवा सहकारी संघवाद की तरफ बढ़ रहे हैं, उससे जहां भारतीय लोकतंत्र को शक्ति मिलेगी, वहीं इसकी जड़ें भी मजबूत होंगी।” 

स्पष्ट है कि सहकारी संघवाद के जरिए हमने समन्वय की राजनीतिक संस्कृति को जन्म दिया है। इससे देश के अधिक से अधिक लोगों को सहभागिता के अवसर मिलेंगे, जिससे सहभागी अथवा सहकारी संघवाद की व्यवस्था मजबूत होगी। समन्वय की इस संस्कृति को हम ‘सुशासन’ से भी जोड़कर देख सकते हैं, क्योंकि समन्वय ही सुशासन का आधार है। जब समन्वय और सहभागिता बढ़ती है, तो सुशासन को भी धार मिलती है। इस संस्कृति से लोगों में जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है। 

हम जिस तरह से सहभागी अथवा सहकारी संघवाद की तरफ बढ़ रहे हैं, उससे जहां भारतीय लोकतंत्र को शक्ति मिलेगी, वहीं इसकी जड़ें भी मजबूत होंगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र सीधे तौर पर स्वराज है, जो सभी लोगों पर, सभी लोगों के लिए, सभी लोगों द्वारा किया जाता है। सहभागिता और सहकारिता तो इसके प्राणतत्व हैं। यह पारदर्शी तंत्र की कुंजी है, तो उदार लोकतंत्र की परिचायक है। सहकारी संघवाद एक न्यायपूर्ण व्यवस्था – का प्रतीक है, तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का पर्याय भी है। 

हमारे देश में सहकारी संघवाद का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा | है। कुछ हालिया पहलों से जहां केंद्र और राज्य सरकारों के बीच घर्षण कम हुआ है, वहीं राज्य एक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। केंद्र और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता देखने को मिल रही है, तो नीति आयोग के गठन के बाद से विकेंद्रीकरण को गति मिली है। सहकारी संघवाद के स्वर्णिम युग की शुरुआत हो चुकी हैं| 

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