उपभोक्ता संरक्षण पर निबंध | जागो ग्राहक जागो पर निबंध

उपभोक्ता संरक्षण पर निबंध

उपभोक्ता संरक्षण पर निबंध | जागो ग्राहक जागो पर निबंध  अथवा भारत में उपभोक्ता संरक्षण (Consumer Protection In India) अथवा (Jago Grahak, Jago) जागो ग्राहक,जागो अथवा भारत में कितने संरक्षित हैं उपभोक्ताओं के हक 

भारत में डिजिटलीकरण और ई-कॉमर्स के नए दौर ने जहां एक नए बाजार को सृजित किया है, वहीं इस नए बाजार के परिप्रेक्ष्य में उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं में भी बदलाव आया है। उनके हितों को नए सिरे से संरक्षित किए जाने की आवश्यकता इन बदलाओं के बीच महसूस की गई और इस दिशा में सरकार द्वारा ‘उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 के रूप में एक सुचिंतित पहल भी की गई है। इस पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि उपभोक्ता कहते किसे हैं। सामान्य अर्थों में उपभोक्ता उसे कहा जाता है, जो किसी वस्तु या सेवा की उचित कीमत चुका कर उसे प्राप्त करता है। बाजारों के विकास एवं व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ उपभोक्ता उत्पादन एवं विपणन की प्रक्रियाओं का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। 

उपभोग की संस्कृति बढ़ने से उपभोक्तावाद बढ़ा। इसके दो महत्त्वपूर्ण रुझान भी सामने आए। पहला यह कि बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता की अहमीयत बढ़ी, तो दूसरा यह कि उपभोक्ता के हितों एवं अधिकारों में सेंध लगाने का चलन भी बढ़ा। यानी उपभोक्ता को गमराह किए जाने के तौर-तरीके भी बढे। इन तौर-तरीकों में उपभोक्ता को छलने के लिए विज्ञापनों का भी सहारा लिया जाने लगा और बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने उत्पादों का प्रचार नामी-गिरामी उन । हस्तियों से करवाना शरू किया, जिन्हें हम ‘सेलेब्रिटी’ कहते हैं। इन सेलेब्रिटियों की जनता में गहरी पैठ एवं लोकप्रियता होती है। इस लिहाज से इनका जनता के प्रति दायित्व भी अधिक होता है। विडंबना यह रही कि इस ‘दायित्व-बोध’ से मुंह फेर कर अधिकांश सेलिब्रेटियों ने (कुछ सम्मानित अपवादों को छोड़कर) उन उत्पादों के बारे में खोखले दावे एवं भ्रामक प्रचार करना शुरू किया, जिन्हें उन्होंने न तो खद आजमाया और न ही उन पर भरोसा किया। इससे भ्रामकता का एक ऐसा भ्रमजाल निर्मित हुआ, जिसमें उपभोक्ता फंसने लगे। 

“उपभोग की संस्कृति बढ़ने से उपभोक्तावाद बढा। इसके दो महत्त्वपूर्ण रुझान भी सामने आए। पहला यह कि बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता की अहमीयत बढी, तो दूसरा यह कि उपभोक्ता के हितों एवं अधिकारों में सेंध लगाने का चलन भी बढ़ा।” 

हमारे देश में सिर्फ मिथ्या प्रचार एवं भ्रामक विज्ञापनों के जरिए ही उपभोक्ताओं को गुमराह नहीं किया जा रहा है, बल्कि भ्रामक पैकिंग, कीमतों में हेर-फेर, तथा तथ्यों को छुपाकर भी उपभोक्ता हितों में सेंध लगाई जाती है। नक्कालों की समानान्तर सत्ता भी बाजारों में कायम है। हर ‘असल’ की ‘नकल’ बाजार में उपलब्ध है। तमाम ब्रांडों के नकली उत्पादों से बाजार पटे पड़े हैं। स्थिति इतनी विकराल है कि हम जिस साबुन से नहाते हैं, जिस तेल का इस्तेमाल करते हैं और जिस देशी घी से रोटी को चुपड़ कर खाते हैं, वे सब-के-सब नकली हो सकते हैं। यह धंधा इतनी चालाकी और सावधानी से हो रहा है कि असली और नकली में फर्क करना आम उपभोक्ता के बस की बात नहीं है। ओआरजी मार्ग के एक सर्वेक्षण के बाद यह तथ्य सामने आया है कि नकली ब्रांडों का कारोबार सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में ही धड़ल्ले से नहीं होता है, बल्कि आज देश के हर हिस्से में और यहां तक कि धनाढ्य क्षेत्रों के कुलीन बाजारों में भी नकली ब्रांडों की भरमार है। यानी हर तरीके से अनैतिक व्यवसायी एवं पूंजीपति उपभोक्ता हितों और अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं। 

“यह अच्छा संकेत है कि हमारी सरकार अपनी जिम्मेदारी एवं दायित्व को समझते हुए उपभोक्ता को जागरूक एवं मजबत तो बना ही रही है, कानूनी स्तर पर भी उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण की दिशा में प्रयत्नशील है। वह उपभोक्ता को जागरूक बनाने के लिए उसे जगा रही है। उपभोक्ता जागरूकता अभियान को 12वीं योजना में महत्त्वाकांक्षी स्वरूप प्रदान किया गया।” 

जागरूकता में कमी एवं अशिक्षा जैसे कारणों से भारत में उपभोक्ता शक्ति एवं आन्दोलन का विकास उस तरह से नहीं हो पाया, जिस तरह अमेरिका एवं यूरोपीय देशों में हुआ। वर्ष 1991 से प्रारंभ आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय उपभोक्ताओं में कुछ जागरूकता भले आई, किंतु अभी भी यह अपर्याप्त है। भारत में स्थिति इसलिए भी खराब है कि उपभोक्तावाद का दायरा बढ़ने एवं जागरूकता व सावधानी के अभाव में स्वयं उपभोक्ता ही खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों को खरीद लेते हैं। यह जानते हुए भी जो चमक रहा है या जिसे सोना बताया जा रहा है, वह सोना नहीं है, उपभोक्ता स्तरहीन व गुणहीन उत्पादों को खरीद लेते हैं। 

चंकि उपभोक्ताओं का समूह असंगठित होता है, अतएव सरकार का भी यह दायित्व बनता है कि वह अपने स्तर से उपभोक्ताओं को मजबूत बनाए और उनके अधिकारों को पूरा संरक्षण प्रदान करे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उपभोक्ता जागरूकता का स्तर किसी भी देश की प्रगति का सूचक माना जाता है। अर्थव्यवस्थाओं के सुदृढ़ीकरण में भी सशक्त उपभोक्ता आन्दोलन की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

यह अच्छा संकेत है कि हमारी सरकार अपनी जिम्मेदारी एवं दायित्व को समझते हुए उपभोक्ताओं को जागरूक एवं मजबूत तो बना ही रही है, कानूनी स्तर पर भी उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण की दिशा में प्रयत्नशील है। वह उपभोक्ता को जागरूक बनाने के लिए उसे जगा रही है। उपभोक्ता जागरूकता अभियान को 12वीं योजना में महत्त्वाकांक्षी स्वरूप प्रदान किया गया। इसका नारा है- ‘जागो ग्राहक, जागो! इस अभियान के तहत हर आम उपभोक्ता तक उसके अधिकारों के बारे में सही जानकारी पहुंचाने का संकल्प लिया गया है। इसमें ग्रामीण एवं सुदूर क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। अखबार, इलेक्ट्रानिक मीडिया के सरकारी एवं गैरसरकारी चैनलों, इंटरनेट आदि हर संभव माध्यम के जरिए उपभोक्ता अधिकारों की ब्यौरेवार जानकारी विज्ञापित की जा रही है। प्रशिक्षण आदि के माध्यम से विभिन्न उपभोक्ता मंचों को सुदृढ़ बनाया जा रहा है। सरकारी प्रयासों के अलावा उपभोक्ता जागरूकता के लिए निजी क्षेत्र की पहलकदमी को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है और उससे तालमेल बैठा कर एक समग्र ढांचा खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। उपभोक्ता के मार्ग दर्शन के लिए जहां दिल्ली में राष्ट्रीय हेल्पलाइन की स्थापना की गई है, वहीं राज्यों में भी हेल्पलाइनें स्थापित की जा रही हैं। योजना गतिविधियों के पूरक के तौर पर गैर योजना उपायों को भी तरजीह दी जा रही है। बहुत सारे स्वैच्छिक संगठन हैं, जो तुलनात्मक परीक्षण, जागरूकता पैदा करने, अनुसंधान और उपभोक्ता सहायता के क्षेत्रों में बखूबी योगदान कर रहे हैं।

“हाल ही में नई जरूरतों एवं बाजार के नये परिवेश को ध्यान में रखकर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 संसद द्वारा पारित किया गया। यह विधेयक उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 1986 का स्थान लेगा।” 

भारत सरकार कानूनी स्तर पर उपभोक्ताओं के हितों और अधिकारों को संरक्षण देने की दिशा में प्रयत्नशील है। दिसंबर, 1986 में भारत सरकार ने अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड एवं ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में प्रभावी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियमों एवं व्यवस्थाओं का गहराई से अध्ययन करने के बाद एक व्यापक ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लागू किया, जिसमें क्रमशः वर्ष 1991, 1993 एवं 2002 में नई आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधन किए गए। हाल ही में नई जरूरतों एवं बाजार के नये परिवेश को ध्यान में रखकर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 संसद द्वारा पारित किया गया। यह विधेयक उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 1986 का स्थान लेगा। इस नए विधेयक की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि | उभरते नए बाजार (डिजिटलीकरण एवं ई-कॉमर्स) में उपभोक्ताओं की बदली हई आवश्यकताओं को पूरा करने, घटिया उत्पादों, बाजार में हेराफेरी के जरिए मूल्यों में बढ़ोत्तरी, असफल वारंटी, बिक्री उपरांत असंतोषजनक सेवाओं और अनुचित व्यापारिक लेन-देन से उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा हेतु ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986’ में बदलाव की आवश्यकता थी। यह विधेयक उपभोक्ता संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों (UNGCP-2015) के तहत अंकटाड (UNCTAD) द्वारा गठित पर्यवेक्षण तंत्र ‘अंतर्सरकारी विशेष समूह (Intergovernment Group of Expert) के अनुरूप हैं |

इस नए विधेयक में ई-कॉमर्स (C-Commerce) की परिभाषा  को विस्तार देते हए डिजिटल व्यापार को विनियमित करने के लिए नियमों और विनियमों का प्रावधान किया गया है। मौजूदा उपभाक्ता कानन के तहत किसी उत्पाद या सेवा के इस्तेमाल से किसी उपभोक्ता को कोई क्षति पहंचने पर कंपनी केवल नकसान का मुआवजा देती है, जबकि नए विधेयक में यदि एक समूह इन उत्पादों या सवा स प्रभावित होता है, तो इसे ‘क्लास-एक्शन केस’ (Class-Action Case) माना जाएगा। इस नए विधेयक में भ्रामक विज्ञापन करने वाले सेलिब्रिटीज पर भी शिकंजा कसा गया है। भ्रामक विज्ञापन करने वाले सेलिब्रिटी पर पहले अपराध के लिए 10 लाख रुपय तक का जुर्माना एवं एक साल का प्रतिबंध है, जबकि दूसरे अपराध के लिए 50 लाख रुपये तक का जुर्माना एवं तीन वर्ष के प्रतिबंध का प्रावधान है। इसी प्रकार कंपनियों द्वारा भ्रामक विज्ञापन जारी करने पर पहले अपराध हेतु 10 लाख रुपये तक का जुर्माना एवं दो वर्ष जेल का प्रावधान है। इसके बाद के अपराधों पर 50 लाख रुपये तक का जुर्माना और पांच वर्ष तक जेल की सजा का प्रावधान है। नए विधेयक में खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामलों में जुर्माने के साथ-साथ उम्रकैद की सजा का भी प्रावधान किया गया है। 

नए विधेयक की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए एक केंद्रीय ‘उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण’ स्थापित किए जाने का प्रावधान है, जिसे राज्य एवं जिला स्तरीय भी बनाया जाएगा। यह प्राधिकरण शिकायतें तो सुनेगा ही, उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के साथ वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र के रूप में भी कार्य करेगा, जिसमें मुकदमे के बाद भी मध्यस्थता का प्रावधान है। प्रस्तावित केंद्रीय प्राधिकरण में न्यायिक पृष्ठभूमि का एक अध्यक्ष होगा तथा 15 अन्य सदस्य होंगे। यकीनन, उपभोक्ताओं के हितों और अधिकारों के संरक्षण की दृष्टि से इस नए विधेयक के रूप में एक व्यापक पहल की गई है। 

उपभोक्ता के हितों की संरक्षा और सुरक्षा से संबंधित कुछ और कानून भी हमारे देश में अस्तित्व में हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं—फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, ड्रग एंड मैजिकल रिमेडीज (ऑब्जेक्शनेबल एडवर्टीजमेंट) एक्ट, वाट तथा मानक (पैकेज में रखी वस्तुएँ) अधिनियम, चोर-बाजारी निवारण तथा आवश्यक वस्तु प्रदाय बनाए रखना अधिनियम, बाट तथा माप मानक अधिनियम एवं व्यापार तथा व्यय वस्तु चिन्ह अधिनियम। उल्लेखनीय है कि खाद्य पदार्थों से संबंधित ‘फड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट, 2006’ भारत का एकमात्र ऐसा कानून है, जिसमें भ्रामक विज्ञापनों के लिए सेलेब्रिटी को जिम्मेदार ठहराने की व्यवस्था की गई है। उपभोक्ताओं के कानूनों एवं उन्हें प्रदान किए गए उपचारों के संदर्भ में यह जान लेना समीचीन रहेगा कि यदि कोई उत्पाद ‘भारतीय मानक ब्यूरो’ से प्रमाणित है तो निर्माता इसके संबंध में किसी प्रकार का भ्रामक विज्ञापन नहीं चला सकता। यदि वह इसके संबंध में विज्ञापन चलाता है, तो उत्पाद के विषय में वही बातें बतानी होंगी, जिनके आधार पर इसे ब्यूरो का प्रमाणपत्र मिला हुआ है। 

भारत में कानूनी स्तर पर उपभोक्ताओं के अधिकारों को व्यापक रूप से संरक्षित किए जाने के प्रावधान किए गए हैं। इनमें जो कमियाँ-खामियाँ हैं, उन्हें भी भविष्य में दूर किया जा सकता है। जागरूकता अभियानों एवं कानूनों के बावजूद भारत में व्यापार संबंधी अनैतिक क्रिया-कलापों के जारी रहने तथा उपभोक्ताओं के शोषण की घटनाएं थम नहीं रही हैं। इसकी मुख्य वजह जागरूकता की कमी है। विकसित देशों की भांति हमारे देश में उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति न तो सजग है और न ही सावधान। देश की गरीब जनता एवं ग्रामीण अंचलों के लोग प्रायः वस्तु की गुणवत्ता एवं मात्रा में कमी जैसी बातों के प्रति उदासीन रहते हैं। देश का पढ़ा-लिखा तबका भी अक्सर यह सोचकर अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ता है कि इस तरह की गतिविधियों में समय जाया कौन करे। भारत का उपभोक्ता संगठित भी नहीं है। 

“उपभोक्ता के हितों की संरक्षा और सुरक्षा से संबंधित कुछ और कानून भी हमारे देश में अस्तित्व में हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं-फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, ड्रग एंड मैजिकल रिमेडीज (ऑब्जेक्शनेबल एडवर्टीजमेंट) एक्ट, वाट तथा मानक (पैकेज में रखी वस्तुएँ) अधिनियम, चोर-बाजारी निवारण तथा आवश्यक वस्तु प्रदाय बनाए रखना अधिनियम, बाट तथा माप मानक अधिनियम एवं व्यापार तथा व्यय वस्तु चिन्ह अधिनियम” 

भारत में उपभोक्ता शक्ति को पर्याप्त रूप से विकसित करना आवश्यक है। ऐसा कर के ही हम देश में उपभोक्ता हितों एवं अधिकारों को संरक्षित कर पाएंगे। इसके लिए जहां सरकारी तंत्र की ओर से और अधिक सक्रियता की आवश्यकता है, वहीं यह भी आवश्यक है कि देश की जनता में व्याप्त उस अज्ञानता एवं जागरूकता के अभाव को दूर किया जाए, जिसकी वजह से आम जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं रह पाती है। विभिन्न सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों का यह दायित्व बनता है कि वे उपभोक्ताओं को जागरूक करें। गैर सरकारी संगठन यह कार्य अधिक ठीक ढंग से कर सकते हैं। पिछड़े एवं ग्रामीण अंचलों में जनजागरूकता बढ़ाने के प्रति विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करना होगा। उपभोक्ता आन्दोलन को सफल बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि विनिर्माता एवं उपभोक्ता के मध्य सीधा संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाए। उपभोक्ता संरक्षण में सहकारिता की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। सहकारिता के माध्यम से उपभोक्ता वर्ग संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकता है। 

उक्त प्रयासों के अलावा यह भी जरूरी है कि मुनाफाखोरी में गले तक डूबे व्यापारी वर्ग को व्यापारिक शुचिता, पेशागत ईमानदारी एवं राष्ट्रीय नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाए। व्यापारी वर्ग को महात्मा गांधी के इस कथन के निहितार्थ को समझना होगा- “उपभोक्ता हमारे परिसर में आने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है। वह हम पर निर्भर नहीं है, हम उस पर निर्भर हैं। उससे हमारे काम में रुकावट नहीं आती, वह ता हमारा लक्ष्य है। वह हमारे कारोबार से अलग नहीं है, बल्कि उसका | हिस्सा है। उसकी सेवा कर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते, बल्कि हमें ऐसा अवसर देकर वह हम पर एहसान करता है।”    

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