सांप्रदायिकता पर निबंध

सांप्रदायिकता पर निबंध

सांप्रदायिकता पर निबंध

सांप्रदायिकता का अभिप्राय है-दो संप्रदायों के मतावलंबियों के बीच विद्वेष की भावना। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति किसी संप्रदाय के पक्ष या विपक्ष में बोलता है, तो लोग उसे भी ‘सांप्रदायिक’ या ‘संप्रदायवादी’ कहते हैं। संप्रदाय से संबंधित बातों को ‘सांप्रदायिक बातें’ कहा जाता है। 

जब एक धर्म या संप्रदाय के अनुयायी अपने ही धर्म को अच्छा समझते हैं और दूसरे धर्म के अनुयायियों के प्रति प्रायः विद्वेष की भावना रखते हैं, तब उसे ‘सांप्रदायिकता’ कहते हैं। सांप्रदायिकता किसी भी देश तथा समाज के लिए अत्यंत घातक होती है। इससे देश की आर्थिक प्रगति तो रुकती ही है, देश की अखंडता भी खतरे में पड़ जाती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे अखंड भारत का बंटवारा इसी सांप्रदायिकता रूपी राक्षस की देन है। 

पांच सौ वर्षों के भारतीय इतिहास के अवलोकन से ज्ञात होता है कि भारत में सांप्रदायिकता का बीज यहां के शासकों ने बोया था। वे इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु दूसरे मतावलंबियों पर जोर-जबरदस्ती करने लगे। इस्लाम धर्म न स्वीकार करने पर लोगों को दीवारों में चुनवाने तथा तलवार द्वारा मौत के घाट उतारने जैसे कुकृत्य अपनाए गए। इससे सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला और हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच खाई बढ़ी। इस मौके का फायदा उठाकर अंग्रेज यहां के शासक बन बैठे। उन्होंने भी अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए हिंदुओं तथा मुसलमानों में एक दूसरे के प्रति धार्मिक विद्वेष को बढ़ावा दिया। इस प्रकार सांप्रदायिकता की भावना तेजी से बढ़ी। 

इसी अस्त्र के सहारे अंग्रेज लगभग 200 वर्षों तक निष्कंटक शासन करते रहे। अंग्रेजों ने जाते-जाते भी सांप्रदायिकता रूपी बाणों से भारत के शरीर को बेध दिया। फलतः आजादी मिलने के साथ-साथ देश का विभाजन हुआ। चारों ओर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। इन दंगों में जान-माल की अपूर्णीय क्षति हुई। इतना ही नहीं, सांप्रदायिकता रूपी राक्षस ने अबोध बच्चों तक को नहीं बख्शा। अतः सांप्रदायिकता मानवता के नाम पर एक कलंक है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म को अपनाने और पूजा-पाठ करने में राष्ट्र की ओर से स्वतंत्र है। इतना होने पर भी हमारे देश में विभिन्न धर्मों के लोगों में परस्पर सौहार्द्र और भाईचारे का अभाव है। इसी वजह से तो अब भी जगह-जगह सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं; यथा—हिंदू-मुसलमान, शिया सुन्नी, अकाली-निरंकारी एवं हिंदू-सिक्ख के बीच। इसके मूल में दो ही कारण हैं- पहला, धार्मिक कट्टरता और दूसरा, स्वार्थ परक राजनीति। 

समाज में तथाकथित मौलवी और पंडित धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं। ये अपने स्वार्थ के लिए समाज के सामने धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। फलतः मंदिर और मस्जिद, जो सौहार्द्र के प्रतीक हैं, कटुता का विषवमन करने लगते हैं। धर्म और राजनीति–दोनों अलग-अलग चीजें हैं। अगर सांप्रदायिकता का समावेश धर्म और राजनीति में किया जाएगा, तो उसके परिणाम भयानक होंगे। लेकिन खेद की बात है कि हमारे देश में संप्रदायों और धर्मों के आधार पर राजनीतिक दल बनाए जा रहे हैं। इन दलों के नेता अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए भोली-भाली जनता को सांप्रदायिकता की आग में झोंकते हैं। 

सांप्रदायिकता को दूर करने के लिए संप्रदायों के आधार पर होने वाली राजनीति पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। समाज में धर्म की सही व्याख्या होनी चाहिए। जो भी धर्म सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे, वह धर्म नहीं, अधर्म है। अल्लाह-ईश्वर में कोई भेद नहीं है। कोई भी मजहब आपस में वैर भाव रखना नहीं सिखाता। सभी धर्मों का सार ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ ही है। धर्म के इन सुविचारों को समाज में स्थापित किया जाए, ताकि सांप्रदायिकता के विष से निजात मिल सके। तभी सांप्रदायिक सद्भाव का विकास हो सकता है। 

यह संभव नहीं है कि देश में जातिवाद का पोषण होता रहे तथा ऐसे लोगों के प्रयास से धर्म और संप्रदाय का भेदभाव समाप्त हो जाए। जातिवाद प्रकारांतर से संप्रदायवाद है। जो जातिवादी नहीं होगा, वह संप्रदायवादी भी नहीं होगा। हमारे देश के नेता एक तरफ जात-पांत लेकर समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटते हैं, तो दूसरी तरफ ढपोरशंखी बातें करते हैं। वे सांप्रदायिकता के बल पर ही सत्ता में आने के लिए कमर कसते रहते हैं और पाक-साफ कहलाने के लिए सांप्रदायिकता के विरुद्ध झूठा प्रलाप करते हैं।

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