भारत में कृषि का व्यवसायीकरण पर निबंध

भारत में कृषि का व्यवसायीकरण पर निबंध

भारत में कृषि का व्यवसायीकरण पर निबंध Essay on Commercialization of Agriculture in India

कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारतीय कृषि का एक स्याह पक्ष यह है कि यह व्यावसायिक नहीं बन पाई है। यहां शुरू से ही ‘जीविका कृषि’ की प्रधानता रही, जिसके तहत स्वयं की तथा परिवार की उदरपूर्ति के लिए खाद्यान्न उत्पादन किया जाता रहा है। खराब आर्थिक दशा वाले छोटे और सीमांत किसान, जिनका कि भारत में प्रतिशत 85 है, ‘जीविका कृषि’ पर ही निर्भर करते हैं। व्यावसायिक कृषि से दूर रहने के कारण भारत का किसान आज भी फटेहाली से उबर नहीं पाया है। वह कर्ज के बोझ से दबा है, तो आत्महत्या करने । पर भी विवश है। कषि उसके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। फलतः वह कृषि से पलायन कर ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं के तहत मजदूरी कर जीवन यापन करने को विवश है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत का ‘अन्नदाता’ कृषि के अलाभकारी स्वरूप के कारण दर दर की ठोकरें खाने को विवश है। 

भारतीय किसानों को विपन्नता से उबारने एवं उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए कृषि के व्यवसायीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। कृषि का व्यवसायीकरण इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हमारे देश में शहरीकरण और औद्योगीकरण ने रफ्तार पकड़ रखी है। शहरीकरण और औद्योगीकरण को विकास का मानक बेशक माना जाता है, किंतु इसमें सर्वाधिक ह्रास भूमि का ही होता है। कृषि योग्य भूमि के कम होने से खाद्य जरूरतों को पूरा करने में दिक्कतें आती हैं, जिन्हें दूर करने के लिए भी कृषि का व्यवसायीकरण आवश्यक है। यानी कृषि को व्यावसायिक बनाकर ही खाद्यान्न सरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। मौजूदा समय में जिस तरह से कृषि कार्यों की लागत बढ़ी है, उसे देखते हुए भी कृषि के व्यवसायीकरण की जरूरत बढ़ी है, ताकि किसान अधिक लाभ कमा कर समृद्धि की ओर बढ़ सके। इन सब के अलावा वर्तमान वैश्वीकरण के युग में कृषि का व्यवसायीकरण एक अनिवार्य वास्तविकता बन चुका है। प्रतियोगिता में बने रहने के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि कृषि उत्पादों में गुणवत्ता हो और यह तभी संभव है, जब कृषि क्षेत्र को एक उद्योग के रूप में विकसित कर इसे लाभकारी स्वरूप प्रदान किया जाए। 

कृषि के व्यावसायीकरण से अभिप्राय कृषि की उस प्रक्रिया से है, जिसमें किसान बिक्री के उद्देश्य कृषि कार्य करता है। साथ ही स्थानीय बाजारों के स्थान पर बड़े बाजारों में कृषि उत्पाद विक्रय हेतु तैयार किए जाते हैं। यानी यह वह प्रक्रिया है, जो कृषि का लाभकारी स्वरूप सुनिश्चित करती है। कृषि के व्यवसायीकरण के तहत कृषि उत्पादन अधिकतम लाभ के लिए किया जाता है और इसके लिए उपभोक्ताओं की विभिन्न आवश्यकताओं एवं रुचियों को ध्यान में रखा जाता है। इसमें उद्यमशीलता एवं व्यवसाय प्रबंधन पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जाता है। व्यवसायीकरण से जहां किसानों के कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है, वहीं कृषि सहायक उद्यमों का भी विकास होता है। 

भारत के किसानों की खुशहाली, अर्थव्यवस्था की मजबूती एवं खाद्यान्न सुरक्षा के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि हम देश में कृषि के व्यवसायीकरण को प्रोत्साहित करें। इसके लिए हमें कृषि का एक ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जो भारतीय कृषि को व्यावसायिक संस्पर्श प्रदान करे और इसे लाभदायक बनाकर देश के किसानों को खुशहाली की तरफ ले जाए। इसके लिए सरकारों को पारदर्शी पहलें करनी होंगी, तो देश के किसानों को भी प्रगतिशील बनना पड़ेगा। 

आज अगर खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है, तो उसकी मुख्य वजह है कृषि क्षेत्र में व्यवसायीकरण का अभाव। कृषि में आर्थिक लाभ की असीम संभावनाएं हैं, बशर्ते इसे एक व्यवसाय की तरह किया जाए। कृषि से संबंधित अनेक चुनौतियों का समाधान कृषि के व्यवसायीकरण में ही है। कृषि के व्यवसायीकरण के लिए पहली जरूरत तो यह है कि किसान और बाजार के बीच तालमेल बढ़ाया जाए। भारतीय कृषक के साथ जुड़ी एक बड़ी विडंबना यह है कि उपज कम होने पर तो उसे नुकसान उठाना ही पड़ता है, उपज अधिक होने पर भी उसे तब नुकसान उठाना पड़ता है, जब खरीदार नहीं मिलते। इस स्थिति से बचने के लिए किसानों को ई-खेती और कॉन्ट्रैक्ट खेती को अपनाना होगा। ई-खेती किसानों को सिर्फ पैदावार के स्तर पर ही लाभान्वित नहीं करती है, बल्कि बाजार के स्तर पर भी इसका लाभ मिलता है। दूसरी तरफ कॉन्ट्रैक्ट खेती से जहां फसलों की बर्बादी रोकी जा सकती है, वहीं इसमें किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत भी मिलती है। कॉन्ट्रैक्ट खेती के तहत उत्पाद के लिए तयशुदा बाजार तैयार किया जाता है। किसान और खरीदार के बीच कीमतें पहले ही तय हो जाती हैं। फसल उगाने से पहले ही उसकी गुणवत्ता, मात्रा एवं डिलीवरी का समय निर्धारित कर लिया जाता है। किसान को जहां उर्वरक एवं कीटनाशक जैसी जरूरतों के साथ तकनीकी सलाह और सहयोग मुहैया कराया जाता है, वहीं उसे वित्त भी उपलब्ध करवाया जाता है। इस तरह की खेती में किसान को खुले बाजार की तुलना में 20 से 25 प्रतिशत अधिक मुनाफा होता है और उसका भविष्य भी सुरक्षित रहता है। यह अकारण नहीं है कि केंद्रीय कृषि नीति में कॉन्ट्रैक्ट कृषि के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है। इसका मकसद कृषि को व्यावसायिक स्पर्श देना एवं उसमें निवेश को बढ़ावा देना है। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलने से अनेक किसान निजी कंपनियों के लिए फसल उगा कर लाभान्वित हो रहे हैं। 

जैविक खेती को प्रोत्साहित कर भी हम कृषि के व्यवसायीकरण की दिशा में आगे बढ सकते हैं। स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के प्रति बढती जागरूकता के कारण जैविक खाद्य उत्पादों की जबरदस्त मांग बढ़ी है। ये वे खाद्य उत्पाद होते हैं, जिन्हें कृत्रिम खाद, कृत्रिम कीटनाशक शाकनाशक एवं कृत्रिम हार्मोन्स के बगैर तैयार किया जाता है। ये कुदरती तरीके से तैयार खाद्य उत्पाद होते हैं, जो कि सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। इसीलिए इनकी मांग बढ़ी है। किसान इसका लाभ उठा सकते हैं। उपभोक्ता अधिक कीमत देकर जैविक खाद्य उत्पाद लेना पसंद कर रहे हैं, जिसका भरपूर लाभ किसान उठा सकते हैं। जैविक खेती किफायती भी होती है। यानी इसके जरिए किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। 

किसानों के लिए औषधीय खेती भी मुनाफे का सौदा है। इसके तहत औषधीय महत्त्व की जड़ी-बूटियों एवं वनस्पतियों का उत्पादन किया जाता है। इनका न सिर्फ भारत में अच्छा बाजार है, बल्कि विदेशों में भी इनकी मांग है। औषधीय खेती, व्यावसायिक कृषि का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जिसे अपना कर कृषक खुशहाली की तरफ बढ़ सकते हैं। इसी प्रकार कृषि के व्यवसायीकरण में रेशम की खेती भी महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए मल्बेरी की खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। रेशम के कीड़ों का प्रिय आहार मल्बेरी के पत्ते होते हैं। कृषि के व्यावसायीकरण की दृष्टि से आजकल फूलों की खेती पर भी जोर दिया जा रहा है।

कृषि के व्यवसायीकरण की दृष्टि से बागानी कृषि एवं फूड प्रोसेसिंग का भी विशेष महत्त्व है। यदि किसान इन दोनों को साथ लेकर चले तो बहुत अच्छा मुनाफा कमा सकता है। उदाहरण के लिए आंवले की खेती करने वाले जो किसान आंवले से तैयार होने वाले उत्पादन को प्रोसेसिंग के बाद बाजार में उतारते हैं, उन्हें उत्पाद की दो से तीन गुना अधिक कीमत मिलती है। इसी प्रकार अनाज के साथ बागवानी भी व्यावसायिक कृषि का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। इससे जहां कृषि जोत में तेजी से आ रही गिरावट को रोका जा सकता है, वहीं खेती को फायदे का सौदा भी बनाया जा सकता है। इसके तहत बागवानी के पौधे लगाने के दौरान खेत में अनाज की बुवाई भी कर दी जाती है और अनाज प्राप्त किया जाता है। जैसे-जैसे बाग तैयार होता है, वैसे-वैसे अनाज की खेती कम कर दी जाती है। इससे किसान कहीं अधिक मुनाफा प्राप्त करते हैं। 

कृषि को व्यावसायिक स्पर्श देने की दृष्टि से मिश्रित खेती पर भी ध्यान देना होगा। यह अत्यंत लाभकारी होती है। इसके तहत एक ही खेत में कई तरह की खेती की जाती है। इसमें खेत में नीचे हल्दी, लहसुन और प्याज जैसी फसलें उगाई जाती हैं और ऊपर झामड़ बना कर लतर वाली सब्जियों को चढ़ा दिया जाता है। साथ ही, खेत की मेड़ों के किनारों पर केला, गन्ना एवं अमरूद आदि के पेड़ भी लगा दिए जाते हैं। कृषि को लाभकारी बनाने के लिए हमें मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन आदि पर भी ध्यान केंद्रित करना पड़ेगा, जो कि कृषि से संबंधित क्षेत्र ही हैं। 

जहां तक कृषि के व्यवसायीकरण में सरकार की भूमिका का प्रश्न है, तो सरकार की तरफ से न सिर्फ कृषि के व्यवसायीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है, बल्कि इस संदर्भ में किसानों को जागरूक बनाने की कोशिशें भी जारी हैं। राष्ट्रीय कृषि ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा भी कृषकों को खुशहाल बनाने की पहले जारी हैं। नाबार्ड ने कृषि व्यवसायीकरण में संयुक्त देयता समूह के माध्यम से किसानों के कायाकल्प की योजना बनाई है। इस योजना में नाबार्ड द्वारा स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग भी लिया जा रहा है। यह योजना बटाई पर कृषि करने वाले भूमिहीन किसानों एवं कृषि मजदूरों की स्थिति में व्यापक बदलाव ला सकती है। 

भारत में कृषि के व्यवसायीकरण के मार्ग में कुछ अवरोध भी हैं, जिन्हें दूर दिया जाना आवश्यक है। पहला अवरोध यह है कि अधिकांशतः भारतीय किसान अशिक्षित एवं अप्रशिक्षित है। उसमें जागरूकता का भी अभाव है। ऐसे में न तो वह प्रगतिशीलता की तरफ कदम बढ़ा पाता है और न ही सरकारी पहलों का लाभ ही उठा पाता है। इसके अलावा निवेश वितरण और स्थानीय कृषि शासन प्रणाली की दुर्बलता, जलवायु परिवर्तन एवं मौसमी प्रकोपों के कारण उत्पादन से जुड़े खतरे, कृषि क्षेत्र से लोगों का बढ़ता पलायन तथा विद्युत की अपर्याप्त आपूर्ति एवं मशीनों की ऊंची कीमतों आदि कृषि के व्यवसायीकरण के मार्ग में बड़े अवरोधक हैं। हमें इन बाधाओं को पार करने के लिए समुचित उपाय करने होंगे। यह भी आवश्यक है कि निचले स्तर पर किसानों को व्यवसायिक खेती हेतु भरपूर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं तथा पर्याप्त सिंचाई व्यवस्था, प्रशिक्षण, शोध व अनुसंधान की सुविधा तथा संसाधन उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए। 

खेती का व्यवसायीकरण मौजूदा दौर की आवश्यकता बन चका है। यह देश के किसानों को विपन्नता से उबारने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए तो आवश्यक है ही, खाद्यान्न सुरक्षा एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है। अब वह समय आ गया है कि हम कृषि क्षेत्र में निहित आर्थिक लाभ की असीम संभावनाओं को समझें और उसके अनुरूप पहले कर धरती से धन निकाल कर समृद्धि और संपन्नता की ओर बढ़े। 

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