गठबंधन सरकार पर निबंध अथवा भारतीय लोकतंत्र और गठबंधन सरकारें (Indian Democracy And Coalition Governments) 

गठबंधन सरकार पर निबंध

गठबंधन सरकार पर निबंध अथवा भारतीय लोकतंत्र और गठबंधन सरकारें (Indian Democracy And Coalition Governments) 

भारत में संसदीय लोकतंत्र है। हमारे यहां संघ तथा राज्य, दोनों  स्तरों पर संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च होती है और जनता का प्रतिनिधित्व करती है। संसदीय लोकतंत्र में आम चुनावों का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इन्हीं के जरिए जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है। 

चुनाव में जब किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है, तो वह अपनी सरकार का गठन कर लेता है। केन्द्र में राष्ट्रपति और राज्य में राज्यपाल बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के रूप में मनोनीत करता है। मंत्रिमंडल के गठन के साथ एक दलीय सरकार अस्तित्व में आ जाती है। ऐसी सरकारें प्रायः बगैर गठबंधन के चलती हैं। गठबंधन के जरिए सरकार के गठन की नौबत तब आती है, जब किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है। इस स्थिति में दलीय नेताओं के साथ तालमेल बैठाया जाता है और जब गठबंधन दल का नेता बहुमत के प्रति राष्ट्रपति या राज्यपाल को विश्वास में ले लेता है, तो उसे सरकार बनाने का अवसर प्रदान किया जाता है। 

“Coalition government denotes a co-operative arrangement under which distinct political par ties, unite to form a government or ministry.”

इस प्रकार गठित होने वाली सरकार मिली जुली सरकार कहलाती है। गठबंधन सरकारें ‘सहमिलन’ की उस अवधारणा का परिणाम होती हैं, जो राजनीतिक समाजशास्त्र का अभिन्न हिस्सा है। प्रायः गठबंधन सरकारों का मकसद अधिक-से-अधिक पारितोषिक प्राप्त करना होता है। जानकारों के अनुसार मिलीजुली सरकार का आधार ‘सहयोगी प्रबंध’ होता है। 

ऑग ने इसे इस प्रकार रेखांकित किया है— “Coalition gov ernment denotes a co-operative arrangement under which distinct political parties, unite to form a government or ministry.” 

भारत में केन्द्रीय एवं राज्य दोनों स्तरों पर गठबंधन की सरकारें बनती और गिरती देखी जाती रही हैं। यानी भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का एक इतिहास रहा है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन सरकारों का भविष्य क्या है? वैसे, भारतीय राजनीति में अब तक की गठबंधन सरकारों के इतिहास को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र सहमिलन की ऐसी सरकारों के सर्वथा अनुकूल नहीं है। इस संदर्भ में भवानीसेन गुप्ता का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है-“मिलीजुली सरकारों के गठन और जीवन तथा कार्यकरण के लिए जिस प्रतिभा और संस्कृति की आवश्यकता होती है, भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में अभी तक वस्तुतः उसका अभाव रहा है। अस्थायी मिलीजुली सरकारों या अल्पमत सरकारों के क्रम ने राज्य के संकट में योगदान दिया है, क्योंकि राज्य, सरकार के साथ गुंथा हुआ है।” 

“मिलीजुली सरकारों के गठन और जीवन तथा कार्यकरण के लिए जिस प्रतिभा और संस्कृति की आवश्यकता होती है, भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में अभी तक वस्तुतः उसका अभाव रहा है। अस्थायी मिलीजुली सरकारों या अल्पमत सरकारों के क्रम ने राज्य के संकट में योगदान दिया है, क्योंकि राज्य, सरकार के साथ गुंथा हुआ है।” 

भारत में राज्यों एवं केन्द्रीय स्तरों पर मिलीजुली यानी गठबंधन सरकारों का गठन होता रहा है। यहां ऐसी कुछ सरकारों पर संक्षेप में नजर डाल लेना समीचीन होगा। वर्ष 1977 में पांच घटक दलों के सहमिलन से जनता पार्टी खड़ी की गई एवं इसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा गया। केन्द्र में जनता पार्टी की मिलीजुली सरकार बनी। यह गठबंधन दीर्घजीवी नहीं रहा। वर्ष 1979 में चौधरी चरण सिंह ने अपना समर्थन वापस ले लिया और यह सरकार गिर गई। इसके बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के सहयोग से सरकार का गठन तो किया, किन्तु मात्र 22 दिन बाद ही कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर चौधरी सरकार को गिरा दिया। इसके बाद वर्ष 1980 में जहां कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला, वहीं वर्ष 1984 में हुई इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या से पैदा हुई सहानुभूति लहर के चलते दोबारा कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला और एकदलीय सरकार का गठन हुआ। इसके बाद वर्ष 1989 में वामपंथियों तथा भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अस्तित्व में आई, जो कि टिकाऊ सिद्ध नहीं हुई। चन्द्रशेखर द्वारा समाजवादी जनता पार्टी का गठन कर लिए जाने से वी.पी. सिंह की सरकार गिर गई। कुछ ऐसा ही हश्र चन्द्रशेखर की उस सरकार का हुआ, जो विभिन्न दलों के गठजोड़ से बनी थी। वर्ष 1996 में हुए आम चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अकाली दल के सहयोग से सरकार का गठन किया, जो मात्र 13 दिनों में ही गिर गई। बाद में क्रमशः एच.डी. देवगौड़ा एवं इन्द्र कुमार गुजराल कई दलों के गठबंधन ‘संयुक्त मोर्चा’ के नेता के रूप में सत्तारूढ़ हुए। वर्ष 1998 में फिर मध्यावधि चुनाव हुए और एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी 19 दलों के गठबंधन का नेतृत्व करते हुए सरकार बनाने में सफल हुई। यह भी दीर्घजीवी नहीं साबित हुई। 13 माह बाद फिर चुनाव हुए। इस चुनाव में 23 दलों के सहमिलन से ‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन’ की नींव पड़ी। यह सरकार चली तो, किन्तु देश को चलाने के बजाय सारी ऊर्जा गठबंधन का संतुलन बनाए रखने पर खर्च की जाती रही। इसके बाद वर्ष 2004 के मई माह में एक बार फिर केन्द्रीय स्तर पर गठबंधन की सरकार ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन’ के तहत अस्तित्व मे आई, जिसने लगातार अपने दो कार्यकाल पूरे तो किए, मगर यह सरकार सहयोगी दलों के दबाव के कारण कभी भी पूरी स्वतंत्रता एवं पारदर्शिता के साथ ‘राजधर्म’ नहीं निभा सकीं। इसका प्रतिकूल प्रभाव देश के विकास पर पड़ा तथा कुशासन भी बढ़ा। 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को बुरी पराजय झेलनी पड़ी। 2019 के लोकसभा चुनाव की खास बात यह रही कि देशभर के कई गठबंधन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की विजय | रथ यात्रा को रोक नहीं पाए। राज्य स्तर पर भी अनेक गठबंधन | सरकारें बनीं, किन्तु इनका भी भविष्य सुखद नहीं रहा। इस संबध में हम उत्तर प्रदेश में भाजपा-बसपा गठबंधन से बनी सरकारों का उदाहरण सामने रख सकते हैं। वर्ष 1997 में छह-छह माह के लिए बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद के फॉर्मूले के आधार पर तथा वर्ष 2002 में बसपा नेत्री मायावती के नेतृत्व में भाजपा-बसपा गठबंधन सरकारें बनी तो, किन्तु औंधे मुंह गिरी। यानी गठबंधन का प्रयोग सफल नहीं रहा। 

भारतीय लोकतंत्र में अब तक गठबंधन सरकारें जिस अंजाम को प्राप्त हुईं, उन्हें देखते हुए भवानीसेन गुप्ता का वह कथन सटीक प्रतीत होता है, जिसमें उन्होंने कहा है कि मिलीजुली सरकारों के गठन और जीवन तथा कार्यकरण के लिए जिस प्रतिभा और संस्कृति की आवश्यकता होती है, भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में अभी तक वस्तुतः उसका अभाव रहा है। यही कारण है कि अव्वल तो गठबंधन सरकारें अपना कार्यकाल ही नहीं पूरा कर पातीं और यदि कर भी लेती हैं, तो अपने कार्यकाल में ‘राज धर्म’ का निर्वहन दबाव मुक्त रहकर पारदर्शिता के साथ नहीं कर पाती हैं। सुशासन और विकास के बजाय इनका पूरा ध्यान सहयोगी दलों को साधकर सत्ता संतुलन बनाए रखने में लगा रहता है। यह स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र की सूचक कदापि नहीं हो सकती, क्योंकि इसमें ‘जन’ एवं ‘राष्ट्र’ दोनों के हित प्रतिकूल रूप से प्रभावित होते हैं। 

गठबंधन सरकारों से भारतीय लोकतंत्र को नुकसान ज्यादा, नफा कम है। लाभप्रद स्थिति तब होती है, जब गठबंधन में शामिल होने वाले दलों की विचारधारा में समरूपता होती है और वे मिलकर पूरी मजबूती के साथ राष्ट्र के विकास, राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान एवं जनता और जनतंत्र के हित के लिए कार्य करते हैं। ऐसा गठबंधन स्थायी, टिकाऊ और सफल रहता है। दूसरी तरफ जब सिर्फ सत्ता प्राप्ति की लालसा को पूरा करने के लिए गठबंधन किया जाता है, तो ऐसे गठबंधन की बुनियाद निहित स्वार्थ एवं अवसरवाद पर टिकी होती है। ऐसे गठबंधन न तो स्थायी होते हैं और न ही सफल। ये न तो देश का भला कर पाते हैं और न ही जनता का। भारत में ऐसे ही गठबंधनों का बाहुल्य रहा, जिसके दुष्परिणाम सामने आते रहे हैं। गठबंधन सरकारों के घटक दलों में वैचारिक एकरूपता न होने के कारण इनमें जल्द ही बिखराव की स्थिति पैदा हो जाती है और गठबंधन ध्वस्त हो जाता है। ऐसी सरकारों के मंत्रियों के अनुत्तरदायी आचरण के कारण अक्सर अप्रिय स्थितियां पैदा होती रहती हैं। गठबंधन सरकारों के गिरने से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, जिसे एक समृद्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहितकर माना जाता है। 

भारत में मिलीजुली सरकारों के अभी तक के परिणाम सुखद, सफल और आशाजनक नहीं कहे जा सकते। फिर भी इनकी बेहतर सभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजनीति का संभावनाओं का खेल कहा गया है। मिलीजुली सरकारों की सफलता के लिए कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पहला यह कि गठबंधन उन्हीं दलों के बीच हो, जिनमें वैचारिक एकरूपता हो तथा यह गठबंधन चुनाव से पूर्व हो, न कि चुनाव के बाद सिर्फ सरकार बनाने के लिए। मिलीजुली सरकारों का गठन बाहरी समर्थन के आधार पर न हो, क्योंकि ऐसा समर्थन प्रकृति से ही सर्वथा अस्थायित्व से भरा होता है। यह दायित्व के बिना सत्ता की स्थिति होती है, जिसमें समर्थन वापसी की गुंजाइश सदैव बनी होती है। यह भी होना चाहिए कि सरकार के गठन में नेतृत्व उसी दल के नेता को सौंपा जाए, जिसने चुनाव में सर्वाधिक सीटें हासिल की हों। यह भी आवश्यक है कि सरकार में सम्मिलित घटक दल गठबंधन को निभाने के लिए व्यावहारिक एवं सहयोगी दृष्टिकोण का परिचय दें, न कि सिर्फ सिद्धांतों पर अड़े रहें। गठबंधन सरकार के टिकाऊपन के लिए जिस समायोजन एवं सहिष्णुता की आवश्यकता होती है, वह नेताओं को आना चाहिए। साथ ही, संभावित टकराव की स्थिति को ध्यान में रखकर समाधान के रूप में एक सर्वमान्य तरीका पहले से ही तय कर लेना चाहिए। यह पैदा होने वाली अप्रिय स्थितियों को टालने में मददगार साबित होता है। 

सारतः हम यह कह सकते हैं कि गठबंधन के मानकों को स्थापित करने के लिए सरकारों को भारतीय समाज की बहुसांस्कृतिक प्रवृत्ति के प्रतिनिधित्व का हुनर सीखना होगा। इससे भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन सरकारें बेहतर प्रदर्शन के साथ सुखद एवं सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकती हैं। 

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