सहकारिता पर निबंध | Essay ON CO-OPERATIVE MOVEMENT IN INDIA IN HINDI

Essay ON CO-OPERATIVE MOVEMENT IN INDIA IN HINDI

सहकारिता पर निबंध | ESSAY ON CO-OPERATIVE MOVEMENT IN INDIA IN HINDI

सहकारिता का सामान्य अर्थ है-मिल-जुलकर काम करना। दूसरे शब्दों में आपसी सहयोग का नाम सहकारिता है। व्यावहारिक रूप से समान पेशे से संबंधित लोग जब आपसी सहयोग के आधार पर कुछ निश्चित आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कोई संगठन बनाते हैं, तो इसे ‘सहकारिता’ और उस संगठन को ‘सहकारी समिति’ कहा जाता है। सहकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लोग अपनी इच्छा से सहकारी समिति के सदस्य बनते हैं, सरकारी या गैर सरकारी दबाव में नहीं। इसमें सभी सदस्यों की पूंजी सम्मिलित रहती है। सभी सदस्यों के अधिकार एवं कर्तव्य समान होते हैं । सहकारी समिति से जो लाभ मिलता है, उसे सभी सदस्यों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। सहकारिता का उद्देश्य तभी प्राप्त होता है, जब इसके सभी सदस्यों में आपसी मेल-जोल, विश्वास और ईमानदारी की भावना हो। 

सहकारिता का क्षेत्र अति व्यापक है। सहकारिता से कृषक, व्यापारी और मजदूर सभी लोग लाभ उठा सकते हैं। भारत में सहकारिता के आधार पर खेती करने से काफी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। हमारे देश में कृषि योग्य भूमि दिनो-दिन टुकड़ों में बंटती जा रही है। सहकारिता से भूमि के विभाजन एवं उपखंडन की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। यहां के कृषक गरीब हैं। उनके पास इतनी पूंजी नहीं है कि वे वैज्ञानिक ढंग से खेती कर सकें। 

इसका प्रमुख कारण है कि कृषि के वैज्ञानिक उपकरण-ट्रैक्टर, पावर स्टेशन, सिंचाई-पंप आदि बहुत महंगे हैं। लेकिन जब वे मिलकर संगठन बनाते हैं, तब उनका काम आसान हो जाता है। ऐसे संगठन को सरकार भी उन्नत बीज, खाद एवं कृषि साधनों की खरीदारी हेतु समय-समय पर ऋण देती है। सहकारिता के आधार पर खेती करने से कम लागत में अधिक उत्पादन होता है। दुग्ध उत्पादन में भी सहयोगी समितियां सरलतापूर्वक समय-समय पर ऋण उपलब्ध कराती हैं। इस प्रकार सहकारिता से ही हम हरित क्रांति का लक्ष्य पा सकते हैं, जिससे भारतीय किसानों की गरीबी दूर हो सकती है। 

सहकारी समितियों से छात्रों को भी लाभ है। ये समितियां स्कूलों एवं कॉलेजों में उचित दामों पर किताब, कॉपियां आदि बेचती हैं। इन समितियों के संचालन की बागडोर छात्रों के हाथों में होती है। इससे विद्यार्थियों में नेतृत्व की भावना और संगठन संचालन की क्षमता भी विकसित होती है। सहकारिता के माध्यम से गांवों के उद्योग धंधों को भी विकसित किया जा सकता है। इससे मजदूरों, शिल्पकारों तथा कर्मचारियों को लाभ मिल सकता है। 

सहकारी समितियों द्वारा मजदूरों का शोषण नहीं होता। वे शिल्पकारों की मदद करती हैं और उनके सामानों के लिए बाजार उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा सूत कातने, कपड़े बुनने, रेशमी कपड़े आदि तैयार करने तथा मिट्टी, धातु और चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने, मछली पकड़ने आदि लघु उद्योगों की स्थापना के लिए सदस्यों की सहायता करती हैं। इस प्रकार सहकारिता से लाभ ही लाभ है। इसमें कम पूंजी पर अधिक मुनाफा होता है तथा बेरोजगार हाथों को काम मिलता है। इससे भाईचारे एवं सहयोग की भावना पनपती है। संक्षेप में, सहकारी आंदोलन के माध्यम से भारत की गरीबी दूर की जा सकती है। 

लेकिन आज सहकारी समितियों में कुछ खामियां आ गई हैं। दबंग सदस्य अधिक मुनाफा खाते हैं। समभाव के स्थान पर इनमें व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना बढ़ गई है। इतना ही नहीं, दबंग लोगों के नेतृत्व में बहुत सारी फर्जी समितियों का भी गठन कर लिया गया है। इन सभी कारणों से सहकारिता के मूल स्वरूप में विकृति आ गई है। ये खामियां दूर करके ही सहकारिता का पावन उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा इस संगठन को सक्रिय रूप से सहयोग देना चाहिए। सरकारी बैंकों द्वारा दी जाने वाली ऋण प्रक्रिया को अधिक से अधिक सुगम बनाना चाहिए एवं इन ऋणों पर ब्याज की दर भी न्यूनतम होनी चाहिए। साथ ही साथ सहकारिता से होने वाले लाभों का सरकारी स्तर पर प्रचार-प्रसार करना चाहिए।

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