जलवायु परिवर्तन पर निबंध | Essay on Climate Change in Hindi

जलवायु आपातकाल 

जलवायु परिवर्तन : क्या हैं कारण । अथवा जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणाम (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2012) अथवा मानवीय हस्तक्षेप और इसका प्रकृति पर प्रभाव (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2013) अथवा जलवायु आपातकाल 

कहा जाता है कि अति हर चीज की बुरी होती है, यह कहावत इंसानों के द्वारा पर्यावरण के गहनतम क्षरण पर सटीक और सही बैठती है। पिछले दो दशकों से मानव समुदाय द्वारा किये जा रहे | पर्यावरण दोहन के गंभीर परिणाम सामने आये हैं। इसका उदाहरण अभी हाल ही में यूरोपीय देशों जैसे ब्रिटेन एवं आयरलैंड में घोषित हुआ जलवायु आपातकाल है। ध्यातव्य है कि ब्रिटेन जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु आपातकाल घोषित करने वाला दुनिया का पहला देश है। 

जलवायु आपातकाल क्या है? : अभी तक जलवायु आपातकाल की कोई सर्वमान्य परिभाषा तो सामने नहीं आई है परन्तु जलवायु आपातकाल का संदर्भ ऐसी स्थितियों से है जब जलवायु संकट अपने शीर्षतम चरम स्तर पर पहुँच जाये एवं उससे लड़ने हेतु त्वरित कदम उठाने अवश्यम्भावी हो जाये। ध्यातव्य है कि इसी वर्ष 2019 में जर्मनी, नीदरलैंड तथा बेल्जियम जैसे देशों में गर्मी के सारे रिकार्ड टूट गये। इन देशों में तापमान 4°C का स्तर पार कर गया। ये सारी स्थितियाँ जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई हैं। _ जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को विस्तार से समझने के पूर्व यह जान लेना जरूरी होगा कि जलवायु (Climate) किसे कहते हैं। वस्तुतः किसी भी स्थान का दीर्घकालीन मौसम जलवायु कहलाता है। इसके तहत वहां लंबे समय तक डाटा एकत्र किया जाता है। इसमें वायुमंडल का दबाव, तापमान, आर्द्रता, हवा की गतिविधि तथा बादलों की गतिविधि आदि का अध्ययन किया जाता है और जलवायु के बारे में एक निश्चित धारणा विकसित की जाती है। भूगोलशास्त्रियों ने सदियों पूर्व जलवायु का अध्ययन प्रारंभ कर दिया था। 624-546 ईसा पूर्व यूनानी गणितज्ञ व खगोलशास्त्री थेल्स ने जलवायु विज्ञान की नींव पश्चिम में रखी थी। प्रसंगवश मौसम (weather) एवं जलवायु (climate) के बीच अंतर जान लेना भी उचित होगा। मौसम और जलवायु में अंतर यह है कि मौसम रोज बदलता है। यह विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग होता है, जबकि जलवायु स्थिर रहती है। 

जलवायु परिवर्तन से आशय जलवायु में दिखने वाले बदलावों से है। ये बदलाव प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों से हो सकते हैं। यह परिवर्तन एक-दो महीने या वर्ष में नहीं होता है। इसे होने में कई दशक या लाखों वर्षों का भी समय लग सकता है। इसका प्रभाव वैश्विक भी हो सकता है अथवा यह एक क्षेत्र विशेष में भी दिख सकता है। 

जलवायु परिवर्तन की काली छाया सिर्फ भारत पर ही नहीं मंडरा रही है। विश्व के अनेक देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन अब वैश्विक समस्या बन चुका है और इसे लेकर विश्व के अनेक देश फिक्रमंद भी दिख रहे हैं। वैश्विक सम्मेलनों में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा छाया रहता है। वर्ष 2011 के नवंबर माह में डरबन में संपन्न हुए अंतर्राष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन में इस वैश्विक समस्या पर जमकर मंथन हुआ। इससे पूर्व वर्ष 2009 में कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में भी इस समस्या पर गभीर विचार-विमर्श हुआ था। ग्लेशियरो का पिघलना. ग्लोबल वार्मिंग, अतिवृष्टि, सूखा, सूनामी जैसी समस्याएं जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह जानना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन है क्या तथा किन कारणों से जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ रही है। तो आइये इस बारे में यहां हम विस्तार से चर्चा करते हैं। 

“प्राकृतिक कारणों में मुख्य रूप से ज्वालामुखी, महाद्वीपीय पृथक्करण तथा महासागरी धाराएं आदि जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं।” 

कारण : वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन की जो समस्या हमारे सामने आई है, उसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है। कारण अनेक हैं, जिनमें कुछ तो प्रकृति से जुड़े हैं, तो कुछ के लिए स्वार्थी मानव समाज उत्तरदायी है। वस्तुतः प्राकृतिक कारणों से कहीं ज्यादा मानवजनित कारणों से जलवायु परिवर्तन जैसा वैश्विक संकट हमारे | सामने आया है। पहले हम जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्राकृतिक | कारणों पर दृष्टि डालते हैं। 

प्राकृतिक कारणों में मुख्य रूप से ज्वालामुखी, महाद्वीपीय | पृथक्करण तथा महासागरी धाराएं आदि जलवायु परिवर्तन के लिए 

उत्तरदायी हैं। 

ज्वालामुखी (Volcano) : भूपर्पटी की वे दरारें ज्वालामुखी कहलाती हैं, जिनसे अंदर की द्रवित चट्टान, लावा, भस्म तथा गैसें निकलती हैं। जब ज्वालामुखी फटते हैं, तब अनेक प्रकार की गैसें बाहर आती हैं, जिनमें मुख्य रूप से सल्फर डाइऑक्साइड (SO,), सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO.), क्लोरीन (Cl), भाप (H,O), कार्बन डाइऑक्साइड (CO.), हाइड्रोजन सल्फाइड (H,S) तथा कार्बन मोनोक्साइड (CO) आदि शामिल होती हैं। ये गैसें, धूल कण तथा राख आदि वायुमंडल में फैलाकर जलवायु को प्रभावित करती हैं। ज्वालामुखी तो शांत हो जाता है, किंतु ये लंबी समयावधि तक सक्रिय रहकर जलवायु को प्रभावित करती हैं। विस्फोट के कारण धूल और राख के कण बहुत ऊपर तक जाते हैं और वर्षों तक वायुमंडल में विद्यमान रहकर जलवायु को प्रभावित करते हैं। 

महासागरीय धाराएं : पृथ्वी की सतह पर लवण जल का विशाल फैलाव महासागर कहलाता है। पृथ्वी का 70 प्रतिशत से भी कुछ अधिक हिस्सा जलाच्छादित है अर्थात् सागरों एवं महासागरों के रूप में है। यही कारण है कि जलवायु के निर्धारण में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। समय-समय पर समुद्र अपना ताप वायुमंडल में छोड़ता है, जिससे जलवायु प्रभावित होती है। काफी ताप जलवाष्प के रूप में धरती पर ग्रीन हाउस गैस के प्रभाव को बढ़ाता है। इस प्रकर महासागरीय धाराएं भी जलवायु को प्रभावित करने में योगदान देती हैं। 

प्राकृतिक कारणों से कहीं ज्यादा मानवजनित कारण जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं, जिन पर हमने बहुत देर में ध्यान देना शुरू किया। आइये, अब इन मानवजनित कारणों पर सिलसिलेवार गौर करें-

ग्रीनहाउस प्रभाव : ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण जलवायु में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में उतार-चढ़ाव प्राकृतिक कारणों से भी होता है और मानवजनित कारणों से भी। औद्योगिक क्रांति के बाद उद्योग-धंधे तेजी से कायम हुए तथा शहरीकरण की प्रक्रिया में गति आई। इस कारण कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वातावरण में बढ़नी शुरू हुई। दूसरी तरफ वनों की अंधाधुंध कटाई और दोहन के कारण पेड़-पौधों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में परिवर्तित करने की प्रक्रिया भी मद पड़ी। स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती चली गई। कार्बन डाइऑक्साइ ही नहीं, ऐसी अनेक घातक गैसें प्रचुर मात्रा में वायमंडल म पर लगीं। इनमें मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड क्लोरो-फ्लोरोकार्बन शामिल हैं। ये सब मिलकर का प्रभाव को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन कर रही हैं। सब मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड के ग्रीन हाउस बढाकर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नई-नई चुनौतियां पेश 

तापमान बढ़ने से हरित जैव मास यानी हरियाली में भारी कमी आती है, जिससे पर्यावरण असंतुलित होता है।” 

कृषि : जलवायु परिवर्तन में कृषि से जुड़े क्रिया-कलापों ने भी योगदान दिया है। आज हम परम्परागत खेती के बजाय आधुनिक खेती की तरफ उन्मुख है। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग नजि में बढ़ा है। जलमग्न चावल की जुताई से मीथेन का उत्सर्जन होता है। जगाली करने वाले पशु भी वातावरण में मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। इससे ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ता है। 

जीवाश्म ईंधन : जीवाश्म आधारित ईंधन के दोहन से भी कार्बन डाइऑक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। इस मानवजनित उत्सर्जन से भी जलवायु परिवर्तन की समस्या विकराल हुई है। जीवाश्म आधारित ईंधन के दहन से जहां ग्रीनहाउस गैसों का संचयन बढ़ा है, वहीं वायु एवं जल प्रदूषण भी बढ़ा है। अम्लीकरण भी इसी का नतीजा है। कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे ज्यादा उत्सर्जन जहां कोयले के दहन के कारण होता है, वहीं इस समय तेल का दहन वायु में 30 प्रतिशत तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है।

शहरीकरण और औद्योगिकीकरण : हमने शहरीकरण एवं औद्योगिकीकरण के नाम पर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया। एक तरफ तो पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की, तो दूसरी तरफ शहरीकरण के नाम पर वन क्षेत्रों को नगला। विकास के नाम पर विनाश किया। ‘ईको फ्रेंडली’ होकर विकास की तरफ ध्यान न देकर पर्यावरण से हद दर्जे की छाड़ की। प्रदूषण को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन की समस्या को बनाने में योगदान किया। इसमें विकसित देश कुछ ज्यादा ही आगे रहे। 

दुष्परिणाम : जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम यहां बिन्दवार प्रस्तुत हैं 

बढ़ती गर्मी के कारण नदियों, तालाबों, झीलों तथा महासागरा आदि का पानी तेजी से भाप बनकर उड़ रहा है। इससे अतिवृष्टि और बाढ़ आदि की समस्या बढ़ी है। बढ़ती गर्मी के कारण ही कुछ जगहों पर वायुमंडलीय दबाव अचानक कम हो जाता है, जिससे आंधी-तूफान का प्रकोप बढ़ जाता है।

जलवायु परिवर्तन से कृषि भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। तापमान की वृद्धि के कारण पौधों में नमी का अभाव हो जाता है। अनेक फसलों की वृद्धि हेतु एक निश्चित सीमा के अंदर तापमान की आवश्यकता होती है। तापमान की वृद्धि के कारण वे नष्ट होने लगती हैं। मिट्टी में पानी की मात्रा कम हो जाने से उसमें मौजूद कार्बनिक पदार्थों का विघटन एवं पुनर्चक्रण ठीक से नहीं हो पाता, अतएव सामान्य पैदावार के लिए भी अधिक खाद का उपयोग करना पड़ता है।

सीमा से अधिक तापमान उत्पन्न होने पर नये प्रकार के कीड़े मकोड़े उत्पन्न होने लगते हैं और उन पर सामान्य कीटनाशकों का कम प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप फसल की उत्पादकता एवं गुणवत्ता प्रभावित होती है।

तापमान बढ़ने से हरित जैव मास यानी हरियाली में भारी कमी आती है, जिससे पर्यावरण असंतुलित होता है।

तापमान बढ़ने से ध्रुवों की बर्फ पिघलने लगती है, जिससे सागरों का जल स्तर बढ़ने से तटवर्ती क्षेत्रों के जलमग्न होने का खतरा बढ़ जाता है।

असामयिक वर्षा और सूखा की संभावना बढ़ जाती है।

ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव के कारण ओजोन की सतह को क्षति पहुंच रही है। सूर्य से आने वाली पैराबैगनी किरणों का अवशोषण कम होने से अनेक प्रकार की बीमारियां बढ़ी हैं। 

जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है, जिससे उबरने के लिए समग्र, संतुलित एवं सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता है। धरती को बचाने के लिए वैश्विक पहल की आवश्यकता है। सभी देशों को साथ मिलकर चलना होगा, फिर चाहे वे विकसित देश हों या विकासशील। 

यदि इस समस्या के समाधान हेतु वैश्विक समुदाय पर्यावरण संरक्षण के भारतीय दर्शन से प्रेरणा ले, तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने चाहिए। 

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