शहरी जीवन पर निबन्ध | Essay on City Life in Hindi

शहरी जीवन पर निबन्ध | Essay on City Life in Hindi

शहरी जीवन पर निबन्ध | Essay on City Life in Hindi

नगरजीवन पर निबन्ध

आप यदि राजमार्गों से निकल जाएँ, तो पाएँगे कि धुआँ उड़ाती, कोलाहल करती मरण का आमंत्रण लुटाती-टैक्सियाँ, बसें और ट्रामगाड़ियाँ बेतहाशा भागी जा रही हैं, जिनमें मनुष्य निर्जीव पार्सल के पैकेट की तरह ठसाठस भरे हैं। इन राजमार्गों के दोनों ओर आकाश-आश्लेषी अट्टालिकाएँ हैं, जिनमें मरकरी और नायलन बल्बों की रोशनी दूधिया चाँदनी को चुनौती दे रही है, जिनके प्रकाश में बैठे तुंदिल व्यापारियों की जेबकतरा मुस्कानें बिछल रही हैं, किनारे-किनारे अपार जनसमूह का समुंदर लहरा रहा है। सजी-धजी दुकानों में हवाखोरी को निकली नागिन-सी रूपसियों की भीड़ उमड़ आई है। गगन में चाँद का कौन पता लगाए, इस अपार भीड़ में जहाँ-तहाँ चाँद का झुंड ही नजर आ रहा है। सब भाग रहे हैं।

बेतहाशा भाग रहे हैं-कारखानों से झुलसे लोग, दफ्तरों से चुसे लोग, मजदूरी की चक्की में पिसे लोग, दिनभर के कामों में घिसे लोग ! बाहरी चकाचौंध में नरों के स्फूर्तिहीन कार्टून किसी विद्युत्-तरंग पर भागते चले जा रहे हैं। यहाँ पग-पग पर मानवस्वेद का अथाह पंक पड़ा दीखता है, विज्ञान का इंद्रजाल नजर आता है। काउपर ने ठीक कहा था कि नगर मनुष्य की दुनिया है, परंतु गाँव ईश्वर की। शहरों में प्रकृति की हर कला ध्वस्त हो चुकी है और उसके श्मशान पर उभर आई है, एक नई दुनिया ।

यहाँ ईश्वर के हाथों निर्मित हरसिंगार मोहक गंध नहीं बिखेरता, वरन् बंद शीशियों में बैठे फाहे गंध लुटाते हैं, यहाँ चाँद और  सितारों की महफिल नहीं सजती, वरन् बल्बों की बारात सजती है। यहाँ पहाड़ की गोद में झरने नहीं मचलते, वरन् लोहे के यंत्र से अशुद्ध जल के फव्वारे छूटते हैं, यहाँ दूर-दूर गंधमाती हवा तन-मन में स्फूर्ति नहीं उत्पन्न करती, वरन् कमरे की कैद हवा ही विद्युत्-यंत्रों के द्वारा चक्कर काटती है; यहाँ पक्षियों की नैसर्गिक रागिनी नहीं सनाई पड़ती, वरन् कर्णस्फार ध्वनिविस्तार-यंत्रों से बेताल राग चीखता है। 

शहर में जब रात गहराती है, तब भीड़-तमाशबीनी का ज्वार थमता नजर आता है। सड़कें उदास हो जाती हैं; व्यापारिक रोशनी की बहार कम हो जाती है। एक और नभचुंबी वातानुकूलित भवनों में करोड़पति करवटें बदलते रहते हैं, तो दूसरी ओर खुल आकाश की छत के नीचे फुटपाथों पर हजार-हजार लोग  खर्राटे लेते नजर आते हैं या असर्यंपश्या गलियों के डस्टबिनों में न मालूम कितने श्वान उच्छिष्ट उकटते नजर आते हैं। नगर में स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है कि परमात्मा ने यह दुनिया नहीं बनाई। यदि उसने यह दुनिया बनाई होती, तो आदमी-आदमी के बीच इतनी दुर्लंघ्य खाई नहीं होती. आकाश-पाताल की ऐसी दूरी नहीं होती।

नगर का बाह्य तन तो बड़ा आकर्षक है, किंतु उसका अंतःकरण कुरूप और घिनौना, जैसे कोई कनक-घट विषरस से भरा हो। यहाँ के मनुष्य बहुत बातूनी, बहुत बनावटी होते हैं। शिष्टाचार के नाम पर बातों में तो यहाँ के लोग मिसरी घोलते हैं, ओठों से शहद टपकाते हैं, किंतु इनके हृदय में छल और कपट का जहर भरा रहता है। ये बिलकुल मयूरधर्मी लोग हैं, जिनके आवरण तो बड़े ही चमकीले और इंद्रधनुषी हैं, किंतु आहार साँप जैसा जहरीला जंतु। यहाँ के लोगों के आचरण पर अज्ञेयजी ने ठीक ही व्यंग्य किया है 

साँप !

तुम सभ्य तो हुए नहीं,

नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूर्फे—(उत्तर दोगे?)

तब कैसे सीखा डॅसना विष कहाँ पाया? 

आप शहर में चल रहे हैं, तो हर वक्त अपना एक पाँव कब्र में रखिए या कफन खरीदकर पहले से अपने पास रख लीजिए। पता नहीं, कौन-सा ट्रक आपको धक्का देकर भाग जाए, कौन-सा ताँगा आपकी टाँगों को तोड़कर रफूचक्कर हो जाए, कौन-सा गुंडा आपके सीने में कटार घुसेड़कर चंपत हो जाए ! जेब काटना, सामान छीन लेना तो मामूली बात है। कब कोई किसी अबला पर बलात्कार कर दे, कब कोई आपके मासूम बच्चे को उड़ाकर भाग जाए। किसी समय आपकी जान, आपका माल, आपकी इज्जत सरक्षित नहीं है। जितनी देर जो बच पाता है, उसे संयोगमात्र समझिए। बात-बात पर गुस्सा, बात-बात पर हड़ताल, बात-बात पर उत्पात ! कहीं कोई आपका रक्षक नहीं। ये पुलिस, ये सिपाही, ये संतरी-सब बदमाशों के साझेदार हैं। इसीलिए, एक आधुनिक कवि ने नगरजीवन का सही चित्रांकन किया है 

यहाँ कोई नियम, कोई शासन नहीं दया,

क्षमा, प्रेम, कोई दीन-धर्म नहीं

यहाँ सिर्फ एक कानून है

जंगल का कानून जिसका अर्थ-खून है 

यह शहर नहीं, जंगल है 

यहाँ जिंदगी का हर रास्ता खो गया है

एक अचंभा-सा हो गया है ! 

 किंतु आश्चर्य होता है कि क्यों ग्रामवासी प्रकति-पालना गाँवों को वीरान बनाकर स रावण का स्वर्णपुरी लंका की ओर भागते चले आ रहे हैं। नगर मासूम लोगों को अपने बाह्य चाकचिक्य से, तड़क-भड़क से खींचता है। लोग ग्रामों के तपोवन को छोड़कर जनाकीर्ण कोलाहलपूर्ण मायानगरी की ओर दौड़ रहे हैं। नगर का तन बाहर-बाहर से सँवरा अवश्य है, किंतु इसका भीतर नहीं सँवर पाया है। यदि इसके वज्र-तन में मोम का मन बस पाता, तो अधिक कल्याणकर हो सकता।