सिनेमा और समाज पर निबंध | Essay on Cinema and Society in Hindi

सिनेमा और समाज पर निबंध

सिनेमा और समाज पर निबंध | Essay on Cinema and Society in Hindi अथवा हिन्दी सिनेमा का समाज पर प्रभाव अथवा सिनेमा और समाज अथवा हिन्दी सिनेमा में लोकजीवन और संस्कृति का चित्रण अथवा भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष 

मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय ने कभी कहा था, ‘सिनेमा व्यक्ति की जिम्मेदारियों और संभावनाओं को समझने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।” निहितार्थ यह है कि सिनेमा किसी समाज की संवेदनशीलता और रचनात्मकता के आकलन का एक बड़ा आधार है। यह बात भारतीय सिनेमा पर भी लागू होती है, जो कि भारतीय समाज, सभ्यता और संस्कृति का पर्याय था, है और आगे भी रहेगा। जिस भारतीय सिनेमा की शुरूआत मूक फिल्म से हुई, वह अब 100 वर्षों से अधिक का समय तय कर समाज कर दर्पण बना हुआ, तो मनोरंजन का लोकप्रिय साधन भी है। यह विश्व सिनेमा से स्पर्धा करते हुए अपनी कामयाबी की नई-नई कहानियाँ गढ़ रहा है, तो सपनों का सौदागर बने हुए नायाब अभिव्यक्तियों को पंख भी लगा रहा है। भारतीय सिनेमा पर इस सम्यक चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले भारतीय सिनेमा के शुभारंभ पर संक्षेप में प्रकाश डालना उचित रहेगा। 

जिस भारतीय सिनेमा की शुरूआत मूक फिल्म से हुई, वह अब 100 वर्षों से अधिक का समय तय कर समाज कर दर्पण बना हुआ, तो मनोरंजन का लोकप्रिय साधन भी है। यह विश्व सिनेमा से स्पर्धा करते हुए अपनी कामयाबी की नई-नई कहानियाँ गढ़ रहा है, तो सपनों का सौदागर बने हुए नायाब अभिव्यक्तियों को पंख भी लगा रहा है। 

भारत में दादा साहेब फाल्के जैसी जुझारू और समर्पित शख्सियत के निजी प्रयासों से सिनेमा प्रतिष्ठित हुआ। इसीलिए इन्हें भारतीय सिनेमा का ‘जनक’ कहा जाता है। इन्होंने पूर्ण स्वदेशी फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ देशवासियों को दी, जो कि 3 मई, 1913 को रिलीज हुई। सर्वप्रथम इसका प्रदर्शन हुआ बंबई के 6 कॉरोनेशन थिएटर में, बाद में इसे पूरे भारत में प्रदर्शित किया गया। यह थी तो एक ‘मूक फिल्म’, किन्तु इसने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। यह रोमांच बोलती फिल्मों के शुभारंभ के साथ और बढ़ गया। अर्देशिर ईरानी के निर्देशन में बनी ‘आलम आरा’ भारत की पहली बोलती फिल्म थी। ‘आलम आरा’ का प्रदर्शन वर्ष 1931 में हुआ था। अभी तक फिल्में श्वेत-श्याम बन रही थीं। इनका रोमांच और आकर्षण भारतीय जनमानस में तब और बढ़ा, जब रंगीन फिल्मों की शुरूआत हुई। ‘किसान कन्या’ भारत में बनी पहली रंगीन फिल्म थी, जो कि वर्ष 1937 में रिलीज हुई और बंबई के मैजेस्टिक सिनेमा घर में प्रदर्शित हुई। इसके बाद भारतीय सिनेमा ने पलटकर नहीं देखा और नए मानकों व मैयारों को कायम करता हुआ पंख लगाकर उड़ने लगा। इसने दुनिया से अलग एक संतरंगी दुनिया का सृजन किया, जो मनोरंजन का पर्याय बन गई। 

भारत में दादा साहेब फाल्के जैसी जुझारू और समर्पित शख्सियत के निजी प्रयासों से सिनेमा प्रतिष्ठित हुआ। इसीलिए इन्हें भारतीय सिनेमा का ‘जनक’ कहा जाता है। इन्होंने पूर्ण स्वदेशी फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ देशवासियों को दी, जो कि 3 मई, 1913 को रिलीज हुई। 

हालांकि भारतीय सिनेमा की शुरूआत तो धार्मिक फिल्मों से हुई, किन्तु जल्द ही भारतीय सिनेमा, भारतीय समाज के इर्द-गिर्द घूमने लगा और इसे भारतीय समाज का दर्पण कहा जाने लगा। सिनेमा का जुड़ाव समाज से अकारण नहीं हुआ। देश की आजादी के बाद नई तरह की सामाजिक समस्याओं ने जहाँ सिर उठाना शुरू किया, वहीं नए तरह के सामाजिक सरोकार भी सामने आए। बेरोजगारी, बेगारी, गरीबी, किसानों की बदहाली, अपराध, भ्रष्टाचार, दूषित राजनीति, छुआ-छूत, ऊँच-नीच जैसी अनेकानेक विसंगतियों ने फिल्मकारों को अच्छे सामाजिक विषय दिए और इस प्रकार सामाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों का ‘नया दौर’ शुरू हुआ। चूँकि ये फिल्में सामाजिक विषयों पर केन्द्रित थीं, इनमें समाज के लोगों की अभिव्यक्ति थी, अतएव दर्शकों को हर फिल्म की कहानी अपने आस-पास की लगीं और ये फिल्में हिट-सुपरहिट रहीं। 

अब सामाजिक विषयों पर केन्द्रित तथा सामाजिक विदूपताओं पर प्रहार करती नए दौर की कुछ फिल्मों पर नजर डालना उचित रहेगा। आमिर खान की फिल्म ‘पीपली लाइव’ भारत के उन लोगों की कहानी है, जो हाशिए पर हैं तथा जिनकी सुध कोई नहीं लेता। 

जब भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज के यथार्थ सरोकार और विसंगतियों को सामने लाना शुरू किया, तो आम जनमानस को इनमें अपना ही अक्स दिखा और ये फिल्में उनके दिल में उतरती चली गई। यहाँ गुजरे दौर और नए दौर की ऐसी ही कुछ चुनिंदा फिल्मों की संक्षिप्त चर्चा कर लेना समीचीन रहेगा। वर्ष 1957 में प्रदर्शित वी. शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ महात्मा गांधी के हृदय परिवर्तन के दर्शन से प्रेरित थी, तो महबूब खान द्वारा निर्देशित ‘मदर इंडिया ने न सिर्फ भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी, बल्कि भारतीय सिने इतिहास में महबूब खान को अमर कर दिया। दिलीप कुमार और वैजयंती माला के अभिनय से सजी बी. आर. चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ (1957) मानव बनाम मशीन के संघर्ष की अत्यंत संवेदनशील और सार्थक अभिव्यक्ति है। गुरुदत्त की ‘प्यासा’, फ्रांज आस्टेन की ‘अछूत कन्या’, बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’, सत्यजीत राय की ‘पाथेर पंचाली’ राजकपूर की ‘आग’ और ‘आवारा’ जैसी फिल्मों ने विविध सामाजिक विषयों को बड़ी मजबूती से उठाया तथा मील का पत्थर साबित हुईं। समानान्तर सिनेमा के सशक्त हस्ताक्षर और संजीदा फिल्मकार श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म ‘अंकुर’ के माध्यम से क्रूर जमींदारी प्रथा का जीवंत चित्रण करते हुए किसानों के शोषण को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। यह फिल्म आज भी हिन्दी सिनेमा की महत्त्वपूर्ण थाती मानी जाती है। समानान्तर सिनेमा से इतर मुख्य धारा की फिल्म ‘कटी पतंग’ एक रोमांटिक फिल्म भले ही थी, मगर इसमें भी ‘विधवा विवाह’ जैसे सामाजिक विषय को दर्शाया गया। मनोज कुमार की फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ तो पूरी तरह सामाजिक सरोकारों और विसंगतियों पर केन्द्रित थी और इसमें आम आदमी का दुख-दर्द साफ-साफ झलकता है। इस फिल्म का गीत ‘मंहगाई मार गई’ आज भी आम आदमी को अपने बहुत करीब लगता है। 

अब सामाजिक विषयों पर केन्द्रित तथा सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करती नए दौर की कुछ फिल्मों पर नजर डालना उचित रहेगा। आमिर खान की फिल्म ‘पीपली लाइव’ भारत के उन लोगों की कहानी है, जो हाशिए पर हैं तथा जिनकी सुध कोई नहीं लेता। हाँ, चुनावों के समय इन्हें बेशक याद किया जाता है। यह फिल्म जहां देश के आखिरी पायदान पर खड़े वंचितों-शोषितों की पीड़ा को बयां करती है, वहीं इसके गीत ‘मंहगाई डायन’ में आम आदमी का दर्द छिपा है। ‘तारे जमीं पर’ में भी आमिर खान ने एक अच्छा मुद्दा उठाते हए यह संदेश दिया है कि अभिभावक बच्चों पर अपनी महत्त्वाकांक्षा न लादें। फिल्म का एक संवाद है-“बच्चों पर अपनी महत्त्वाकांक्षा लादना बालश्रम से भी बुरा है।” तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ भी आज के समाज और विद्रूप व्यवस्था, शासन-प्रशासन पर करारा प्रहार करती है। फौज से रिटायर होकर, अंतर्राष्टीय ख्याति का एथलीट शांतिपूर्ण जीवन बिताना चाहता था किंत विद्रुप व्यवस्था से क्षुब्ध होकर उसे बागी बनना पड़ा। प्रकाश टा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आरक्षण’ उस द्वंद्व को दर्शाती है, जो आरक्षण के कारण पैदा हुआ है। निर्देशक विनय शुक्ला की फिल्म का सेक्स में स्त्री-पुरुष की बराबरी की बात करती है, तो ‘वाटर’ फिल में बाल-विधवाओं की त्रासदी को दर्शाया गया है। आज भी भारतीय सिनेमा सामाजिक मुद्दों को सशक्त अभिव्यक्ति दे रहा है और आगे भी देता रहेगा। 

भारतीय सिनेमा ने भारतीय लोक जीवन और संस्कृति को भी | जीवंतता से चित्रित किया है। कुछ उदाहरण आपके सामने हैं। वर्ष 1939 में आयी फिल्म ‘रोटी’ में निर्देशक ज्ञान मुखर्जी एक औद्योगिक सभ्यता तथा आदिवासी संस्कृति की तुलना अत्यंत प्रभावशाली तरीके से करते हुए निष्कर्ष देते हैं कि न तो आदिवासी संस्कृति शहर में आकर सुखी हो सकती है, न ही एक तबाह उद्योगपति आदिवासी सभ्यता में खुशियाँ हासिल कर सकता है। जहाँ बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ कृषि एवं कृषक जीवन की कारुणिक गाथा है, वहीं महबूब खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मदर इंडिया’ भारतीय लोक संस्कृति की परदे पर हुई सबसे सटीक और सशक्त व्याख्या है। फिल्म में लोक के सभी रंग मौजूद हैं। इसमें गाँव अपनी सम्पूर्णता के साथ उपस्थित है। फिल्म में लोक-धुनों पर आधारित गीत मन को छू लेते हैं। दस्यु समस्या पर केन्द्रित सुनील दत्त की फिल्म ‘मुझे जीने दो’ में भी लोक संस्कृति की छटा देखने को मिलती है और उसके गीत 

अपने सौ साल से अधिक के सफर में भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित कर उस पर अमिट छाप छोड़ी है। इसने मनोरंजन का सशक्त माध्यम बन कर जहाँ लोगों को तनाव-मुक्त बनाया, वहीं समाज के बिम्बों का सजीव चित्रण भी किया। 

लोक जीवन और लोक संस्कृति के सुन्दर बिंब वर्ष 1982 में आयी राजश्री बैनर की फिल्म ‘नदिया के पार’ में भी देखने को मिलते हैं। यह पूरी फिल्म ही लोक के रंग में रंगी है। इस फिल्म में जहाँ सोहर, विवाह-गीत, ग्राम देवी गीत, मनौती गीत व होली जैसे लोक पर्व पर गाए जाने वाले फाग-गीत का सुन्दर दृश्यांकन हुआ है, वहीं संवादों में अवधी, भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय बोलियों ने प्राण फूंक दिए हैं। राजश्री प्रोडक्शन ने अपनी फिल्मों में हमेशा भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को महत्त्व दिया, जिसके दर्शन इस प्रोडक्शन की फिल्म ‘एक विवाह ऐसा भी’ में भी होते हैं। लोक सापेक्ष फिल्मों में जहाँ वास्तविक भारत के दर्शन होते हैं, वहीं देश की कला, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं आदि को समझने का मौका मिलता है। अपने सौ साल से अधिक के सफर में भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित कर उस पर अमिट छाप छोड़ी ही इसने मनोरंजन का सशक्त माध्यम बन कर जहाँ लोगों को तनाव-मुक्त बनाया, वहीं समाज के बिम्बों का सजीव चित्रण भी किया। फिल्मों से मिलने वाले सामाजिक संदेशों ने आम जनमानस सकारात्मक प्रभाव छोड़ा तथा उनकी सोच में बदलाव के लिए कांतिकारी काम किया। छुआछूत, सामाजिक भेदभाव तथा जात-पात जैसी विद्रूपताओं के विरुद्ध सकारात्मक संदेश दिए, तो रूढ़ियों को तोडने की प्रेरणा दी। सच तो यह है कि हमारे रहन-सहन, बोल चाल, रीति-रिवाजों और यहाँ तक कि विश्वासों को बदलने में फिल्मों का बड़ा हाथ रहा। पिछली शताब्दियों की तुलना में 20वीं शताब्दी में हए सामाजिक परिवर्तनों की अप्रत्याशित तेज गति की कल्पना ‘छाया-माया’ के इस खेल के बगैर असंभव थी। यह कहना असंगत न होगा कि भारतीय जनमानस की चिन्तन परम्परा को भारतीय सिनेमा ने नई धार दी। फिल्मों ने लोगों को वास्तविकता के निकट से दर्शन कराए, तो भारतीय लोक जीवन व संस्कृति के संरक्षण पर संचयन का काम किया। सरकारों और सत्ता को जगाने का काम किया तो मर्मस्पर्शी प्रस्तुतियों से हृदय परिवर्तन भी किए। यहाँ यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि भारतीय सिनेमा को ‘सॉफ्ट पॉवर’ के शक्तिशाली और प्रभावी सांस्कृतिक उपकरण के रूप में अभिहित किया जाता है। इस उपकरण ने हमारे अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को भी सकारात्मक स्पर्श प्रदान किया और द्विपक्षीय संबंधों के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाई। उदाहरणस्वरूप, हाल ही में आई कबीर खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ ने भारत और पाकिस्तान के मध्य दोस्ती और सौहार्द का माहौल बनाने में काफी मदद की। इसके अतिरिक्त, इस फिल्म ने दोनों देशों की आम जनता के पूर्वाग्रहों को भी खत्म करने का प्रयास किया। भारतीय सिनेमा के प्रभाव का रेखांकन करते समय उसके इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

बाजार के प्रभाव से भारतीय सिनेमा भी स्वयं को अछूता नहीं रख पाया। यह कहना असंगत न होगा कि बाजारवाद के प्रभाव से भारतीय सिनेमा का स्तर गिरा, जो कि इसका धुंधला पहलू है। बाजारवाद के कारण फार्मूला फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ, जिसके नकारात्मक परिणाम सामने आए। 

बाजारू फिल्मों ने बॉलीवुड को दो नंबर के पैसों के खेल का अड्डा बना दिया। बाजार के प्रभाव में फिल्मों को बिकाऊ बनाने के लिए ऐसे फार्मूले गढ़े जाने लगे, जो युवा पीढ़ी को आकर्षित करें। फिल्मों में हिंसा-प्रतिहिंसा विवाहेतर सम्बन्ध. अश्लीलता, बडरूम सीन, अंग प्रदर्शन, बलात्कार, कैबरे और आइटम सांग्स का बढ़ चढ़ कर प्रदर्शन किया जाने लगा। इतना ही नहीं, जासूसी और रहस्य की नकली कथाएं, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, मृत आत्माओं का प्रकट होकर बदला लेना तथा पुनर्जन्म आदि के प्रसंग पटकथाओं का हिस्सा बनने लगे। संदेशपूर्ण और यथार्थ सिनेमा तिरोहित होने लगा। फैंटेसी का प्रभाव बढ़ा और फिल्मों का वातावरण यथार्थ विरोधी होने लगा। फिल्में बाजार के विस्तार का साधन बनने लगीं। फिल्मों के निर्माता पश्चिमी देशों की बाजारू फिल्मों के लगातार सम्पर्क में रहने लगे। बाजारू कथानक चुराकर उनकी प्रस्तुति कुछ बदलावों के साथ की जाने लगी। इस तरह जहाँ फिल्मों में अमर्यादित दृश्यांकन सामने आने लगा, वहीं ‘सेंसर बोर्ड की भूमिका और आचरण पर सवाल उठने लगे। फिल्मों के इस खोखलेपन और स्तरहीनता ने भारतीय सिनेमा के गौरव को खंडित किया। इस पहलू पर फिल्मकारों को चिंतन-मनन करना चाहिए। 

कुछ विसंगतियों के बावजूद आज भी भारतीय सिनेमा समाज के निर्माण में योगदान सुनिश्चित करते हुए मूल्य-बोध करवा रहा है। मसाला फिल्मों के बीच अच्छे कथानकों पर केन्द्रित संदेशपूर्ण और उद्देश्यपरक फिल्में बराबर देखने को मिल रही हैं, जिनमें लोक जीवन, ग्रामीण चेतना, सामाजिक सरोकारों, लोक की समस्याओं एवं प्रश्नों की अनुगूंज है। सार्थक अभिव्यक्तियाँ आज भी सिनेमा के माध्यम से सामने आ रही हैं, जिससे यह आशा जागी है कि आने वाले समय में भी इस तरह के निर्देशकों की तादाद बढ़ेगी, जो लोक के विभिन्न रूपों को परदे पर जीवित करते रहेंगे। 

फिल्मों की श्रीवृद्धि और सिनेमा के गौरव को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि फिल्मों में यथार्थ और संदेश बना रहे। ऐसा करके ही हम भारतीय सिनेमा की अस्मिता को कायम रख पाएंगे। फिल्मों में आई गिरावट के कारण ही इनके कलात्मक स्वरूप को आघात पहुँचा है तथा सामाजिक समस्याएँ अछूती रह गई हैं, जिससे युवा वर्ग दिग्भ्रमित हुआ है। उचित यही रहेगा कि हम फिल्मों के संदेशपूर्ण, उद्देश्यपूर्ण, शिक्षाप्रद और मनोरंजक स्वरूप को कायम रखें, ताकि स्वस्थ समाज का निर्माण हो। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिनेमा जनशिक्षा का एक सशक्त माध्यम है, जिसमें सभी को प्रभावित करने की असीम क्षमता भी है। ऐसे में फिल्म निर्माताओं को व्यावसायिकता के साथ समाज के प्रति अपने दायित्वों का भी निर्वाह करना चाहिए। 

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