सिनेमा और साहित्य पर निबंध Essay on Cinema and Literature in Hindi

सिनेमा और साहित्य पर निबंध

सिनेमा और साहित्य पर निबंध Essay on Cinema and Literature in Hindi |सिनेमा और साहित्य (Cinema and Literature) 

भारतीय साहित्य का भारतीय सिनेमा पर गहरा प्रभाव रहा है। सिनेमा और साहित्य के बीच रिश्ते मजबूत रहे और कालजयी साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में चर्चित भी हुईं व सफल भी रहीं। साहित्य ने वैचारिक स्तर पर भी सिनेमा को समृद्ध बनाया और चिंतन के उच्च आयाम स्थापित किये। वस्तुतः किसी भी देश का साहित्य वहां की जनता की चितवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। यह बात भारतीय साहित्य पर भी लागू होती है। सिनेमा के माध्यम से इस प्रतिबिंब को जीवंतता मिली। यह कहना गलत न होगा कि भारतीय साहित्य ने भारतीय सिनेमा को सजन की आत्मा दी. सौंदर्य का बोध करवाया और मानसिक तृप्ति दी। समाज का दर्पण कहा जाने वाला साहित्य सिनेमा के जरिये जीवन के यथार्थ और सच्चाईयों को उजागर करने का सशक्त माध्यम बना। साहित्य ने भारतीय सिनेमा को सार्थक आधार दिया और उच्च आयाम भी दिये। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा की विरासत को समृद्ध बनाने का काम साहित्य ने बखूबी किया। भारतीय सिनेमा ने पिछले 100 वर्ष साहित्य के साथ साझा किये और साहित्य व सिनेमा के संबंध को मजबूती प्रदान की। 

“यह साहित्य की ही देन है कि हमारी फिल्मों में सदैव भारत की जड़ें दिखीं। भारत की आत्मा दिखी। भारतीय परिवेश से जुड़े सवाल और उनके जवाबों की कोशिशें भी उनमें दिखीं।” 

साहित्य और सिनेमा का संबंध तो भारत में सिनेमा के आगाज से ही जुड़ा है। भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के न सिनेमा का श्रीगणेश ही धार्मिक साहित्य से किया था। उनकी फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ धार्मिक साहित्य पर ही केन्द्रित थी। भारतीय सिनमा के जनक दादा साहेब फाल्के के पास उस समय अनेक विषय रहे होंगे, किन्तु उन्होंने धार्मिक साहित्य को यदि अपनी फिल्म का कथानक बनाया, तो इसके पीछे एक ठोस वजह यह थी कि वह भारतीय जनमानस के सामने एक आदर्श रखना चाहते थे। सिनेमा को साहित्य से जोड़ने की शुरुआत उन्होंने ही की। दादा साहेब ने पौराणिक और धार्मिक साहित्य पर 125 फिल्में बनाईं। धीरे-धीरे यह सिलसिला आगे बढ़ता गया और निर्माता-निर्देशकों ने सामाजिक पृष्ठभूमि के साहित्यिक कथानकों में विशेष रुचि लेनी शुरू की। यही कारण है कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा सामाजिक चेहरा सामने आया, जिसे गढ़ने में साहित्य का अमिट योगदान रहा। भारतीय सिनेमा में साहित्यिक मूल्य और चिंताएं दिखीं। भारतीय समाज की कहानियां दिखीं। 

यह साहित्य की ही देन है कि हमारी फिल्मों में सदैव भारत की जड़ें दिखीं। भारत की आत्मा दिखी। भारतीय परिवेश से जुड़े सवाल और उनके जवाबों की कोशिशें भी उनमें दिखीं। कहने का आशय यह कि साहित्य ने सिनेमा को भारतीय तत्वों से भरने का काम किया। इन्हीं वजहों से भारतीय सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा सामने आया। यदि सिनेमा में मन को छूती साहित्यिक कृतियों को स्थान न दिया जाता, तो शायद भारतीय सिनेमा वह मुकाम हासिल न कर पाता, जो उसने 100 वर्षों के अपने सफर में हासिल किया है। सपने और सिनेमा अपनी ही भाषा में अच्छे लगते हैं, इस जरूरत को पूरा करने में साहित्य ने भारतीय सिनेमा को भरपूर योगदान दिया। मजबन कथानकों की अभिव्यक्ति साहित्य के माध्यम से संभव हो सकी। 

सिनेमा की सफलता के लिए भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के ने साहित्य को जरूरी माना और कहा भी कि साहित्य के बगैर सिनेमा की यात्रा अधूरी है। दादा साहेब ने यह बात कभी बहुत ही बेबाकी से कही थी, कि फिल्म विधा सिर्फ मनोरंजन के साथ नहीं चल सकती। उसमें साहित्य की सोद्देश्यता आवश्यक है। उनके बाद के अनेक फिल्मकारों ने इस बात की गंभीरता को समझा और 

साहित्य व सिनेमा के अंतर्संबंधों को मजबूती प्रदान की। साहित्य ने | जो कहा, उसे सिनेमा ने दिखाया। अच्छे निर्देशकों ने साहित्यिक कृतियों पर सचल और सवाक छायांकित बिंब पेश कर मुखर अभिव्यक्ति दी। सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की रचनाओं ‘सद्गति’ व ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को पूरी प्रतिबद्धता के साथ परदे पर उतारा। 

यह कहना गलत न होगा कि साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में कथानक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से अत्यंत सशक्त होती हैं। इतनी सशक्त कि कभी-कभी उसे इसका खामियाजा तक उठाना पड़ता है। वर्ष 1932 में मुंशी प्रेमचंद ने पहली फिल्म कथा मिल’ लिखी थी। इस फिल्म का कथानक मिल मालिक और मजदूरों के बीच संघर्ष का था, जो ब्रिटिश सरकार को रास नहीं आया। सेंसरशिप के तहत इसे काट-छांट कर ‘गरीब परवर’ के नाम से रिलीज किया गया। मुंशी प्रेमचंद की कृतियों गोदान, गबन और सेवासदन भी परदे पर उतरने के बाद चर्चित रहीं। श्रेष्ठ आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गये गलफाम’ पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ को बहुत पसंद किया गया। ‘बदनाम बस्ती’, ‘आषाढ़ का दिन’, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘एक था चंदर, एक थी सुधा’, ‘सत्ताइस डाउन’, ‘रजनीगंधा’, ‘सारा आकाश’, तथा ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्मों से साहित्य का कारवां फिल्मों में बढ़ता गया। इसी क्रम में ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘साहब, बीबी और गुलाम’, ‘गमन’, ‘एक बार फिर’ आदि फिल्मों के जरिये साहित्य को परदे पर बड़ी मजबूती से स्थापित किया गया। 

“साहित्य ने खालिस मनोरंजन के रास्ते पर आगे बढ़कर सिनेमा को भटकने से बचाया। एक ऐसा अनुशासन निर्मित किया, जिसने भारतीय सिनेमा को दिशाबोध करवाया और सिनेमा की यात्रा को लोक यात्रा से जोड़ा।” 

साहित्य के साथ सिनेमा की यात्रा आज भी जारी है। नये दौर की फिल्मों में भी साहित्य दिख रहा है, अलबत्ता इसका प्रवाह थोड़ा क्षीण पड़ा है। काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘पिंजर’ फिल्म बनी. तो रस्किन की कहानी पर ‘सात खन माफ। उदय प्रकाश की कहानी पर ‘मोहनदास’ बनी, तो प्रियंवदा की कहानी पर ‘खरगोश’। जहां शरद जोशी के व्यंग्य पर बनी फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ सफलतम फिल्म रही, वहीं विकास स्वरूप का कृति ‘क्यू एंड क्यू’ पर बनी ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। 

साहित्य का सिनेमा के प्रति सबसे बड़ा योगदान यह है कि -उसने मनोरंजन के साथ भारतीय सिनेमा को यथार्थपरक भी बनाए रखा। सिनेमा को उद्देश्यपूर्ण बनाए रखा और उसे सार्थकता प्रदान की यथार्थ सिनेमा और सार्थक सिनेमा जैसे शब्द साहित्यिक अवदान के कारण ही फिल्म जगत में अस्तित्व में आए। साहित्य ने खालिस मनोरंजन के रास्ते पर आगे बढ़कर सिनेमा को भटकने से बचाया। एक ऐसा अनुशासन निर्मित किया, जिसने भारतीय सिनेमा को दिशाबोध करवाया और सिनेमा की यात्रा को लोक यात्रा से जोड़ा। 

सिनेमा और साहित्य के अंतःसंबंधों की चर्चा करते हुए यदि हम सिनेमा के संवादों एवं गीतों का जिक्र न करें तो शायद यह चर्चा अधूरी रह जाएगी। संवादों-गीतों के स्तर पर भी देश के नामचीन साहित्यकारों ने सिने जगत को समृद्धशाली बनाने का काम अपने ‘अपने स्तर से किया है। सआदत हसन मंटो से लेकर डॉ. राही मासूम रज़ा जैसे संवाद लेखकों ने अपने बेहतरीन संवादों के जरिये परदे पर उच्चकोटि के शब्द शिल्प को जगह दिलवाई। कुछ ह्रास के साथ यह सिलसिला आज भी कायम है। सिने जगत में सुरीले गीतों की समृद्ध परंपरा की बुनियाद उच्चकोटि के शायरों- कवियों ने डाली। शकील बदांयूनी, साहिर लुधियानवी, राजेन्द्र कृष्ण, मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र, खैय्याम, जैसे शायरों-गीतकारों ने सुरीले व अर्थपूर्ण गीतों की जो परंपरा शुरू की, उसे बाद में कैफी आजमी और पदमश्री गोपाल दास नीरज जैसे साहित्यकारों ने आगे बढ़ाया। यह परंपरा इतनी समृद्ध रही कि गीतों पर फिल्म फेयर अवार्ड दिए गये। राजेन्द्र कृष्ण के खानदान फिल्म के गीत तुम्हीं मेरे मंदिर…. से इसकी शुरुआत हुई थी। 

साहित्य और सिनेमा की जुगलबंदी से जो समृद्ध परंपराएं स्थापित हुई थीं, बाजारवाद एवं वैश्वीकरण के कारण वे क्षीण पड़नी शुरू हो गई हैं। यह भी कहा जा सकता है कि सिनेमा में साहित्य के लिए बाजार एक बड़ा खतरा बन गया है। इससे जहां साहित्य और सिनेमा के बीच खिंचाव की स्थिति पैदा हुई है, वहीं सिनेमा जगत में समृद्ध साहित्यिक परंपराओं का क्षरण भी शुरू हो चुका है। बाजार का दबाव इस कदर बढ़ा है कि वह सिनेमा से साहित्य को बाहर निकलान पर तुला है। इसका प्रभाव सिने जगत में हर स्तर पर दिख रहा है। न अच्छी कहानियां मिल रही हैं और न ही मजबूत अभिव्यक्ति ही देखने को मिल रही है। संवादों और गीतों का स्तर भी बुरी तरह गिरा है। गीतों के बोल कितने घटिया हैं यह ‘चिकनी चमेला जस गीतों से पता चलता है। 

सिनेमा पर साहित्य की पकड़ कमजोर होने से भारतीय सिनेमा में छिछलापन बढ़ा है। नये सिनेमा में भारतीय दर्शन, मूल्यों एवं परंपराओं की आत्मा गुम हो गयी है। साहित्य के दूर होने से अब पहले जैसी सामाजिक चिंताएं भी नहीं दिख रही हैं। फिल्मों की सोद्देश्यता पर मानो ग्रहण लग गया है। हम अपने परिवेश से भी कट गये हैं। इसका मुख्य कारण बाजार का दबाव है। सब कुछ बाजार के चश्मे से देखा जा रहा है और बाजारू चश्मे के आगे साहित्य टिक नहीं पा रहा है। कारण, साहित्य मूल्यों की पैरोकारी करता है, यथार्थ को स्थापित करता है। बाजार का इन बातों से कोई सरोकार नहीं होता। फिल्म कितनी ही बे-सिर-पैर की क्यों न हो, ‘कमाऊ’ होनी चाहिए। यह बाजार का फलसफा है और यही फलसफा सिनेमा में साहित्य का सत्यानाश करने पर तुला है। ये शुभ संकेत नहीं हैं। यदि सिनेमा ने साहित्य से नजदीकियां नहीं बढ़ाईं, तो आने वाले दिनों में भारतीय सिनेमा ‘फेसलेस’ की श्रेणी में भी आ सकता है। 

भारतीय सिनेमा में भारत की आत्मा नजर आये, इसके लिए उसका साहित्य से जुड़ाव आवश्यक है। हमें साहित्य और सिनेमा के रिश्तों को प्रगाढ़ बनाना ही होगा। इसके लिए एक पुनर्जागरण और सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता है। सिने जगत से जुड़े उन लोगों को आगे आना होगा, जिन्होंने खुद को इस क्षेत्र में खपाया है और सिनेमा को धार दी है। कुछ प्रयास बेशक अच्छे हो रहे हैं। मसलन वर्ष 2012 के फरवरी-मार्च माह में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा दिल्ली में आयोजित द्विवार्षिक पुस्तक मेले की थीम ‘साहित्य और सिनेमा’ रखी गई। इस अवसर पर भारतीय सिनेमा के युग पुरुषों से सुसज्जित ‘साहित्य और भारतीय सिनेमा’ नामक कैलेण्डर भी जारी किया गया। सिनेमा और साहित्य के रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने के लिए ऐसी पहले आवश्यक हैं। साहित्य के बिना सिनेमा की यात्रा पूरी तो हो सकती है, किन्तु इसे एक निरुद्देश्य यात्रा ही कहा जाएगा। आवश्यकता इसे सोद्देश्य बनाने की है और इसके लिए साहित्य अपरिहार्य है। 

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