बाल विवाह पर निबंध | Essay on Child Marriage in Hindi

बाल विवाह पर निबंध

बाल विवाह पर निबंध | Essay on Child Marriage in Hindi | भारत में बाल-विवाह की समस्या  पर निबंध

भारत में बाल विवाह की समस्या एक प्रमुख सामाजिक समस्या है। भारतीय समाज में इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश में यह समस्या बनी हुई है और हमें इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इस कुप्रथा का सबसे अधिक खामियाजा अल्पवयस्क बच्चियों को भुगतना पड़ता है। एक पुरानी कहावत है कि कच्चे घड़ों को आग पर नहीं रखा जाता। यदि रखा जाता है तो ये आग की तपन बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति बाल-विवाह में सामने आती है और कच्ची उम्र में वर-वधू को आग से झुलसना पड़ता है। 

हमारी ऋग्वैदिक अथवा पूर्व-वैदिक कालीन सभ्यता में बाल विवाह का कोई अस्तित्व नहीं था। तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा उन्नत थी तथा उन्हें पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह पता चलता है कि बाल-विवाह की कुप्रथा का आविर्भाव राजपूतकालीन भारत में हुआ, जिसका मुख्य कारण विदेशी आक्रमण थे। मुस्लिम तुर्क आक्रमण के साथ भारत में इस कुप्रथा का चलन बढ़ता गया। सल्तनतकाल, मध्यकाल और औपनिवेशिक काल तक यह समस्या अपने विकराल स्वरूप में भारतीय समाज को अभिशप्त करती रही। सोचा यह गया था कि आजादी के बाद भारत से इस सामाजिक समस्या का सफाया हो जाएगा, किन्तु सरकार की तमाम कवायदों के बावजूद भारतीय समाज से बाल-विवाह की काली स्याही धुल नहीं पाई है। 

“बच्चों का बचपन छीनने वाली यह कुप्रथा भारतीय समाज के लिए एक अभिशाप जैसी है। यह एक ऐसी कुप्रथा है, जिससे हमारा समाज कमजोर और संक्रमित होता है।” 

सरकारें इस समस्या को लेकर कितनी अगंभीर हैं, इसका पता इसी से चलता है कि सरकारों के पास इस समस्या से जुड़े सटीक आंकड़े तक नहीं हैं। भारत में इस समस्या के आकलन के लिए हमें संयुक्त राष्ट्र की बाल मामलों की एजेंसी ‘यूनिसेफ’ पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसके अनुसार बाल विवाह के मामलों में बांग्लादेश के बाद भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है तथा दुनिया की हर तीसरी बालिका वधू भारत में है। यह स्थिति चिंता का विषय है। 

भारत में बाल-विवाह की समस्या के पीछे कई वजहें हैं। प्रमुख वजह है साक्षरता का अभाव। साक्षरता के अभाव में हम बाल-विवाह के दुष्परिणामों को भी समझ नहीं पाते और अज्ञानतावश इस कुप्रथा को प्रोत्साहन देते हैं। हमारे देश में बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के प्रति जनजागरूकता एवं जनचेतना की भी काफी कमी है। गांवों-कस्बों में जनचेतना की कुछ अधिक ही कमी देखने को मिलती है और अभिभावक अपने बच्चे का बाल-विवाह करवा देते हैं। यदि इन लोगों में चेतना और जागृति होती, तो इन्हें मालूम होता कि वे मासूम नव दंपत्ति को खुशहाली का आशीष नहीं, अपितु उसके अभिशप्त जीवन का श्राप दे रहे हैं। दहेज, गरीबी और सामाजिक असुरक्षा जैसे कारणों से भी भारत में बाल-विवाह की समस्या विकराल हुई है। गरीबी का दंश झेल रहे अभिभावकों के पास देने के लिए दहेज नहीं होता है। ऐसे में वे कम उम्र में ही बेटी को ब्याह कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते हैं। कुछ स्थानों पर स्थितियां इतनी अराजकतापूर्ण हैं कि निम्नतर सामाजिक हैसियत वाले अपनी बेटी को दबंगों की बुरी नजर से बचाने के लिए कम उम्र में ही उसके हाथ पीले कर देते हैं। ये निम्नतर सामाजिक हैसियत वाले इस समस्या से निजात का बाल-विवाह को ही बेहतर विकल्प मानते हैं। इस समस्या का संबंध लिंगानुपात में आ रही गिरावट से भी है। भारत के कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिनमें लिंगानुपात में आ रही गिरावट के कारण दुल्हनों की कमी हो रही है। इस कारण कुछ अभिभावकों को यह डर सताया करता है कि संभवतः विवाह योग्य होते-होते उनके पुत्र को दुल्हन ही न मिले। इस सोच के चलते वे बालकाल में ही अपने बेटे का ब्याह कर देते हैं। कुछ लोग बेटी का घर-बार जल्द बसाने के चक्कर में कच्ची उम्र में उसके हाथ पीले कर देते हैं, तो कुछ लोग धार्मिक रूढ़ियों के कारण ऐसा करते हैं। स्पष्ट है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से देश में बाल-विवाह के मामले बढ़ रहे हैं। 

बाल-विवाह के अनेक दुष्परिणाम सामने आते हैं। सबसे पहला दुष्परिणाम यह सामने आता है कि कम वय में विवाह बंधन में बंध जाने के कारण वर और वधू दोनों की शिक्षा बाधित होती है। इससे साक्षरता दर प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। लड़कियों को अल्पावस्था में ही संतान को जन्म देने और उनकी परवरिश की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। वे कम उम्र में मां बनने के कारण अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक व्याधियों का शिकार हो जाती हैं। यह भी देखने में आया है कि बालिका वधुएं जहां घरेलू हिंसा से ग्रस्त रहती हैं, वहीं उन्हें अनेक प्रकार के शोषणों का शिकार भी बनाया जाता है। उन्हें खेलने-कूदने और व्यक्तित्व विकास की अवस्था में गृहस्थी संभालने की दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं। उन्हें असमय वैधव्य का भी दंश भी झेलना पड़ता है और एक विधवा के रूप में त्रासद जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। 

“कम वय में विवाह बंधन में बंध जाने के कारण वर और वधू दोनों की शिक्षा बाधित होती है। इससे साक्षरता दर प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। लड़कियों को अल्यावस्था में ही संतान को जन्म देने और उनकी परवरिश की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। वे कम उम्र में मां बनने के कारण अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक व्याधियों का शिकार हो जाती हैं।” 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि बाल-विवाह की रोकथाम के लिए बने कड़े कानूनों एवं जनचेतना बढ़ाने के लिए शुरू किए गए अनेक कार्यक्रमों के बावजूद देश में इस कुप्रथा पर अंकुश नहीं लग पाया है। भारत में बाल-विवाह की रोकथाम के लिए कानूनी स्तर पर पहली पहल औपनिवेशिक काल में हुई थी। 28 सितंबर, 1929 को ‘चाइल्ड मैरिज निरोधक एक्ट’ (शारदा एक्ट) पारित किया गया था। यह एक्ट अप्रैल, 1930 से प्रभावी हुआ। इसके तहत वैधानिक विवाह के लिए लड़के की उम्र 18 तथा लड़की की 14 वर्ष होना निश्चित किया गया। 

इसके बाद से इस दिशा में प्रयास तेज किए गए। मौजूदा समय में 21 वर्ष से कम अवस्था के लड़के तथा 18 वर्ष से कम अवस्था की लड़की का विवाह वैधानिक दृष्टि से निषिद्ध है। 

‘बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006’ के जरिए बाल विवाहों की रोकथाम के प्रावधानों को व्यापक बनाया गया। इसमें | जुर्माना एवं सजा दोनों का प्रावधान है। इसके तहत वर-वधू के माता पिता, सगे संबंधियों, बारातियों तथा विवाह कराने वाले पंडित को भी कानून के दायरे में लाया गया। इसमें यह भी प्रावधान है कि यदि | वर या कन्या बाल-विवाह के बाद विवाह को स्वीकार नहीं करते, तो | वे बालिग होने के बाद विवाह को शून्य घोषित करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। कानूनों के अलावा बाल-विवाहों की रोकथाम के लिए | महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा भी अनेक स्तरों पर प्रयास | किए जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बाल विवाह रोकने की पहल होती रहती है। अभी हाल में संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों’संयुक्त  राष्ट्र जनसंख्या कोष’ एवं ‘संयुक्त राष्ट्र बाल कोष’ द्वारा बाल विवाह रोकने हेतु एक नई वैश्विक पहल प्रारंभ की गई है, जिसे नाम दिया गया है- ‘यूनिसेफ ग्लोबल प्रोग्राम टू एक्सेलरेट एक्शन टू एंड चाइल्ड मैरिज’। इस नई पहल को शुरू में विशेष रूप से अफ्रीका, मध्य-पूर्व एवं एशिया के उन 12 देशों में शुरू किया गया है, जहां बाल विवाह की दर अधिक है। इसमें बाल विवाह रोकने के लिए सरकारों, युवकों, समुदायों एवं परिवारों का सहयोग लिया जाना है तथा दुनियाभर की अल्पवयस्क बच्चियों के अधिकारों को संरक्षित किया जाना है। इस पहल के जरिए वर्ष 2030 तक बाल विवाह की प्रथा को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। इन प्रयासों की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इनमें जनसहभागिता बढ़ाई जा तथा जनचेतना लाने के स्तर पर विशेष प्रयास हों। 

बाल-विवाह की कुप्रथा के उन्मूलन हेतु पहली आवश्यकता है कि हम साक्षरता और जागरूकता को बढ़ाएं। विशेष रूप से लड़कियों को साक्षर व जागरूक बनाने की दिशा में विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि इस कुरीति का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव मासूम लड़कियों पर ही पड़ता है। गरीबी जैसी आर्थिक समस्या एवं दहेज जैसी सामाजिक कुप्रथा पर अंकुश लगाया जाना भी इस समस्या के निवारण में सहायक सिद्ध हो सकता है। हमें उन दूषित परम्पराओं एवं धार्मिक रूढ़ियों का सफाया भी करना होगा, जिनसे इस कुप्रथा को प्रोत्साहन मिलता है।

बाल-विवाह की रोकथाम के लिए हमारे देश में कानून तो हैं, किन्तु इनका क्रियान्वयन सही ढंग से न हो पाने के कारण अक्सर गुनाहगार बच जाते हैं। इस दिशा में ध्यान दिए जाने की जरूरत है। हमें ऐसे उपाय सुनिश्चित करने होंगे कि गुनाहगार कानून की गिरफ्त से बच न पाएं। हानिकारक सामाजिक नियमों में बदलाव लाकर, युवा महिलाओं को आर्थिक अवसर प्रदान कर तथा विशेष रूप से उन जातियों में जागृति लाकर जिनमें बाल-विवाह के प्रति रुझान ज्यादा है, हम इस समस्या से उबर सकते हैं। कोई भी समस्या लाइलाज नहीं होती है। बस आवश्यकता समग्र और सुचिंतित प्रयासों की होती है। बाल-विवाह की समस्या से हम उबर सकते हैं। जरूरत समग्र प्रयासों की है। प्रयास जारी भी हैं। भविष्य में अच्छे परिणामों की उम्मीद की जा सकती है।

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