बाल श्रमिक की समस्या पर निबंध |Essay on Child Labor Problem in Hindi

बाल श्रमिक की समस्या पर निबंध

बाल श्रमिक की समस्या पर निबंध  |Essay on Child Labor Problem in Hindi

 हमें भारत के प्रत्येक भाग में बाल श्रमिक भारी तादाद में मिल जाएँगे. ये बालक घरेलू काम से लेकर कारखानों तक में काम करते हुए देखे जा सकते हैं. इतना ही नहीं, वे कूड़े के ढेर में से कागज के टुकड़े, टूटी-फूटी वस्तुएँ बीनते हुए भी देखे जा सकते हैं. कचरे में से चीजें बिनवाने का काम शहर के कबाड़िये बालकों से कराते हैं और मजदूरी के नाम पर इतना दे देते हैं जिससे ये बालक जीवित रह सके. कुछ बालक मजदूरी लेकर भीख माँगने और चोरी करने का भी काम करते हैं. ये बाल-श्रमिक ऐसे कारखानों में भी काम करते हैं, जहाँ इनकी जान को खतरा रहता है तथा ये अनेक प्रकार के घातक रोगों के शिकार भी हो जाते हैं. खेलने, खाने, पढ़ने, लिखने की अवस्था में ये बालक श्रम करके अपना तथा अपने परिजन का पेट पालने को विवश होते हैं. कारण केवल गरीबी है. गरीबी की विवशतावश अनेक बालक अपराधी भी बन जाते हैं अथवा बना दिए जाते हैं. 

बाल श्रमिकों के अभिशाप को लक्ष्य करके हम लोग प्रायः आँसू भी बहा देते हैं. सरकार ने कई कानून भी बना रखे हैं, परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात.

बाल-श्रमिक 

यूनिसेफ की सन् 1997 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 25 करोड़ बालक श्रमिक हैं. इनमें लगभग एक तिहाई केवल भारत में हैं. हमारे देश में विभिन्न स्तरों पर इस समस्या के बारे में प्रायः विचार-विनिमय होता रहता है, गोष्ठियाँ होती रहती हैं, नारे लगाए जाते हैं, कानून बनाए जाते हैं आदि, परन्तु इस समस्या की जड़ तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं किया जाता है. इस समस्या से रूबरू होने पर हमें सबसे पहले गति की वह दुश्चक्र तोड़ना होगा जिसके चक्र में हमारे ये नौनिहाल जीवन भर पिसते रहने को विवश होते हैं. 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद विकास कार्य काफी तेजी से हुआ है, परन्तु विकास का लाभ उन लोगों को प्राप्त नहीं हो सका है जिनके लिए विकास के कार्यक्रम किए जाते हैं. इसके अनेक कारण हो सकते हैं. सब कारणों के मूल में एक ही कारण है हमारे भीतर तथा हमारे प्रयत्नों में न सच्चाई है और न ही ईमानदारी, समस्त विकास कार्य सतही तौर पर किए जाते हैं और इनका काम भ्रष्टाचार में बदलकर विकसित लोगों की जेब में शरण पाता है. वास्तविकता यह है कि अनेक लोगों की सोच तो यह होती है कि हमारे जीवन में सुख के लिए बाल श्रमिकों की संख्या बनी रहनी चाहिए. जो भी हो, नारेबाजी, सम्मेलनों और कानूनों में यह समस्या तब तक हल नहीं हो सकती है जब तक इस समस्या के प्रति समाज में पूरी जागरूकता उत्पन्न नहीं हो जाती है. 

कल्याणकारी राज्य की सार्थकता सिद्ध करने के लिए शासन एवं समाज को प्रत्येक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान देना होगा. मानवाधिकार का महत्त्व तब तक कुछ नहीं है, जब तक हम मानव की पहचान कर लें, मानव को मानव न समझ लें. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 में स्पष्ट लिखा गया है कि 14 वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को किसी कारखाने अथवा खदान या अन्य किसी रोजगार में नहीं लगाया जाएगा. यह भी सत्य है कि यदा कदा हमारे सरकारी अफसर बाल श्रमिकों को रखने वाले कारखानों पर छापे भी मारते रहते हैं, परन्तु परिणाम क्या है ? भारत के प्रत्येक नगर में, प्रत्येक कस्बे में, प्रत्येक गली-कूचे में हमें बाल श्रमिक देखने को मिल जाएँगे. इन श्रमिकों को बाल सुलभ निरीहता एवं सुकुमारता प्रायः हृदयविदारक होती हैं. इन बाल श्रमिकों को देखकर यह पूरा विश्वास हो जाता है कि सामाजिक रूपान्तरण की प्रक्रिया में निर्धनता ही खलनायक की भूमिका का निर्वाह कर रही है. 

इस प्रक्रिया में बाल श्रमिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इस प्रक्रिया के प्रमुख कारण हैं निर्धनता, निरक्षरता और समाज की भागीदारी का अभाव. इन कारणों के निराकरण का प्रयत्न पूरी शक्ति के साथ किया जाना चाहिए. इस बुराई को दूर करने के उपायों पर हम जब विचार करते हैं, तो यह अप्रिय तथ्य उभरकर आता है कि इस सामाजिक बुराई के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हम सब जिम्मेदार हैं. हमने समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को न तो पढ़ाने की दिशा में सच्चाई के साथ गम्भीर प्रयत्न किये हैं, न उनकी आर्थिक दशा सुधारने के लिए रोजगार के अवसरों की सृष्टि की है और न ही उनको गले लगाने के लिए सामाजिक व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन ही किए हैं. हाँ, इतना अवश्य है कि इनके बारे में हम आकर्षक भाषण कर लेते हैं, विवेचनापूर्ण निबंध लिख लेते हैं, वाक्-कलाओं का आयोजन कर लेते हैं, यहाँ तक कि बाल मजदूरों की दीन-दशा चित्रित करने वाली चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन भी कर लेते हैं. इतना ही नहीं, बाल श्रमिकों पर फिल्में तथा टी.वी. धारावाहिक भी प्रस्तुत कर देते हैं, परन्तु विचारणीय तथ्य यह है कि बाल श्रमिकों की दीन-दशा का विचारोत्तेजक वर्णन करने वाले व्यक्तियों में कितने ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपने घरेलू काम स्वयं करते हैं. मध्यमवर्ग के अधिकांश व्यक्ति ऐसे हैं, जो अपने घरेलू काम के लिए सामान्यतया 10 से 13 वर्ष की अवस्था वाले बालकों को नौकर रखते हैं, और उन्हें अत्यन्त हीन एवं निम्न कोटि का जीवन व्यतीत करने को विवश करते हैं. ये बाल श्रमिक आधा पेट भोजन, वह भी परिवारीजन के खाना खाने के बाद बचे हुए भोजन का सेवन करके दिन-रात काम करते हैं और कड़ाके के जाड़े में एक फटी-सी कमीज धारण किए हुए दौड़-दौड़ कर काम करते हैं. उनकी आँखें प्रश्न करती हुई प्रतीत होती हैं, लोगों का कहना है कि इस समस्या का वास्तविक समाधान कठोर सामाजिक कानून तथा उसका कठोर अनुपालन द्वारा ही सम्भव है. बाल श्रमिक रखने वाले व्यक्ति अथवा संस्थान का सामाजिक बहिष्कार करना इस समस्या के समाधान में सहायक हो सकता है, परन्तु इसी के साथ यह प्रश्न भी उत्पन्न हो जाता है कि बहिष्कार अथवा कानून का कठोर अनुपालन कौन करेगा? सबके घरेलू काम बाल श्रमिकों के सहारे चलते हैं. इस संदर्भ में यह ध्यातव्य है कि कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो इन बाल श्रमिकों से काम लेने के साथ उनकी जीवन-पद्धति को सुधारने का प्रयत्न भी करते हैं, कुछ श्रीमान् लोग अपने घरेलू नौकरों को स्कूल में पढ़ाते हैं और उनके नाम से बैंक या डाकखाने में बचत खाता खोल देते हैं, उनका विवाह आदि करके उनके लिए व्यवस्थित जीवन की व्यवस्था कर देते हैं.

निर्धनता और निरक्षरता का निर्दय दुष्चक्र 

घरेलू नौकर रखने वाले लोग प्रायः इस तरह की शिकायत करते हुए पाए जाते हैं कि ये नौकर-नौकरानी 4-6 महीने से ज्यादा नहीं टिकते हैं और जाते समय कुछ न कुछ चुरा ले जाते हैं. इन लोगों को यह जान लेना चाहिए कि ये श्रमिक बालक प्रायः किसान परिवारों के होते हैं. जब खेत में काम नहीं होता है, तब ये श्रमिक बनकर नगरों में आ जाते हैं. अतः अधिकांश बाल श्रमिक खास मौसम में नौकरी करते हैं. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 7% बाल श्रमिक वर्ष में छः महीने से भी कम समय तक काम करते हैं. कारखानों में काम करने वाले बाल श्रमिकों की स्थिति सर्वथा भिन्न रहती है. उनको मजदूरी भी अधिक मिलती है तथा उनको एक प्रकार से घेर कर, बंधुआ बनाकर रखा जाता है. जब तक सामाजिक संगठन निर्धनता के दुष्चक्र को नहीं तोड़ेंगे, तब तक बाल श्रमिकों की स्थिति अपरिवर्तित बनी रहेगी. 

भारत के रोजगार बाजार में तेजी के साथ मौसमी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. निम्न मध्यमवर्गीय कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में बाध्य होकर अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बच्चों को काम पर भेजना पड़ता है. ये बच्चे छोटे-पूरे काम करके अथवा परिवारों एवं दुकानों पर नौकरी करके अपने परिवार की रोटी-पानी की व्यवस्था में सहायक होते हैं. इस वर्ग के व्यक्ति जब अपने परिवार के भोजन कपड़े की व्यवस्था ठीक प्रकार से नहीं कर पाते है, तब उनसे यह आशा क्यों की जा सकती है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर सकेंगे? इस प्रकार निर्धनता और निरक्षरता का अटूट सम्बन्ध हो जाता है. इसके अलावा माता-पिता के सामने यह भी समस्या रहती है कि उन्हें सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार अपने बेटे-बेटियों के शादी-विवाह भी करने होते हैं. ऐसी स्थिति में उन्हें साहूकारों, महाजनों की शरण लेनी पड़ती है. इस प्रकार के ऋण के दुष्चक्र में पड़ जाते हैं. जिससे वे जीवन भर छुटकारा नहीं पा सकते हैं. इस विषम परिस्थिति में केवल एक विकल्प रह जाता है कि वे अपने बच्चों द्वारा कमाई कराएँ. इस प्रकार कमजोर वर्ग की आय में सुधार करना अथवा बच्चों की निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना हमारी प्रथम आवश्यकता है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार का समाज कल्याण विभाग दलित वर्ग को छात्रवृत्ति भी देता है. इस व्यवस्था की दो विसंगतियाँ हैं—सवर्ण बालकों को यह छात्रवृत्ति नहीं दी जाती है तथा दलित वर्ग के माता-पिता छात्रवृत्ति को परिवार की आमदनी का एक जरिया मान लेते हैं. बालकों को शिक्षित करना उनके लिए सर्वथा गौण बात रहती है. इस प्रकार समाज कल्याण विभाग द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्तियाँ इने-गिने परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान कर देती हैं—न गरीबी दूर कर पाती है और न बालक-बालिकाओं को शिक्षित ही कर पाती है. 

लगभग सभी विकसित देशों में ऐसा देखा जाता है कि सेवाओं में अधिक लागत से प्रयोज्य आय में बढ़ोत्तरी और जीवन-शैली में परिवर्तन द्वारा सामाजिक रूपान्तरण की प्रक्रिया में अद्भुत तेजी आ जाती है. जब हमारी प्रयोज्य आय में वृद्धि होती है तो यह सर्वथा स्वाभाविक है कि बच्चों की शिक्षा को परिवार के मासिक बजट में प्राथमिकता मिलती है. फलतः औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्रों में नौकरी के अवसर बढ़ जाते हैं. 

साधारण तौर पर अभिग्रहण और निर्णय की योग्यता शिक्षा के स्तर द्वारा प्रभावित होती है. स्पष्ट है कि बाल श्रम का एक महत्त्वपूर्ण कारण निरक्षरता बन जाती है. अतएव बाल श्रम के संदर्भ में माता-पिता की अशिक्षा का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है. अशिक्षित माता पिता न तो शिक्षा के महत्त्व को समझते हैं, और न शिक्षा के दीर्घकालीन प्रभाव पर विचार कर पाते हैं. वे अल्पावधि एवं तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखकर अपने बच्चों को नौकरी मजदूरी के लिए भेज देते हैं. इस प्रकार माता-पिता की अशिक्षा बालकों को श्रमिक बनाने के निर्णय में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है. प्रचार माध्यम भी अपेक्षित जागरूकता लाने में अक्षम सिद्ध होते हैं, क्योंकि निरक्षर जन समुदाय की अभिग्रहण क्षमता संवेदनशील नहीं होती है. द्रष्टव्य यह है कि निर्धनों को शिक्षित करने वाले सहकारी नियम भी बहुत सीमित मात्रा में संवेदनशील होते हैं. 

दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों से इस बात का पता चलता है कि शिक्षित लोग अपने बच्चों को आमतौर पर काम पर जाने की अनुमति नहीं देते हैं. कारण स्पष्ट है, अशिक्षित समुदाय से उनकी जीवन-शैली एवं चिन्तन-पद्धति सर्वथा भिन्न होती हैं. वे यह समझने में समर्थ होते हैं कि अल्पावधि लाभ और दीर्घावधि लाभ का सापेक्ष मूल्यांकन कर सकें. फलस्वरूप शिक्षित वर्ग के लोग अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति अत्यन्त उदार होते हैं. वे साधारण तौर पर व्यवस्था और योजना को महत्त्व देते हैं. इस वर्ग के कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हुए देखे जाते हैं कि हम एक वक्त भूखे रहकर भी बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. 

यह भी एक ध्यान देने की बात है कि प्रायः पिछड़े हुए अथवा विकासशील देशों में ही अधिक बाल श्रमिक पाए जाते हैं. इतना ही नहीं, विकसित देशों में बाल श्रमिकों की मांग को भी अविकसित देशों के गरीब एवं अनपढ़ बच्चे पूरी करते हैं. अतएव इस प्रकार के नियम कानून बनाए जाएँ कि अपने बच्चों को शिक्षित न करने वाले माता-पिता को दण्डित किया जाए, क्योंकि ये माता-पिता बच्चों को शिक्षा से वंचित रखकर प्रकारान्तर में ‘बाल श्रम’ को बढ़ावा देते हैं. इस दिशा में सफलता प्राप्ति में महिलाओं के सामाजिक संगठन विशेष उपयोगी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं. 

यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत बाल मजदूर घरों और होटलों में काम करते हुए पाये जाते हैं. इस क्षेत्र की बाल मजदूरी पर सामाजिक समर्थन द्वारा नियंत्रण किया जा सकता है. सामाजिक संगठन इनसे कानूनों का पालन करा सकते हैं. जैसे निर्धारित घण्टों से अधिक काम लेना, बहुत कम अवस्था के श्रमिकों से काम, उन्हें पूरा वेतन न देना, उनके लिए निर्धारित सुविधाओं की व्यवस्था न करना आदि.

निराकरण के उपाय 

औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में कम मजदूरी देने वाले लोगों के प्रति कड़ाई का व्यवहार करना होगा. इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामाजिक नियमों को अधिक प्रभावकारी बनाए जाने की आवश्यकता है. 

अशिक्षा एवं निर्धनता से उत्पन्न विवशता ने कमजोर वर्ग की संवेदनशीलता समाप्त कर दी है. प्रचार माध्यमों द्वारा जागरूकता एवं संवेदनशीलता को बढ़ाना होगा. विडम्बना यह है कि निर्धनों को शिक्षित करने वाले सरकारी नियम अपेक्षित रूप से संवेदनशील नहीं हैं. ऐसी परिस्थिति में स्वयंसेवी सामाजिक संगठनों को अपना दायित्व निभाने के लिए आगे आना होगा. 

निःशुल्क अनिवार्य बाल शिक्षा सम्बन्धी कानून काफी समय से चले आ रहे हैं. अब आवश्यक यह है कि ऐसे सामाजिक नियम बनाए जाएँ जिनके अनुसार अपने बालकों को स्कूल न भेजने वाले माता-पिता को दण्डित किया जा सके. इसी के साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि शिक्षित करने और उनके सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सरकार का ही है, 

बच्चों को काम पर रखने का एक चिरपरिचित क्षेत्र है—वाहनों की मरम्मत. साइकिल, स्कूटर की मरम्मत, आटो मोबाइल सर्विसिंग एवं रिपेयरिंग सेण्टर. इनमें काम करने वाले बच्चों का शोषण किस स्तर का होता है, सब जानते हैं. सामाजिक जागरूकता द्वारा हम इस समस्या को हल कर सकते हैं. बाल मजदूरों का यौन-शोषण भी होता है. इसके लिए भी समाज में सांस्कृतिक जागरूकता उत्पन्न करनी होगी. 

अस्तु, बाल श्रमिकों की समस्या के समाधान हेतु सरकार द्वारा अपेक्षित कानून बनाए जाने की तथा पूरी कड़ाई के साथ उनके पालन की आवश्यकता तो है ही, उससे अधिक आवश्यकता यह है कि समाज में अपने उत्तरदायित्व के प्रति चेतना जाग्रत हो. इस समस्या के समाधान में सामाजिक दबाव अधिक सफल हो सकते हैं, क्योंकि इस समस्या के मूल में सामाजिक शोषण की वृत्ति कार्य करती है. 

बाल श्रमिक एक विश्वव्यापी बुराई है. भारत में यह समस्या एक सामाजिक अभिशाप के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत है. इसके मूल में निर्धनता, अशिक्षा तथा समस्या के समाधान के प्रति सच्चाई का अभाव है. इस समस्या की सर्वप्रथम माँग है समाज के कमजोर वर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार. इस वर्ग की आय में सुधार करने के लिए हमें अपनी राष्ट्रीय मजदूरी नीति को अधिक युक्तिसंगत बनाना होगा. मूल्य सूचकांक के साथ उसका संतुलन भी बनाए रखना होगा. तभी यह सम्भव है कि सेवाओं की लागत में भी बढ़ोत्तरी हो. 

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