शिक्षा की चुनौतियां पर निबंध | शिक्षा की चुनौतियां और संभावनाएं

शिक्षा की चुनौतियां पर निबंध

शिक्षा की चुनौतियां पर निबंध | शिक्षा की चुनौतियां और संभावनाएं अथवा भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समक्ष उपस्थित चुनौतियां (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2005) 

शिक्षा के सामने अस्तित्व की चुनौती है शिक्षा के अपने अस्तित्व के साथ ही मानवता के अस्तित्व की। यह सबसे अधिक उजागर है शिक्षा को मानव संसाधन (यूमन रिसोर्स) बना देने में। क्या शिक्षा अन्य संसाधनों की तरह संसाधन मात्र है? वास्तव में, मानव संसाधन निर्माता है और शिक्षा संसाधनों का आविष्कार और निर्माण कर सकती है। अगर शिक्षा मानव संसाधन है तो किस लिए? इस प्रश्न का स्पष्ट जवाब नहीं दिया जाता, परन्तु परोक्ष रूप से बताया जाता है कि शिक्षा विकास के लिए संसाध न है। प्रश्न पूछा जाता है कि विकास का मतलब क्या है और किसके विकास की बात की जा रही है मानव जाति के विकास या कुछ समर्थ मानवों के विकास की? इस प्रश्न का कोई भी स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। पर यह उजागर है कि विकास को आर्थिक विकास माना जा रहा है जिसके लिए समान अवसर की बात की जाती है। यह ऐसी ही बात हुई कि दौड़ने का समान अवसर दिया जाय और दौड़ में लंगड़े भी शामिल हों और मिलखा सिंह भी। 

ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि आर्थिक विकास, विकास का एक जरूरी पर आंशिक आयाम है। वास्तविक विकास तो मानवीय यानी सांस्कृतिक विकास है जिसमें मनुष्य और समाज बेहतर बनते जा रहे हों। आज यह जग-जाहिर है कि आर्थिक विकास से मनुष्य और समाज का वास्तव में क्षरण हो रहा है, उसका अमानवीकरण हो रहा है। 

“शिक्षा का ज्ञान-विज्ञान-साहित्य-कला यानी मानव जाति की किसी भी उपलब्धि की तरह, नैसर्गिक विकास नहीं हो पाया है…” 

ऐसे में शिक्षा की चुनौतियों को प्रमुख रूप से दो तरह से परखना जरूरी है :

1. शिक्षा क्या कर रही है और हो सकती है यानी शिक्षा की मूल अवधारणा क्या रही है। बाद में निहित-हितों के हाथ की कठपुतली हो जाने के कारण वह क्या होती गई है और आज ज्ञान-विज्ञान में इतनी प्रगति के बाद उसकी अन्तर्वस्तु और रूप में क्या परिवर्तन हुआ है और हो सकता है। तथा

2. शिक्षा वास्तव में मनुष्य और समाज का रूपांतरण करने में क्या क्या कर सकती है बहुत सीमित रूप में ही सही क्या कर ले पा रही है। 

इस पृष्ठभूमि में सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि शिक्षा का ज्ञान-विज्ञान-साहित्य-कला यानी मानव जाति की किसी भी उपलब्धि की तरह, नैसर्गिक विकास नहीं हो पाया है और न ही हो पा रहा है कि वह अपने अस्तित्व (raison d’ etre) को । प्रमाणित कर पाए। 

इसी बात को इस तरह भी कहा जा सकता है कि उपर्युक्त क्षेत्रों की तरह ही शिक्षा की अर्तवस्तु और रूपों (content and forms) का देश-कालानुसार समुचित उद्विकास नहीं हो पा रहा है। 

यह आज के ज्वलंत प्रश्नों में से एक है पर यह आज किसी के एजेन्डे पर नहीं दिखाई देता- न शिक्षकों के, न विचारकों के, न राजनीतिकों के, न सिविल सोसायटी के। सबसे अधिक उम्मीद सिविल सोसायटी से ही की जा सकती थी पर वह परमाणु ऊर्जा, साम्राज्यवाद, भ्रष्टाचार आदि के विरोध में तो खड़ी है, जन-जंगल-जमीन के मुद्दे उठा रही है, परन्तु इनमें से कोई भी काम क्या सही चेतना के अभाव में हो सकता है? और क्या सही चेतना का विकास सही शिक्षा के अभाव में हो सकता है? 

उपर्युक्त पृष्ठभूमि में शिक्षा की कुछ खास चुनौतियों को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाय :

1. सबसे बड़ी चुनौती तो है शिक्षा की अर्थवत्ता और महत्ता को चिन्हित करना यानी यह समझना-समझाना कि शिक्षा आजीविका का नहीं जीवन का साधन है। शिक्षा डिग्री के लिए नहीं चेतना के लिए जरूरी है ताकि मानव मानवोचित व्यवहार करता हुआ उत्तरोत्तर उच्चतर स्तर की ओर बढ़ता रह सके। 

यह काम वास्तव में जनोन्मुख सरकार ही कर सकती है।  यह दुख की बात है कि फिलहाल दुनिया की कोई भी सरकार इस दिशा में सचेत नहीं दिख रही है। 

ऐसे में यह काम समाज का है क्योंकि भुक्तभोगी तो वही है। समाज में ऐसे काम समाज के प्रबुद्व और सामाजिक सरोकार वाले सम्पृक्त लोग करते हैं जैसे विचारक, समाज-सेवी, शिक्षक आदि । आजकल ऐसे काम करने के लिए चिंतक समूह (Think tank) बनाने का चलन है। जैसे सरकार बनाती है Knowi edge Commission (ज्ञान मंडल) वैसे ही समाज और संस्कृति के आंदोलनों की ओर से शिक्षा मंडल’ का गठन किया जा सकता है जिसको लेकर जनता की ओर से दबाव बनाया जा सकता है।

2. दूसरी चुनौती है शिक्षा को शिक्षण संस्थाओं की कैद से मुक्त करने की। धीरे-धीरे शिक्षा को औपचारिक शिक्षा मात्र बना दिया गया है जो शिक्षण संस्थाओं में ही उपलब्ध है और ऐसी शिक्षा को आजीविका के लिए अनिवार्य बना दिया गया है। ऐसे में व्यवसाय की शिक्षा ने शिक्षा के व्यवसाय को आगे बढ़ाया है। 

कबीर को भुला दिया गया है कि शिक्षा ‘पोथी’ मात्र से नहीं आती। रूसो से मदाम मोंतेसरी से पाउलो फ्रेरे से जान होल्ट से गीजू भाई तक विचारकों ने लगातार औपचारिक शिक्षा को न केवल अपर्याप्त और अप्रासंगिक बल्कि घातक करार दिया है। अब तो स्कूल को ‘मूर्ख बनाने का कारखाना तक कहा जा रहा है। इसीलिए अब ‘इनफार्मल’ और ‘नॉन फार्मल’ एजूकेशन पर चर्चा और व्यवहार बढ़ रहा है।

3. शिक्षा कैसी भी हो वह मातृभाषा में सबसे अधिक ग्राह्य होती है। जिसे अपनी भाषा आती है उसे दूसरी भाषाएं भी आ सकती हैं। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने औपचारिक शिक्षा से मुंह मोड़ लिया पर उन्हें अपनी भाषा बांग्ला बहुत अच्छी तरह आती थी। फिर उन्होंने अपनी कवितओं को स्वयं अंग्रेजी में अनुवाद किया और उनके अनूदित कविता संग्रह “गीतांजलि’ को नोबेल पुरस्कार दिया गया। 

मातृभाषा के बारे में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभ में ही हिन्दी के हिरावल लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था : ‘निज भा॥ उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ।’ बंगाल, महाराष्ट्र और केरल आदि के विद्वान-वैज्ञानिक भी जैसे सत्येन बोस, अपनी मातृ भाषा में भी लिखते थे और अंग्रेजी में भी। हिन्दी ही ऐसी भाषा है जिसके क्षेत्र के विद्वान और वैज्ञानिक उसका सम्मान नहीं करते और अहसासे कमतरी’ (Inferionty com plex) से ग्रस्त हैं। मातृ भाषा में उपयुक्त साहित्य और पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराए बिना शिक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता।

4. शिक्षा के सामने एक और चुनौती है सतत शिक्षा का प्रबंध। शिक्षा कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं जो नौकरी और व्यवसाय होने के बाद बंद हो जाय। मनुष्य को जीवनभर शिक्षार्थी होना चाहिए। इसीलिए पाश्चात्य में अभिभावकों के लिए लगातार पुस्तकें लिखी जाती हैं जैसे Mathematics for Parents, क्योंकि जब अभिभावकों ने गणित पढ़ी होगी तब से गणित का कोर्स बहुत बढ़ गया है और अगर अभिभावक लगातार ‘अपटडेट’ नहीं रहते तो उनके बच्चों पर उनका प्रभाव कम हो जाता है। इसी तरह कुछ लोगों की शिक्षा किन्हीं मजबूरियों के कारण बीच में ही रुक जाती है। उनके लिए दूरस्थ शिक्षा (Distant education) जैसी योजनाएं बहुत उपयोगी साबित होती हैं। 

“शिक्षा के सामने एक और चुनौती है सतत  शिक्षा का प्रबंध। शिक्षा कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं जो नौकरी और व्यवसाय होने के बाद बंद हो जाय। मनुय को जीवनभर शिक्षार्थी होना चाहिए।”

5. शिक्षा के सामने वास्तविक चुनौती यह आ खड़ी हुई है कि प्रायः वह आरोपित लगती है क्योंकि शिक्षा देने पर जोर है जबकि शिक्षा ली जाय तभी दी जाने का कोई मतलब होता है। सबसे अधिक शिक्षा तभी ली जाती है जब वह दी नहीं जाती। जरा हम गौर करें कि 3-4 साल का होते-होते बच्चा कितना सीख जाता है। सबसे बड़ा चमत्कार तो भाषा के क्षेत्र में होता है। कठिन से कठिन भाषा बच्चा अपने घर और समाज में बिना सिखाए सीख जाता है। वह न जाने कितनी बातें सहज रूप में सीखता रहता है। ज्यों ही शिक्षा माँ-बाप और शिक्षक थोपते हैं बच्चे को उसमें अरूचि पैदा होती जाती है। 

इसलिए प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक को अधिकाधिक सहज बनाने की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश की संस्था एकलव्य’ द्वारा विज्ञान के प्रयोग तक सहज उपलब्ध सामग्रियों से शुरू किए गए और वह ग्रामीण स्कूलों तक में बहुत लोक प्रिय होते गए। अब उनके द्वारा प्रकाशित किताबें और बाल पत्रिका ‘चकमक तथा शिक्षा के खिलौनों जैसे उपकरण बहुत लोकप्रिय होते जा रहे हैं। 

6.भारत में झुग्गियों में रहने वाले करोड़ों आदिवासी, घुमक्कड़ जातियां, ग्रामीण मजदूर आदि शिक्षा की परिधि में लाए ही नहीं जा रहे। उनके बीच कुछ गैर-सरकारी संगठन (NGO) कुछ-कुछ अस्थायी रूप से करते रहते हैं। इसके अलावा करोड़ों बीच में ही शिक्षा छोड़ देने वाले लोग (Drop out) ऐसे हैं जो सीखा हुआ भूल जाते हैं। उन्हें भी शिक्षित किए बिना जनतंत्र सफल नहीं हो सकता। 

शिक्षा की दैनंदिन चुनौतियां अगणित हैं-जैसे औपचारिक शिक्षा में जितना जरूरी है कक्षा की शिक्षा उतना ही जरूरी है पाठ्येत्तर शिक्षा (Extra curricular education)| उससे ही व्यक्तित्व का विकास होता है। उसके लिए अधिकांश शिक्षक और अभिभावक ध्यान नहीं देते और अधिकांश संस्थाओं में तो । संसाधन भी नहीं होते। औपचारिक क्षेत्र में अधिक रचनात्मक पहुंच की आवश्यकता होती है और उसका बेहद अभाव है। 

अंत में, शिक्षा की चुनौतियां चेतना और समझ के क्षेत्र में अधिक गंभीर हैं। संसाधन वाली चुनौतियां तो थोड़ी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता के साथ कम संसाधनों में भी हल की जा सकती हैं। पर यह बात समझ लेनी चाहिए कि जब तक शिक्षा संबंधी चुनौतियों का हल नहीं ढूंढा जाता अन्य किसी भी चुनौती के समाधान का प्रयास बहुत दूर तक नहीं किया जा सकता। 

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