युवाओं में भटकाव के कारण पर निबंध | Essay on cause of disorientation among youth

युवाओं में भटकाव के कारण पर निबंध

युवाओं में भटकाव के कारण पर निबंध | Essay on cause of disorientation among youth

युवाओं में भटकाव 

वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में युवा वर्ग में जितना अधिक भटकाव हुआ है. उतना शायद पहले कभी नहीं हुआ था. ‘युवाओं में भटकाव’ तात्पर्य यह है कि युवा वर्ग द्वारा अपने मूल उद्देश्यों, नैतिक कर्त्तव्य तथा उचित मार्ग से विमूढ़ होकर अनुचित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अमानवीय कार्यों का सहारा लेते हुए गलत मार्ग पर कदम बढ़ाना. 

युवा-जीवन अनन्त कर्तव्यों से भरा पड़ा है, जिसका पालन करना युवा वर्ग का धर्म है जैसे-देश के सम्मान की रक्षा करना, विश्व में इसकी बेहतर छवि का निर्माण करना, समाज की परम्पराओं की रक्षा करना, अपनी संस्कृति की उपेक्षा न करना, स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए प्रयत्नशील बनना, परिवार की मर्यादा की रक्षा करना, स्वच्छ राजनीतिक माहौल के निर्माण हेतु संघर्ष करना, नशाखोरी प्रवृत्ति से बचना तथा अध्ययन के प्रति सजग रहना आदि, परन्तु आज दिन-ब-दिन युवा वर्ग इन कार्यों से भटकता जा रहा है.

युवाओं में भटकाव क्यों? 

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर वे कौनसे कारण हैं जिनके चलते हमारा युवा वर्ग अपने कर्त्तव्यों को भूलकर दिग्भ्रमित हो गया है? इस चेतनाशून्यता का कारण क्या है? किसी भी विद्वान, विचारक, चिन्तक, दार्शनिक, समाजशास्त्री के लिए यह अत्यन्त आश्चर्य की बात हो सकती है कि युवा वर्ग (जिसके कंधों पर देश को हमेशा से ढोया जाता रहा है) के सम्बन्ध में किसी को संदेह नहीं हो सकता. इनमें भ्रष्ट आचरण की प्रवृत्ति तथा चारित्रिक पतन जिस प्रकार दृष्टिगोचर हुआ है, उसके कई कारण हैं. यह स्थिति मुख्य रूप से सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में आए अवमूल्यन के कारण उत्पन्न हुई है. 

वर्तमान में फिल्मी अश्लीलता व दूरदर्शनी संस्कृति युवाओं को भ्रष्टता, चारित्रिक पतन और विचारशून्यता की ओर ले जा रही है. ये फिल्में बढ़ते अपराधों और युवाओं में भटकाव का प्रमुख कारण हैं. 

युवा वर्ग में निराशा एवं कुण्ठा का मुख्य कारण है बेरोजगारी. आरक्षण की नीति ने अनेक प्रतिभा सम्पन्न युवक-युवतियों को जबरदस्ती बेरोजगार एवं परावलम्बी बना दिया है. अतएव अपनी इच्छाओं एवं महत्वाकांक्षओं को पूरा करने के लिए नई पीढ़ी छोटे रास्ते (Short cuts) ढूँढ़ती रहती है. यह स्थिति मौजूदा उपभोक्ता संस्कृति से उत्पन्न मानसिकता है, जिससे प्रेरित होकर हमारे युवा अधिकार एवं धन पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

आज समाज में युवाओं में चारित्रिक पतन एवं भ्रष्ट आचरण के अकल्पनीय कुकृत्य देखने-सुनने को प्रायः मिलते हैं. इनके मस्तिष्क में कुत्सित मनोवृत्ति के प्रश्रय से ही अश्लीलता प्रकट होती है, जो युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन, फैशनपरस्ती एवं दिग्भ्रमित स्थिति से उत्पन्न परिस्थितिजन्य व मानवजनित कारकों की मिश्रित देन है. 

परम्परागत मूल्यों का ह्रास भी युवाओं में भटकाव का प्रमुख कारण है. पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में युवा वर्ग पूरी तरह बँध चुका है. नई पीढ़ी का मानना है कि पाश्चात्य सभ्यता के प्रयोग से ही मनुष्य की खोई हुई मासूमियत फिर से मिल पाएगी. इस सभ्यता के प्रभाव से वेशभूषा एवं रहन-सहन में भी अन्तर मालूम पड़ते हैं. युवतियों के इस प्रकार के वस्त्र होते हैं, जिनसे उनके उत्तेजक एवं अर्द्धनग्न नजर आने वाले परिधानों के कारण मनचले युवकों में कुत्सित भावनाओं को बढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है, जिसके फलस्वरूप अश्लीलता से अन्य युवा भी भ्रष्ट हुए हैं. मनोरंजन के साधनों में भी पाश्चात्य अन्धानुकरण होने से युवाओं में भटकाव आना स्वाभाविक ही है. 

देश में गरीबी घटने के बजाय बढ़ रही है. युवाओं के सामने एक और समस्या रोजगार अथवा मनोनुकूल नियोजन की है. बेरोजगार होने के कारण तथा अपने झूठे सपनों को साक्षात् रूप में देखने के लिए युवा भ्रष्ट राह पर चल पड़े हैं. इसका उदाहरण नग्न (ब्लू) फिल्में बनाना, अवैध सम्बन्धों का ब्लैकमेल करना, अपहरण तथा चोरी जैसे घृणित कार्य को व्यवसाय बनाना, युवतियों द्वारा कालगर्लशिप एवं वेश्यावृत्ति को व्यवसाय बनाना आदि कुकृत्यों के रूप में देखा जा सकता है. 

भारतवर्ष में शिक्षा की विशेष कमी है. यहाँ अत्यधिक व्यक्ति अशिक्षित हैं. स्त्रियों में शिक्षा की स्थिति और भी शोचनीय है. पढ़े-लिखे युवा भी अशिक्षितों के मध्य रहकर संकुचित दिमाग के हो जाते हैं. लोग धार्मिक कट्टरता से मदमस्त हो मानव के असली धर्म और कर्त्तव्य को भुला बैठते हैं. जातिवाद से ग्रस्त होकर भी युवा वर्ग अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं. यौन शिक्षा एवं ज्ञान का अभाव भी युवाओं में भटकाव का प्रमुख कारण है. सकारात्मक यौन शिक्षा के अभाववश उनके मन में विपरीतलिंगी के प्रति उत्तेजना व जिज्ञासा बनी रहती है. उस जिज्ञासा की पूर्ति के लिए वे गलत मार्ग पर चल पड़ते हैं. 

आज के छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा कम दी जाती है और राजनीति के दाँवपेच ज्यादा सिखाए जाते हैं, क्योंकि आज की शिक्षा-पद्धति को हमारे कुबुद्धि और मूर्खवेत्ताओं ने तोड़ मरोड़कर रख दिया है. इसीलिए तो युवक छोटी-छोटी बातों को लेकर हड़ताल करते हैं, जुलूस निकालते हैं, धरना देते हैं, अनशन करते हैं आदि. 

युवाओं में भटकाव’ की व्यापकता एवं प्रभाव 

आज हमारे युवाओं में सृजनात्मक एवं रचनात्मक प्रवृत्ति का ह्रास होता जा रहा है. अधिकांश युवक नशे का शिकार हो गए हैं. यह महारोग आज केवल युवकों में ही नहीं, बल्कि युवतियों में भी अपनी जड़ें जमाने लगा है, नशे का दूसरा नाम मौत है, कुछ युवक निरूद्देश्य घूमते या सिगरेट पीते हुए दिखते हैं. कुछ युवक लूट, अपहरण, हत्या आदि अपराध करते हुए किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते हैं. कभी-कभी युवकों द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के कृत्यों में युवतियाँ भी भाग लेती हुई खबरों में आ जाती हैं. युवतियों द्वारा वेश्यावृत्ति तथा कालगर्लशिप को अपनाना आज आम बात हो गई है. आज के बदलते परिवेश तथा बदलते जीवन मूल्यों में एवं भौतिकवादी संस्कृति के युग में युवा पीढ़ी ने श्रम के महत्व को झुठला दिया है. युवा पीढ़ी में अनुशासन नाम की चीज तो प्रायः समाप्त ही हो चुकी है.

ये केवल अश्लील साहित्य, नग्न व कामक्रियाओं को प्रकाशित करने वाले प्रकाशन, ब्लू फिल्में आदि के पीछे अंधदौड़ लगाने में संलग्न हैं. चरित्र युवा वर्ग के पास संचित वह धनराशि है जो शाश्वत है, स्थायी है व अकूत है, परन्तु यह क्षोभ का विषय है कि आज युवा वर्ग जिससे स्वर्णिम भविष्य की आशाएं हैं, व्यथित है, वह भटक गया है. समाज की खिंची लक्ष्मण रेखाओं के आर-पार उछलते-कूदते फिरना, पीढ़ियों से चली आ रही वर्जनाओं को अंगूठा दिखाकर’ उनके विरुद्ध आचरण करना, नित नई मादकताओं में झूमना, भटकना ये कुछ लक्षण हैं आज के युवा वर्ग को इनके भौतिकवादी संस्कृति में लिप्त होने के कारण एकल परिवार में वृद्धि हो रही है. 

इतिहास साक्षी है कि जब-जब देश अंधकार के गर्त में डूबा है तब युवा वर्ग ने ही ऊषाकाल के सूर्य के समान जन-जन को संचरित कर उस अंधकार को तिरोहित किया है. यह वर्ग भारतवर्ष को आगे ले जाने वाली विशेष यांत्रिकी के समतुल्य है और जब किन्हीं कारणोंवश यही वर्ग अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए, तो उस देश के लिए इससे अधिक घातक स्थिति और क्या हो सकती है? मुंशी प्रेमचन्द का कथन है कि-“जवानी जोश है, बल है, साहस है, दया है, आत्मविश्वास है, गौरव है और सब कुछ है, जो जीवन को उज्ज्वल और पूर्ण बना देती है, परन्तु यदि जवानी भटक गई तो समस्त सद्गुणों का तिरोधान हो जाएगा.” 

युवा वर्ग में लज्जा नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. यहाँ 18 वर्ष की बच्चियाँ वेश्यावृत्ति अपनाकर जीवनयापन कर रही हैं, बिन ब्याही माँ बनने में युवतियों में होड़ शुरू हो गई है. 17 वर्ष के बालक-बालिकाएं ‘एड्स’ की बीमारी से मर रहे हैं. फलस्वरूप, लज्जा जो भारतीय जीवन का एक भूषण थी, आज वह ‘गूलर का फूल’ मात्र बनकर रह गई है. 

युवा वर्ग में आक्रोश की भावना भी अनावश्यक रूप से बढ़ गई है. इसी आक्रोश का परिणाम है कि आज देश में हत्या, बलात्कार, डकैती आदि की बाढ़-सी आ गई है. देश में आतंकवाद इसी आक्रोश का स्पष्ट उदाहरण है. प्रमुख बात तो यह है कि इस देश का युवा वर्ग एक नए फैशन के तहत राष्ट्रविरोधी कार्य कर रहा है. इस नए फैशन ने राष्ट्र की सभ्यता व संस्कृति तथा मर्यादा का अच्छी प्रकार से पतन किया है. वोटों की राजनीति तथा बेरोजगारी की समस्या ने हमारे देश में असन्तुष्ट युवकों की एक सेना तैयार कर दी है. शासन इन्हें भटके हुए युवक न कहकर अपराधी कहता है. सबसे प्रमुख बात तो यह है कि युवा वर्ग में भटकाव आने के चलते भारतीय संस्कृति का हनन हो रहा है.

‘युवाओं में भटकाव’ रोकने के उपाय 

यह कार्य इतना आसान तो नहीं है, परन्तु इस कार्य के लिए युवा वर्ग की शिक्षा में पुरातन, भव्य और उत्कृष्ट परम्परागत मूल्यों का समावेश होना चाहिए. ताकि वे धर्म और जीवन-पद्धति के मूलभूत सिद्धान्तों से अवगत हो सकें. माता-पिता, बच्चों को अपनी संस्कृति से सम्बन्धित परम्परागत मूल्यों से अवगत कराएं. यह कठिन कार्य मात्र सिद्धान्तों से नहीं होगा, बल्कि आचरण द्वारा इनकी अमिट छाप इनके बच्चों के सुकोमल मस्तिष्क पर अंकित की जा सकती है. तभी वे आगे चलकर अपने राष्ट्र और धर्म के प्रति कर्तव्यपरायण और निष्ठावान बन सकेंगे. 

इस भटकाव को रोकने के लिए सबसे अहम बात तो यह हो सकती है कि पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण न किया जाए तथा मनोरंजन के साधन भारतीय संस्कृति के अनुकूल होने चाहिए. 

इसके अलावा गरीगी, बेरोजगारी आदि समस्या की ओर भी सरकार को समुचित कदम बढ़ाना होगा. शिक्षा का प्रसार इस भटकाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है. शिक्षा के प्रसार में ‘यौन-शिक्षा’ व नैतिक शिक्षा’ पर भी महत्वपूर्ण ध्यान देना होगा. 

वास्तव में युवावस्था अति संवेदनशील अवस्था होती है. यही अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं निर्मित कर अपना समग्र विकास करता है. कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक धन जुटाने एवं समाज में अपनी अलग छवि बनाकर सम्मान पाने की महत्वाकांक्षा युवाओं में चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाती है. वैधयिक तृष्णा की अंधी दौड़ युवाओं को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ से व्यक्तित्व विकास के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं. हमको यह तथ्य हर हालत में स्वीकार करना होगा कि युवा वर्ग की वास्तविक समस्या स्वयं अपने से सम्बन्धित है, बाहर तथा समाज से कम. अतः युवा निम्नलिखित बातों पर यदि अमल करें, तो वे दिग्भ्रमित होने से स्वयं को बचा सकते हैं 

(i) सर्वप्रथम युवा यह सुनिश्चित कर लें कि उन्हें हर काम अपने विवेक से करना है. 

(ii) स्वार्थ सिद्धि करने वाले राजनेताओं को वे अपना आदर्श कदापि न मानें तथा उनसे दूर रहें. 

(iii) महत्वाकांक्षाओं को अपने ऊपर हावी न होने दें. 

(iv) युवा वर्ग यह जान ले कि मेहनत, ईमानदारी, संयम व लगन से ही स्वर्णिम भविष्य रचा सकता है. 

(v) युवा वर्ग को यह जान लेना चाहिए कि वे ही देश के भावी कर्णधार हैं. इसी रूप में अपने को तैयार करना तथा विकसित करना उनका कर्तव्य बनता है. यदि उनके प्रमाद के कारण देश का पतन होगा, तो फिर देश व समाज को सँभालने वाले व्यक्ति कहाँ से आएंगे?

उपसंहार 

वर्तमान की जटिलताओं और समस्याओं के घने वन में युवा मन अनायास ही परिभ्रमित हो जाता है. फलस्वरूप हमारे युवक-युवतियाँ उस अंधे रास्ते पर आगे बढ़ते चले जा रहे हैं, जिसकी परिणति उन्हें नहीं मालूम है. वे अपनी राह से पूर्णतः भटक गए हैं, जबकि देश को आगे ले जाने का दायित्व उन्हीं के कंधों पर है. अतः यदि ‘युवाओं में भटकाव’ वाली समस्या पर तत्काल कदम नहीं उठाया गया तो भारत को 21वीं शताब्दी में स्वर्णिम राष्ट्र बनाने का स्वप्न दिवास्वप्न बनकर रह जाएगा. वस्तुतः युवाओं में भटकाव नहीं होना चाहिए. यही समय की माँग है और वक्त का तकाजा भी. 

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