व्यवसाय या कैरियर पर निबंध | Essay on Career in Hindi

व्यवसाय या कैरियर पर निबंध

व्यवसाय या कैरियर पर निबंध | Essay on Career in Hindi

क्षणभर हम कल्पना के इंद्रधनुषी विमान पर समासीन होकर सुदूर अतीत की ओर चले जाएँ, तो हमारी मुलाकात आदिम युग के मनुपुत्रों से होगी, जहाँ मच्छरों की तरह मनुष्य भनभनाते नहीं हैं, जहाँ राशन की दुकानों पर मेला नहीं लगता है, जहाँ ‘अधिक अन्न उपजाओं’ का कंपेन नहीं चलता है। थोड़े-से लोग हैं-सभ्यता सर्पकुंडली की तरह टेढ़ी नहीं हो गई है। थोड़े-से फल, अनाज या आखेट से उनका जीवनयापन हो जाता है। किंतु, ज्यों-ज्यों सभ्यता विकसित होती गई—पाषाणयुग से हम अणुयुग में आ गए, शिक्षा के अनेक आयाम, विज्ञान के नए-नए गवाक्ष खुले, त्यों-त्यों जीवनयापन का प्रश्न जटिल होता गया और हमारे लिए व्यवसाय का चुनाव आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य बन गया। 

पश्चिमी देशों में व्यवसाय के चुनाव में सतर्कता बरती जाती है। बड़े-बड़े विशेषज्ञ बच्चों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा लेकर उन्हें उनके अनुकूल व्यवसाय में भेजने की राय देते हैं, और इसका परिणाम होता है कि बच्चे अपने अगले जीवन में बहुत ही चमक उठते हैं। कम्युनिस्ट देशों में तो सरकार की ओर से जाँच का प्रबंध रहता है, ताकि व्यक्ति की प्रतिभा का उचित दिशा में उपयोग हो सके। किंतु, हमारे देश में जिंदगी संयोग है, जूआ है, लॉटरी है। जिंदगी एक लुढ़कती हुई गेंद है, जो किसी-न-किसी किनारे तो लग ही जाएगी अथवा एक बरसाती नाला है, जो कहीं-न-कहीं अपना रास्ता तो बना ही लेगी।

मनुष्य की रुचि, प्रतिभा, शक्ति और सीमा पर यहाँ विचार करने की आवश्यकता ही नहीं होती है, इसलिए हमारे यहाँ के अधिकांश युवकों की जिंदगी असफलताओं की पिटारी रह जाती है। यदि किसी विद्यालयी छात्र से प्रश्न किया जाए कि तुम्हें अपने जीवन में क्या करना है, तो वह सीधे कहेगा-अभी सोचा नहीं है। जब कॉलेज में उसी छात्र से पूछे, तो वह कहेगा-बी० ए० करने के बाद देखा जाएगा। बी० ए० बाद पूछ, तो वह कहेगा कि एम० ए० करने के बाद तय किया जाएगा। इस अकार, वृत्ति का ध्यान रखे बिना वह अनिर्दिष्ट पथ पर दौडा चला जा रहा है अंधेरे मल फकता चला जा रहा है। उसने अपने जीवन का जहाज सागर में डाल दिया ह-पता नहीं, वास्कोडिगामा की तरह किस हिंदुस्तान का पता लगा लेगा, कोलंबस का तरह किस अमेरिका की खोज कर लेगा ! वह अपने जीवन के विशाल भवन का नक्शा बनाए बिना ईंट-पर-ईंट रखे जा रहा है कि वह कभी-न-कभी कोई आकार तो ग्रहण कर ही लेगा। किंतु, इस प्रकार के निर्माताओं का निर्माण कैसा होगा, इसका अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। 

 अधिकांश लोगों को व्यवसाय के चुनाव की कोई पूर्वनिर्धारित योजना नहीं होती। बाद में अपनी रुचि और शक्ति का ध्यान किए बिना किसी व्यवसाय के बाह्य चाकचिक्य के प्रति वे आकृष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की रुचि चित्रकारी में है, किंतु देखता है कि अब कौन चित्रों की कदर करता है, अच्छा है वह पार्श्वगीत-गायक बन जाए-पैसे और प्रतिष्ठा सभी मिलेंगे। कमल से केवड़े का काम लेने की हठधर्मिता में सब गड़बड़ हो गया। किसी की रुचि दर्शन के अध्ययन में है। किंतु, देखा कि अब शंकराचार्य तक को तो कोई पढ़ता नहीं, मेरे चिंतन का क्या मूल्य होगा। हाँ, इंजीनियर बनने में बहुत आय है। अतः, दर्शन की पढ़ाई छोड़कर वह विज्ञान में कूद पड़ा। किसी की रुचि चिकित्सा में है, किंतु उसे लगता है कि भारतीय शासनसेवा में अधिकार और प्रतिष्ठा है। वह डॉक्टरी को छोड़ उस ओर उछल पड़ा। किसी की रुचि शिक्षण में है, लेकिन देखा कि बेचारे शिक्षक की कोई कद्र नहीं है, यदि राजनीति में चले गए एम० एल० ए०, एम० पी० हो गए, तो कभी-न-कभी मंत्री अवश्य बन जाएँगे और फिर है पौ-बारह। इतना अर्जित करके छोड़ दिया जाए कि सात पश्तों तक मटरगस्ती चलती रहे। किसी की रुचि साहित्य में है, पर पद और प्रतिष्ठा के लोभ में वह भारतीय प्रशासनिक सेवा की ओर लपक पड़ा। किसी की रुचि कषि में लक्ष्मी का निवास तो व्यापार ही में है, कौन खाद-गोबर का हिसाब रखे। कषि से छलांग लगाकर वह व्यापार को और चला आया। अंगूर की लत्ती से अब करने की इच्छा का जो परिणाम हो सकता है, वही परिणाम होगा यदि रुचि के प्रतिकल व्यवसाय का चुनाव किया जाए। 

अतः, व्यवसाय के चुनाव में बड़ी सतर्कता और समझदारी की आवश्यकता है। व्यवसाय के चुनाव में सबसे महत्त्वपूर्ण है—रुचि। जिस व्यवसाय में रुचि हो, रुझान हो, आत्मा का आदेश हो, उधर ही जाना चाहिए। दूसरे के कहने से, किसी अन्य व्यवसाय के आकर्षण या किसी प्रकार के प्रलोभन से उस ओर जाना कतई उचित नहीं है। रुचि के प्रतिकूल पेशा चुनने से उधर मन रम नहीं पाता है और इस प्रतिस्पर्धा के युग में सफलता भी नहीं मिल पाती। 

इसके अतिरिक्त अपनी रुचि के अनुकूल जब कोई व्यवसाय चुन लिया, तब उस ओर पूरी लगन और निष्ठा से लग जाना चाहिए। सच्ची लगन काँटों की परवाह नहीं करती। यदि मार्ग में बाधाएँ भी आएँ, तो डटकर मुकाबला करना चाहिए। पं० सोहनलाल द्विवेदी ने ठीक ही कहा है 

खड़ा रहा जो अपने पथ पर, लाख मुसीबत के आने में, 

मिली सफलता उसको जग में, जीने में या मर जाने में।

रुचि, लगन तथा उसपर टिके रहने की आदत डालनी चाहिए। यदि अपने मनोनुकूल व्यवसाय में भी असफलता का हलका झोंका आया, तो उसका परित्याग कर भाग निकलना ठीक नहीं। बंदर की तरह एक डाल से दूसरी डाल पर कदते रहना ठीक नहीं। जिस व्यवसाय को चुना, उसे धैर्य, परिश्रम, अध्यवसाय एवं सुरुचि से करते जाना चाहिए। यदि उचित व्यवसाय का चुनाव हो गया और उस ओर हम पूरी निष्ठा, लगन और धैर्य से बढ़ते रहे, तो हम समृद्ध, समुन्नत होंगे तथा यश और प्रतिष्ठा सभी हमारे पाँव चूमेंगे। जीवन में दुःख के शूल सदा चुभते रहें या सुख की सुमनशय्या पर मस्कराते रहें—यह सब व्यवसाय के समुचित चयन पर ही निर्भर है। जीवन के आनंदपूर्ण भव्य रत्नसोध की आधारशिला है-व्यवसाय का चयन। 

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