भारत में मृत्युदंड पर निबंध | Essay on Capital Punishment in India

भारत में मृत्युदंड पर निबंध

भारत में मृत्युदंड पर निबंध | Essay on Capital Punishment in India                                            

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मृत्युदण्ड के औचित्य को लेकर एक लंबे समय से मतैक्य का अभाव देखने को मिल रहा है। भारत में मृत्युदण्ड की प्रासंगिकता पर बराबर पक्ष व विपक्ष दोनों में तर्क सामने आते रहे हैं। वस्तुतः यह मुद्दा ही अत्यंत संवदेनशील है, जो कि मानव सभ्यता के विकास के साथ कुछ अधिक ही संवदेनशील हुआ। मानवाधिकारों के प्रति बढ़ी जागरूकता ने इस मुद्दे को कुछ अधिक ही बहस तलब बना दिया है। वैसे, मृत्युदंड के मानवीय या अमानवीय पक्ष को लेकर चलने वाली बहसों का सिलसिला पुराना है। यह अलग बात है कि समय-समय पर इससे नये प्रसंग जुड़ते रहते हैं और इस बहस में नये मोड़ आते रहे हैं। मृत्युदंड की हिमायत करने वाले जघन्यतम अपराधों में जहां इसे जायज व प्रासंगिक ठहराते हैं, वहीं मानवाधिकारों के पैरोकार एवं आधुनिक उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण की हिमायत करते हुए, मृत्युदंड का विरोध करती हैं तथा इसे अप्रासंगिक ठहराती हैं, सभ्य समाज में फांसी के औचित्य पर सवाल खड़ा करती हैं। मृत्युदंड से जुड़ी यह बहस अभी तक किसी सही मंजिल तक नहीं पहुंच पाई है और न ही हम अभी तक इसका कोई पैमाना ही निर्धारित कर पाए हैं। 

हमारे समाज में दंड की अवधारणा पुरानी है। मृत्युदंड भी दंडों के विविध स्वरूपों में एक है और संभवतः सबसे बड़ा दंड है। दंड की अवधारणा इसलिए है कि इससे भय उत्पन्न होता है और यही भय हमें अपराधों से दूर रखता है। हम अगर ईश्वर से भी डरते हैं, तो इसलिए क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है और उसे सबसे बड़ा दंडाधिकारी माना जाता है। यदि दंड की व्यवस्था न हो तो जंगल राज कायम हो जाए तथा समाज निरंकश और उच्छंखल हो जाए। भयमक्त और सुरक्षित समाज के लिए ही दंड की व्यवस्था आदिकाल से चली आ रही है। इस क्रम में मृत्युदंड की व्यवस्था भी प्राचीन है। प्राचीनकाल में जान के बदले जान ली जाती थी। इसे ‘लॉ ऑफ मोजेज’ कहा जाता है। यह 4000 साल पुराना दंड विधान है। आज भी विश्व के अनेक देशों में मृत्युदंड की व्यवस्था है। भारत भी इन देशों में से एक है। 

“भयमुक्त और सुरक्षित समाज के लिए ही दंड की व्यवस्था आदिकाल से चली आ रही है। इस क्रम में मृत्युदंड की व्यवस्था भी प्राचीन है। प्राचीनकाल में जान के बदले जान ली जाती थी। इसे ‘लॉ ऑफ मोजेज’ कहा जाता है। यह 4000 साल पुराना दंड विधान है। आज भी विश्व के अनेक देशों में मृत्युदंड की व्यवस्था है। भारत भी इन देशों में से एक है।” 

भारत में मृत्युदंड को मानवीय और प्रासंगिक मानने वालों की यह दलील है कि भारत अभी एक विकासशील देश है। यह अर्धशिक्षित एवं अर्ध सामंती भी है। यहां का परिवेश अभी विकसित देशों से अलग है। अनेक चुनौतियां हैं, जिनमें से कुछ का संबंध देश की अखंडता और सम्प्रभुता से है। अतः गंभीर किस्म के असाधारण मामलों में मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। यदि मृत्युदंड की व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी, तो अपराध से दूर रखने वाला आंतरिक भय लोगों में समाप्त हो जाएगा और गंभीर किस्म के जघन्य एवं असाधारण श्रेणी के अपराध साधारण ढंग से होने लगेंगे। इनकी बाढ़-सी आ जाएगी। एक हद तक यह बात उचित भी है। मृत्युदंड को समाप्त किए जाने की बात समझ से परे है। यह सच है कि अपराधियों की मनोदशा तथा उनके आचरण को सुधारने के प्रयोग व्यापक पैमाने पर होने चाहिए, किन्तु ये प्रयोग किसी दंड को समाप्त करने की कीमत पर नहीं होने चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो धीरे-धीरे लोग हर प्रकार के दंडों को समाप्त करने की बे-सिर पैर की दलीलें देना शरू कर देंगे। वस्ततः दार्शनिक एवं उपदेशात्मक शैली में मानवता की दहाई देना आसान होता है, जबकि व्यवहार की वास्तविकता कुछ और ही होती है। मृत्युदंड की मुखालफत करने वाले इस बात पर सम्यक् विचार नहीं करते हैं कि जघन्यतम अपराध का शिकार होने वाले के परिजनों पर क्या गुजरती है। इस पहलू पर विचार किए बिना मृत्युदंड पर कोई संतुलित नजरिया विकसित नहीं किया जा सकता। यह कहना तो बहुत आसान होता है कि फांसी बर्बर समाज का प्रतीक है, पर इसके सापेक्ष एक गंभीर प्रश्न यह भी है कि समाज में रहने वाले कितने सुसभ्य हैं? एक चार वर्ष की मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाकर उसकी निर्मम हत्या करने वाला क्या बर्बर नहीं है? तो क्या वह इस समाज में रहने का हकदार है? वह तो ऐसा कुकृत्य करने के बाद समाज में रहने के अपने अधिकार को खो चुका होता है। ऐसे में मृत्युदंड न सिर्फ प्रासंगिक है, बल्कि जायज भी है। शायद अपराध के इसी घृणित स्वरूप के कारण ही भारत में मृत्युदंड सुनाने की न्यायिक प्रक्रिया अभी बनी हुई है। इतना ही नहीं, भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी मृत्युदंड को समाप्त न किये जाने की बात कह चुका है। विदित हो कि गत दिनों मृत्युदण्ड पर प्रतिबंध के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव के पक्ष में 110 देशों ने मतदान किया और मृत्युदण्ड को समाप्त किए जाने का समर्थन किया। यह एक अबाध्यकारी प्रस्ताव था, जिसमें मृत्युदण्ड को समाप्त किए जाने की बात कही गई थी। भारत सहित 39 देशों ने जहां इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया, वहीं 36 देशों ने तटस्थ रहते हुए इस पर कोई राय नहीं दी। विरोध करने वाले देशों में भारत के अलावा अमेरिका, चीन, जापान, कोरिया, कुवेत, पाकिस्तान, लीबिया, ईरान व इराक जैसे महत्त्वपूर्ण देश भी सम्मिलित थे। भारत ने अपने विरोध का कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रत्येक देश को अपनी कानून प्रणाली निर्धारित करने का अधिकार है। प्रस्ताव के मसौदे में फांसी पर रोक की बात कही गई है। भारत इस प्रस्ताव को इसके मौजूदा स्वरूप में स्वीकार नहीं कर सकता। विदित हो कि नार्वे वह राष्ट्र है, जिसने इस प्रस्ताव के समर्थन में व्यापक अभियान चला रखा है। नार्वे उन देशों में से एक है, जहां मृत्युदण्ड का प्रावधान नहीं है। 

“यह भी कहा जाता है कि मृत्युदंड के द्वारा अपराधी को सुधरने व पश्चाताप करने के अवसर से वंचित किया जाता है।” 

मानव सभ्यता के विकास क्रम में सम्पत्ति और राजनीतिक अधिकार चेतना के साथ अपराध के तरीकों तथा दंड के प्रावधानों में भी बदलाव की अवधारणा बलवती हुई है। इसी क्रम में विकसित और सभ्य समाजों में मृत्युदंड को प्रतिबंधित किया गया है। अब तक दुनिया के 150 देशों में मृत्युदंड को समाप्त किया जा चुका है। संयुक्त राष्ट्र एक ऐसी मानवीय व्यवस्था के प्रयास में लगा है, जिसमें अपराधियों को सुधरने व सुधारने का सिलसिला चलाया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र के करीब तीन चौथाई सदस्य राज्य मृत्युदंड को समाप्त कर चुके हैं। यूरोप के किसी भी देश में अब मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है। यहां तक कि पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश जब गंभीर अपराधों में लिप्त किसी दूसरे देश के अपराधी को उस देश को प्रत्यावर्तित करते हैं, तो वहां की सरकार से यह लिखित आश्वासन ले लेते हैं कि उस अपराधी को मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा। 

आइये, अब गौर करते हैं उन दलीलों पर, जो मृत्युदंड को अमानवीय व अप्रासंगिक ठहराने के लिए दी जा रही हैं। हालांकि ये भावनात्मक ज्यादा, व्यावहारिक कम हैं। मृत्युदंड को नकारने वालों की मुख्य दलील यह है कि जब राज्य किसी को जीवन दे नहीं सकता, तो उससे जीवन छीन कैसे सकता है। इसी आधार पर इसे सभ्य समाज में जायज नहीं ठहराया जा सकता। यह भी कहा जाता है कि मृत्युदंड के द्वारा अपराधी को सुधरने व पश्चाताप करने के अवसर से वंचित किया जाता है। 

मृत्युदंड के विरोध में एक दार्शनिक किस्म की दलील यह भी दी जाती है कि हम अपराधी को मृत्युदंड देकर उसे जीवन से मुक्त कर देते हैं और इस प्रकार मुक्ति का रास्ता खोल देते हैं। ये दलीलें देते हुए जहां मृत्युदंड के विकल्प के रूप में उम्रकैद की सजा सुझाई जाती है, वहीं यह भी जोड़ा जाता है कि सभ्य समाज में सजा-ए-मौत अमानवीय है। ये दोनों दलीलें व्यावहारिक नहीं हैं। मृत्यु से बड़ा कोई भय नहीं होता, अतः मुक्ति मार्ग की बात तर्कसंगत नहीं है। दूसरा जहां तक सभ्य समाज की बात है, तो यदि समाज वास्तव में सभ्य ही हो, तो ऐसे जघन्यतम एवं घिनौने अपराध हों ही क्यों, जिनके साबित होने पर मृत्युदंड की आवश्यकता पड़े। 

भारत में मृत्युदंड पर होने वाली बहस के बीच कोई ठोस निष्कर्ष अभी तक सामने नहीं आ पाया है। अतः स्पष्ट रूप से इसके भविष्य को लेकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। भारत में मृत्युदंड दिया जाना चाहिए अथवा नहीं, इस बारे में भारतीय कानून आयोग का मानना है कि मृत्युदंड के प्रावधान को समाप्त करने का उचित समय अभी नहीं आया है। संसदीय समिति भी यह कह चुकी है कि देश में मृत्युदंड की व्यवस्था बरकरार रखनी चाहिए। देश की शीर्ष अदालत भी इस बाबत यह व्यवस्था दे चुकी है कि मृत्युदंड विरल से विरलतम मामलों में ही दिया जाना चाहिए। मृत्युदंड दिए जाने में कमी भी आई है। जाहिर है, कि मृत्युदंड का आधार अपराध की प्रकृति एवं उसकी जघन्यता को सामने रखकर ही तय किया जाना चाहिए। मसलन, सुप्रीम कोर्ट ने स्व0 प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को ‘राक्षसी अपराध’ बताते हुए इसमें लिप्त चार मुजरिमों को मृत्युदंड दिया। स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत ने इसे एक ऐसा अपराध माना, जिसके सामने मानवता लज्जित हुई। भारतीय संसद पर हमला भी न सिर्फ एक असाधारण किस्म का अपराध है, बल्कि यह देश की अखंडता और संप्रभुता को भी सीधे-सीधे प्रभावित करता है। इसके लिए दोषी अफजल गुरु को यदि मृत्युदंड दिया गया तो यह अनुचित नहीं है। यही बात मुंबई हमलों के आरोपी कसाब पर भी लागू होती है, जिसे कुछ समय पूर्व मृत्युदंड दिया गया था। 

वस्तुतः लोकतंत्र एक अच्छी प्रणाली तो है, क्योंकि इसमें सभी  की बात सुनी जाती है, किन्तु लोकतंत्र जब अपने आप में कोई आदर्श नहीं रह जाता, बल्कि दलतंत्र और वोटतंत्र में बदल जाता है, तब वह समानता, न्याय और निष्पक्षता के मूल्यों का हनन करने का औजार बन जाता है। मृत्युदंड के प्रश्न पर धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन लोकतंत्र का घोर अलोकतांत्रिक इस्तेमाल है। मृत्युदंड न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विधान है और इसकी क्षमा का सर्वोच्च अधिकार राष्ट्रपति के पास है। मृत्युदण्ड से जुड़ा पक्ष अवश्य विचारणीय है कि जघन्यतम मामलों में न्यायिक प्रक्रिया तीव्र होनी चाहिए। मृत्युदंड के मामलों का निपटारा फौरन से पेश्तर होना चाहिए। इसमें इतना समय नहीं लगना चाहिए कि दोषी की एक लंबी । उमर ही कारागार में गुजर जाए और उसके मामले पर निर्णय न हो सके। इस परिप्रेक्ष्य में हमें क्षमा याचिकाओं को भी ‘मियादी’ बनाना होगा, ताकि एक तय समय सीमा में इनका निस्तारण त्वरितता से हो सके। आज आवश्यकता न्याय व्यवस्था में सुधार की है, न कि मृत्युदंड को समाप्त किए जाने की। 

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