भारत में नौकरशाही पर निबंध : चुनौतियां एवं महत्त्व |Bureaucracy in India : Challenges and Importance

भारत में नौकरशाही पर निबंध

भारत में नौकरशाही पर निबंध  : चुनौतियां एवं महत्त्व |Bureaucracy in India : Challenges and Importance

भारत में नौकरशाही की विशेषताएं, चुनौतियों एवं महत्त्व को रेखांकित करने से पूर्व नौकरशाही की अवधारणा (The Concept of Bureaucracy) को समझ लेना जरूरी है। नौकरशाही, जिसे हम अंग्रेजी में ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) कहते हैं, वस्तुतः कार्मिक प्रशासन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। वैसे ब्यूरोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ वह तंत्र है, जो डेस्क से संबंधित हो। यदि ब्यूरोक्रेसी की शाब्दिक संरचना पर गौर करें तो हम पाते हैं कि यह शब्द ब्यूरो (Bureau) व क्रेसी (Cracy) से मिलकर बना है। ब्यूरो, फ्रांसीसी भाषा का शब्द है, जो कि ‘डेस्क’ के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि ‘क्रेसी’ ग्रीक भाषा का शब्द है, जो कि ‘तंत्र’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है, किंतु समय के साथ इस शब्द के प्रयोग में बदलाव आता गया और बदलाव के इस प्रारंभिक काल में फ्रांस में यह शब्द उस इकाई के लिए प्रयुक्त हुआ, जिस पर शासन चलाने की जिम्मेदारी होती है। बदलाव के अगले चरण में यह शब्द नौकरशाहों की तानाशाही, संकीर्ण दृष्टिकोण, निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता व कठोर रवैये के लिये प्रयुक्त होने लगा। वर्तमान में इस शब्द का प्रयोग कार्मिक प्रशासन के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में होने लगा है, जिसकी जहां अपनी कुछ खूबियां है, वहीं कुछ दोष भी हैं। 

विद्वानों ने नौकरशाही की अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं। प्रो. लॉस्की के अनुसार—“नौकरशाही का अभिप्राय उस व्यवस्था से है, जिसका पूर्णरूपेण नियंत्रण उच्च अधिकारियों के हाथों में होता है और वे इतने स्वेच्छाचारी हो जाते हैं कि उन्हें नागरिकों की निंदा करते समय भी शंका एवं हिचकिचाहट नहीं होती है।” मैक्स वेबर ने नौकरशाही को इस प्रकार परिभाषित किया है— “यह एक प्रकार का प्रशासकीय संगठन है, जिसमें विशेष योग्यता, निष्पक्षता तथा मानवीयता का अभाव आदि लक्षण पाये जाते हैं।” पिफनर के अनुसार “व्यक्तियों तथा कार्यों के उस विशेष प्रकार के संगठन को, जो सामूहिक प्रयत्नों के द्वारा उद्देश्यों को सबसे अधिक प्रभावशाली ढंग से प्राप्त करता है, उसे ही नौकरशाही कहते हैं।” ग्लैडन ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है- “नौकरशाही एक ऐसी विनियमित प्रशासकीय प्रणाली है, जो अन्तः संबंधित पदों की श्रृंखला के रूप में संगठित होती है।” 

“नौकरशाही का अभिप्राय उस व्यवस्था से है, जिसका पूर्णरूपेण नियंत्रण उच्च अधिकारियों के हाथों में होता है और वे इतने स्वेच्छाचारी हो जाते हैं कि उन्हें नागरिकों की निंदा करते समय भी शंका एवं हिचकिचाहट नहीं होती है।” 

उक्त परिभाषाओं के अलावा मार्सटीन मार्क्स ने नौकरशाही का | बड़ा ही जीवंत विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार इसके चार प्रमुख अवयव हैं। पहला अवयव यह है कि नौकरशाही एक विशेष प्रकार का संगठन है, जो विशेष रूप से लोक प्रशासन का कार्य करने की एक संरचना है। दूसरा अवयव यह है कि नौकरशाही संगठन की एक ऐसी बीमारी है, जो अच्छे प्रबंधन में अवरोधक की भूमिका निभाती है। तीसरे अवयव को रेखांकित करते हुए मार्सटीन कहते हैं कि नौकरशाही सरकार के अच्छे-बुरे कार्यों के लिए सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ एक विशाल संगठन है। इसके चौथे व आखिरी अवयव को उन्होंने यह कहकर रेखांकित किया है कि नौकरशाही बुराई पैदा करने वाला एक अभिशाप है, जो स्वतंत्रता के लिए हानिकारक है। इस तरह हम देखते हैं, कि नौकरशाही की अवधारणा मिश्रित अर्थों वाली है। 

नौकरशाही सिर्फ शासकीय स्तर पर परिलक्षित नहीं होती है, बल्कि शासक प्रमख नौकरशाही. सैनिक प्रमख नौकरशाही. जातीय नौकरशाही. संरक्षक नौकरशाही तथा गणात्मक नौकरशाही आदि स्वरूपों में भी सामने आती है।

भारत में नौकरशाही की विशेषताएं : भारत में नौकरशाही की परिकल्पना एक ऐसे प्रशासनिक ढांचे के रूप में की गई है, जो निजी स्वार्थ, अधिमान्यताओं व पूर्वाग्रहों तथा व्यक्तिगत भावनाओं को अपनी कार्यशैली में कोई भी स्थान न देते हुए न सिर्फ शासन प्रशासन के महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्यों व दायित्वों का निर्वहन करता है, बल्कि निर्धारित नियमों व प्रक्रियाओं के दायरे में रह कर पूरी पारदर्शिता के साथ प्रशासनिक कार्यों को अंजाम देता है। भारत में नौकरशाहों को ऊंचे ओहदों तक पहुंचने के लिए अपनी पात्रता को साबित करना पड़ता है। उन्हें अपनी पात्रता को साबित करने के लिए सिविल सेवा परीक्षा के तीन चरणों से गुजरना पड़ता है। पहला चरण होता है प्रारंभिक परीक्षा, दूसरा चरण होता है मुख्य परीक्षा और तीसरे चरण के रूप में उन्हें साक्षात्कार में अपने आप को साबित करना पड़ता है। इसके बाद इन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है और महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। 

“तमाम विकृतियों और चुनौतियों के बावजूद भारत में नौकरशाही के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में नौकरशाही की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।”

 भारत में नौकरशाही की विशेषताओं की चर्चा करते हुए यदि इसके इतिहास पर प्रकाश न डाला जाए, तो शायद यह चर्चा अधूरी रह जाएगी। जहां तक प्राचीन भारत का प्रश्न है, उस समय आज की तरह नौकरशाही की कोई अवधारणा अस्तित्व में नहीं थी। हालांकि आज की तरह उस समय राज्य के हितों को सर्वोपरि रखा जाता था और राज्य की सर्वोच्चता (Supermacy of the State) को वरीयता दी जाती है। प्राचीन संदर्भो में देखें तो आज की नौकरशाही की एक झलक कौटिल्य के अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ में देखने को मिलती है, जिसमें कानून और प्रशासन के बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित किया गया है। इसमें व्यावहारिक प्रशासन (Practical Adninistration) के अत्यंत जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं। डा. अल्तेकर के अनुसार—“कौटिल्य का अर्थशास्त्र राज्यशास्त्र का ऐसा सैद्धांतिक ग्रंथ नहीं, जिसमें प्रशासन या राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों का विवेचन किया गया हो, बल्कि यह प्रशासक के लिए लिखी गई मार्गदर्शिका है।” 

भारत में वर्तमान में जो नौकरशाही विद्यमान है, उसमें औपनिवेशिक काल की प्रतिछाया देखने को मिलती है। इसका ढांचा भी लगभग वही है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान नौकरशाही का वर्चस्व स्थापित हुआ। नौकरशाही ने ही यहां ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें मजबूत की और शासन को चलाने का दारोमदार भी उसी पर था। आज जो आईएएस अधिकारियों का वर्ग है, वह तब आईसीएस के नाम से जाना जाता था। नौकरशाही का जो ढांचा ब्रिटिश हुकूमत ने तैयार किया था, वह हल्के-फुल्के फेर-बदल के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बरकरार रहा। नौकरशाहों से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह अपेक्षा अवश्य की गई कि वे देश के परिवेश को ध्यान में रखकर लोककल्याणकारी दृष्टि से काम करेंगे और यही शायद भारतीय नौकरशाही की सबसे बड़ी विशेषता भी है। आज की भारतीय नौकरशाही का स्वरूप लोक सेवा जैसा है और नौकरशाह लोक सेवक की भूमिका निभा रहे हैं।

भारतीय नौकरशाही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक लोकसेवक के रूप में भारतीय नौकरशाह राजनीति के प्रति तटस्थता की नीति अपनाते हुए इसका हिस्सा नहीं बनता है। यह बात ब्रिटिश नौकरशाही में नहीं थी। एक सरसब्ज लोकतंत्र के लिए नौकरशाही में यह विशिष्टता होनी आवश्यक भी है। भारतीय लोकसेवक से तटस्थता व निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। वह दलगत राजनीति से ऊपर होता है और उसकी प्रतिबद्धता राष्ट्र के प्रति होती है। भारतीय नौकरशाही की दूसरी विशेषता यह है कि इसका ढांचा पद आधारित है, जो कि ऊपर से नीचे की ओर आता है। इससे प्रशासन में पारदर्शिता रहती है तथा सभी के दायित्व व कार्य क्षेत्र की सीमाएं सुस्पष्ट व सुनिश्चित रहती हैं। चूंकि भारत में विभागीय संगठन के रूप में प्रशासनिक इकाइयां हैं, अतएव मंत्रिपरिषद के सदस्यों के हाथों में इनकी बागडोर रहती है और हर विभाग का मुखिया एक मंत्री होता है। इससे नौकरशाही में निरंकुशता की गुंजाइश नहीं रह जाती, क्योंकि मंत्री जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होता है। 

भारतीय नौकरशाही की एक विशेषता यह भी है कि इसमें केंद्र – व राज्यों दोनों का ध्यान रखा गया है। सिविल सेवा के क्षेत्र में ये दोनों ही सम्मिलित हैं। प्रांतीय कैडर के अधिकारी जहां प्रांतीय सरकारों के अधीन होते हैं, वहीं केंद्र सरकार के अधिकारी संघ सरकार के नियंत्रण में होते हैं। इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में पदावधि प्रणाली की भी विशेषता है। इसके तहत राज्य संवर्ग के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर केंद्रीय सेवा में भेजा जाता है। इस व्यवस्था का दोहरा लाभ है। इससे जहां राज्य सरकारों को केंद्रीय योजनाओं की अच्छी जानकारी होती है, वहीं केंद्र राज्य के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियां हासिल कर उनका इस्तेमाल नीति निर्धारण में करता है। 

भारतीय नौकरशाही के समक्ष चुनौतियां : अनेक विशिष्टताओं के लिए जानी जाने वाली भारतीय नौकरशाही के समक्ष | चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारतीय नौकरशाही राजनीतिक दबाव से | उबर नहीं पा रही है। इस वजह से इसका वह तटस्थ स्वरूप नहीं रह गया है, जो इससे अपेक्षित था। राजनीतिक लोग न सिर्फ नौकरशाहों से चाटुकारिता करवाना चाहते हैं, बल्कि उन्हें अपने प्रतिनिधि की तरह अपनी मनमर्जी से चलाना चाहते हैं। जो नौकरशाह ऐसा नहीं 

कर पाते उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पीड़ित किया जाता है। इससे उनकी प्रशासनिक क्षमता का ह्रास होता है। कार्यशैली में निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं रह जाती है। राजनेताओं की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के तबादले कर दिये जाते हैं या उन्हें महत्त्वहीन पदों पर बैठा दिया जाता है। इससे उनका मनोबल गिर जाता है और वे मानसिक विकृतियों के शिकार होने लगते हैं। अनेक पद लोलुप और स्वार्थी अधिकारियों की निष्ठा और प्रतिबद्धता राष्ट्र के प्रति न रह कर राजनीतिक आकाओं के प्रति हो जाती है और ये उनकी सरपरस्ती में मौज उड़ाने का कोई भी अवसर गंवाना नहीं चाहते। इससे प्रशासन का स्तर गिरता है और आलोचनाएं शुरू हो जाती हैं, किंतु इन आलोचनाओं से बेपरवाह नौकरशाहों का राजनीतिक गठजोड़ जारी रहता है और शासन में विकृतियां बढ़ती जाती हैं। भारत के नौकरशाहों पर पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, अपराधियों से सांठ-गांठ, निरंकुशता एवं मनमानी आदि के आरोप भी बढ़े हैं। एक हद तक यह बात ठीक भी है। इस संदर्भ में वोहरा समिति के इस अंश को रेखांकित करना समीचीन होगा—“जहां माफिया तत्व एवं नक्सली संगठन समानान्तर सरकार चलाते हैं, उसमें कुछ नौकरशाहों की मिली-भगत भी होती है, इसीलिए अपराधी तत्वों तथा नक्सलियों की हिम्मत बढ़ती जा रही है।” इस संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का यह वक्तव्य भी गौरतलब है— “सामान्य जनता कई बार नौकरशाही को सेवाएं प्रदान करने वाले तंत्र की बजाय शोषण का एजेंट समझती है।” इस विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भारतीय नौकरशाही आज भी औपनिवेशिक नौकरशाही की प्रेत छाया से मुक्त नहीं हो पाई है। 

महत्त्व : तमाम विकृतियों और चुनौतियों के बावजूद भारत में नोकरशाही के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में नौकरशाही की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। लोक-कल्याणकारी राज्य के कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कर सामाजिक परिवर्तन में तो नौकरशाही ने यथेष्ट योगदान दिया ही, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी की। संवैधानिक व्यवस्था को कायम करने में योगदान दिया। देश के विकास के लिए बनने वाली पंचवर्षीय योजनाओं के क्रियान्वयन में हाथ बंटाकर नौकरशाहों ने आर्थिक व सामाजिक बदलाव का सूत्रपात किया। यह भी देखने को मिला है कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा व समर्पण रखनेवाले लोकसेवकों ने अवकाश ग्रहण करने के बाद सक्रिय राजनीति में आकर देश की सेवा जीवन पर्यंत की। 

आज यदि भारत में नौकरशाही की स्थिति काफी मजबूत है, तो इसके पीछे ठोस कारण यह है कि इसने सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर अपनी एक विशेष पहचान बनाई है और राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। यह कहना असंगत न होगा कि भारतीय नौकरशाही प्रशासनिक बोझ को अपने कंधों पर उठाने का सलीका जानती है। मैक्स बेबर ने जहां नौकरशाही को आधुनिक राज्य का अपरिहार्य तत्व कहा है, वहीं हर्बट मौरीसन ने इसे संसदीय लोकतंत्र के मूल्य की संज्ञा दी है। नौकरशाही के प्रशासनिक महत्त्व को हम प्रो. हैन्स रोजनवर्ग के इस कथन से समझ सकते हैं—“नौकरशाही अच्छी है या बुरी, शासन की आधुनिक संरचना का एक अनिवार्य अंग, व्यावसायिक प्रशासन की फैली हुई व्यवस्था और उसमें नियुक्त अधिकारियों का पदसोपान है, जिसके ऊपर समाज पूर्ण रूप से आश्रित है। चाहे हम उस प्रकार की सर्वसत्तात्मक तानाशाही के अधीन रहते हों अथवा एक सर्वथा उदार लोकतंत्र के अधीन हम अधिक सीमा तक किसी न किसी प्रकार की नौकरशाही द्वारा शासित होते हैं।” 

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