पुस्तक मेला पर निबंध | Essay on Book Fair in Hindi

Essay on Book Fair in Hindi

पुस्तक मेला पर निबंध | Essay on Book Fair in Hindi

किसी बुद्धिजीवी के विचार हैं, “मैं अपने परिवार के सहारे जीवित नहीं हूं और न ही अपने मित्रों के सहारे। अगर मैं जीवित हूं, तो सिर्फ अच्छी पुस्तकों के सहारे, जो मेरी वास्तविक मित्र हैं।” पुस्तकें ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति की धरोहर हैं। इस संबंध में किसी तानाशाह के विचार हैं, “यदि किसी राष्ट्र को गुलाम बनाना हो, तो सबसे पहले उसकी पुस्तकें नष्ट करो।” 

सचमुच ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति से विहीन राष्ट्र को बहुत दिनों तक गुलाम रखा जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पुस्तकें मानव-जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। लेकिन आजकल इस महत्वपूर्ण अंग के प्रति लोगों के रुझान में काफी कमी आई है। दूरदर्शन, सिनेमा, रेडियो आदि माध्यमों से लोग यह कहते पाए जाते हैं कि मुझे अमुक कंपनी का साबुन, क्रीम, टूथपेस्ट, तेल आदि चाहिए। इसके ठीक विपरीत आज बच्चे अपने अभिभावक से यह कभी नहीं कहते कि मुझे अमुक लेखक की एक अच्छी पुस्तक चाहिए। यह राष्ट्रीय चरित्र के ह्रास का द्योतक है। इसका मुख्य कारण है-पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम का अभाव। विभिन्न नगरों में पुस्तक मेलों के आयोजन से इस अभाव को दूर करने की कोशिश की जा रही है। 

पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने के उद्देश्य से ही यूनेस्को द्वारा सन 1972 से अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक वर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसके तहत सन 1972 में विंडसर पैलेस, नई दिल्ली में प्रथम विश्व पुस्तक मेला’ का आयोजन हुआ। तब से अब तक हर वैकल्पिक वर्ष में इसका आयोजन किया जा रहा है। इसमें देश-विदेश के सभी प्रमुख प्रकाशक अपनी पुस्तकें बेचते और खरीदते हैं। यहां पुस्तकें खरीदने पर विशेष छूट दी जाती है। मेले में प्रायः सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं सामाजिक विषयों पर गोष्ठियां आदि भी आयोजित की जाती हैं। इसे एक अच्छी परंपरा की शुरुआत माना जा सकता है। इस तरह के पुस्तक मेले अब प्रत्येक वर्ष आयोजित होते रहते हैं। यही नहीं, अब तो समस्त राज्यों की राजधानी तथा कस्बों में भी पुस्तक मेले का आयोजन होने लगा है। 

पुस्तक मेलों से प्रकाशकों, लेखकों और पाठकों को प्रत्यक्ष लाभ हैं। प्रकाशकों को अपनी तमाम पुस्तकों का एक साथ प्रचार-प्रसार करने का इससे अच्छा अवसर दूसरा नहीं मिल सकता। यहां इनकी पुस्तकों की भी अच्छी बिक्री हो जाती है। लेखकों को यह पता चलता है कि कहां, क्या और कैसा छप रहा है। कौन सा प्रकाशक ज्यादा रॉयल्टी दे रहा है ? इसी प्रकार ‘कॉपी राइट्स’ की लेन-देन भी इन मेलों में होती है। पुस्तक मेलों में पाठकों की उमड़ती भीड़ से इसकी उपयोगिता साबित होती है।

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