जैव प्रौद्योगिकी और कृषि पर निबंध |Essay on Biotechnology and Agriculture

जैव प्रौद्योगिकी और कृषि पर निबंध

जैव प्रौद्योगिकी और कृषि पर निबंध |Essay on Biotechnology and Agriculture

भारत ही नहीं, समूची दुनिया की आबादी बढ़ी है। ऐसे में बढ़ी हुई आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध कराने की चुनौती भी बढ़ी है। कृषि योग्य भूमि सीमित ही नहीं, सिकुड़ भी रही है जिससे बढ़ी हुई आबादी के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित कर पाना आसान नहीं है। ऐसे में जैव-प्रौद्योगिकी ने कृषि की अभिनव तकनीक के रूप में खाद्यान्न की उपलब्धता को सुनिश्चित कराने का भरोसा जगाया है। वैसे तो जैव-प्रौद्योगिकी के चमत्कारिक अनुप्रयोगों से आज कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है, किंतु कृषि क्षेत्र में इसने विशेष रूप से अपनी उपादेयता को साबित किया है। संक्षेप में जीवों के जीनोम में पूर्णतया अथवा आंशिक परिवर्तन कर उसे बेहतर एवं उपयोगी बनाना ही जैव-प्रौद्योगिकी है। सर्वप्रथम वर्ष 1917 में हंगरी के अभियंता कार्ल इर्के द्वारा जैव-प्रौद्योगिकी शब्द का इस्तेमाल किया गया था। मानव स्वास्थ्य से लेकर अर्थव्यवस्था तक में जैव-प्रौद्योगिकी का समान रूप से दखल है। कृषि का क्षेत्र भी इससे परे नहीं है। कम समय एवं लागत में, बढ़ी उत्पादकता, जैव-प्रौद्योगिकी का लक्ष्य है। जीन-अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) तथा ऊतक संवर्द्धन जैसी कुछ अचूक विधियों का उपयोग इसकी विशेषता है। अस्सी के शुरुआती वर्षों में जैव-प्रौद्योगिकी ऐसी जादुई छड़ी बनकर आयी, जिसने कृषि में एक नये युग की शुरुआत की। 

जैव-प्रौद्योगिकी का सर्वाधिक उपयोग अभियांत्रिकी फसलों के विकास में हुआ है। ये वे फसले हैं, जिनके जीनोम को जीन अभियांत्रिकी के द्वारा कुछ इस तरह से परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे कुछ विशेष नुकसानदायक कारकों के लिये प्रभाव शून्य हो जाती हैं। फलस्वरूप बिना किसी विशेष रख-रखाव एवं लागत के बेहतर तथा अधिक उत्पाद प्राप्त होता है। जैव-प्रौद्योगिकी के कृषि के क्षेत्र में युग परिवर्तक अनुप्रयोगों ने अनेक लाभदायक स्थितियां निर्मित कीं। कृषि क्षेत्र को जैव-प्रौद्योगिकी ने नये आयाम देने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। कृषि क्षेत्र के लिए इसकी क्या उपादेयता है, यह जानने के लिए यहां प्रस्तुत विश्लेषण पर गौर करना समीचीन रहेगा।

पराजीनी (ट्रान्सजेनिक) फसलें 

प्रकृति में अनेकानेक ऐसे पादप हैं, जिन पर संक्रमण एवं रसायनों आदि का असर न के बराबर होता है। परन्तु वे आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी होते हैं। वहीं दूसरी तरफ वे फसलें जिनसे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले तमाम उत्पाद प्राप्त होते हैं, पर संक्रमण इतनी तेजी से होता है कि उत्पादकता शून्य तक हो जाती है। 

जैव-प्रौद्योगिकी के द्वारा वे जीन्स जो कि अनुपयोगी पौधों को संक्रमणरोधी बनाते हैं, को उपयोगी पौधों के जीनोम में प्रत्यारोपित कर देते हैं जिससे यही नया पौधा एक तरफ तो अपने पूर्वज की भांति संक्रमण प्रतिरोधी होता है तो दूसरे पूर्वज की तरह उपयोगी उत्पाद देने वाला। 

चूंकि इसमें एक पौधा, दूसरे पौधे के जीन्स को धारण करता है। अतः इस नये उत्परिवर्तित पौधे को पराजीनी (ट्रान्सजेनिक) पौधा भी कहते हैं। पूरे विश्व में पराजीनी फसलों की कृषि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है, जिनमें कुछ प्रमुख हैं 

खर-पतवार नाशक प्रभाव शून्य पौधे-फसलों के बीच में उगने वाले, अनुपयोगी पौधों (खर-पतवारों) को नष्ट करने के लिए खर-पतवार नाशकों (हर्बिसाइड्स) का प्रयोग होता है। परन्तु अक्सर ये रसायन, खर-पतवारों के साथ-साथ, फसलों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। जैव-प्रौद्योगिकी के द्वारा विकसित पराजीनी फसलों पर इन रसायनों का कोई असर नहीं होता है। जिससे केवल खर-पतवार ही नष्ट हो पाते है, फसल नहीं। “ग्लाइफोसेट’ (एक हर्बिसाइड) प्रभाव-शून्य पौधे आज सम्पूर्ण विश्व में सफलता से उगाये जा रहे हैं। 

कीट संक्रमण मुक्त पौधे-कीट-पतंगे, फसलों के सबसे नुकसानकारी कारक हैं। ऐसा अनुमानित है कि हमारे देश की कृषि का लगभग 1/3 भाग कीटों द्वारा नष्ट कर दिया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा आज ऐसी फसलों को विकसित कर लिया गया है, जिन पर कीट-पतंगों का कोई प्रभाव नहीं होता है। 

विषाणु मुक्त पौधे-जैव-प्रौद्योगिकी का एक और महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग, ऐसे पौधे विकसित करने में है, जिस पर विषाणु संक्रमण का प्रभाव नहीं होता है। ये ऐसे पौधे हैं, जिनके जीनोम में विषाणु के जीन्स डाल दिये जाते हैं। ये जीन्स ऐसे प्रोटीन उत्पन्न करते हैं, जो कि विषाणु के संक्रमण को निष्क्रिय कर देते हैं। पपीते एवं कद्दू की दो विषाणु-संक्रमण मुक्त प्रजातियाँ हाल ही में व्यवसायिक उपयोग के लिये तैयार की गयी हैं। 

बी. टी. फसलें 

आज की सर्वाधिक चर्चित ये फसलें, जैव-प्रौद्योगिकी का वरदान हैं। इन पर कीट पतंगों का कोई असर नहीं होता है। इन पौधों के जीनोम में “बैसिलस थरिनजेसिस (बी.टी.)” नामक जीवाण के जीन्स प्रत्यारोपित कर दिये जाते हैं। क्योंकि ये पौधे बी.टी. जीवाणु के जीन्स धारण किये रहते हैं, अतः इन्हें बी.टी. पौधे भी कहते हैं। यह बी.टी. जीन्स क्रिस्टल (Cry) प्रोटीन का निर्माण करता है जो कि के फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के लिए जहरीला होता है जैसे ही कोई कीट इन पौधों को खाता है वह Cry प्रोटीन उसके गले में अवशोषित हो जाता है। अवशोषित होते ही यह वहां की कोशिकाओं को तेजी से नष्ट करना शुरू कर देता है जिससे थोड़ी ही देर में कीट की तड़प कर मृत्यु हो जाती है। शुरुआत में यह बी.टी. जीन्स कपास के पौधे में प्रत्यारोपित किया गया था। इसकी सफलता को देखकर आज इसे अनेकानेक पौधों में प्रत्यारोपित कर कीट संक्रमण मुक्त पौधों को विकसित किया जा चुका है। बी.टी. सोयाबीन एवं बी.टी. मक्के इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

पोषकता 

कृषि उत्पादों की पोषकता बढ़ाने में भी जैव-प्रौद्योगिकी का योगदान कम नहीं है। आधुनिक युग में भोजन की पोषकता, वाह्य स्वरूप एवं स्वाद के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। जैव-प्रौद्योगिकी के द्वारा विकसित पराजीनी सोयाबीन के पौधों से प्राप्त सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा मूल पौधे से उत्पन्न सोयाबीन से 80 प्रतिशत अधिक है। इसी प्रकार पराजीनी आलू एवं दालें जिनमें माण्ड एवं एमिनोएसिड की मात्रा अपेक्षा से अधिक है, का उपयोग बखूबी हो रहा है जीन अभियांत्रिकी से निर्मित चावल में बीटा कैरोटीन उत्पन्न करने की क्षमता है। बीटा कैरोटीन से विटामिन ‘ए’ का निर्माण होता है, जो कि रतौंधी एवं आंख की अन्य बीमारियों को रोकने में सहायक है। 

खाद्य संवर्द्धन 

कृषि द्वारा उत्पन्न खाद्य पदार्थों के संवर्द्धन में जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग हुआ है। प्राचीनकाल में पनीर-उद्योग में बछड़े के “जावन” का प्रयोग होता था, परन्तु अशुद्धता, अत्यधिक लागत एवं कम उत्पादकता, उद्योग को प्रभावित करती थी। सन् 1990 में ‘काइमोसिन’ नामक इन्जाइम, जिसे जीन-अभियांत्रिकी द्वारा एक जीवाणु से प्राप्त किया गया, ने तो पनीर-उद्योग में क्रांति ही ला दी। आज पूरे विश्व में पनीर-उद्योग मूलतः इसी एन्जाइम पर टिका हुआ है। 

खाद्य-उद्योग का लगभग एक तिहाई हिस्सा किण्वन पर आधारित है। यीस्ट (खमीर-सैकरोमाइसिटिज सेरेविसी) तथा अन्य सूक्ष्मजीव इस किण्वन के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हीं सूक्ष्मजीवों को जीनोम में परिवर्तन कर, उन्नत एवं सुधरी हुयी प्रजातियां तैयार करने में जैव प्रौद्योगिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यीस्ट की जीन-अभियांत्रिक प्रजातियों का उपयोग आज दूध के किण्वन से लेकर ब्रेड बनाने तक किया जा रहा है। 

सूक्ष्म रोपण (माइक्रोप्रोपेगेशन) 

कृषि में आज ऐसे उपयोगी पौधे हैं जो तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इसके कई कारण हैं—एक तो पौधे से बीज बनने तक में कई वर्ष तक लग जाते हैं दूसरे बीजों से सीमित मात्रा में पौधे उगाये जा सकते है। ऊतक संवर्धन विधि द्वारा पौधों की संख्या में अल्पसमय में संवर्द्धन कर, प्रत्येक कोशिका से नये पौधे विकसित कर लिये जाते 

वातावरणीय लाभ 

फसलों को संक्रमण से बचाने के लिये रसायनों का प्रयोग खूब होता है। ये रसायन न केवल मृदा को दूषित करते हैं, वरन् भूमिगत जल को भी दूषित करते हैं। जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा, खर-पतवार नाशक संक्रमण मुक्त पौधों के विकसित कर लिये जाने से, इन रसायनों के उपयोग का प्रचलन कम हुआ है। जिससे परोक्ष रूप से वातावरण प्रदूषण को कम करने में मदद मिली है। 

अन्य अभियांत्रिक उत्पाद 

पादप आधारित टीका बनाने में जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग आजकल चलन में है। हेपेटाइटिस B, दांत की सड़न तथा डायरिया आदि, के पादप आधारित टीके जैव-प्रौद्योगिकी के उपहार हैं। 

“हाई फ्रक्टोज कार्न सिरप” (HFCS), ऐसा मीठा पदार्थ है जिसे आजकल ठंडे-पेय बनाने में उपयोग किया जाता है। जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न किये गये इन्जाइम की सहायता से प्राप्त यह मीठा पदार्थ, चीनी से सस्ता एवं स्वास्थ्य के लिये कम नुकसानकारी है। 

जैव-प्रौद्योगिकी के द्वारा टमाटर की ऐसी प्रजातियां विकसित की गयी हैं जिनमें पानी की मात्रा कम तथा पकने का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है। इससे इसके भण्डारण एवं आयात-निर्यात में काफी सविधा हई है। जीन-अभियांत्रित सेब की महक तो बरबस उपभोक्ताओं को आकर्षित करती है। 

मृदा में ऐसे सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं जो पौधों को अनेक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इन सूक्ष्म जीवों को जैव उर्वरक कहा जाता है। अनेक नील-हरित शैवाल एवं जीवाणु इसी वर्ग में आते हैं। यद्यपि ये जैव उर्वरक अनेक पोषक तत्व तैयार करते हैं, परन्तु वायुमण्डल से वायवीय नाइट्रोजन को अवशोषित कर उसे पौधों के उपयोग लायक बनाना इनका मुख्य कार्य है, क्योंकि पौधे सीधे वायुमण्डल से नाइट्रोजन अवशोषित नहीं कर सकते हैं। जैव प्रौद्योगिकी की मदद से आज अनेक प्रकार के और बढ़ी हुयी क्रियाशीलता वाले जैव उर्वरकों का निर्माण कर लिया गया है। राइजोवियम, एजोला, एजेटोवैक्टर ऐसे ही जैव उर्वरक हैं। 

भविष्य की सम्भावनाएं-कृषि के क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगिकी का दोहन अभी बाकी है। वैज्ञानिक फसलों की अनेकानेक प्रजातियों के विकास में लगे हैं। ऐसी फसलें जिन पर वातावरणीय दबाव का कोई असर न हो, न तो ताप का, न तो सूखे का और न ही बाढ़ का कोई फसल किसी क्षेत्र एवं मौसम विशेष की नहीं रह जायेगी, कोई भी फसल कहीं भी किसी भी मौसम में उगायी जा सकेगी। जाहिर है कि इन बातों का भरपूर लाभ कृषि जगत को मिलेगा ही। उत्पाद तो बढ़ेगा ही, कृषकों की निर्भरता मौसम पर नहीं रहेगी। तब सूखा या बाढ़ का प्रकोप उत्पादकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं कर पाएगा। भारत में भी जैव-प्रौद्योगिकी के महत्त्व को समझा जा चुका है। वर्ष 1986 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा अलग जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना की जा चुकी है। इसे भविष्य की खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। 

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