साइकिल की सवारी पर निबंध |Essay on Bicycle Riding in Hindi

साइकिल की सवारी पर निबंध

साइकिल की सवारी पर निबंध |Essay on Bicycle Riding in hindi

आपने चाहे जितनी भी रंगबिरंगी, छोटी-बड़ी सवारियाँ देखी हो, किंतु साइकिल की सवारी सबसे अनोखी, सबसे निराली है। आप जब चाहिए, इसकी सीट पर बैठ जाइए, हैंडिल थाम लीजिए, पैडिल मारते जाइए और मस्ती से निकलते जाइए। जब आप इसपर सवार होते हैं, तब आपकी शान के क्या कहने! सचमुच साइकिल मस्तमौलों की सवारी है, अल्हड़ नौजवानों की सवारी है, अपनी भुजाओं पर आस्था रखनेवालों की सवारी है, अपनी श्रमशक्ति पर विश्वास रखनेवालों की सवारी है। 

वनस्थली की माँग-सी तनी पहाड़ी सड़कों पर साइकिल की सवारी पर जितनी तल्लीनता से आप प्राकृतिक सुषमा का पान कर सकते हैं, शायद ही किसी अन्य सवारी से कर पाएँ। आप बढ़ते जाइए, मौन के संगीत का मजा लेते जाइए, तरुराजि की हरीतिमा से नेत्ररंजन करते जाइए, पर्वत के वक्षःस्थल पर हीरकहार-से तिरते उज्ज्वल जलस्रोत का सौंदर्य निहारते जाइए, तृणाच्छादित तराइयों के बीच वनगायों की बारात देखते जाइए, झुरमुटों के बीच वनजंतुओं की क्रीड़ा निहारते जाइए। अथवा, जिधर सड़कें बनी हों. उन ग्रामीण क्षेत्रों में निकलकर खेत की बालिश्त-भर चौड़ी मेड पर साइकिल चलाते हए सरकस खेलने का मजा लीजिए और साथ ही आनंद मनाइए कि कहीं मकई की धनसिया आपके मस्तक पर गिरकर केसर-सी छा रही है, कहीं गन्ने के पत्ती आपकी छाती से रगड़ खा रही है, कहीं धान के पौधे आपके ठेहुने को पकड़ने की चेष्टा कर रहे है तो कहीं शकरकंद की लत्तियाँ साइकिल के चक्के से लिपटने की चेष्टा कर रही हैं. जीने के लिए किसी सहारे की तलाश कर रही हैं या फिर कहीं सौंफ के पौधे अपनी सगंधि का उपहार देकर आपको फिर-फिर आने का निमंत्रण जता रहे हैं। 

अगर पहाड़ी राजमार्ग से निकल जाइए, तो देखिए कि टेसू के लाल-लाल फूल आपके भीतर के दर्द को उभार रहे हैं या वटवृक्ष अपनी घनी डालियों का चॅदोवा डालते हुए प्रलयकालीन पारावार में अपनी पत्रशय्या पर पड़े बालगोविंद की कथा याद करा रहे हैं या पीपल के पेड़ प्रह्लाद की कथा याद दिला रहे हैं या पाकड़ के पेड़ आपके ऊपर अपने फलों को टपकाते हुए काकभुशुंडि की कथा का संकेत कर रहे हैं। 

अगर मस्ती है आपमें, ऋतुओं की चुनौती स्वीकार करने का सामर्थ्य है आपमें, तो फिर क्या कहने! चाहे लू की चिनगारियाँ उड़ाता ग्रीष्म हो या झड़ी की छड़ी चलाती बरसात या हिमबाण छोड़ता शिशिर-कोई बात नहीं, आप दनादन साइकिल चलाते जाइए, जवानी की पताका उड़ाते हुए निकल जाइए। जो फूलों के पाँवड़े पर नहीं, वरन् शूलों की धार पर मुसकराए, उसका नाम है जवानी। जिसने सर से कफन बाँध लिया, जिसने पीड़ाओं की छाती पर पाँव बढ़ाना जान लिया, उसके लिए साइकिल की सवारी का कोई जवाब नहीं, कोई जोड़ा नहीं। 

जी हाँ! यदि कोई दूसरी सवारी से इसकी तुलना करेंगे, तो पता चलेगा इसकी अद्वितीयता का। बिना नीम खाए गुड़ का स्वाद मालूम हो तो कैसे? हाथी रखिए, तो अकेला वह चालीस-पचास व्यक्तियों का राशन साफ कर देगा, घोड़ा रखिए तो कितनी ही घास और दाना हजम कर डालेगा, मोटर रखें तो लिटर-का-लिटर पेट्रोल गटक जाएगी, रेलगाड़ी हो, तो टन-का-टन कोयला हजम कर जाए! और, हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर? इन्हें तो बस, अगस्त्य ही समझिए, जो चुल्लू में सागर गटक जाएँ और, रॉकेट? नाम मत लीजिए। इसके चारे-दाने ने तो अमेरिका जैसे सबसे समृद्ध देश की भी हालत बिगाड़ दी है।

इतना ही नहीं, हाथी के लिए हथसार, घोड़े के लिए अस्तबल, मोटर के लिए गैरज और हवाई जहाज या रॉकेट के उड़ान-आवास के लिए सैकड़ों बीघे जमीन चाहिए. किंत, साइकिल को जहाँ चाहिए, रख लें। बेचारी एक कोने में दुबक जाएगी: न कोई तरबुद, न कोई चिंता ! खरीदने की बात हो, तो हाथी-घोड़े में दस-पाँच हजार से भी अधिक, मोटर में लाख-दो लाख, हवाई जहाज में कम-से-कम बीस-तीस लाख और अंतरिक्ष यान में करोड़ों-करोड़ की जरूरत, समझिए कि एक राज्य ही बिक जाए। अतः इतनी सस्ती, इतनी कम कीमती, इतनी तंगदस्ती से गुजारा करनेवाली साइकिल जैसी दसरी सवारी शायद ही आपको मिले। यदि कहीं हवा निकल गई, तो किसी से पंप माँग लीजिए, नहीं तो चवन्नी पैसे में ही इसकी क्षुधा की शांति कर दीजिए। हाँ. अल्पभोजी विद्यार्थियों की तरह यह भी अल्पभोजी ही है। 

जब यह रहती है, तो आपको सुविधा देती है; आनंद देती है; जब चली जाती है, तो बहुत दुःख भी नहीं देती। हाथी, घोड़ा, मोटर के नाश पर तो कलेजा बैठ जाता है, आर्थिक रीढ़ टूट जाती है, किंतु साइकिल के सर्वनाश से भी हमारे ऊपर वैसा शोक का बादल नहीं घिरता। वस्तुतः, गीता के श्रीकृष्ण की भाषा में यदि कोई वस्तु अपने नाश पर ‘मा शुचः’ का उद्घोष करती है, तो साइकिल ही। यह बराबर कहती है कि जीर्ण वस्त्र के नाश पर नवीन वस्त्र धारण करने की जैसी खशी है, वैसी ही खुशी होगी आपको मेरे नाश के बाद भी। 

यह कभी आपकी कीमती जान को खतरे में नहीं डालती, कभी आपको राहगीरों के थप्पड नहीं खिलाती, कभी आपको उपहास के बाण नहीं चुभाती; कभी गालियों का उपहार नहीं दिलाती, कभी अदालतों की धूल नहीं फँकवाती, कभी वकीलों की खशामद नहीं कराती. कभी आपके लाइसेंस को रद्द नहीं कराती, कभी आपको कठघरे में खड़ा नहीं कराती, कभी पुलिस की हेकड़ी नहीं सहाती। जिन्हें इसपर विश्वास नहीं, वे तभी विश्वास कर सकते हैं जब उनकी कार से कोई ऐक्सिडेंट हो जाए, किसी व्यक्ति को मामूली-सा धक्का भी लग जाए। 

यह कभी आपको प्रतीक्षा का दारुण दुख नहीं देती। मोटर से आ रहे हैं, गुमटी बंद ! घंटों तक कोफ्त। कोई उपाय नहीं। रेलगाड़ी से आ रहे हैं, कुछ कर्मचारियों ने रेलवे लाइन पर इसलिए सत्याग्रह कर रखा है कि एक अधिकारी ने एक खलासी को इसलिए बर्खास्त कर दिया कि वह मालगाड़ी के डिब्बे से सामान गायब करते हुए रँगे हाथ पकड़ा गया। जब तक फैसला न हो, तब तक आपकी रेलगाड़ी रुकी रहेगी। आपके लिए कोई उपाय नहीं है। किंतु, साइकिल के लिए न कहीं कोई अवरोध है, न रुकावट। वस्तुतः साइकिल आधुनिक युग में भारतीय दिग्विजय का उपाय अवश्य है. जिसके द्वारा आप चाहें तो समस्त संसार को निर्विघ्न रौंद सकते हैं। इसके दो चक्र जनता-जनार्दन के दो पदचक्र हैं, इसकी गति जीवन की दरअसल नपी-तुली निरापद गति है, इसमें संदेह नहीं। 

अतः, हमें इसके जनक इंगलैंड-निवासी स्टारले के प्रति शुक्रगुजार होना चाहिए। साइकिल की ईजाद के एक वर्ष बाद 1885 ई० में भारतीय जनजागरण संस्था काँग्रेस का जन्म हुआ। आसान सवारियों में साइकिल सिरमौर है, आपको मानना ही पडेगा। यह कभी गुनहगार नहीं है। ऐसा होने पर कहेगी- 

सौ जान से हो जाऊँगा राजी मैं सजा पर।

पहले वो मुझे अपना गुनहगार तो कर लें।            -अकबर इलाहाबादी

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