डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध

Essay on Bhimrao Ambedkar in Hindi

डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध |Essay on Bhimrao Ambedkar in Hindi

डॉ. भीमराव अंबेडकर आधुनिक भारत के प्रमुख विधिवेत्ता, समाज सुधारक और राष्ट्रीय नेता थे। वे मानव मात्र की सेवा में अपने को समर्पित करने वाले तथा दलितों, शोषितों और पीड़ितों की दर्द भरी मूक भाषा को अमर स्वर प्रदान करने वाले एक महामानव थे। उनकी योग्यता, विद्वत्ता एवं सक्रिय कार्य शक्ति के आधार पर उनकी जन्म शताब्दी वर्ष 1990 में उन्हें ‘भारत रत्न’ की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित किया गया था। 

डॉ. अंबेडकर का जन्म अनुसूचित जाति के एक निर्धन परिवार में 14 अप्रैल, 1891 को महाराष्ट्र के महू छावनी में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उनके बचपन का नाम भीम सकपाल था। उनके पिता रामजी मौलाजी एक सैनिक स्कूल में प्रधानाचार्य थे। उन्हें मराठी, गणित और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था। उनके घर का वातावरण धार्मिक था। 

मेधावी छात्र अंबेडकर ने 1907 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और इसी वर्ष उनका विवाह रामबाई के साथ हो गया। सन 1912 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। जब बड़ौदा नरेश से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने लगी, तो वे 1913 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए न्यूयार्क चले गए। अमेरिका, लंदन तथा जर्मनी में रहकर उन्होंने अपना अध्ययन पूरा किया। सन 1923 तक वे एम.ए., पीएच.डी. और बैरिस्टर बार एट लॉ बन चुके थे। उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र तथा कानून का गहन अध्ययन किया था। 

1923 से 1931 तक डॉ. अंबेडकर के लिए संघर्ष तथा सामाजिक अभ्युदय का समय था। वे दलित वर्ग का नेतृत्व करने वाले प्रथम नेता थे। उन्होंने ‘मूक’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया, जिससे दलितों में उनके प्रति आस्था उत्पन्न हुई। गोल मेज कॉन्फ्रेंस लंदन में भाग लेकर उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए पृथक चुनाव पद्धति तथा विशेष मांगें अंग्रेज शासन से स्वीकार कराईं। वे दलितों से सदैव कहा करते थे, “शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित रहो।” वे दलितों, अनुसूचित एवं पिछड़ी जातियों को अधिकार दिलाने के लिए 6 दिसंबर, 1930 को प्रथम गोल मेज कॉन्फ्रेंस में तथा 15 अगस्त, 1931 को द्वितीय गोल मेज कॉन्फ्रेंस में भाग लेने लंदन गए थे। 27 मई, 1935 को उनकी धर्मपत्नी रामबाई का देहांत हो गया, जिससे उन्हें मानसिक आघात पहुंचा। 

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 13 अक्टूबर, 1935 को अपने धर्मांतरण की घोषणा की तथा उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। उन्होंने श्रमिकों और दलितों में चेतना जाग्रत करने तथा उन्हें सुसंगठित करने के लिए अगस्त, 1936 में ‘स्वतंत्र मजदूर दल’ की स्थापना की। उन्हें दलितों तथा शोषितों में शिक्षा का अभाव सदैव खटकता था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 20 जून, 1946 को सिद्धार्थ महाविद्यालय की स्थापना की। 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू की पारखी दृष्टि विधि विशेषज्ञ डॉ. भीमराव पर पड़ी। पं. नेहरू ने 3 अगस्त, 1947 को उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में विधि मंत्री के रूप में सम्मिलित किया तथा 21 अगस्त, 1947 को भारत की संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया। डॉ. अंबेडकर की अध्यक्षता में भारत के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी संविधान की संरचना हुई, जिसमें मानव के मौलिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा की गई। 26 जनवरी, 1950 को भारत का वह संविधान राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। 

डॉ. भीमराव अंबेडकर दिसंबर, 1954 में विश्व बौद्ध परिषद में भाग लेने रंगून गए तथा बौद्ध धर्म के नेता के रूप में नेपाल गए। 14 अक्टूबर, 1956 को डॉ. अंबेडकर बौद्ध धर्म से दीक्षित हो गए। फिर 20 नवंबर, 1956 को उन्होंने महात्मा बुद्ध और कार्ल मार्क्स पर विद्वत्तापूर्ण तथा ओजपरक ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने ‘बुद्ध और उनका धर्म’ नामक एक महान ग्रंथ की रचना भी की, जिसका समापन 5 दिसंबर, 1956 को हुआ। 

6 दिसंबर, 1956 को वह महामानव महापरिनिर्वाण को प्राप्त हो गया। सन 1990 में देश के कोने-कोने में उनकी जन्म शताब्दी के समारोह मनाए गए। मानव समाज उनका पुनीत स्मरण करके आज भी उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। उन्होंने मानव समाज को जो कुछ भी दिया, उसके प्रतिदान में समाज उन्हें कृतज्ञता भरे नेत्रों से श्रद्धावनत नमन कर रहा है। अतः देश का कल्याण चाहने वाले सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि वे भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर के बताए हुए पथ का अनुसरण करें। 

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

sixteen + 13 =