बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध |Essay on Beti Bachao Beti Padhao

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध |Essay on Beti Bachao Beti Padhao

राष्ट्र की मजबूती और विकास के लिए जहां बेटियों की पढ़ाई लिखाई और साक्षरता आवश्यक है, वहीं उनकी संरक्षा भी आवश्यक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बेटियों को पढ़ाकर और उन्हें बचाकर ही हम एक सबल और सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं। आज की बेटियां किसी से कमतर नहीं हैं। आवश्यकता उन्हें संरक्षा और शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने की है। 

राष्ट्र निर्माण एवं सामाजिक संतुलन के लिए हमारे देश में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे समग्र अभियान की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। यह सर्वविदित है कि हमारे देश में जहां लिंगानुपात की स्थिति संतोषजनक नहीं है, वहीं बालिकाओं के प्रति अनेकानेक पर्वाग्रह भी देखने को मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि बाल लिंगानपात (CSR-Child Sex Ratio) को 0 से 6 वर्ष की आयु में प्रति 1000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है। भारत में सीएसआर वर्ष 1961 में 976 पर था जो कि वर्ष 2001 में 927 और पुनः वर्ष 2011 में 919 (ग्रामीण-923; शहरी-905) पर आ गया है। यह महिला असशक्तीकरण को दर्शाने वाला चिंताजनक संकेतक है तथा यह लड़कियों के प्रति जन्म-पूर्व लिंग चयन पूर्वाग्रहों और जन्म के पश्चात भी उनके प्रति भेदभाव को दर्शाता है। 

वस्तुतः लगभग सभी भारतीय समुदायों में सुदृढ़ सामाजिक सांस्कृतिक पूर्वाग्रह, पुत्र के लिए वरीयता और बेटियों के प्रति भेदभाव ही समस्या का मूल कारण है। दहेज के सामाजिक मानक, पितृसत्तात्मक सोच, पुत्र द्वारा अंतिम संस्कार और संपत्ति में केवल पुत्र का उत्तराधिकार होना आदि लैंगिक भेदभाव और हिंसा को उत्पन्न करते हैं। साथ ही जन्म-पूर्व लिंग चयन और बालिका शिशु भ्रूण हत्या के लिए नैदानिक चिकित्सकीय सुविधाओं की सख कानून के बावजूद सरलता से उपलब्धता ने गिरते बाल लिंगानुपात को और कम करने में सहायता की है। 

उपर्युक्त तथ्यों के संदर्भ में ही 22 जनवरी, 2015 को देश के प्रधानमंत्री द्वारा केंद्र सरकार के सामाजिक क्षेत्र के पुनरोत्थान के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का राष्ट्रीय अभियान के रूप में शुभारंभ किया गया। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना एक साथ देश के अल्प (खराब) बाल लिंगानुपात (जहां लड़कियों की जनसंख्या का लड़कों की जनसंख्या से अनुपात काफी कम है) वाले 100 जिलों में प्रारंभ की गई थी जिसमें हरियाणा (जहां बाल लिंगानुपात 834 के स्तर पर देश में सबसे कम है) के सर्वाधिक 12 जिले (महेंद्रगढ़-जो न्यूनतम बाल लिंगानुपात 775 वाला जिला है, झज्जर, सोनीपत, रेवाड़ी, अम्बाला, कुरुक्षेत्र, रोहतक, करनाल, यमुनानगर, कैथल, भिवानी और पानीपत) शामिल हैं। इस योजना में पंजाब के 11 जिले, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र के 10 10 जिले, जम्मू एवं कश्मीर, दिल्ली और गुजरात के 5-5 जिले, मध्य प्रदेश के 4 जिले, उत्तराखंड के 2 जिले तथा शेष सभी राज्यों एवं संघीय क्षेत्रों के एक-एक जिले शामिल थे। इस योजना में शामिल उत्तर प्रदेश के जिले थे—बागपत (प्रदेश में सबसे कम बाल लिंगानुपात 841), गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, आगरा, मुजफ्फरनगर, हाथरस (पूर्व नाम- महामाया नगर), झांसी एवं मथुरा (2011 जनगणना के तहत उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रदेश के न्यूनतम बाल लिंगानुपात वाले जिले)। ध्यातव्य है कि 8 मार्च, 2018 को बाल लिंगानुपात में अच्छा प्रदर्शन करने वाले 10 जिलों का चयन किया गया जिसमें राजस्थान का झुंझुनू ने पहला स्थान हासिल किया। इसी दिन इस योजना को देश के सभी 600 जिलों में विस्तार करने की घोषणा की गई थी। 

इस अभियान के समग्र लक्ष्य एवं उद्देश्यों में जहां बालिका शिश के जन्म पर खशी एवं उत्सव मनाने का प्रावधान किया गया है. वहीं बालिका की उत्तरजीविता और संरक्षण सुनिश्चित करने का भी प्रावधान किया गया है। अभियान के तहत बालिका शिशु भ्रूण हत्या की रोकथाम के प्रभावी उपाय किए गए हैं, तो बालिका की शिक्षा एवं सशक्तीकरण को भी सुनिश्चित किया गया है। इस अभियान के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने, उन्हें सम्मान दिलाने तथा अवसरों में वृद्धि करने हेतु प्रयासों को उन्नयित एवं संवर्धित किया जाएगा। यह अभियान केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा मानव संसाधन मंत्रालय की एक संयुक्त पहल है। एक अच्छी बात यह भी है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के तहत बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके विवाह के लिए ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ नाम से एक राष्ट्रीय लघु बचत योजना का शुभारंभ भी 22 जनवरी, 2015 को किया जा चुका है। इस अभियान से जुड़ी यह पहल भी बालिकाओं के सशक्तीकरण से अभिप्रेत है।

अभियान के तहत महत्त्वपूर्ण पहलें हो रही हैं, ताकि इसे शत प्रतिशत सफल बनाया जा सके। इस अभियान के क्रियान्वयन में धन की कमी आईर आए इस बात को ध्यान में रखकर वर्ष 2010 के मजर में इसके लिए 200 करोड़ रूपए का बजट निर्धारित किया गया है। वर्ष 2017-18 के बजट में यह राशि 200 करोड़ रूपए थी। इस कार्यक्रम के तहत जनजागरूकता के विस्तार हेत महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर ग्राम स्तर तक गुद्धी गुना बोर्ड के पारा सत्य से संबंधित सौगक (बालक बालिका) आकड़ों को दर्शाया जाएगा और जन्म के समय लिंगानुपात का विवरण प्रचारित किया जाएगा। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना के तहत जनसामान्य को अपनी पुत्रियों पर गर्व करने और पराया धन की मानसिकता का विरोध करने लड़को और लड़कियों के बीच समानता को बढ़ावा देने, हरची का स्कूत में दाखिला और उसकी पढ़ाई बरकरार रखना सानिक्षित करने परुषों और सडको को लैगिक रहिवादी सोच एवं भूमिकामों को चुनौती देने, लिंग निर्धारण परीक्षण की किसी भी घटना की सूचना देने, अपने आस-पड़ोस को महिलाओं एवं लड़कियों के लिए सुरक्षित और हिंसा मुक्त बनाने, बाल-विवाह और दहेज प्रथा का ददता से विरोध करने और साधारण रूप से विवाहों की वकालत करने तथा महिलाओं के सम्पत्ति के स्वामित्व एवं उत्तराधिकार के 

इस देशव्यापी अभियान के तहत ‘गर्भाधान-पूर्व एवं प्रसव-पूर्व नैदानिक तकनीके (लिग चयन का प्रतिषेध) अधिनियम |Pr-Con ception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (Prohibi tion of Sor Selection) Act, 1994 के सुदृढ़ क्रियान्वयन सहित सभी तत्संबंधी विधायनों एवं अधिनियमों को कड़े दंडों के साथ सती से लागू करने पर जोर दिया जाएगा।

जनवरी, 2019 में हरियाणा के तीन जितो झइझर, करनात तथा कुरुक्षेत्र को इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन हेतु पुरस्कार प्रदान किये गये। 

बालिका शिशु के प्रति लोगों में धनात्मक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से परिकल्पित इस योजना के प्रारंभ से पूर्व इसके व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु 15 जनवरी, 2015 को सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी स्कूलों में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के केंद्रीय विषयों पर निबंध, स्लोगन एवं पेंटिंग प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, हरियाणा के 12 अल्प सीएसआर जिलों में 17-19 जनवरी, 2015 के मध्य ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ यात्राएं निकाली गईं तथा 20-21 जनवरी, 2015 के दौरान महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा हरियाणा सरकार के सहयोग से पानीपत में ‘नवदिशा’ (NAVDISHA: National Thematic Workshop on Best Prac tices for Women and Child Development) नामक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। 

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान अपने अभीष्ट पर पहुंचे, इसके लिए यह आवश्यक है कि इसे जनसहयोग भी प्राप्त हो। सरकारी प्रयास भी तभी फलीभूत होंगे, जब जनता की उनमें सक्रिय भागीदारी हो। इसके लिए पहली आवश्यक शर्त तो यह है कि हर धर्म, सम्प्रदाय एवं वर्ग के लोग बेटियों के प्रति अपनी सोच में बदलाव लाएं। वे बेटियों को बोझ न समझें तथा बेटों से बढ़कर उनकी परवरिश करें तथा शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करें। उनकी सुरक्षा और संरक्षा का पूरा ध्यान रखें तथा किसी भी प्रकार का भेदभाव उनके साथ न करें। 

जब बेटियां बढ़ेगी, तभी भारत बढ़ेगा। बेटियों को बचाकर, उन्हें सुशिक्षित बनाकर जहां हम देश को विकास के रास्ते पर आगे ले जा सकते हैं, वहीं एक संतुलित समाज की स्थापना कर सकते हैं। बेटियों से जड़े जिन विविथ नकारात्मक कारणों से हमारी वैश्विक छवि धूमिल हो रही है, उससे भी हम उबर सकेंगे और भारत सशक्त बेटियों का देश कहलाएगा। 

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