रुपये की आत्मकथा पर निबंध | Essay on Autobiography of Money in Hindi

पैसे की रामकहानी

रुपये की आत्मकथा पर निबंध | Essay on Autobiography of Money in Hindi

 जी, मैं पैसा हूँ। किसी सुहागिन के माथे की बिंदी के सदृश मनोमोहक, स्वस्तिक-चिह्न के सदृश शुभसूचक, पाटल की पंखुड़ी की तरह अनुरंजक! आप मेरी रामकहानी सुनना चाहते हैं, मेरे बाप-दादे की नहीं, इसीलिए मैं अपनी वंशावली का खाका न खींचकर, अपने वंशवृक्ष की तफसील में आपको न उलझाकर, अपनी रामकहानी ही सुना रहा हूँ। 

आप मेरे अतिलघु रूप को देखकर मुझे अकिंचन न समझें, मुझपर तिरस्कार का शरसंधान न करें, मुझे दुत्कार का अर्धचंद्र न दें। वस्तुतः, मुझ वामन का ही विराट रूप वह है, जिसे आप ‘रुपया’ नाम से पुकारते हैं। वस्तुतः मैं ही महतो महीयान् धनरूपी भगवान का अणोरणीयान् रूप हूँ, सागरोल्लंघी भीमाकार विक्रम-बजरंगी का सूक्ष्म रूप हूँ, जो उन्होंने सागरनिवासिनी निशाचरी को धोखे में डालने के लिए धारण किया था। मैं ही संपत्तिरूपी सर्वेश्वरी का आज्ञाकारी अनुचर हूँ, मैं ही वह व्यष्टि रूप बूंद हूँ, जिसका समष्टि रूप ऐश्वर्य महासागर का सर्जन करता है। 

जी, मेरा यह वरद रूप मुझे यों ही नहीं मिला है। इसके लिए मैंने जितनी कठोर साधना की है, जितनी लंबी तपस्या की है, उतना शायद अपर्णा ने भूतभावन भोलानाथ की प्राप्ति के लिए की होगी, देवेंद्र ने दुर्लभ इंद्रासन पाने के लिए की होगी, ध्रुव ने विभु-साक्षात्कार के लिए की होगी। जी, इस सर्वाकर्षक रूप को पाने के लिए मैं तपस्वियों की तरह पंचाग्नि में तपा हूँ, अपनी शुद्धता का अभिसाक्ष्य देने के लिए जगजननी सीता की तरह मैंने अग्निपरीक्षा दी है, निष्ठुर लौहयंत्रों में दबाव की यातुधान-यातना सही है। मैंने मीरा की तरह सूली का उपहार पाया है, शम्स तबरेज की तरह अपनी खाल खिंचवाकर ही अमरत्व का आशीर्वाद पाया है। 

सरकारी यंत्रालय में भारत-सरकार ने मेरे सीने पर सारनाथ-स्तूपवाले सिंहचिह्न दाग दिया। मैंने उसी प्रकार उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया, जिस प्रकार विष्णु भगवान ने अपने वक्षःस्थल पर भगुचरण को अंकित कर लिया था। इसपर उसने ‘भारत : रुपये का सौवाँ हिस्सा’ राष्ट्रभाषा हिंदी में लिखा, सो तो मुझे अँचा, किंतु अँगरेजी में, ‘इंडिया’ क्यों लिख दिया, समझ नहीं पाता। अँगरेज तो चले गए, किंतु उनका भूत भारत सरकार को अब भी नहीं छोड़ रहा। मेरे गले विजातीय भाषा का यह ताबीज कितना जानमारू है, कितना अपमानजनक है, कितना देश-प्रेमविघातक है कि क्या बताऊँ? 

खैर ! जब मैं टकसाल से निकला, तब दिग्विजय के अश्व की तरह सारे संसार की परिक्रमा कर गया। किसी का साहस न हुआ कि वह मेरे विजय-अभियान में व्यवधान बन उपस्थित हो। इतना ही नहीं, मैं जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ मेरा भव्य स्वागत हुआ। मेरे पाँव जिधर-जिधर पड़े, उधर-उधर मेरा शिरसा नमन किया गया। मैं अभावों के अंधकार से घिरे जिस घर में पहुँचा, वहीं दीवाली जगमगा उठी, निराशा के परदे से ढके जिस हाट पर गया, वहीं होली की मस्ती छा गई। किसी ने मुझे अपने सीने में चिपकाया, किसी ने मुझे अपनी गर्म मुट्ठियों में भींचा। साधारण लोगों की बात कौन कहे, कभी मैंने भगवान काशी विश्वनाथ के चरणों का निवास पाया, कभी मैं उज्जैन के महाकालेश्वर के सिर पर चढ़ा, कभी काठमांडू के पशुपतिनाथ का सान्निध्य प्राप्त किया, कभी तिरुपति के व्यंकटेश्वर स्वामी के दर्शन का साधन बना, कभी पुरी के जगन्नाथजी के महाप्रसाद का उपकरण बना, तो कभी बदरीनाथ की दुर्गम चढ़ाइयों का सहारा बना। __जहाँ मैं पहुँचता, वहीं सभी मुझे अपने प्रणयपाश में बाँध लेना चाहते, सभी मुझपर अपना अनन्य प्रेम बरसाते कि मैं केवल उन्हीं का होऊँ-केवल उन्हीं का। सब मुझे अपनी स्नेह-बोझिल निगाहों में गिरफ्तार कर लेना चाहते। भिखारी मुझे अपनी झोली में बंद कर लेना चाहता, किसान मुझे अपने बटुए में दबा लेना चाहता, धनसेठ मुझे अपने सेफों में रख लेना चाहता, मक्खीचूस अपनी तहखानों में डाल देना चाहता, टाई-पैंटवाला छैल छबीला अपनी नितंबवाली जेब में घुसेड़ लेना चाहता, तो सोसाइटी गर्ल अपने वैनिटी बैग में खिसका लेना चाहती। श्रीराम को तुलसी जैसे विरले भक्तों का अनन्य प्रेम भले मिला हो, किंतु मेरे अनन्य भक्तों की संख्या संसार में जितनी है, उसकी गणना भी संभव नहीं। लगता है, मेरी वंदना में ही यह श्लोक रचा गया है 

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

 त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव 

त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥

मेरे लिए त्याग की प्रतियोगिता छिड़ गई। मेरे लिए किसी ने ईमान छोड़ा, तो किसी ने सम्मान, किसी ने भगवान छोड़ा, तो किसी ने घर, किसी ने खेत छोड़ा, तो किसी ने खलिहान, किसी ने मैदान छोड़ा, तो किसी ने दूकान, किसी ने ज्ञान छोड़ा, तो किसी ने विज्ञान, किसी ने सच्चा साहित्य छोड़ा, तो किसी ने शुद्ध संगीत। भाई ने भाई को, तो बाप ने बेटे को, भाई ने बहन को, पत्नी ने पति को, शिष्य ने गुरु को, गुरु ने शिष्य को, मित्र ने मित्र को, गृहस्थ ने अतिथि को, महंथ ने संत को, विधायक ने दल को और उच्चाधिकारी ने पद को छोड़ा। किस-किस की बात आपको सुनाऊँ? किंत, आप विश्वास मानिए, मैंने किसी को छोड़ने के लिए, किसी से संबंध तोड़ने के लिए कभी किसी को प्रोत्साहित नहीं किया। 

मेरे बल पर मंदिर भी बने-मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे भी। मेरे कारण विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय-सभी खुले। मेरे कारण जलाशय बने, अनाथालय बने, औषधालय बने। मेरे कारण भूखों की भूख मिटी, बीमारों की जान बची। अलबत्ता, यह बात दूसरी है कि कितनों की जान भी गई है मेरे कारण । राहजनी, पॉकेटमारी, लूट-खसोट, चोरी-डकैती की बात छोड़िए, मेरे कारण संसार में न मालूम कितने रोमांचक महायुद्ध हुए हैं, शायद आप नहीं जानते। भयानक महायुद्धों के पीछे 

मैं न होऊँ, तो कौन हो? __ जी, मैं ही किसी राष्ट्र का जीवनरक्त हूँ, मैं ही किसी साधक का प्रेरणास्रोत हूँ, मैं ही महान आविष्कारों का महामंत्र हूँ। मैं बुढ़ापे में जवानी की ताजगी लाता हूँ, शांत शिराओं में मकरध्वज की ऊष्मा उड़ेलता हूँ। मुझसे ही अकुलीन कुलीन बनते हैं और अपूजनीय पूजनीय बनते हैं, मुझसे ही धर्म होता है और धर्म से ही सुखोपलब्धि होती है। मैं ही आपत्सिंधु में त्राणदायक जलयान बनता हूँ। मेरे कारण ही मनुष्य पंडित, गुणज्ञ, बहुश्रुत, सुवक्ता और सुदर्शन कहलाते हैं। 

हाँ, लेकिन एक बात के लिए खबरदार भी कर रहा हूँ कि मेरी तीन ही गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। मैं जब आपके पास होऊँ, तो खुलकर मेरा भोग कीजिए, खुलकर दान कीजिए। मुझे ही द्रव्य कहा गया है–सचमुच मैं द्रवणशील हूँ, अर्थात् बहना ही मेरा स्वभाव है। यदि आप मुझे रोककर रखेंगे, तो अवरुद्ध जल-प्रवाह की भाँति दुर्गंध उत्पन्न करूँगा। विनोबाजी ने ठीक ही कहा है कि मेरा खेल फुटबॉल की तरह होना चाहिए। गेंद को कोई अपने पास नहीं रखता। वह जिसके पास पहुँचता है, वही उसे फेंक देता है। पैसे की, अर्थात् मुझे भी इसी तरह फेंकते जाइए, तो समाज-शरीर में उसका प्रवाह बहता रहेगा और समाज नीरोग रहेगा। मुझे अपने पास संचित कर रखिएगा, तो वही हाल होगा, जो पानी भर जानेवाली नाव का होता है। अच्छा हो, आप सयाने लोग दोनों हाथ मुझे उलीचते चलिए 

पानी बाढ़ो नाव में, घर में बाढ़ो दाम।

दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।।  -कबीर 

किंतु, इतना ही नहीं कि रेलवे की टिकट-खिड़की पर पैसे नहीं रहने के कारण आपको अपनी यात्रा स्थगित कर देनी पड़े या पोस्ट ऑफिस के दरवाजे से निराश लौटकर आपको अपने मोहन के पास पाती भेजने से वंचित रह जाना पड़े। यदि मेरी रामकहानी आपको भा जाए, प्रेरणा की कोई चिनगारी मुझसे आपको मिल जाए, तो मैं फिलहाल अपने समय का सदुपयोग मानूँगा। 

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