अटल बिहारी वाजपेई और उनका सुशासन मॉडल | अटल बिहारी वाजपेयी पर निबंध

अटल बिहारी वाजपेई और उनका सुशासन मॉडल

अटल बिहारी वाजपेई और उनका सुशासन मॉडल | अटल बिहारी वाजपेयी पर निबंध

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोककर वह खड़ी हो गई, यूँ लगा जिन्दगी से बड़ी हो गई। -अटल बिहारी वाजपेई

16 अगस्त, 2018 को तेजस्विता का प्रखर सूर्य अस्त हो गया। भारत रत्न से अलंकृत देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई हमें छोड़कर चले गए। 25 दिसंबर, 1924 को ग्वालियर (म. प्र.) में जन्मे इस तेजस्विता के सूर्य ने न सिर्फ अपनी आभा से भारत के गौरव को बढ़ाया, बल्कि सुशासन को धार देकर देश के विकास को गति और लय प्रदान की। 

राष्ट्र सेवा के मूल्यों से लबरेज अटल बिहारी वाजपेई का सारा जीवन राष्ट्र सेवा में बीता और इस दौरान उन्होंने जहाँ हर स्तर से राष्ट्र के विकास की बातें कीं, वहीं भारत के विकास को नजदीक से देख भी। उन्होंने राष्ट्र सेवा का व्रत लिया और सक्रिय राजनीति में रहते हुए सदैव राष्ट्र के प्रति समर्पित रहे। 16 वर्ष की आयु में ही वह भारतीय जनसंघ से जुड़कर देश की राजनीति में सक्रिय हुए और नित नई ऊँचाइयों पर पहुँने। अटल जी ने लोकसभा में दस बार संसद सदस्य के तौर पर सेवा की और अपने राजनीतिक कार्यकाल के दौरान दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए। वाजपेई जी ने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर देश की सेवा की। पहली बार 1996 म केवल 13 दिनों के लिए, दूसरी बार 1998-99 में 13 महीनों के लिए और तीसरी बार 1999 से 2004 तक एक पूर्ण कार्यकाल के लिए उन्होंने देश की सेवा की। 

अटल जी की यह विशेषता थी कि उन्होंने राजनीति को मूल्यों और भारतीय परंपराओं से जोड़ते हुए सुशासन की बुनियाद रखी, ताकि पारदर्शी, प्रभावशाली और जवाबदेह शासन व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। सुशासन से अभिप्राय एक विकासोन्मुख, पारदर्शी और सेवाओं की शीघ्रता से एवं आसानी से सुपुर्दगी पर आधारित सरकार से है। 

प्रधानमंत्री के रूप में अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान अटल जी सुशासन के प्रति मुखर रहे। 7 सितंबर, 2000 को न्यूयार्क में ‘एशिया सोसाइटी’ में दिए अपने भाषण में उन्होंने सुशासन के बुनियादी विचार को इस प्रकार सामने रखा-“व्यक्ति के सशक्तिकरण का अर्थ है राष्ट्र का सशक्तिकरण और सशक्तिकरण तीव्र सामाजिक बदलाव के साथ तीव्र आर्थिक वृद्धि से किया जा सकता है।” उनका सुशासन देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उन्नयन के लिए प्रतिबद्ध था। यही कारण है कि ‘एशिया सोसाइटी’ में दिए अपने भाषण में उन्होंने व्यक्ति के सशक्तिकरण पर बल दिया। 

अपने कार्यकाल के दौरान अटल जी ने जिन बातों पर विशेष बल दिया, वे सभी सुशासन से ही जुड़ी हैं। उनका पूरा ध्यान उस पारदर्शी एवं जिम्मेदार प्रशासन के निर्माण पर केन्द्रित रहा जिसमें आम आदमी का कल्याण सुनिश्चित हो। सुशासन के लिए उन्होंने अच्छी और प्रभावी नीतियों पर बल दिया, ताकि लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्त पारदर्शी प्रशासन उपलब्ध कराया जा सके तथा देश में वृद्धि | और विकास को प्रोत्साहित किया जा सके। सुशासन के अपने मॉडल । में अटल जी ने सदैव शासन प्रक्रिया में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर विशेष जोर दिया, ताकि एक पारदर्शी और जवाबदेह शासन व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। वह इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि सत्ताधारी दल को निष्पक्ष और विकासोन्मुख होना चाहिए तथा विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचना चाहिए। विद्रूपताओं, विसंगतियों, असत्य और अन्याय के विरुद्ध उनमें सदैव प्रतिकार रहा और उनसे लड़ते हुए उन्होंने सुशासन को धार देने के प्रयास किए। उन्होंने विपरीत चलने वाली हवाओं से कभी हार नहीं मानी। यही बात उनकी इस कविता में ध्वनित होती है 

सत्य का संघर्ष सत्ता से

न्याय लड़ता निरंकुशता से 

अंधेरे ने दी चुनौती है

किरण अंतिम अस्त होती है

दीप निष्ठा का लिए निष्कंप

वज़ टूटे या उठे भूकंप

किंतु फिर भी जूटाने का प्रण 

अंगद ने बढ़ाया चरण

प्राण-प्रण से करेंगे प्रतिकार

दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते 

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते। 

अटल जी का सुशासन मॉडल अत्यंत सफल रहा। वाजपेई के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भारत ने आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर अपनी सबसे तीव्र वृद्धियों में से एक को महसूस किया। वह आर्थिक सुधारों की शुरूआत करके देश को नई ऊंचाइयों पर ले गए। वर्ष 1998 से 2004 तक उनके कार्यकाल के दौरान भारत ने सकल घरेलू उत्पाद की दर आठ प्रतिशत बनाए रखी, वहीं मॅहगाई दर चार प्रतिशत के भीतर बनी रही। विदेशी मुद्रा के भंडार में वृद्धि हुई। व्यवसायों और उद्योगों के संचालन में सरकारी भूमिका कम करने की उनकी प्रतिबद्धता एक अलग विनिवेश मंत्रालय बनाए जाने के तौर पर परिलक्षित होती थी। उन्होंन ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम’ लागू करवाया, जिसका उद्देश्य वित्तीय घाटे को नीचे लाना था। 

अटल जी क कुशल और दूरदर्शी मार्गदर्शन में संचालित सुधार कार्यक्रमों के कारण सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का सशक्त रूप से उदय हुआ। उनकी सरकार की नई दूर संचार नीति ने राजस्व हिस्सेदारी व्यवस्था के साथ दूर संचार कंपनियों के लिए नियत लाइसेंस फीस को बदलकर भारत में दूर संचार क्रांति का सूत्रपात किया। 

आम आदमी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए उन्होंने ‘अंत्योदय अन्न योजना शुरू करवाई, ताकि गरीबों को सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध हो। 

अटल जी के सुशासन मॉडल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उनकी सड़क परियोजनाओं को रेखांकित किया जा सकता है। उन्होंने ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ और ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ के माध्यम से देश में सड़क क्रांति ला दी। स्वर्णिम चतर्भज राजमार्गों के नेटवर्क के जरिए चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोड़ता है, तो दूसरी तरफ ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ से विकास से कटे सम्पर्क रहित गाँवों को सड़कें मिलीं और ये गाँव मुख्य सड़कों से जडे। इसका सबसे अधिक लाभ उन किसानों को मिला, जिनकी उपज सड़क सम्पर्क न होने के कारण समय से मंडियों तक नहीं पहुँच पाती थीं। 

यह अटल जी के सुशासन मॉडल का ही प्रभाव है कि वर्ष 2014 में उनके 90वें जन्मदिन को वर्तमान सरकार द्वारा ‘सशासन दिवस’ के रूप में हर साल मनाए जाने की घोषणा की गई। उनके जन्म दिन को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाया जाना यह इंगित करता है कि वह सुशासन के प्रबल पैरोकार थे और देश को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए इसे आवश्यक मानते थे। 

अटल जी ने अपने सुशासन से भारत को एक मजबूत आधार प्रदान किया और देश के स्वर्णिम भविष्य की आधारशिला रखी। आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के जरिए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को सार्थकता और जीवंतता प्रदान की। उनके राष्ट्र केंद्रित नेतृत्व ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को कुछ इस तरह से बदला कि उनको चाहने वालों की संख्या अनगिनत हो गई और उनके आलोचकों का सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि और ख्याति बहत कम नेता ही प्राप्त कर पाते हैं। भारत का यह जननायक सब को साथ लेकर चला और बाधाओं से कभी विचलित नहीं हुआ। प्रस्तुत हैं, उनके इसी जज्बे को अभिव्यक्त करती उनकी कविता की ये प्रेरक पंक्तियाँ- 

बाधाएं आती हैं आएं घिरें

प्रलय की घोर घटाएं

पावों के नीचे अंगारे

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं

निज हाथों में हंसते-हंसते 

आग लगाकर जलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा।

जीवन को शत-शत आहुति में जलना होगा,

ललना होगा कदम मिलाकर चलना होगा। 

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