एशियाई सदी पर निबंध |Essay on Asian Century

एशियाई सदी पर निबंध

एशियाई सदी पर निबंध |Essay on Asian Century

जिस कालखण्ड में कोई महाद्वीप विश्व मंच पर केंद्रीय भूमिका निभाता है, वह कालखण्ड, वह सदी उसके नाम से जानी जाती है। जैसे, प्रायः हर दृष्टि से, हर अर्थ से 16वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक यूरोप विश्व मंच पर केन्द्रीय भूमिका में रहा और ये सदियां यूरोपीय सदियों के रूप में अभिहित की गईं। 20वीं सदी के प्रारंभ में प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोप कमजोर पड़ने लगा और विश्व मंच पर केन्द्रीय भूमिका नहीं निभा पाया। इस बीच विश्वमंच पर एशिया की केन्द्रीय भूमिका की संभावनाओं को ध्यान में रख कर जहां एशियाई सदी के रूप में 21वीं सदी की परिकल्पना की गई, वहीं इस दौरान जिस तरह से एशियाई देशों में असाधारण रूप से राष्ट्रोपरि महाद्वीपीय लगाव का रुझान देखने को मिला, उससे इस परिकल्पना को बल भी मिला। एशियाई देशों में ‘साझा आधार, नया विस्तार’ की विकसित हुई अवधारणा से तो मानो इस परिकल्पना को पंख लग गए कि 21वीं सदी, एशियाई सदी है। 

यदि एशियाई सदी के रूप में 21वीं सदी की परिकल्पना की गई है, तो यह कोई थोथी परिकल्पना नहीं है। इसके पीछे कुछ ठोस आधार हैं। एशिया संसार में क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों दृष्टियों से सबसे बड़ा महादेश है। इस सर्वाधिक जनसंख्या वाले महादेश में विश्व की लगभग 60% जनसंख्या निवास करती है तथा इसका क्षेत्रफल समूचे विश्व के भू-भाग का लगभग 30% है। दुनिया के इस सबसे बड़े महाद्वीप (क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों दृष्टियों से) में जहां सर्वाधिक सांस्कृतिक विविधता है, वहीं अनेक प्राचीन धर्म यहीं उद्गमित हुए। अनेक प्राचीन सभ्यताएं यहीं पुष्पित-पल्लवित हुईं, तो वैचारिक एवं दार्शनिक स्तरों पर यह महाद्वीप अत्यंत सम्पन्न और समृद्ध रहा। इन पारम्परिक तत्त्वों के अलावा यह भी सच है कि एशिया में वैसी यूरोप जैसी प्रतिद्वंद्विता नहीं विकसित हुई, जैसी इंग्लैण्ड और फ्रांस तथा फ्रांस और जर्मनी के बारे में सदियों तक चलती रही थी और जिस कारण दो-दो विश्व युद्ध हुए। एशिया में प्रतिद्वंद्विताएं भौगोलिक देशों के अंदर ही चलती रहीं। एशिया के दो सबसे बड़े देशों में आज कुछ प्रतिद्वंद्विता अवश्य दिख रही है, किंतु एशियाई अस्मिता को लेकर दोनों देशों में जो विश्व दृष्टि विकसित हुई है, इसमें जबरदस्त साम्य है। एशियाई देश न सिर्फ परस्पर करीब आ रहे हैं, बल्कि उनमें एक-दूसरे की सहायता और सह-अनुभूति का जज्बा भी बढ़ा है। 

यदि एशियाई सदी के रूप में 21वीं सदी की परिकल्पना की गई है, तो यह कोई थोथी परिकल्पना नहीं है। इसके पीछे कुछ ठोस आधार हैं। एशिया संसार में क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों दृष्टियों से सबसे बड़ा महादेश है। इस सर्वाधिक जनसंख्या वाले महादेश में विश्व की लगभग 60% जनसंख्या निवास करती है तथा इसका क्षेत्रफल समूचे विश्व के भू-भाग का लगभग 30% है। 

एशिया यदि विश्व मंच पर 21 वीं सदी में केंद्रीय भूमिका निभाने को बेताब दिख रहा है, तो इसमें भारत और चीन जैसे संभावना सम्पन्न देशों का बड़ा योगदान हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत और चीन दोनों उभरती हुई शक्तियां हैं और दोनों ही एशियाई सदी का सपना पूरा करने को कटिबद्ध भी हैं। दोनों देश विश्व मंच पर एशियाई वर्चस्व के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर न सिर्फ एकजुट दिख रहे हैं, बल्कि साझा आधार को विस्तार देने की दिशा में प्रयत्नशील भी हैं। यह अकारण नहीं है कि ये दोनों देश जहां मतभेदों को न्यूनतम स्तर पर लाना चाहते हैं, वहीं सहमतियों को अधिकतम विस्तार देना चाहते हैं। इस आकांक्षा का केन्द्र साझी एशियाई अस्मिता ही है। भारत और चीन दोनों महाशक्तियां है और दोनों ही 21वीं सदी में विश्व मंच पर एक अहम व रचनात्मक भमिका निभाने को उद्यत दिख रही हैं। दूसरी तरफ तकनीक के विशाल आधार वाले देश जापान की भी अहम भूमिका एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करने में हो सकती है। 

एशियाई सदी का सपना साकार करने के लिए जहां भारत और चीन की जुगलबंदी आवश्यक है, वहीं यह भी आवश्यक है कि समस्त एशियाई देश इस दिशा में आगे बढ़ें, एशियाई अस्मिता की राष्ट्रोपरि भावना विकसित करें। इसके लिए एशियाई देशों को परस्पर एकजुटता, सह-अनुभूति एवं सह-अस्तित्व की भावना विकसित करनी होगी। तभी एशिया 21वीं सदी में विश्व मंच पर निर्णायक केन्द्रीयता प्राप्त कर सकेगा। 

एशियाई सदी का सपना साकार करने के लिए एशियाई देशों की तरफ से कुछ पहले नितांत आवश्यक हैं। इसके लिए एशियाई पुत्रों को कमर कसनी होगी और समग्र प्रयास करने होंगे। एशियाई देशों में परस्परता बढ़े, इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अंतर सभ्यतागत आदान-प्रदानों का एक सुन्दर अध्याय रचें। विरासती संबंधों को नए आयाम दिए जाएं, तो आपसी समझ एवं भरोसा विकसित करने पर विशेष बल दिया जाए। 

एशियाई सदी का सपना साकार करने के लिए जहां भारत और चीन की जुगलबंदी आवश्यक है, वहीं यह भी आवश्यक है कि समस्त एशियाई देश इस दिशा में आगे बढ़ें, एशियाई अस्मिता की राष्ट्रोपरि भावना विकसित करें। 

एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करने में युवा शक्ति अप्रतिम योगदान दे सकती है। इसे ध्यान में रखकर यह आवश्यक है कि एशियाई देशों के युवकों के बीच सम्पर्क बढ़ाने पर जोर दिया जाए और उन्हें एशियाई अस्मिता के लिए प्रेरित किया जाए। युवा मेधा और शक्ति को धार देकर विश्व मंच पर एशिया की धाक जमाई जा सकती है और इसके लिए युवकों के बीच मेलजोल बढ़ाना आवश्यक है। सूचना एवं संचार के इस युग में यह काम कोई मुश्किल भी नहीं है। जब महाद्वीपीय लगाव के साथ एशियाई युवक एक मंच पर जुटेंगे, तो एशियाई वर्चस्व एवं दबदबा बढ़ना तय है। आजकल डिजिटल युग का सूत्रपात हो चुका है। ऐसे में डिजिटल मित्रता अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। डिजिटल नजदीकियों से जहां दिल की दूरियां मिटेंगी, वहीं फिल्मों व रचनात्मक कार्यक्रमों के आदान-प्रदान से बेहतर वातावरण तैयार होगा, जो कि महाद्वीपीय लगाव को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होगा। इससे परस्पर एकीकरण की भावना भी प्रबल होगी। 

एशियाई अस्मिता के अभ्युदय के लिए देशों के बीच बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। एशियाई देशों में अनेक विरासतें फैली हुई हैं, जिन्हें साझा किए जाने की आवश्यकता है। मसलन, भारत का योग और चीन की स्वास्थ्य लाभ और स्वयं सुरक्षा से जुड़ी कला ‘ताई ची’ वे विरासतें हैं, जिन्हें हम साझा कर सकते हैं। ऐसी विरासतों को साझा करने से जहां परस्पर एकजुटता बढ़ती है, वहीं इसका लाभ भी सभी को मिलता है।

एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करने के लिए नागरिक समाजों और समुदायों के बीच बेहतर तालमेल एवं जुड़ाव आवश्यक है। इसके लिए सधी हुई पहले आवश्यक हैं। नागरिक समाज को जोड़ने के लिए हमें एशियाई देशों के मध्य धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना होगा। एशिया में इसकी अपार संभावनाएं भी हैं, क्योंकि इस महाद्वीप को सभी धर्मों की ‘आद्यभूमि’ के रूप में अभिहित किया जाता है। एशियाई देशों में न सिर्फ बौद्ध धर्म के अनेक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं, बल्कि इस्लाम धर्म के भी अनेक पवित्र धर्मस्थल हैं। हिन्दू धर्म भी सिर्फ भारत और नेपाल तक ही सिमटा हुआ नहीं है, अपितु इसका विस्तार अनेक जगहों पर है। हिन्दू मंदिरों का सबसे बड़ा परिसर अंगकोरवाट (कम्बोडिया) में है, तो दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में आज भी रामकथा पर आधारित संगीत नृत्य की परंपरा है। यानी धार्मिक पर्यटन के स्तर पर एशिया अत्यंत समृद्ध है और इसे बढ़ावा देकर नागरिक समाजों के मध्य तालमेल बढ़ाया जा सकता है। सिर्फ धार्मिक पर्यटन ही नहीं, इस क्रम में हमें पर्यटन को भी बढ़ावा देना होगा। एशिया विविधताओं वाला महादेश है। ऐसे में यदि समस्त एशिया वासी पर्यटन के स्तर पर जुडें तो इससे वे अपने महादेश को जान-समझ सकेंगे, उनमें अपने महादेश के प्रति लगाव बढ़ेगा एवं एशियाई चेतना का संचार होगा। ये बातें विश्व मंच पर एशिया की केन्द्रीय भूमिका में सहायक सिद्ध हो सकती हैं। 

एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करने के लिए एशियाई देशों को एक-दूसरे का पूरक बनना होगा और इसके लिए व्यापारिक वाणिज्यिक रिश्तों को मजबूत बनाना होगा। इस क्षेत्र में असीम संभावनाएं भी हैं। इन संभावनाओं को नए आयाम देकर हम एशिया को केंद्रीय भूमिका में विश्व मंच पर ला सकते हैं। एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करने के लिए जो पहल सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सबसे ज्यादा आवश्यक है, वह यह है कि एशियाई देश आपस में रायशमारी कर वैश्विक महत्त्व के मुद्दों पर साझा रुख अपनाएं तथा एकजुटता प्रदर्शित करें। 

 वैश्विक महत्व के जो निकाय हैं, उनमें न सिर्फ एशियाई देशों का गहरा दखल होना चाहिए बल्कि इनके साथ बेहतर तालमेल भी होना चाहिए। जब वैश्विक मुद्दों पर एशियाई देशों की राय एक होगी और उनमें एकजुटता होगी तो स्वाभाविक है कि विश्व मंच पर एशिया का दबदबा बढ़ेगा और अमेरिका व उन पश्चिमी देशों का वर्चस्व कम होगा, जिनका प्रभाव संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकायों पर ज्यादा ही रहा है। 

उक्त सिद्धांतों पर आगे बढ़ कर ही एशियाई सदी के स्वप्न को साकार किया जा सकता है। यानी सैद्धांतिक स्तर पर उक्त पहले जरूरी हैं। हमें इन पर अमल करना ही होगा। हमारे पास संभावनाएं भी अपार हैं, जिन्हें उच्च आयाम देने की आवश्यकता है। हमारे पास संसाधनों की भी कमी नहीं है। जनबल भी पर्याप्त है। ऐसे में एशियाई सदी के स्वप्न को साकार करना कोई मुश्किल काम नहीं है। सुखद है कि एशिया पुत्रों में यह जज्बा दिख रहा है। मंजिल करीब है। 

एशिया का शाब्दिक अर्थ ही है ‘उदित सूर्य’। अब इस शाब्दिक अर्थ को वास्तविकता में बदलने का समय आ चुका है। यानी इस उदित सूर्य की उष्मा को समूचा विश्व महसूस करे और इसका नमन करे। इसके लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर एशियाई देशों को एक धरातल पर खड़ा होना होगा और विश्व मंच पर केंद्रीय व असरदार भूमिका के लिए राष्ट्रोपरि महाद्वीपीय हितों को वरीयता देनी होगी। यह शुरुआत होती दिख रही है और एशिया के अभ्युदय का समय अब दूर नहीं दिख रहा है। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

4 × three =