धारा 370 पर निबंध अथवा अनुच्छेद 370 का समापन पर निबंध

धारा 370 पर निबंध

धारा 370 पर निबंध अथवा अनुच्छेद 370 का समापन पर निबंध 

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान में 17 अक्टूबर, 1949 को शामिल किया गया था। जो कि एक अस्थाई उपबंध था। इस अनुच्छेद के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य को एक विशिष्ट दर्जा प्राप्त था। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर मामले में संसद को संसदीय शक्तियों को इस्तेमाल करने से रोकता था। 

अमेरिका के 40वे राष्ट्रपति ‘रोनाल्ड रीगन’ ने एक बार किसी भाषण में कहा था कि ‘एक राष्ट्र जो अपनी सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर सकता है, वह राष्ट्र नहीं है।’ भारत सरकार ने इसी वाक्य को मूलमंत्र मानते हुए कश्मीर समस्या को सुलझाने हेतु ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य से संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने (लगभग) और राज्य का विभाजन दो केन्द्र शासित क्षेत्रों जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख में करने का फैसला किया। विदित हो कि 6 अगस्त, 2019 को यह जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत हो गया। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, 31 अक्टूबर, 2019 से लागू हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि 31 अक्टूबर को ही लौहपुरुष वल्लभभाई पटेल का जन्मदिन पड़ता है। गौरतलब है कि अब राज्य में अनुच्छेद 370 (I) ही लागू रहेगा, जो संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर के लिये विधि बनाने से संबंधित है। इसी अनुच्छेद की वजह से जम्मू कश्मीर में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 तथा 360 लागू नहीं होते थे। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35 (A) जम्मू-कश्मीर विधानसभा को यह शक्ति प्रदान करता है कि राज्य विधानमंडल राज्य के स्थाई निवासियों एवं उनके अधिकारों को परिभाषित कर सकता है। यह अनुच्छेद वर्ष 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से अस्तित्व में आया। इसी अनुच्छेद में जम्मू-कश्मीर की महिलाओं की अन्य राज्यों के पुरुषों से विवाह कर लेने के पश्चात् वैधानिक स्थिति का उल्लेख था। ध्यातव्य है कि अब अनुच्छेद 35 (A) भी समाप्त हो गया है। 

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान में 17 अक्टूबर, 1949 को शामिल किया गया था। जो कि एक अस्थाई उपबंध था। इस अनुच्छेद के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य को एक विशिष्ट दर्जा प्राप्त था। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर मामले में संसद को संसदीय शक्तियों को इस्तेमाल करने से रोकता था। उल्लेखनीय है कि नवंबर 1956 में जम्मू-कश्मीर संविधान का कार्य पूर्ण हो गया एवं इसके उपरांत 26 जनवरी, 1957 को यह उपबंध राज्य में लागू कर दिया गया। 

इस अनुच्छेद के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार प्रदान किये गये थे। जिसके तहत भारत की विधायिका यानी संसद जम्मू कश्मीर के मामले में सिर्फ तीन क्षेत्रों रक्षा, विदेश एवं संचार से संबंधित क्षेत्रकों हेतु कानून बना सकती थी। इसके अतिरिक्त किसी क्षेत्र के लिये कानून बनाने हेतु केन्द्र सरकार को राज्य सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होती थी। 

उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में उल्लिखित अनुच्छेद 370 भारत के राष्ट्रपति के आदेश एवं जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सहमति से खत्म किया जा सकता था। ध्यातव्य है कि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा 26 जनवरी, 1957 को ही भंग हो चुकी थी एवं राज्य में राज्यपाल शासन था, इसलिये राष्टपति के आदेश द्वारा भी इसे समाप्त किया जा सकता है। 

6 अगस्त, 2019 को यह जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत हो गया। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, 31 अक्टूबर, 2019 से लागू हो जायेगा। 

भारत की आजादी के पश्चात् विभाजन एक त्रासदी के समान था। हिंदुस्तान की आजादी के बाद न सिर्फ भारत एवं पाकिस्तान आजाद हुए बल्कि 560 से अधिक देशी रियासतें भी आजाद हुईं। | इन रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिये एक विलयपत्र (इंस्टुमेंट ऑफ एक्सेशन) तैयार किया गया। इस लिखित दस्तावेज में वे शर्ते थीं जिनके आधार पर ये रिसायतें किसी देश में शामिल हो सकती थीं। इसी इंस्टुमेंट के द्वारा लौह पुरुष वल्लभ भाई पटेल ने 562 देशी रियासतों को भारत में मिलाया था। शुरूआत में जम्मू-कश्मीर भारत या पाकिस्तान के साथ शामिल होने को तैयार नहीं था परन्तु अक्टूबर, 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों के हमले के पश्चात् 26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह द्वारा ‘इंस्टुमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर कर दिया गया। ध्यातव्य है कि ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के जरिये अस्तित्व में आया था। उल्लेखनीय है कि इसी अधिनियम के जरिये ब्रिटिश साम्राज्य का भारत एवं पाकिस्तान में बँटवारा हुआ। इसके अतिरिक्त इसी अधिनियम में देशी रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे भारत में शामिल हो या पाकिस्तान में शामिल हो या आजाद बनी रहें। 

भारत की देशी रियासतों द्वारा आजादी का दावा ब्रिटिश राज्य द्वारा निर्गत सिद्धांत ‘पैरामाउंट सी’ सिद्धांत पर आधारित था। यह सिद्धान्त वर्ष 1813 में अस्तित्व में आया था जिसमें यह बात उल्लिखित था कि भारत की देशी रियासतें प्रत्यक्षतः ब्रिटिश क्राउन के प्रति उत्तरदायी होंगी। इसके पश्चात् इसी सिद्धांत के चलते 1947 के स्वतंत्रता अधिनियम में देशी रियासतों को आजाद रहने की भी स्वायत्तता प्रदान की गई थी। 

भारत सरकार द्वारा किये गये इस राजनीतिक निर्णय के बाद निम्नलिखित बदलाव अस्तित्व में आयेंगे- 

  • जम्मू-कश्मीर राज्य का दो केन्द्रशासित राज्यों जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजन हुआ। 
  • जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान जबकि लद्दाख में विधानसभा का प्रावधान नहीं है। 
  • जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान इस कदम के बाद निष्प्रभावी हो गया है।
  • जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की दोहरी नागरिकता समाप्त हो जायेगी।
  • जम्मू-कश्मीर सरकार का कार्यकाल अब छह वर्ष की बजाय पांच वर्ष का होगा।
  • जम्मू-कश्मीर में देश के अन्य राज्यों के लोग भी जमीन खरीद सकेंगे। अभी तक जम्मू-कश्मीर में अन्य क्षेत्रों के लोगों को वहाँ जमीन खरीदने का अधिकार नहीं था। 
  • इस कदम के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना अलग झंडा नहीं होगा। भारत का कोई भी नागरिक अब जम्मू-कश्मीर में नौकरी भी कर सकेगा।
  • जम्मू-कश्मीर की लड़कियाँ अब अन्य राज्य के किसी व्यक्ति से विवाह के पश्चात भी संपत्ति की हकदार होंगी। 
  • जम्मू-कश्मीर में अब रणवीर दंड संहिता के स्थान पर भारतीय दंड संहिता प्रभावी होगी।

किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता उसकी उन्नति एवं स्वाभिमान हेतु अति आवश्यक होती है। ध्यातव्य है कि कोई भी राष्ट्र अपने किसी भी क्षेत्र को किसी भी दुविधाजनक स्थिति में छोड़ना नहीं चाहता। चाहे वह स्पेन का कैटालोनिया हो, डेनमार्क का ग्रीनलैंड हो या भारत का जम्मू-कश्मीर राज्य हो।

संसाधन एवं सौंदर्य की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर को पूर्व का स्विट्जरलैंड कहा जाता है इसीलये सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जम्मू-कश्मीर से संबंधित एक कल्याणकारी खाका भी प्रस्तुत किया है। अतः कहा जा सकता है कि भारत का यह कदम जम्मू-कश्मीर के नागरिकों तथा शेष भारत के नागरिकों के जीवन में खुशहाली लाने वाला है। 

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