मानव जीवन में पशुओं की भागीदारी पर निबंध |Essay on animal participation in human life

मानव जीवन में पशुओं की भागीदारी पर निबंध

मानव जीवन में पशुओं की भागीदारी पर निबंध |Essay on animal participation in human life

जीवन का कोई भी पक्ष, वर्ग या क्षेत्र नहीं है जो किसी-न-किसी रूप में पशुओं की सेवाओं से सेवित न हो, उनके प्रदेयों से लाभान्वित एवं उनका भोक्ता न हो, उनकी जिसे उपयोगिता न हो. छोटे किसानों, छोटे व्यापारियों, दूध बेचने वालों, ताँगा, इक्का, बैलगाड़ी आदि हाँकने वालों की कौन कहे, नाक पर मक्खी न बैठने देने वाले बड़े-बड़े सेठ तक उनके ऋणी हैं. उनके साहचर्य से धन्य और कृतज्ञ हैं. 

यदि दूध देने वाले जानवरों से हमें दूध मिलता है, तो ऊँट, घोड़ा, खच्चर, गधा, हाथी आदि की उपयोगिता भी किसी से छिपी हुई नहीं है. यदि भेड़, चवरी गाय (याक), खरगोश से हम उनके बालों के रूप में मुलायम, शानदार और अत्यन्त भरकाने वाला ऊन पाते हैं, तो ऊँट के कड़े और बेरौनक बालों से घटिया ही सही, ठण्डक में शरीर को गर्माने वाला ऊन प्राप्त करते हैं. इसी प्रकार हाथी, घोडे, बैल, ऊँट आदि सवारी और बोझा लादने के साधन ही नहीं रहे हैं, प्रत्युत् वे युद्धकाल में योद्धा के उद्वोढा बनकर उसे युद्ध-क्षेत्र में कौशलपूर्वक लड़ाई लड़ने देने में भी सहायक सिद्ध हुए हैं. यदि हाथी से हाथीदाँत और बाघ, शेर, मृग, चीतल, साँभर, गेंडा आदि से उनकी खाल मिलती है, तो बाघ से हमें उसकी हड्डियों से बनी गठिया की दवा, गलमुच्छों से सिरदर्द की दवा और आँख के कोटरों से मिर्गी की दवा प्राप्त होती है. इसी प्रकार यदि गेंडे की नाक पर उगा सींग औषधीय गुणों से भरपूर है, तो कृष्णसार मृग से प्राप्त कस्तूरी बहुत ही हितकारी और लाभकारी है. कहाँ तक कहें यदि कुत्ते की अग्न्याशयी नलिका से हमें मधुमेह की अचूक दवा ‘इन्सुलिन’ प्राप्त होती है, तो गाय के शरीर पर हाथ फेरने से उच्च रक्तचाप में लाभ होता है, 

वर्तमान में गाय, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा, बैल, भैंसा, खच्चर, गधा, बन्दर, सुअर आदि पालतू पशुओं से भी अधिक घर-घर में कुत्ते का पाला जाना न केवल ‘स्टेटस और स्टैण्डर्ड का प्रतीक बन गया है, अपितु उसकी प्राणि-विशिष्ट विशेषताओं को समझते हुए उनका लाभ उठाने के विचार से उसे पुलिस के इंटेलीजेंस विभाग में भी प्रवेश मिल गया है. आज कुत्ता सिर्फ कुत्ता बनकर ही नहीं रह गया है, बल्कि वह ‘पुलिस इंस्पेक्टर’ बनकर चोरी-चकोरी से लेकर घातक मर्डर्स के केस खुलवाने और विस्फोटक पदार्थों को पकड़वाने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है. 

मानव-जीवन में पशुओं की भागीदारी से प्राप्त परिणाम का ही यह सुखद फल है कि विष्णु शर्मा और नारायण पण्डित पशु-आधारित शिक्षाप्रद कथाओं- ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ की रचना कर सके. इसी दृष्टि से बोधिसत्व के जीवन से सम्बन्धित पशु आधारित ‘जातक कथाएं’ भी उल्लेखनीय हैं. इसी क्रम में प्रेमचन्द की ‘कुत्ते की कहानी; सीताराम की ‘शेरनी का प्रेम’; सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ‘हाथी की पौं’ तथा एक अन्य लेखक की ‘बिल्ली के बच्चे’; पं. मन्तेयफेल की ‘जीव जगत् की कहानियाँ’; ए. एच. हाशमी की ‘जन्तुओं के विचित्र स्वभाव’: रवि लायट्र की ‘हम जीव-जन्तु’ आदि के नाम लिए जा सकते हैं शिकार कथाओं के लिए प्रसिद्ध जिम कार्बेट और श्रीराम शर्मा को कौन नहीं जानता? यहीं वे चित्रकार और मूर्तिकार भी स्मरणीय हैं जिन्होंने ‘पाषाण युग’ से लेकर आज तक की पशुओं की भागीदारी को चित्रों और मूर्तियों के रूप में साकार करते हुए अपनी उदारता का परिचय दिया है. यदि उन्होंने मानव जीवन में पशुओं की भागीदारी को सहजतया अनुभव और स्वीकार न किया होता, तो वे भला अपनी कला में उन्हें क्यों स्थान देते? 

पशुओं के प्रति मानव के लगाव का यह क्रम आज भी टूटा नहीं है तभी तो भारत सरकार की मुद्रा (सील) पर अश्व-वृषभ के साथ तीन मुख वाला शेर अंकित है. भारत का राष्ट्रीय पशु-‘बाघ’ सिक्कों पर ही नहीं, डाक टिकटों, पोस्ट कार्डो, दियासलाई की डिब्बियों पर भी देखा जा सकता है. यदि ‘राजस्थान सरकार ने अपने किसी विभाग की सील पर ऊँट का चित्र अंकित कर उसकी भागीदारी को मुखर किया है, तो ‘शिशु मन्दिरों’ ने शिशु-सिंह का मुख खोलते हुए वीर बालक भरत को दर्शाकर भारतीयों के वीरता से भरे हुए मनोरंजन के आत्मीयतापूर्ण आदि साधनों’ का संकेत देकर ‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ की प्रेरणा दी है.. 

ध्यान देने की बात यह है कि जहाँ मनोवैज्ञानिकों ने शिशुओं और बालकों के समुचित विकास में पशुओं की भागीदारी को आवश्यक मानते हुए उस पर अपने मतैक्य का ठप्पा लगा दिया है वहीं फिल्म निर्माताओं ने भी इस ओर आकृष्ट होकर सफेद हाथी’, ‘तेरी मेहरबानियाँ’, ‘मैं तेरा दुश्मन’ आदि फिल्मों के साथ टी.वी. सीरियल ‘आवर पैट्स’, ‘गुरु घण्टाल’, ‘मिक्की माउस’, ‘वाइल्ड एनीमल्स’ आदि का निर्माण करके एक प्रकार से पशुओं की मानव-जीवन में भागीदारी को ही रेखांकित करने का प्रयास किया है. यह प्रसन्नता की बात है कि कुछ विज्ञापनदाताओं और एजेन्सियों ने भी इस ओर आकर्षित होकर अपने विज्ञापनों में पशुओं को स्थान देना आरम्भ कर दिया है-रिक्रॉन, फेविकॉल, सुपर निरमा, ब्रिटानिया टाइगर बिस्कुट, कपिला पशु आहार आदि ऐसे ही विज्ञापन हैं. 

यह भी सर्वविदित तथ्य है कि ज्योतिष विज्ञान की बारह राशियों में से चार राशियाँ मेष, वृष, सिंह, मकर, विष्णु के अवतारों में से 3 अवतार-कूर्म, वाराह, नृसिंह, और अठारह पुराणों में से दो पुराण-कूर्म (कच्छप) और वाराह (सुअर) पशु आधारित ही हैं. इसी प्रकार हिन्दुओं के देवी-देवताओं के वाहन के रूप में जानवरों-चूहा, ऐरावत हाथी, नन्दी, सिंह, भैसा आदि, मुहम्मद साहब के साथ ऊँटनी और ईसा मसीह के संग भेड़ के बच्चे का होना भी इसी बात का स्पष्ट संकेत है कि चाहे वे इहलोक के हों या परलोक के, जानवरों की सहभागिता से कोई भी लोक अनादि काल से वंचित नहीं रहा है. हो भी कैसे सकता है, जबकि दीपावली पर किया जाने वाला ‘गोधन पूजन’ गाय और उसके वंश के ही संवर्धन तक सीमित न रहकर समस्त प्रकार के पालतू पशुओं से सम्बद्ध होकर उनकी वृद्धि, श्रीवृद्धि और समृद्धि का पर्याय बन गया हो. देवास (मध्य प्रदेश) में पाड़ों (जवान भैंसों) की लड़ाई, दक्षिण भारत (केरल) में ‘पोंगल’, बंगलौर में ‘व्लेज फैस्टिवल’ (ग्रामोत्सव) एवं विभिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न स्थानों पर जानवरों के नखासों (मेलों) का आयोजन क्या मानव के पशु-प्रेम और अपने लिए उनकी आवश्यकता के द्योतक नहीं है? तभी तो मानव जीवन में पशुओं की प्रभावोत्पादिनी इस सहभागिता के वर्णन लोक-कथाओं, लोकगीतों, लोकोत्सवों, लोकनृत्यों और लोकचित्रों में ही ध्वनित और चित्रित होते हुए दिखाई नहीं देते, अपितु मुहावरों, लोकोक्तियों, सूक्तियों, अलंकारों आदि में भी स्पष्टतः सुनाई देते हैं. 

चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसन्धान हेतु हम पशुओं को प्रयोग एवं परीक्षण का माध्यम बनाते हैं. 

भारतवर्ष में पशुओं को ‘पशुधन’ कहा गया है. जिसके पास जितना ही अधिक पशु धन होता था वह उतना ही अधिक समृद्धिशाली माना जाता था. इस प्रकार प्राचीन भारत में ‘पशु’ सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था का आधार था. राजा के पास गाय के अतिरिक्त हाथी, घोड़े और रथ को खींचने वाले बैल भी होते थे ये उसकी शक्ति और समृद्धि के सूचक थे. 

परन्तु आज अर्थवाद के युग में प्रतिबन्धित पशुओं के माँस की अवैध बिक्री ने धनलोलुपों के लोभ को और भी अधिक बढ़ा दिया है. आज पशुधन नृशंसों को दूसरे ढंग से धनी बनाने में भागीदारी निभा रहा है. 

पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में पशुओं की कितनी भागीदारी है, शायद हम नहीं जानते. इसीलिए तो सड़ी-गली सब्जियों, फलों, खाद्यान्नों आदि की छीलन, कतरन और फटकन आदि को हम बिना सोचे-विचारे जहाँ-तहाँ फेंक देते हैं. इन बासी और खराब खाद्य पदार्थों को यदि जानवर न खाएं तो कितनी गन्दगी हो जाएगी और उससे कितना वायु प्रदूषण बढ़ जाएगा, कोई नहीं जानता. अंधविश्वासों के कारण हमारे द्वारा नदियों और जलाशयों में बहाई जाने वाली लाशों को मगरमच्छ, घड़ियाल, एलिगेटर, कुम्भीर (कायमन), कछुआ व अन्य जल-जन्तु न खाएं तो उनका जल प्रयोग योग्य भी रह जाएगा, कौन कह सकता है. 

यदि जानवरों के गोबर से घर लीपने और उपले जलाने से रोग कीटाणुओं का नाश होता है, तो ‘गोबर गैस प्लाण्ट’ में गोबर का सदुपयोग कर प्राप्त गैस को जलाने से जहाँ ईंधन की समस्या हल होती है वहीं वायु प्रदूषण पर रोक लगने से पर्यावरण शुद्ध रहता है. 

प्राणियों की ‘भोजन श्रृंखला’ जीव और पर्यावरण सन्तुलन में बड़ी सहायक है. बाघ शेर आदि अपने शिकार का 70% ही खाते हैं, शेष को लोमड़ी, गीदड़ आदि खाकर पर्यावरण को दूषित होने से बचाते हैं. सुप्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट ने भी अपनी पुस्तकों में बाघ को पर्यावरण का सबसे बड़ा संरक्षक कहा है. जया “नर्गिस’ ने तो ‘पशुओं से प्यार’ नामक लेख में यहाँ तक लिखा है कि “पर्यावरण और उसकी सुरक्षा का चक्र जानवरों की सुरक्षा के बिना पूरा नहीं होता. अगर किसी भी जानवर की जाति या प्रजाति नष्ट होती है, तो पर्यावरण का सन्तुलन ही बिगड़ जाता है. इसका प्रभाव मनुष्य सहित समस्त जीव-जन्तु और वनस्पति जगत् पर पड़ता है.” अतः हमारा कर्तव्य है कि हम पशुओं की सुरक्षा करें. 

उपरिलिखित तथ्यों को ध्यान में रखकर ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “यदि ये पशु-पक्षी न होते तो यह दुनिया बेहद नीरस और बेजान होती. पशु-पक्षी मानव जीवन से सचमुच इतने गहरे जुड़े है कि बिना उनके मानव-अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती.” जानवरों के बिना न डेयरी उद्योग होते, न चर्म उद्योग, उनके सींगों से बनने वाले न वाद्य यंत्र, कंघे, शोपीस आदि होते, न खुरों-अंतड़ियों, रक्त आदि से बनने वाला सरेस होता और न जिलेटिन आदि. कहाँ तक कहें मानव आज जैसा भरा-पूरा मानव नहीं, छूछा मानव होता. इसीलिए डब्ल्यू डब्ल्यू. एफ ने सन् 1986 में सिसिली में अपनी रजत जयन्ती समारोह के अवसर पर दुनिया से अपील की थी कि हम अपने जीवन-सहयोगियों को नष्ट होने से रोकें.यह प्रसन्नता की बात है कि डब्ल्यू डब्ल्यू. एफ.ने लगभग 150 देशों में 4000 से भी अधिक परियोजनाएं प्रारम्भ की हैं. जिनमें से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ को अपूर्व सफलता मिली है. 

‘इंडियन वाइल्ड लाइफ बोर्ड’ की सिफारिश पर भारत सरकार ने सन् 1972 में ‘वन्य जीव संरक्षण अधिनियम’ पारित किया. उसमें कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए, जैसे-सभी वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध, केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण का गठन, 

अभयारण्यों के आस-पास के सभी पशुओं को अनिवार्य रूप से टीका लगाना, आयातित हाथी-दाँत के देशी व्यापार पर रोक आदि. 

समस्त विश्व के साथ हमारी सरकार भी वन्य जीवों के संरक्षण के प्रति जागरूक और प्रयत्नवान है. इसके लिए प्रतिवर्ष अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में ‘वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह’ भी मनाया जाता है तथापि वह प्रतिफल देखने में नहीं आ रहा है, जिसकी आशा की जाती थी. यही कारण है कि हिमालय में पाए जाने वाले हिमबाघों (पैंथर अलसिया) को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ‘दुर्लभतम वन्य प्राणी’ घोषित करने के बाद भी भारत सरकार द्वारा उनके संरक्षण के लिए कोई योजना तैयार नहीं की गई है. 

केन्द्र सरकार ने ‘पशुधन विकास बोर्ड’ की स्थापना हेतु डेढ़ अरब रुपयों का प्रावधान किया है. 

तनाव, अवसाद, विषाद, शोक, निराशा आदि को दूर करने वाले पशु-सम्बद्ध ऐसे-ऐसे मनमोहक दृश्य, रोचक समाचार एवं खूबसूरत प्रमाण देखने और पढ़ने को मिल जाएंगे जिनसे मानव-जीवन में पशुओं की भागीदारी पर कटिया की तरह लटकाया गया प्रश्न स्वतः ही हल हो जाएगा. ऐसा होते ही कहीं इहलोक के दृश्यों में पतिगृह को जाती हुई शकुन्तला का वस्त्र खींचता हुआ उसके द्वारा पालित मृग-शावक दिखाई देगा, तो कहीं गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले वीर शिवाजी से अपना दूध दुहाती हुई शेरनी दृष्टिगोचर होगी, कहीं रूसी मनोवैज्ञानिक ब्लाडीमीर ड्यूरोव की आँखों से उसकी मनोभावनाओं को जानकर उसकी इच्छानुसार करतब दिखाते हुए विभिन्न जानवर दृष्टिगत होंगे, तो कहीं बछड़े को जन्म दिए बिना ही हॉर्मोन्स के इंजेक्शनों द्वारा सामान्य गाय से भी अधिक मात्रा में अधिक वसायुक्त दूध देने वाली ‘कामधेनु दिखाई देंगी. 

मनोचिकित्सक जेम्स लिंच और एरन कैचर के अनुसार पालतू जीवों के संसर्ग में रहने वालों को मानसिक तनाव और रक्तचाप से भी छुटकारा मिल जाता है. इतना ही नहीं दिल के दौरे पड़े हुए मरीजों को जानवर पालने से चमत्कारी लाभ प्राप्त होता है. 

क्या अहंकार क्रोध और आवेश के वशीभूत होकर हम अपने ही जातीय बन्धुओं. मानवों को “निरा पशु है”, “साहित्य-संगीत-कला विहीन : साक्षात् ‘पशु’ पुच्छ विषाण हीनः”, “आहार-निद्रा …… धर्मेणहीनः ‘पशुभिः समानः” आदि कहकर प्रकारान्तर से पशुओं को ही बदनाम करने की साजिश नहीं रचते? कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है कि –

“मैं मनुष्यता को सुरत्व की सीढ़ी भी कह सकता हूँ। 

किन्तु पतित को पशु कहना भी कभी नहीं सह सकता हूँ।”

न्याय की बात तो यह है कि हम स्वजनों को चाहे कुछ भी कहें, लेकिन उसमें निरीह पशुओं को बिल्कुल भी न घसीटें. यदि हम ऐसा नहीं कर सकते, तो अपने आपसे ही प्रश्न पूछे कि क्या हमने पशुओं के बारे में यह कहावत-“जिन्दा हाथी लाख का, मरा सवा लाख का” कहते हुए कभी इसके ‘मर्म’ की गहराई तक जाकर ‘अपने बारे में भी सोचा है? …’नहीं’…, तो धन्य हैं वे संत कवि दयारामजी जिन्होंने मरकर भी मानव जीवन में भागीदारी निभाने वाले पशुओं के बारे में कहा 

“भैंसन की खाल के जूता बनें भाँति-भाँति

छेरी की खाल कछु जल भर लाई है

गेंडे की खाल को ओढ़त सिपाही लोग 

मृगन की खाल तपस्विन मन-भायी है 

और मानव……?

परन्तु अपने को श्रेष्ठतम प्राणी कहने का दम भरने वाले मनुष्य की खाल किसी काम की नहीं होती है; यथा 

कहें कवि ‘दयाराम’ राम के भजन-बिन

मानुस की खाल काहू काम में न आई है।” 

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