प्रौढ़ शिक्षा निबंध-Essay on Adult Education in Hindi

प्रौढ़ शिक्षा  निबंध

प्रौढ़ शिक्षा  निबंध -Essay on Adult Education in Hindi

प्रौढशिक्षा का अर्थ है प्रौढ़ों की शिक्षा। प्रौढशिक्षा के सामाजिक संकल्प के साथ यह प्रश्न जुड़ा हुआ है कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत किन लोगों को शिक्षित करने की आयोजन है। ‘प्रौढ़’ शब्द की सर्वसामान्य सीमा बालिग मताधिकार प्राप्त लोगों से संपृक्त है। लेकिन, प्रौढशिक्षा के लिए स्वीकृत प्रौढ़ों की वयःसीमा 15 से 35 वर्ष की मान्य है। इस वयःसीमा के लोग भारत में 10 करोड़ से अधिक हैं, जबकि 1981 के आँकड़ों के अनुसार इस देश की कुल जनसंख्या लगभग 85 करोड़ है। प्रौढ़ों को शिक्षित करने के विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों से इस अवधारणा को बल प्राप्त होता है कि विद्या से बढ़कर कोई वैद्य नहीं है, उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं। विद्या का महनीय अवदान उन बहुत सारे लोगों तक नहीं पहुँच सका है, 

जिन्हें गरीबी के अँधेरे में विवशता की चक्की पीसनी पड़ी है। शिक्षा के मूलभूत संकल्पों और लाभों से वंचित जनता को अज्ञान और रूढ़ियों से मुक्त करने की दिशा में प्रोढ़शिक्षा का आयोजन एक साहसिक कदम है। यह राष्ट्र के अंधेरे कपाट पर रोशन हाथों की जोरदार दस्तक है। प्रौढशिक्षा समाज के उस मूक-समुदाय को वाणी प्रदान करने का प्रयास है, जिसकी अभिव्यक्ति के माध्यम मजबूरियों और अवनतियों के शय में विलीन हो गए हैं।

यह एक वास्तविकता है कि 15 से 35 वर्ष की आयु ही मनुष्य के जीवन की सर्वाधिक कार्यदक्ष अवधि है। यह वयःसीमा राष्ट्र की रीढ़ है, मनुष्य की कार्यकुशलता का स्वर्णकाल है। कृषि और उद्योग, उत्पादन और नियंत्रण-सभी क्षेत्रों में इसी वयोवर्ग के लोगों की प्रतिभा और श्रम का सहारा सर्वोपरि होता है। अतएव, इस वयोवर्ग के लोगों का अशिक्षित एवं बौद्धिक दृष्टि से अल्पविकसित रह जाना देशव्यापी अवनति का कारण बन सकता है। इसी कल्याणकारी संकल्प के साथ प्रौढशिक्षा के राष्ट्रस्तरीय कार्यक्रमों को स्वीकृति मिली है कि प्रौढशिक्षा-संबंधी कार्यक्रमों की सफलता के अनंतर देश की कुल जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग अपनी अभिशप्तावस्था से उबरकर शिक्षा के ज्योतिर्लोक में विचरण कर सकेगा। प्रौढशिक्षा भारत जैसे विकासशील देश की एक अनिवार्यता है।

प्रौढ़शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ने-लिखने की साक्षरता और गणित का सामान्य ज्ञानभर नहीं है; अपितु जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने और लोगों के दृष्टिकोण को विस्तृत करने के संदर्भ में भी प्रौढशिक्षा का विशिष्ट औदात्य है। जीवन के वैविध्यपूर्ण परिदृश्यों की व्यापक जानकारी के लिए शिक्षा का दीपवत् महत्त्व किसी से छिपा नहीं है। इसलिए प्रौढशिक्षा के लोकमंगलकारी राष्ट्रीय कार्यक्रमों का व्यापक स्वागत हुआ है। 

राष्ट्रीय प्रौढ़शिक्षा-कार्यक्रमों का श्रीगणेश 2 अक्टूबर, 1978 से हुआ। सप्तम पंचवर्षीय योजना में प्रौढशिक्षा पर 200 करोड़ से भी अधिक रुपये व्यय करने का निश्चय किया गया था और पाँच वर्षों में 15 से 35 वर्ष की उम्र के लगभग दस करोड़ लोगों को शिक्षित करने का संकल्प सामने था। प्रौढशिक्षा-कार्यक्रम सामान्यतः सभी अशिक्षित प्रौढ़ों के हितार्थ आयोजित है; लेकिन महिलाओं, हरिजनों, अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के अशिक्षित प्रौढ़ों को प्राथमिकता दी जा रही है। इन कार्यक्रमों का लक्ष्य यही है कि भारतीय जनता की वह विशाल मध्य कड़ी देश के विकास में सम्यक सहचर बन सके, जिसे अपनी अशिक्षा के कारण अनुकूल अवसर नहीं मिल पाता। 1981 ई० की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का 63.77 प्रतिशत भाग अशिक्षित था। 1981 ई० में भारत में कुल 42.43 करोड़ लोग अनपढ़ थे।

अतः, लोगों को अशिक्षा के अंधकार से निकालने के लिए ही प्रौढशिक्षा-कार्यक्रम चलाया गया है। इस कार्यक्रम की तीन मुख्य संकल्पनाएँ हैं-साक्षरता, कार्यदक्षता और नागरिक जागृति । प्रौढ़शिक्षा का प्राथमिक लक्ष्य अनपढ़ प्रौढ़ों को सामान्य लेखन और पठन-पाठन की योग्यता प्रदान करना है। साथ ही, उनकी कार्यकुशलता में गतिशीलता की चेतना जगाने और उन्हें अपने सामाजिक अधिकारों-कर्तव्यों की जानकारी देने का लक्ष्य भी प्रौढशिक्षा-कार्यक्रम का अंग है। प्रौढ़शिक्षा के कार्यक्रमों को न केवल सरकारी प्रोत्साहन प्राप्त है, अपितु अनेक स्वैच्छिक समाजसेवी संस्थाएँ भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। विश्वविद्यालयों के अंतर्गत राष्ट्रीय सेवा-योजना ने भी इस कार्यक्रम को व्यापक विस्तार दिया है। 

राष्ट्रव्यापी प्रौढ़शिक्षा-कार्यक्रम की उपादेयता को एक व्यापक फलक पर स्वीकार किया गया है। शिक्षित होने के अनंतर सभी प्रौढ़ देशवासी कृषि, उद्योग, उत्पादन, बाजार इत्यादि की नई तकनीकी जानकारी से परिचित हो सकेंगे। 

अशिक्षा के कारण जिन अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक कुरीतियों ने भारतीय जनता के विकास-मार्ग को अवरुद्ध कर रखा है, उनका निराकरण प्रौढशिक्षा द्वारा ही संभव है। नवीन मानवीय मल्यों और राष्ट की नई विचारभमि से परिचय भी शिक्षा के बिना संभव नही।

इसी कारण, प्रौढ़शिक्षा कार्यक्रम के परिकल्पकों ने इस आवश्यकता का अनुभव किया कि प्रौढ़ नर-नारियों को अक्षर-ज्ञान कराया जाए, समाजोन्मुख जीवन-दृष्टि दी जाए। यह स्थिति अपने-आप में अत्यंत दयनीय कही जा सकती है कि ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विकासशील विश्व में भारतीय जनता का बहत-बडा भाग अज्ञानता के अंधकार में निवास करे। 15 से 35 वर्ष की वयःसीमा के जो लोग अपनी संपूर्ण शक्ति केवल दोनों वक्त की रोटी जुटाने में व्यय कर रहे हैं, उनकी शक्ति और प्रतिभा को ज्ञान के प्रकाश से विकास की दिशा में मोड़ना ही प्रौढ़शिक्षा-कार्यक्रम का लक्ष्य है। 

भारत जैसे विकासशील देश की सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या का विकट दबाव है। हमारे यहाँ प्रतिवर्ष जनसंख्या की दृष्टि से एक नया आस्ट्रेलिया महादेश बन जाता है। जनसंख्या के इस विकटतर दबाव में प्रौढ़ों का अज्ञानांधकार देश की विकास-गति मंद करने का एक उल्लेखनीय कारण है।

इस अंधकार के समूल विनाश के लिए ही प्रौढशिक्षा का कार्यक्रम स्वीकृत किया गया है। इस संकल्पना का उद्देश्य सामाजिक वातावरण की कार्यक्षमता को बढ़ाना और अशिक्षितों को शिक्षा की ज्योति ला की समुचे देश के सामने प्रौढशिक्षा एक वृहत्तर चुनौती है। इस चुनौती का सामना दृढ़विश्वास के साथ  और राष्ट्रहित ऐसी संकल्प के साथ ही किया जा सकता है तभी प्रौढशिक्षा का बहुकल्याणकारी लक्ष्य अपने प्रकर्ष का स्पर्श कर सकेगा। 

 

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