एक दुखद सपना पर निबंध-Essay on a Sad Dream

एक दुखद सपना पर निबंध-

एक दुखद सपना पर निबंध-Essay on a Sad Dream

हम लोगों को अपनी चचेरी बहन की शादी में सम्मिलित होने के लिए गांव जाना था। रात्रि-भोजन की मेज पर पिताजी ने बताया था कि कल सुबह की ट्रेन से हम लोग गांव जाएंगे। फिर क्या था? मैं शीघ्र खाना खाकर सामान बांधने लगी। सामान बांधते-बांधते मैं थककर कब सो गई, इसका पता ही नहीं चला। 

अब मैं स्वप्न में ही गांव जाने हेतु सपरिवार ट्रेन पर सवार हो गई। ट्रेन चल पड़ी। हम लोगों की सामने वाली सीट पर एक ही परिवार के कुछ लोग बैठे थे। वे भी किसी विवाह में सम्मिलित होने जा रहे थे। उनके साथ एक तीन वर्षीय बालिका थी। वह बड़ी प्यारी लग रही थी। बच्ची के पास एक गुड़िया थी। वह कभी गुड़िया से खेलती, तो कभी मेरे पास आ जाती। उसका एक छोटा भाई अपनी मां की गोद में सो रहा था। बच्ची मां की नकल करते हुए गुड़िया को दुलारती-पुचकारती थी। तब लोग हंस पड़ते थे। 

मगर इस सुखमय वातावरण में अचानक रंग में भंग पड़ गया, जब डिब्बे में पांच-छह व्यक्ति काली पोशाक पहने आ धमके। उन लोगों के हाथों में बंदूक एवं चाकू थे। उनमें से एक व्यक्ति ने कड़कती आवाज में कहा, “सभी लोग अपने-अपने स्थान पर चुपचाप बैठे रहें। यदि किसी ने चालाकी दिखाने की कोशिश की, तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा।” उनके हाथों में बड़े-बड़े चाकू एवं उनकी लाल-लाल आंखें देखकर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो रही थी। उस आदमी का आदेश पाकर वे लोग सभी यात्रियों का सामान छीनने लगे। एक औरत के कानों से बालियां खींच लीं, जिससे उसके कान से खून बहने लगा। 

मेरी सामने वाली सीट पर बैठे परिवार का उन्होंने सब कुछ छीन लिया। बच्ची तोतली आवाज में डकैत से अपनी गुड़िया मांगने लगी, “अंकल, मेरी गुड़िया लौटा दो।” लेकिन डकैतों पर इसका असर न हुआ। उल्टे डकैतों ने उस बच्ची को धकेल दिया और वह ट्रेन के नीचे गिर गई। मैं इस भयानक दृश्य को देखकर चीख उठी, जिससे मेरी नींद उचट गई। मैं पसीने से तर बुरी तरह हांफ रही थी। मैंने सोचा, ‘अच्छा हुआ, नहीं तो न जाने कब तक डरती रहती।’

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