एक सुखद सपना पर निबंध-Essay on a Happy Dream

एक सुखद स्वप्न पर निबंध-Essay on a Happy Dream

एक सुखद सपना पर निबंध -Essay on a Happy Dream

एक दिन किसी आवश्यक कार्य से मुझे पटना जाना था। खाना खाने के बाद गाड़ी पकड़ने के लिए मैं ठीक समय पर स्टेशन पहुंच गई। गाड़ी स्टेशन पर रुकी। मैं एक डिब्बे में दाखिल हुई। डिब्बे में काफी भीड़ थी। मैं बैठने के लिए इधर-उधर देख रही थी, तभी पड़ोस के एक चाचा ने अपनी सीट खाली कर दी। उनकी सहायता से मुझे खिड़की के पास बैठने की जगह मिल गई। 

गाड़ी चल पड़ी। कुछ लोगों के बीच मुख्यमंत्री के अधिकार, कार्य एवं ऐश्वर्य के संबंध में पहले से ही वाद-विवाद चल रहा था, जो मुझे रुचिकर लगा। गरमी का दिन था। खिड़की से आती ठंडी हवा के स्पर्श से मैं शीघ्र ही अर्द्ध चेतनावस्था में चली गई। सहसा मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गई-गद्देदार आरामदायक कुर्सी और वातानुकूलित हवा मेरे तन-मन को सुखकर लगने लगे। मैंने घंटी बजाई। जल्द ही आदेशपाल हाजिर हुआ। 

मैंने डी.जी.पी. को बुलाने का आदेश दिया। डी.जी.पी. हाजिर हुए। मैंने कड़कती आवाज में कहा, “डी.जी.पी. साहब, आप जब से इस कुर्सी पर बैठे हैं, तब से महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की संख्या में दिनो-दिन वृद्धि हो रही है। दहेज के कारण मरने वालों की संख्या कहीं अधिक हो गई है। गुंडों ने तो अपहरण को व्यवसाय बना लिया है। कुल मिलाकर राज्य की जनता पुलिस वालों से सुरक्षित नहीं है। आप जाएं और सारी स्थिति पर नियंत्रण करें। यदि मेरे आदेश के अनुपालन में विलंब हुआ, तो आप अपनी छुट्टी समझिए।” 

अब मुख्य सचिव की बारी थी। आदेश पाकर मुख्य सचिव कमरे में दाखिल हुए। मैंने उन्हें गंगा की लहरों पर तैरता हुआ आलीशान बंगला बनाने को कहा। इस पर वे वित्त का रोना रोने लगे। ऐसे में मैंने उन्हें डांटते हुए कहा, “पल भर के अंदर प्रस्तावित भवन तैयार करा दें।” 

अब मैं आलीशान भवन में रहने लगी। कभी मकान के अंदर आती, तो कभी हैलिकॉप्टर पर चढ़कर सैर करती। आलीशान मकान, हैलिकॉप्टर की उड़ान और नौकर-चाकर ये सब मुझे स्वर्ग का आनंद दे रहे थे। 

इसके बाद मुझे कुछ रुपये कमाने की इच्छा हुई। निजी सचिव के द्वारा नगर सेठ को बुलाया गया। नगर सेठ ने मेरे कमरे में प्रवेश किया और झुककर मुझे सलामी दी। मैंने पूछा, “कहो सेठ! धंधा कैसा चल रहा है?” 

नगर सेठ ने प्रसन्न मुद्रा में जवाब दिया, “हुजूर! जब से आप मुख्यमंत्री बनी हैं, मेरे कारोबार में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही है। पहले मैं गोल मिर्च में पपीते के बीज मिलाया करता था, किंतु अब मैं आपकी छत्रछाया में निश्चिंत होकर पपीते के बीज में गोल मिर्च मिलाता हूं।” 

मैंने कहा, “ठीक है, धंधा करते रहो, लेकिन मेरा हिस्सा कहां है।” 

नगर सेठ बोला, “मैडम, कहीं जल में रहकर मगर से वैर लिया जाता है? आपका बुलावा पाकर ही मैं समझ गया था। यह लें, 50 लाख है।” 

मैंने अति प्रसन्न होकर नगर सेठ को चाय पिलानी चाही। वह बोल पड़ा, “आजकल बाजार की चाय मुझे अच्छी नहीं लगती, क्योंकि…।” 

इस अधूरे वाक्य को मैंने पूरा किया, “क्योंकि चाय में आपकी मिलावटी चायपत्ती रहती है।” इस पर हम दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े। 

अब मुझे इस मनभावन वातावरण में रसगुल्ले की मिठास याद आने लगी। फिर क्या था? आदेश मिलते ही पटना की मशहूर दुकान के रसगुल्ले मेरी मेज पर प्रस्तुत हो गए। मैंने खूब छककर रसगुल्ले खाए। फिर जीभ चटखारती हुई हाथ में रुपयों से भरी अटैची उठाकर स्विस बैंक में जमा करने हेतु मैं चुपके से निकलने ही वाली थी कि किसी ने मुझे जोरों से झकझोरा । मैं निद्रा से जाग पड़ी और रेलगाड़ी को पटना रेलवे स्टेशन पर खड़ा पाया। 

अब यहां न तो मुख्यमंत्री का जल पर तैरता हुआ आलीशान बंगला था, न हैलिकॉप्टर, न डी.जी.पी., न मुख्य सचिव और न ही हाथ में रुपयों से भरी अटैची। यहां तो सिर्फ यात्रियों की ठेलम-पेल ही थी। मैं सूखी जीभ और खाली हाथ ट्रेन से उतर गई। अब गरमी से तप्त प्लेटफार्म पर मैं यह सोचती चली जा रही थी-काश! यह रेलयात्रा अधिक लंबी होती।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

10 − 4 =