एक गोरखालैंड राज्य पर निबंध-Essay on a Gorkhaland State

एक गोरखालैंड राज्य पर निबंध

एक गोरखालैंड राज्यः कैसे उचित? (A Gorkhaland State: How Justified?) 

एक ऐसे समय में जब भारतीय अर्थ व्यवस्था, रुपए का और अधिक अवमूल्यन न हो इस संघर्ष में है, यह वास्तव में एक परेशान करने वाली बात है कि आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान राज्य के बँटवारे से एक नया तेलांगना राज्य बनाने के निर्णय के बाद कुछ सुसुप्त राज्यवादी आन्दोलन अपना सर उठाने लगे हैं। ऐसी माँगों में अन्य बातों के साथ पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग एवं तराई और दुआर के सीमावर्ती इलाकों को मिलाकर गोरखालैंड राज्य, आसाम और उत्तर बंगाल के इलाकों को मिलाकर कामतापुर और उत्तर बंगाल के अधिकतर हिस्सों को मिलाकर वृहद्तर कूच बिहार, आसाम में बोडोलैंड और कर्बी-ऐनगलोंग, उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, बुन्देलखंड और पूर्वांचल, बिहार में मिथिलांचल और गुजरात में सौराष्ट्र के एक अलग राज्यों को बनाने की माँग सम्मिलित हैं। 

यह बहुत ही दुखदायी है कि इतनी कठिनाईयों से प्राप्त की गई आजादी के 70 वर्षों के बाद भी राष्ट्र निर्माण की छोड़िए, हमें अभी तक राज्य निर्माण की प्रक्रिया पूरी करनी है। ऐसा महसूस किया जाता है कि विभिन्न प्रकार के ये राज्यवादी आन्दोलन इन अपूर्ण प्रक्रियाओं की रुग्ण अभिव्यक्तियों के अलावा और कुछ नहीं हैं। ऐसे कई आन्दोलनों को करीब से देखने के बाद यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अधिकतर राज्यवादी आन्दोलन स्थानीय निवासियों की वास्तविक आकांक्षाओं में घुले मिले होने से अधिक विभिन्न मतों के स्थानीय अभिजात वर्गों के स्व अतिक्रमण से सराबोर स्वार्थी और अहंवादी इच्छाओं के प्रतिबिम्ब हैं। अक्सर ऐसे आन्दोलन सम्बंधित क्षेत्र के समग्र विकास और सुशासन की वास्तविक इच्छा में निहित होने की अपेक्षा किसी न किसी प्रकार की राजनीति या राजनीतिक षड्यंत्र से प्रभावित होते हैं। 

पश्चिम बंगाल में, गोरखालैंड के एक अलग राज्य की माँग को 110 वर्ष पुराना होने का दावा किया जाता है। इस आन्दोलन के प्रस्तावक अपनी मांगों के समर्थन में कई तर्क पेश करते हैं। वे तर्क देते हैं कि दार्जिलिंग भौगोलिक रूप से कभी पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं रहा है, कि पश्चिम बंगाल ने दार्जिलिंग का अत्यधिक शोषण किया है और इसे अर्द्ध विकसित रखा है और यह भी कि एक भिन्न नस्लीय समुदाय रहने के कारण वे एक अपने अलग राज्य के योग्य हैं।

इसके अलावा गोरखालैंड के समर्थक सिलीगुड़ी और जलपाईगुड़ी के सटे हुए तराई और दुआर क्षेत्रों के 398 निकटवर्ती और दूर के गाँवों को, अधिकतर वहाँ के लोगों की इच्छा के विरुद्ध प्रस्तावित गोरखालैंड राज्य में जोड़ने की भी माँग करते हैं। इस समावेशन के लिए दिया जाने वाला तर्क इन क्षेत्रों में एक बड़ी नेपालीभाषी आबादी का निवास है हालाँकि इन क्षेत्रों की अधिकाँश आबादी के द्वारा पहले ही ऐसे किसी विचार या किसी प्रयासित कदम के विरुद्ध एक प्रति-आन्दोलन चलाया जा रहा है।

अब, यदि हम शासन कला के कुछ अन्य अधिक महत्वपूर्ण तत्वों सहित निरपेक्ष रूप से इन सारे तर्कों पर मंथन | एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग निश्चित रूप से दार्जिलिंग के लोगों के भावुक उद्गारों से अधिक कुछ और प्रतीत नहीं होती। यदि हम वास्तव में एक अलग गोरखालैंड राज्य बनाने के लिए दार्जिलिंग की ऐतिहासिकता पर विचार करें तो दुर्जेय सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में हमारे देश निर्माताओं के उन 565 विभिन्न शाही रियासतों एक संगठित संघीय राज्य में एकीकृत सारी कड़ी मेहनत बिखर जाएगी। उन छोटी-छोटी शाही रियासतों को एक और बड़ी इकाई में संगठित करके भारत नाम के एक और बड़े संघीय रूप का हिस्सा बना देने के पीछे मूल विचार एक और अधिक एकीकृत और घनीभूत देश बनाना था। हालाँकि, एक बार हम ऐतिहासिकता के इस तर्क को मान लेते हैं, तो पश्चिम बंगाल के ही कई टुकड़े करने के साथ भारत के पास आज वास्तव में सैकड़ों राज्य होने चाहिए। ऐसा प्रतिगामी संशोधनवाद एक बहुत ही नकारात्मक विकास होगा और एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में हमारे संयोजित सह-अस्तित्व को असल कर सकता है। 

अब, इसमें शामिल कुछ और मुद्दों पर विचार करें। दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्र (गोरखालैंड आन्दोलन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के तीन पर्वतीय अनुमंडलों यथा दार्जिलिंग सदर, कर्सियोंग और कालिम्पोंग में मुख्य रूप से सिमटा हुआ है) की आबादी लगभग 9175 लाख है जिनमें से मोटे तौर पर सात लाख लोग गोरखा की श्रेणी में आते हैं, शेष लेपचा, भुटिया, मारवाड़ी, बिहारी, तिब्बती और अन्य गैर-गोरखा समुदायों के हैं। इसलिए इस आन्दोलन के प्रस्तावक वास्तव में इन सात लाख लोगों के लिए एक अलग राज्य चाह रहे हैं; अन्य जबरन इस आन्दोलन का हिस्सा बने हुए हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। वास्तव में लेपचा लोग पहले ही गोरखालैंड के समर्थकों द्वारा धोखे की शिकायत कर रहे हैं। ‘गोरखालैंड’ पद ही एक सबको बाँधे रखने वाली अवधारणा नहीं है और इसलिए दार्जिलिंग में रहने वाले अन्य विभिन्न नस्लीय समुदायों की पहचान के साथ न्याय नहीं करती है। 

इसलिए, यदि एक सात से नौ लाख की आबादी के लोगों की एक राज्यवादी माँग को एक मान्यता दी जाती है तो 125 करोड़ से अधिक लोगों के इस देश में हमारे पास कितने संघटक राज्य या प्रांत होंगे। यदि हमारे तेजस्वी गोरखा को एक अलग राज्य दे दिया जाता है तो हम इस देश के लिए वास्तव में कितने राज्यों से समझौता कर रहे हैं जब 850 भाषाओं के साथ 5000 से भी अधिक नस्लीय समुदाय और जातियाँ हैं? यदि इस माँग को मान्यता मिल जाती है तो यादवों, जाटों, राजपूतों, संथालों, मीणाओं और किनको नहीं के लिए एक राज्य अस्वीकृत करने का हमारे पास क्या औचित्य होगा, जबकि उनमें से अधिकाँश के पास एक बड़ी आबादी है और वास्तव में उनमें से कई गोरखा की तुलना में कहीं अधिक बड़ी संख्या में हैं? 

फिर, बड़ी गोरखा आबादी के सटे हुए गाँवों और क्षेत्रों को मिला लेने की माँग अनेकवाद की उस अवधारणा पर ही आक्रमण करती है जो हमारी मिली-जुली या गंगा-जमुनी सह-अस्तित्ववादी संस्कृति की विशेषता है। गोरखालैंड के प्रस्तावक चाहते हैं कि बड़ी नेपाली भाषी आबादी वाले सारे पास के क्षेत्र प्रस्तावित गोरखालैंड राज्य को दे दिए जाएँ। यदि हम थोड़ी देर के लिए अपने सामाजिक अनेकवाद के इस महत्वपूर्ण तत्व की अवहेलना संभावना भी कर दें जिस पर ऐसी सीमित माँग के परिणामस्वरूप बुरा प्रभाव पड़ेगा, फिर भी कुछ व्यावहारिक कारणों से ऐसी माँग को स्वीकार करना बहुत कठिन है। 

पहला, इस बात को मान लेना सरासर गलत है कि सारे नेपालीभाषी लोग स्वतः ही गोरखा हैं या गोरखालैंड धिकाँश माँग किए हए क्षेत्रों में नेपालीभाषी आबादी से इतर लोगों का बाहल्य है। तीसरे, यहाँ तक कि कुछ क्षेत्र, जहाँ नेपालीभाषी लोग अधिक तादाद में हैं, अन्य जिले या अन्य समुदाय प्रबल क्षेत्रों के अधिकांशतः अन्तःक्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों को वर्तमान गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन या बाद में माँग किए हुए गोरखालैंड राज्य में संलग्न कर लेना एक प्रशासनिक रूप से साध्य प्रस्ताव नहीं है जैसा कि जस्टिस श्यामल सेन आयोग द्वारा भी अवलोकित किया गया है जिसका गठन ऐसे समावेशों की संभावना की छानबीन करने के लिए हुआ था। साथ ही, इन अधिकाँश गाँवों में 20-30 प्रतिशत से अधिक नेपालीभाषी आबादी नहीं है जिसका अर्थ यह है कि ऐसे क्षेत्रों को एक नई हस्ती में मिलाने से अन्य समुदायों, जो उन गाँवों में बहुसंख्या में हैं, की इच्छाओं के साथ महान कुठाराघात होगा। वास्तव में, प्रस्तावित गोरखालैंड में इच्छित विलयन के विरुद्ध पहले से ही एक मजबूत प्रति आन्दोलन चल रहा है। 

इसके अलावा, एक बार हम ऐसी माँग को मान्यता दे देते हैं, भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। यह एकरंगा बनाने की कृत्रिम रूप से कोशिश करके न केवल हमारे समाज की अनेकवादी प्रकृति को खतरे में डालता है बल्कि देश के विभिन्न भागों के निहित स्वार्थों से ऐसी समान माँगों के लिए जल द्वार भी खोल देता है। आखिरकार, हर राज्य में एक न एक नस्ल-भाषाई समूह की कुछ आबादी है जिसकी माँग दूसरे राज्यों द्वारा भी उचित रूप से की जा सकती है। इस तकसे असाम के सारे बांग्लाभाषी क्षेत्र पश्चिम बंगाल में या हिन्दीभाषी या जनजाति प्रभुत्व वाले क्षेत्र क्रमश: बिहार और झारखंड में चले जाने चाहिए। इसी समान तर्क द्वारा, उत्तर भारत के सम्पूर्ण हिन्दीभाषी क्षेत्र को एक विशालकाय राज्य बन जाना चाहिए। ऐसी माँग पर सहमति देने का प्रतिफल वास्तव में बहुत अस्त-व्यस्त कर देने वाला होगा। 

फिर, पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा दार्जिलिंग के कथित ऐतिहासिक शोषण में भी दम नहीं क्योंकि दार्जिलिंग के पास देश के सर्वोत्तम सामाजिक विकास सचक हैं और निश्चित रूप से यह पश्चिम बंगाल के सर्वोत्तम में है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू. एन. डी. पी.) के पर्यवेक्षण में तैयार पश्चिम बंगाल मानव विकास रिपोर्ट 2004 के अनुसार लैंगिकता और मानव विकास की सचियों में पश्चिम बंगाल के सारे जिलों में दार्जिलिंग को क्रमश: द्वितीय और चतुर्थ स्थान प्रदान किया गया। ___ यदि राज्य के ओहदे के औचित्य के लिए यदि दार्जिलिंग के अर्द्ध-विकास और शोषण का उल्लेख किया जाता है तो राज्य के ओहदे में प्रोन्नति की कतार में दार्जिलिंग को बहुत पीछे रहना पड़ेगा क्योंकि देश में ऐसे कई और क्षेत्र हैं, राज्य के ओहदे के लिए जिनका पहला दावा होगा। चाहे यह आय हो, साक्षरता दर, शैक्षिक उपलब्धियाँ, पोषण की स्थिति, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का प्रतिशत, दीर्घ आयु, शिशु और मातृ मृत्यु दर, या लोगों की सम्पूर्ण स्वास्थ्य स्थिति और आधारभूत संरचनाएँ, देश के कई हिस्सों या पश्चिम बंगाल राज्य के विभिन्न जिलों की तुलना में दार्जिलिंग कहीं बेहतर है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि पिछले ढाई दशकों से भी कहीं अधिक से दार्जिलिंग ऐसे स्वायत्त स्थानीय स्व शासन निकायों यथा दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डी. जी. एच. सी.) और जी. टी. ए. के अधीन रहा है। 

लेकिन फिर भी, यदि राज्य के ओहदे के प्रस्तावक विश्वास करते हैं कि दार्जिलिंग को और विकास की आवश्यकता है, निश्चित रूप से राज्य का ओहदा कोई समाधान नहीं है। कुछ पहले से ही अस्तित्व में राज्यों के अनुभवों से हम भली भांति परिचित हैं, जिनका विकास रिकॉर्ड, थोड़ा कहा जाय तो, बहुत दयनीय है। कथित अर्द्ध विकास की समान पृष्ठभूमि पर झारखंड एक राज्य बना लेकिन एक दशक से भी अधिक बीतने के बाद भी, बहुत पहले 2000 में प्राप्त करने के लिए निर्धारित विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति से यह अभी भी बहुत पीछे है। नव निर्मित राज्यों के बीच आज झारखंड की स्थिति बहुत बुरी है और अपने निर्माण के समय से यह केवल बुरी ही हुई है। सच तो यह है कि गोरखालैंड सहित ऐसे किसी भी राज्य के ओहदे के आन्दोलनों के प्रस्तावकों को वास्तव में किसी अन्य बात की अपेक्षा सुशासन और कुशल प्रशासन की बात करनी चाहिए। बिना सुशासन के इष्ट के बिना एक राज्य के ओहदे का साजो-सामान शून्य के सिवा कुछ भी हासिल नहीं करेगा। 

फिर अपने जनसांख्यिकीय और भौगोलिक दोनों आकारों को देखते हुए देश के कई हिस्सों की तुलना में दार्जिलिंग पहले से ही संसाधनों का एक अनुपातहीन प्रति व्यक्ति हिस्सा पाता है। और इन संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल की सरकार से आता है जिसका अर्थ है कि परम्परागत रूप से पश्चिम बंगाल अक्सर राज्य के और अधिक पिछड़े और जरूरतमंद क्षेत्रों की कीमत पर दार्जिलिंग को अनुपातहीन हिस्सा प्रदान करता रहा है। वर्तमान गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन का सारे स्रोतों से राजस्व अनुमानतः सालाना तीन करोड़ से अधिक नहीं। यदि हम राज्य सरकार द्वारा ऐसे स्रोतों यथा भूमि, उत्पाद, परिवहन और व्यावसायिक और बिक्री कर को भी सम्मिलित कर लें तब यह संख्या बहुत अधिक तो 30 करोड़ रुपए तक जाएगी। एकदम आदर्श स्थिति में राजस्व के सभी प्राप्य और संभावित स्रोतों को खंगालते हुए अधिकतम यह 100 करोड़ रुपए सालाना तक जा सकता है। अल्पकालीन रूप से 50 करोड़ रुपए सालाना राजस्व एक अधिक व्यावहारिक संख्या प्रतीत होती है। 

हालाँकि, प्रतिवेदित रूप से जी. टी. ए. के पास अभी लगभग 600 करोड़ रुपए का गैर योजना व्यय है जो योजना और योजनाबद्ध व्यय के साथ लगभग 1400 करोड़ का हो जाएगा। यदि किसी भी तरह से तीन पर्वतीय अनुमंडलों के साथ दार्जिलिंग इच्छित गोरखालैंड राज्य बन जाता है, सामान्य और पुलिस प्रशासन के कारणों से संयुक्त योजना और गैर योजना व्यय के कम से कम 2000 करोड़ तक जाने की संभावना है, यदि हम उन विभिन्न सहवर्ती व्यय की बात न करें तो जो एक नए राज्य के निर्माण के कारण होते हैं। इसलिए यदि एक क्षेत्र जिसके सर्वोत्तम विकास सूचकांक हैं और जिसका राजस्व उत्पादन सामर्थ्य केवल लगभग 50 करोड़ का है, क्यों वे देश के अधिक जरूरतमंद हिस्सों विशेषकर छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश एवं अन्य राज्य के अतिवादी खतरों से आक्रान्त हिस्सों के मूल्य पर अनुपातहीन 2000 करोड़ रुपए पाएँगे।

 गोरखालैंड के प्रस्तावकों को यह दिखलाना चाहिए कि इसकी माँग करने से पहले वे प्रस्तावित गोरखालैंड राज्य का सारा गैर योजना व्यय और कम-से-कम योजना व्यय का एक हिस्सा वहन करने की स्थिति में हैं। यदि ऐसी एक नई हस्ती केन्द्र सरकार की आवश्यकता से कहीं अधिक बेकारी अनुदान की अपेक्षा करती है तो की देश के विभिन्न भागों से समान उचित माँगें नहीं आएँगी। और हम इसकी अनुमति किसी एक खास क्षेत्र के लिए देते हैं तो क्या हम इसके लिए दूसरों को मना कर सकते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि एक नामस्रोत गोरखालैंड राज्य दार्जिलिंग में हमारे देशवासियों की केवल भावनात्मक इच्छाओं के विषय में नहीं है बल्कि शेष देश के लिए इसके घातक दूरगामी प्रभाव हैं। क्योंकि यह ऐसी कई और माँगों को प्रेरित करेगा जैसा कि एक नए तेलांगना राज्य के घोषित निर्माण के बाद से होना प्रारम्भ हो गया है।

 गोरखालैंड के प्रस्तावक अक्सर अपनी स्थिति की तुलना पड़ोसी सिक्किम राज्य या उत्तर पूर्व के छोटे राज्यों से करते हैं जब वे राज्य के ओहदे या विकास के मेवे के अनुपातहीन हिस्से का दावा करते हैं। हम सब उन ऐतिहासिक कारणों और परिस्थितियों से अवगत हैं जिनके कारण इन उत्तर-पूर्वी राज्यों को राज्य का ओहदा या विशेष ओहदा मिला। यदि आज तेलांगना को आज एक राज्य बनने के लिए प्रस्तावित किया गया है, यह इसके भौगोलिक ठोसपन, एक उपयुक्त जनसांख्यिकीय आकार, प्रशासनिक साध्यता और आत्म निर्भर संसाधनों के कारण है। लेकिन यही कई ऐसी माँगों के साथ गोरखालैंड सहित अन्यत्र लागू नहीं होता। 

यदि हम ऐसे आधारों पर राज्य के ओहदे की माँग करते रहे, तब हमारी राज्य निर्माण प्रक्रिया का कभी अंत नहीं होगा और राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया की बात ही व्यर्थ है। गोरखालैंड प्रस्तावकों को वास्तव में जी टी ए को सफलतापूर्वक काम करते रहनेवाला बनाने की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए जो 18 जुलाई 2011 को केन्द्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार प्रभावशाली पर्वतीय दल यथा गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जी. जे. एम. एम.) के बीच एक त्रिदलीय समझौते के माध्यम से अस्तित्व में आया। जी. टी. ए. एक स्वायत्त और अधिकार प्रदत्त निकाय है जिसने अपने अस्तित्व का बस एक साल पूरा किया है और जिसे स्थानीय लोगों की विकासात्मक इच्छाओं को पूरा करने के लिए उपयुक्त रूप से काम में लाया जा सकता है यदि वे विकास की ओर देख रहे हैं। 

ऐसा वास्तव में महसूस किया जाता है कि हमारे नीति निर्माताओं को वास्तव में एक द्वितीय राज्य ! या कोई ऐसा तंत्र जो व्यावहारिक रूप से संभव हो, की सहायता से सदा के लिए राज्य के ओहदे की ऐसी सारी माँगों पर निष्पक्ष रूप से विचार करने पर कुछ गंभीर चिंतन करना चाहिए। उक्त आयोग द्वारा लिया गया ऐसा कोई भी निर्णय भौगोलिक निकटता और ठोसपन, प्रशासनिक दृढता और वित्तीय साध्यता सहित किन्ही तार्किक रूप से पूर्व निर्धारित मानदंडों पर आधारित होना चाहिए। यदि हम ऐसे मुद्दों पर संशोधन जारी रखेंगे और उन्हें राजनीति और षड्यंत्र की संकीर्ण शक्तियों पर तय करने की अनुमति देंगे, तब एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में अतिक्रमनित निहित स्वार्थों द्वारा धीरे धीरे लेकिन निश्चित रूप से हमारे प्रिय देश में घुन लगाने के कारण हमारा निश्चित रूप से विनाश हो जाएगा। 

मुख्य बिन्दु 

  • अधिकाँश राज्य के ओहदे के आन्दोलन सम्बंधित आन्दोलन क्षेत्र के समग्र विकास और सुशासन की वास्तविक इच्छा की अपेक्षा राजनीति से प्रेरित होते हैं। 
  • सारी छोटी-छोटी शाही रियासतों को संगठित करने के पीछे मूल विचार एक और अधिक एकीकृत और घनीभूत देश बनाना था। 
  • दार्जिलिंग का कथित ऐतिहासिक शोषण सच नहीं क्योंकि दार्जिलिंग के पास देश के सर्वोत्तम सामाजिक विकास सूचक हैं। 
  • अन्य मुद्दे जो गोरखालैंड की माँग को नकारते हैं। 
  • यह कई अन्य नस्लीय समुदायों की पहचान के साथ न्याय नहीं करता। 
  • यादवों, जाटों। इत्यादि को इनकार करना कठिन है। 
  • यह अनेकवाद की अवधारणा पर आक्रमण करता है। 
  • तेलांगना का निर्माण इसके भौगोलिक ठोसपन, एक उपयुक्त जनसांख्यिकीय आकार, प्रशासनिक साध्यता और आत्म निर्भर संसाधनों के कारण हुआ। 
  • गोरखालैंड प्रस्तावकों को सुशासन और जी. टी. ए. को सफलतापूर्वक काम करते रहनेवाला बनाने की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 
  • नीति निर्माताओं को द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग या किसी ऐसे तंत्र द्वारा राज्य के ओहदे की सारी मांगों पर गंभीर रूप से विचार करना चाहिए। 

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