एक प्याली चाय पर निबंध |Essay on a cup of tea

एक प्याली चाय पर निबंध

एक प्याली चाय पर निबंध |Essay on a cup of tea

मेरी नन्ही प्याली को देखकर आप मुझे अकिंचन न समझें। मैं तन से गरीब जरूर हूं लेकिन मन से नहीं। यही कारण है कि बालक हो या वृद्ध, राजा हो या रंक, मूर्ख हो या विद्वान, विद्यार्थी हो या व्यापारी–सभी मेरी चुस्कियों का आनंद लेते हैं। विद्यार्थियों के लिए मैं सुरक्षा कवच हूं। उनके निद्राजाल को काटकर मैं उनकी एकाग्रता को काकचेष्टा बना देती हूं। 

मेरी चुस्की लेते ही कामगारों की थकावट दूर हो जाती है। वे तरो-ताजा होकर पुन: अपने काम में लग जाते हैं। वृद्धों का मुझसे विशेष लगाव रहता है। उन्हें कुछ मिले न मिले, जब मैं मिलती रहूं, तो वे अपने-आपको भाग्यशाली समझते हैं। लगता है कि मैं उनके वृद्ध शरीर के लिए संजीवनी बूटी हूं। कुछ लोगों को तो मुझसे इतना लगाव है कि वे मेरे बिना बिस्तर ही नहीं छोड़ते। ऐसे प्रेमी मेरी पहली भेंट को ‘बेड-टी’ कहते हैं। 

इतने लोगों को तृप्त करने से पूर्व मैं खोलते पानी में तपती हूं। करीब पांच मिनट तक तपने के बाद चीनी और दूध के साथ मिलकर मैं हल्के सुनहरे रंग में आपकी सेवा के लिए तैयार हो जाती हूं। अब आप अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप चीनी-मिट्टी अथवा धातु निर्मित विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी चमकती प्यालियों में मेरा आनंद ले सकते हैं। फुटपाथी दुकानों पर खड़े-खड़े मिट्टी के कुल्हड़ में मेरी चुस्कियां ली जाती हैं और बड़े-बड़े होटलों में बैठकर चमकती रंग-बिरंगी प्यालियों में। दोनों का ही अपना अलग-अलग आनंद है। चमकती प्यालियों में वैभव की झलक है, तो मिट्टी के कुल्हड़ में सोंधी-सोंधी महक। अब मैं दौड़ती रेलगाड़ियों और उड़ान भरते जहाजों में भी प्राप्त हूं। इस प्रकार ‘हरि व्यापक सर्वत्र समाना’ की भांति मैं इस कलियुग में सर्वत्र व्याप्त हूं। 

अब तक आपने मेरे बढ़ रहे अनोखे प्रभावों को देखा। मेरी खोज बड़े अनोखे ढंग से हुई थी। ईसा पूर्व में शने नंग चीन के राजा थे। एक बार वे वन विहार को निकले। वन में वे पीने के लिए पानी गरम करने लगे। तभी हवा के झोंकों से उबलते पानी में आसपास की झाड़ियों की कुछ पत्तियां आ गिरीं । इससे पानी का रंग बदल गया और उसमें से सुगंध भी आने लगी। राजा को यह पेय अत्यंत स्वादिष्ट लगा। बस, यहीं मेरी खोज हो गई। 

खौलते जल में गिरने वाली पत्तियां मैं ही थी। मूलत: मैं एक जंगली पौधा हूं। मेरा वानस्पतिक नाम केनिलिया साइनेंसिस है। मुझमें ‘कैफीन’ नामक तत्व रहता है, जो पीने वालों को स्फूर्ति प्रदान करता है। मैं उष्ण प्रदेशों के नमी वाले क्षेत्रों में उगती हूं। भारत में सबसे पहले मेरी खोज एक अंग्रेज मेजर रॉबर्ट ब्रूस ने असम के जंगलों में की थी। भारत में असम मेरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। मेरे प्रेमियों की संख्या ब्रिटेन में सबसे ज्यादा है। 

मैं स्पष्टवादी हूं, इसलिए अपने दुर्गुणों को नहीं छिपाऊंगी। मुझमें टेनिन नामक पदार्थ पाया जाता है। टेनिन से आप परिचित ही होंगे। यह चमड़ा पकाने के काम में आता है। यही टेनिन आमाशय में पहुंचकर मुझे पीने वाले लोगों की भूख मार देता है और वे धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। अतः मेरा अधिक सेवन रोगों का खुला आमंत्रण है। 

मेरे गुण-दोष के संबंध में यह दोहा काफी प्रचलित है। मेरी सलाह है कि मुझे पीते समय आप इस पर अवश्य गौर करें 

कफकाटन वायुहरण, धातुहीन बलक्षीण।

लोहू का पानी करे, दो गुण अवगुण तीन॥

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