Essay in hindi for ias exam pdf-भारत : एक विश्वग्राम 

Essay in hindi for ias exam pdf

Essay in hindi for ias exam pdf-भारत : एक विश्वग्राम 

“काफिले बसते गए, हिन्दोस्तां बनता गया।” 

फिराक गोरखपुरी की उपर्युक्त पंक्ति से यही ध्वनित होता है कि भारत एक देश नहीं, बल्कि एक विश्वग्राम है। भारत में काफिलों के रूप में अनेक जातियां आईं और यहीं की होकर रह गईं। अनेक संस्कृतियों और सभ्यताओं का यहां समागमन हुआ और एक ऐसी बहुरूपता विकसित हुई, जिसने विश्वग्राम की अवधारणा को पुष्ट किया। इसी बहुरूपता ने भारतीयता को असीमित बनाया। खास बात यह रही कि यह विविधतापूर्ण असीमित भारतीयता अंतःसंबंधित एवं अखंड बनी रही, जिससे इसकी अभेद्यता विकसित हुई। यानी बहुरूपता में भी एकरूपता बनी रही। 

 “यह कहना असंगत न होगा कि भारत विविधताओं एवं बहुरूपताओं का समुच्चय है। अनेक स्तरों पर ये विविधताएं एवं बहुरूपताएं परिलक्षित होती हैं, जो भारत को विश्वग्राम की श्रेणी में लाकर खड़ा करती हैं।” 

यह कहना असंगत न होगा कि भारत विविधताओं एवं बहुरूपताओं का समुच्चय है। अनेक स्तरों पर ये विविधताएं एवं बहुरूपताएं परिलक्षित होती हैं, जो भारत को विश्वग्राम की श्रेणी में लाकर खड़ा करती हैं। पहले भौगोलिक वैविध्य पर दृष्टिपात करते हैं। जो भौगोलिक वैविध्य भारत में है, वह संभवतः किसी दूसरे देश में नहीं है। इस देश में हिमाच्छादित विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएं हैं, तो मरुभूमियों की भी कमी नहीं है। समतल मैदानों का विस्तार है, तो पठार भी हैं। यहां अथाह सागर हिलोरें मारते हैं, तो सरिताएं भी खूब हैं। वनों का विस्तार है, तो बीहड़ भी हैं। 

यदि बात ऋतुओं की करें, तो इनकी भी विविधता देखते ही बनती है। भारत में छह ऋतुएं हैं। ये ऋतुएं भी वैविध्य का रंग भरती हैं तथा जीवन शैली, पहनावा, रहन-सहन और संस्कृति के स्तर पर बहुरूपता को ही प्रोत्साहित करती हैं। अब जरा खाद्य विविधता पर नजर डालें। अन्य देशों की तरह भारत में भोजन उदरपूर्ति का साधन मात्र नहीं है और न ही इसमें एकरसता ही है। यहां नाना प्रकार के भोजन उपलब्ध हैं, जो कि अनूठे वैविध्य के द्योतक हैं। भोजन की इस परम्परा को जहां भारतवासियों ने अपनी ‘पाक-साधना’ से समृद्ध बनाया, वहीं बाहर से आकर बसने वालों की खाद्य संस्कृति का भी इस पर प्रभाव पड़ा। व्यंजनों की क्षेत्रीय विशेषताओं ने भी वैविध्य को बढ़ाया। फिर चाहे वह बिहार का चिवड़ा और सत्तू हो या राजस्थान का चूरमा और बाटी। हरियाणा और पंजाब की मक्के की रोटी व सरसों का साग हो या फिर महाराष्ट्र का श्रीखंड। बंगाल का मछली भात और संदेश, तो दक्षिण भारत के दोसा, इडली और सांभर, सभी का अपना-अपना अलग ही महत्त्व है। बिरयानी और केक भी हमें मयस्सर हैं, जो विदेशी अपने साथ लाए थे। क्या किसी अन्य देश में व्यंजनों की ऐसी विविधता संभव है?

अब आते हैं भाषाई वैविध्य पर। भाषाई वैविध्य को रेखांकित करती यह पुरानी उक्ति देखिए–“कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।” यह अनेक भाषाओं-बोलियों वाला देश है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को स्थान दिया गया है। इनके अलावा हजारों भाषाओं-बोलियों का प्रचलन भारत में हैं। आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली बहुत सी ऐसी बोलियां हैं, जिनकी लिपियां विकसित नहीं हो पाई हैं। बहुभाषा-भाषी होना आम भारतवासी की विशेषता है। यह भी एक विशिष्टता है कि इस भाषाई वैविध्य के बीच ‘हिन्दी’ जन भाषा के रूप में इस विशाल देश को एकता के सूत्र में बांधे हुए है। 

यदि धार्मिक विविधता की बात करें तो यह कहना असंगत न होगा कि भारत अनेक धर्मों का समुच्चय है। जितने धर्म भारत में अस्तित्व में हैं, उतने किसी अन्य देश में नहीं। यही कारण है कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं। धार्मिक विविधता के कारण ही साम्प्रदायिक एवं पंथीय विविधता भी देखने को मिलती है। जैसे—हिंदू सम्प्रदाय, मुस्लिम सम्प्रदाय, सिख सम्प्रदाय, ईसाई सम्प्रदाय, जैन सम्प्रदाय, पारसी सम्प्रदाय आदि। भारत रूपी इस विश्वग्राम में मंदिर हैं, शिवालय हैं, मस्जिदें हैं, इबादतगाहें हैं, गुरुद्वारे हैं, तो गिरजाघर भी हैं। विश्व के अनेक बड़े धर्म भारत की इस पवित्र भूमि पर ही उद्गमित हुए। 

भारत की अनेक विविधताओं एवं बहुरूपताओं ने जहां ‘बहुविध समाज’ (Plural Society) का विकास किया, वहीं बहुलतावाद (Pluralism) के उस सिद्धांत को पोषण प्रदान किया, जिसके अंतर्गत उस सामाजिक स्थिति का विकास होता है, जिसमें विविध जातियों, धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों आदि से जुड़े हुए समूह अपनी-अपनी उपसंस्कृतियां और अपनी-अपनी स्वायत्तता कायम रखते हुए एक ही जटिल समाज के भीतर मिल-जुल कर रहते हैं। 

“भारत को विश्वग्राम के रूप में विकसित करने में भारतीय गणतंत्र ने अप्रतिम योगदान दिया है, क्योंकि इसमें निहित समतामूलक विचारधारा विश्व व्यापक एवं समावेशी है।” 

बहुरूपताओं और विविधताओं से मिलकर ही भारत की अनूठी संस्कृति विकसित हुई, जिसे हम समागम, समन्वय एवं सौहार्द की संस्कृति के रूप में अभिहित कर सकते हैं। इसी व्यापक संस्कृति ने ही भारत को विश्वग्राम की पहचान दी और गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस विशाल देश को महामानव-सागर की संज्ञा दी। यह वैविध्य सायास नहीं है, बल्कि यह एक इतिहास प्रक्रिया के तहत अनायास विकसित हुआ। बाहर से जो काफिले, कबीले और जातियां आदि आईं, वे अपने साथ अपना धर्म, भाषाएं, खान-पान, पहनावा और रहन-सहन के तौर-तरीके भी लाईं। इनका यहां के जीवन क्षेत्र को प्रभावित करना एवं स्वयं यहां के जीवन क्षेत्र से प्रभावित होना स्वाभाविक था। पहले सांस्कृतिक संघर्ष हुआ और फिर समन्वय की प्रक्रिया ने ऐसा जोर पकड़ा कि विविधताओं के सभी रूप भारतीय समाज में समाविष्ट हो गए और इस प्रकार असीमित भारतीयता का सृजन हुआ। अनेक होते हुए भी सभी घुल-मिलकर एक हो गए। यदि हम इन विविधताओं-बहुरूपताओं को न सहेजते, तो आज हमें जो सांस्कृतिक वैराट्य हासिल हुआ है, वह हासिल न होता और विश्वग्राम की अवधारणा खंडित हो जाती। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने यह अकारण नहीं कहा है- “भारतीय संस्कृति कोई अलग-थलग चीज नहीं है। वह अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में सीमित रहते हए भी इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह अखिल मानवीय संस्कति में अपना योगदान करती है और खुद मानवीय संस्कृति का एक अंग है। इसी भारतीय संस्कृति से प्रेरणा लेकर जहां पं. जवाहरलाल नेहरू ने ‘विश्व व्यवस्था’ का सपना देखा था, वहीं इसी भारतीय संस्कति ने विश्व को महात्मा गांधी सरीखा ‘विश्व मानव’ दिया, जिसकी मृत्य पर आइंस्टाइन ने कहा था- “भावी पीढ़ियां इस बात पर मुश्किल से यकीन करेंगी कि पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य था।” 

आज जो बहुलतावाद हमारी संस्कृति में परिलक्षित हो रहा है और जो भारत की विश्वग्रामता की पहचान है, उसे भारतीय जनतंत्र ने मजबूत आधार प्रदान किया है। सच तो यह है कि भारतीय जनतंत्र की आत्मा भारत की बहुलतावादी संस्कृति में ही निवास करती है। इस बहुलता ने ही कभी देश में उस एकरूपता को पनपने नहीं दिया, जिसका स्वरूप ‘अधिनायकवादी’ होता है तथा जो दूसरों को दबाकर ऊपर आना चाहती है। फिर चाहे बात भाषा की हो, जाति की हो, क्षेत्र की हो, धर्म की हो अथवा राजनीति की हो। जब अधिनायकवादी एकरूपता सिर उठाती है, तब विद्रूपताएं जन्म लेती हैं, उन्माद बढ़ता है और अंततः देश का विकास बाधित होता है। ऐसा नहीं है कि भारत में जब-तब इस प्रवृत्ति ने सिर न उठाया हो। सिर तो उठाया, किंतु मुंह की भी खानी पड़ी। असीमित भारतीयता और भारतीय जनतंत्र के समतामूलक एवं समावेशी स्वरूप ने इसे करारी शिकस्त दी। कहने का आशय यह है कि भारत को विश्वग्राम के रूप में विकसित करने में भारतीय गणतंत्र ने अप्रतिम योगदान दिया है, क्योंकि इसमें निहित समतामूलक विचारधारा विश्व व्यापक एवं समावेशी है। 

भारत अपनी विशिष्टताओं, विविधताओं एवं बहुरूपताओं के कारण जहां शेष संसार से अलग है, वहीं इन्हीं वजहों से वह स्वयं में एक ऐसा विश्वग्राम है, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का पैगाम देकर समूचे विश्व को एक विश्वग्राम के रूप में देखना चाहता है। सबसे अच्छ बात तो यह है कि जिस विश्वग्रामता की नींव अतीत में पड़ी, उसे भारतीय गणतंत्र ने न सिर्फ बखूबी सहेज कर रखा है, बल्कि निरंतर उसे उच्च आयाम भी प्रदान कर रहा है। यही कारण है कि एक विश्वग्राम के रूप में सारी दुनिया में भारत का आकर्षण बढ़ा है। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

हिन्दी निबंध 

HINDI ESSSAY

HINDI ESSAY ON 10 LINE

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

four × 5 =