Essay for UPSC in Hindi-जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा

Essay for UPSC in Hindi

Essay for UPSC in Hindi-जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा अथवा जलवायु बदल रही है, खाद्य और कृषि को भी बदलना चाहिए 

विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले संक्षेप में यह जान लेना उचित रहेगा कि जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा से अभिप्राय क्या है? पहले बात करते हैं जलवायु परिवर्तन की। जिस जलवायु को स्थिर रहना चाहिए, जब वह कुछ प्राकृतिक एवं कुछ मानवजनित कारणों से स्थिर नहीं रह पाती, तो यह स्थिति जलवायु परिवर्तन कहलाती है, जिसमें जलवायु में बदलाव दिखते हैं। जलवायु परिवर्तन के अनेक दुष्परिणाम हैं, जिनमें से एक कृषि पर पड़ने वाला दुष्परिणाम भी है। जब कृषि दुष्प्रभावित होगी तब खाद्यान्न उत्पादन भी घटेगा और यह स्थिति खाद्य सुरक्षा के लिए घातक सिद्ध होगी। खाद्य सुरक्षा से अभिप्रेत है, सभी को पर्याप्त खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित कराना। जब जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्यान्न उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, तब खाद्य सुरक्षा का भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होना स्वाभाविक है, जो कि एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती। हमें यह याद रखना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा से सुरक्षित व पोषक खाद्य पदार्थों की पर्याप्त मात्रा में सभी तक पहुँच और उपयोग की क्षमता का पता चलता है। 

जब कृषि दुष्प्रभावित होगी तब खाद्यान्न उत्पादन भी घटेगा और यह स्थिति खाद्य सुरक्षा के लिए घातक सिद्ध होगी। खाद्य सुरक्षा से अभिप्रेत है, सभी को पर्याप्त खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित कराना। जब जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्यान्न उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, तब खाद्य सुरक्षा का भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होना स्वाभाविक है, जो कि एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व की बढ़ती आबादी को देखते हुए खाद्य उत्पादकता को बढ़ाया जाए, किन्तु जलवायु परिवर्तन इसमें अवरोधक की भूमिका निभा रहा है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है, अतएव भारत के संदर्भ पर आने से पहले जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा के वैश्विक परिप्रेक्ष्य को जान लेना उचित रहेगा। 21वीं शताब्दी के अंत तक वैश्विक तापमान में 1.4 से 5.8 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है, जिससे खाद्य उत्पादन में कमी देखने को मिलेगी। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2050 तक शीतकाल का तापमान लगभग 3 से 4 डिग्री तक बढ़ सकता है। इससे मानसूनी वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी होने का अनुमान है। इस कमी से फसलों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यहाँ यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 9.5 अरब हो जाएगी। स्पष्ट है कि तब हमें दो अरब अतिरिक्त लोगों के लिए 70 प्रतिशत ज्यादा खाद्यान्न उत्पादित करना होगा। इसके लिए खाद्य और कृषि प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाना होगा तथा इसे अधिक लचीला, टिकाऊ और उपजाऊ बनाने की जरूरत होगी। जलवायु परिवर्तन के परिवर्तन को भांप कर ही वर्ष 2018 के ‘खाद्य दिवस’ का मुख्य विषय (Theme) रखा गया-‘जलवायु बदल रही है, खाद्य और कृषि को भी बदलना चाहिए।

अब आते हैं भारतीय परिदृश्य पर। जलवायु परिवर्तन का खतरा भारत पर भी मंडरा रहा है और इससे भारतीय कृषि के खतरे भी बढ़े हैं। इसरो के मुताबिक हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में ये लगभग 3.75 किलोमीटर सिकुड़ चुके हैं। यदि रफ्तार यही बनी रही तो ये वर्ष 2035 तक गायब हो सकते हैं। रेगिस्तान बढ़े हैं, तो सूखा, चक्रवात, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ी हैं। गौरतलब है कि डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में दिसंबर, 2009 में हुए सम्मेलन में ‘ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स, 2010’ द्वारा एक सूची जारी की गई थी, जिनमें भारत उन शीर्ष 10 देशों में है जो जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित होंगे। कोपेनहेगन में आयोजित सम्मेलन में भारतीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने देश की कृषि पर जलवायु परिवर्तन के पड़ने वाले प्रभावों के बारे में कहा कि इससे लगभग 64 प्रतिशत लोगों पर प्रभाव पड़ेगा, जिनके जीवनयापन का साधन कृषि है। इसका सबसे बड़ा डर खाद्य सुरक्षा को लेकर है। 

जलवायु परिवर्तन से जहाँ देश में पानी की कमी होगी, वहीं । सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ेंगी। विभिन्न फसलें और कृषि प्रणालियाँ जहाँ प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगी, वहीं मिट्टी की उर्वरता का ह्रास होगा। फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों और फसली बीमारियों का प्रभाव बढ़ेगा। जैव विविधता कम होगी, तो फसलों की पौष्टिकता का भी ह्रास होगा। इन बातों से ‘भूख का जोखिम’ तो बढ़ेगा ही, कुपोषण की समस्या भी विकराल होगी। 

भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार प्रत्येक 10 सेल्सियस तापमान बढ़ने पर गेहूँ का उत्पादन 4-5 करोड़ टन कम हो सकता है, तो तापमान 20 सेल्सियस बढ़ने पर धान का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर, कम हो सकता है। इससे फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी और अनाज में पोषक तत्त्वों व प्रोटीन की कमी हो जाएगी। 

तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी और कार्यक्षमता भी प्रभावित होगी। मिट्टी में लवणता बढ़ेगी और जैव विविधता घटती जाएगी। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जहाँ एक ओर मिट्टी का क्षरण अधिक होगा, वहीं दूसरी ओर सूखे के प्रकोप से बंजरता बढ़ जाएगी। जलवायु परिवर्तन से कीट और रोगों की मात्रा बढ़ेगी। गर्म जलवाय कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता की वृद्धि में सहायक होती है। कीटों में वृद्धि के साथ ही उनके नियंत्रण हेतु अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाएगा, जो जानवरों और मनुष्यों में अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देगा। 

कृषि कार्यों के संचालन और अच्छी उत्पादकता में जल संसाधनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव जल संसाधनों पर ही पड़ेगा। जलापूर्ति की भयंकर समस्या उत्पन्न होगी तथा सूखे और बाढ़ की बारम्बारता में इजाफा होगा। अर्धशुष्क क्षेत्रों में शुष्क मौसम अधिक लंबा होगा,जिससे फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वर्षा की अनिश्चितता भी फसलों के उत्पादन को प्रभावित करेगी तथा जल स्रोतों के अधिक दोहन से जल स्रोतों पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। अधिक तापमान और वर्षा की कमी से सिंचाई हेत भ-जल संसाधनों का अधिक दोहन किया जाएगा, जिससे धीरे-धीरे भू-जल इतना ज्यादा नीचे चला जाएगा कि स्थितियाँ अत्यधिक विकराल हो जाएंगी। डाक जोन’ बढ़ने लगेंगे। 

गौरतलब है कि डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में दिसंबर, 2009 में हुए सम्मेलन में ‘ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स, 2010’ द्वारा एक सची जारी की गई थी, जिनमें भारत उन शीर्ष 10 देशों में है जो जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित होंगे। 

जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने तथा खाद्यान्न सुरक्षा नहाने के लिए भारत में सुचिंतित प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले हमें खेतों में जल प्रबंधन की दिशा में ध्यान केन्द्रित करना होगा। तापमान वृद्धि के साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पडती है। ऐसे में जमीन में नमी का संरक्षण और वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी और सहयोग कदम हो सकता है। वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा के पानी को संचित कर सिंचाई के रूप में इसका प्रयोग कर सकते हैं। इससे जहाँ एक ओर हमें सिंचाई की सुविधा मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भू-जल पुनर्भरण में भी मदद मिलेगी। 

जैविक एवं समग्रित खेती से भी हम इस चुनौती से निपट सकते हैं। रासायनिक खेती से हरित गैसों के उत्सर्जन में इजाफा होता है। ऐसे में हमें जैविक खेती की तकनीकों पर अधिक-से-अधिक जोर देना होगा। एकल खेती के बजाय हमें समग्रित खेती पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। एकल कृषि में जहाँ जोखिम अधिक होता है, वहीं समनित कृषि में जोखिम कम होता है। समग्रित कृषि में अनेक फसलों का उत्पादन किया जाता है, जिससे यदि एक फसल किसी प्रकोप से समाप्त हो जाए, तो दूसरी फसल किसान को संबल प्रदान करे। 

-जलवायु परिवर्तन के गंभीर और दूरगामी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए बीजों के उन किस्मों का विकास करना होगा, जो नए वातावरण के अनुकूल हों। हमें ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा, जो अधिक तापमान, सूखे और बाढ़ की विभीषिका को सहन करने में सक्षम हों। हमें लवणता एवं क्षारीयता को सहन करने वाली किस्मों को भी ईजाद करना होगा। साथ ही फसली संयोजन में भी परिवर्तन करना होगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए हमें फसलों के प्रारूप एवं उनके बोने के समय में भी परिवर्तन करना पड़ेगा। कृषि वानिकी अपनाकर भी हम जलवायु परिवर्तन के खतरों से निजात पा सकते हैं। 

इन पहलों के अलावा जलवायु परिवर्तन से निपटने की पहले करनी होगी। चूंकि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है, अतएव इससे निपटना समूचे विश्व की साझा जिम्मेदारी है, जिसमें भारत को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के उपाय सुनिश्चित करने होंगे। वे सभी पहले करनी होंगी, जो पर्यावरण के अनुकूल हों तथा उसे संतुलित रखने में सहायक हों। इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का किफायती इस्तेमाल करते हुए टिकाऊ विकास पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की अपनी वैश्विक जिम्मेदारी को समझा है। 2 अक्टूबर, 2016 को भारत ने उस पेरिस समझौते पर मुहर लगा दी थी, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से लड़ना और वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे रखना है। विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की जरूरत के बीच सही संतुलन बैठाना होगा। भौतिक विकास के प्रकृति पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभाव पर अंकुश लगाना होगा। कार्बन में कमी और ग्रीन हाउस गैसों को घटाने की दिशा में जहाँ आवश्यक प्रयास करने होंगे, वहीं इसके लिए जनजागरूकता और जनभागीदारी को भी प्रोत्साहित करना होगा। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपट कर ही हम खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। 

हमारा प्राचीन भारतीय जीवन दर्शन सदा पर्यावरण हितैषी रहा और हमारे पास परम्परागत ज्ञान के खजाने भी हैं। जरूरत है नई चुनौतियों को देखते हुए इसे पुनर्जीवित कर अमल में लाकर हम जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों को निष्प्रभावी बनाएं। खाद्य सुरक्षा हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि कृषि हमारी आधारशिला है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस आधारशिला की रक्षा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से करें। इसके लिए हमें पर्यावरण मित्र बनना होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति भी हमारी रक्षा तभी करती है, जब हम प्रकृति की रक्षा करते हैं। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

three × 4 =