आईएएस में पूछे गए निबंध-सामाजिक परिवर्तन की वाहक नारी अथवा सृष्टि की जीवन-रेखा है स्त्री 

आईएएस में पूछे गए निबंध-सामाजिक परिवर्तन की वाहक नारी अथवा सृष्टि की जीवन-रेखा है स्त्री 

आईएएस में पूछे गए निबंध-सामाजिक परिवर्तन की वाहक नारी अथवा सृष्टि की जीवन-रेखा है स्त्री 

बहुत प्रचलित कहावत है कि–’एक पुरुष को शिक्षित करने पर एक व्यक्ति शिक्षित होता है परंतु एक नारी के शिक्षित होने पर पूरा परिवार शिक्षित होने लगता है।’ इस कहावत में समाज में नारी की अर्थवत्ता चिह्नित है। 

“प्रकृति ने नारी को पुरुषों से भिन्न बनाया और उसे ही सर्जन-पोषण का दायित्व सौंपा।” 

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता के प्रारंभिक दिनों में प्रगति बहुत तेजी से हुई थी और सभ्यता के सभी अनिवार्य तत्वों का आविष्कार उसी समय हो गया था। आज इतिहास प्रमाणित करता है कि परिवार, कृषि और प्रारंभिक उपकरणों का आविष्कार करने का श्रेय नारी को ही जाता है। प्रकृति ने नारी को पुरुषों से भिन्न बनाया और उसे ही सर्जन-पोषण का दायित्व सौंपा। प्रकृति में जीवन की सततता का उपकरण है पुनरुत्पादन (Reprodution) और यह प्रक्रिया पूरी होती है मादा के गर्भ में। सृजन में नारी-पुरुष की बराबर की भूमिका होती है पर यह प्रक्रिया पूरी होती है नारी में। करीब नौ महीने गर्भ में पोषण और फिर कई वर्ष तक बाहर दुनिया में। यह अजीब विडंबना है कि प्रकृति के जीवों में मनुष्य ही सबसे अधिक विकसित हो मानो सर्वशक्तिमान होता जा रहा है पर सभी जीवों में सबसे निर्बल मानव की ही संतान होती है। अन्य जीवों के बच्चे कुछ दिनों में, कुछ के तो कुछ घंटों में, चलने-फिरने, चुगने लगते हैं पर मानव शिशु कई वर्ष तक ‘निर्भर’ रहता है। इस दौरान पोषण का मुख्य दायित्व मां और अन्य स्त्रियों का ही होता है। 

इसी कारण जब मनुष्य का जीवन शिकार और भोजन संग्रह पर निर्भर था तो शिशु के कारण नारी हमेशा पुरुष के साथ भोजन की तलाश में नहीं जा पाती होगी। उसी दौरान उसे ‘अवकाश’ मिलता होगा। आज यह सिद्ध हो चुका है कि सभ्यता के निर्माण में जितना योगदान श्रम का है उतना ही अवकाश का भी। क्योंकि नया-नया सोचने और करने के लिए अवकाश तो चाहिए ही। इसीलिए कहते हैं-नारी ने ही बीज से पौधे उगने को देखा-समझा होगा और उसे प्रयोग में लाने की कोशिश की होगी। फिर छोटे-मोटे उपकरण भी बनाए होंगे। 

नारी ने ही अवकाश के क्षणों में ‘सोचना’ और जरूरतों को महसूस करना शुरू किया होगा। इस तरह नारी मन-मस्तिष्क में विविधता चरितार्थ होनी शुरू हुई होगी और फिर यह प्रमाणित ही है कि मनुष्य ने जिन अंगों का अधिकाधिक और लगातार इस्तेमाल किया, उनका विकास होता गया और जिनका नहीं किया उनका क्षरण होता गया। ऐसे में सभ्यता के प्रारंभिक काल में नारी मन मस्तिष्क का अधिक विकास हुआ हो यह स्वाभाविक है। 

इस तरह प्रकृति ने ही मानव समाज के लिए नारी को मानो अधिक संभावना संपन्न बना रखा है। पर पुरुष अधिक कुशल और कुटिल साबित हुआ और उसने धीरे-धीरे घर, परिवार, सम्पत्ति और राज्य की ऐसी रचना कर डाली जिसमें पुरुष का वर्चस्व कायम होता गया और नारी गौण होती चली गई। पित सत्ता और रूढिग्रस्त श्रेणी ग्रस्तता ने नारी ही नहीं, अधिकांश श्रमिक पुरुषों को भी द्वितीयक बना दिया। इससे मानव समाज की बहुत क्षति हुई और वह उन ऊंचाइयों को नहीं छू सका जहां तक पहुंच सकता था। 

आधुनिक काल का प्रारंभ हुआ तो मानव समाज के केंद्र में लाया गया। पर शुरू में ‘मानव’ पुरुषों और पुरुषों में भी अभिजनों तक सीमित था। फिर धीरे-धीरे लोकतंत्र का प्रादुर्भाव हुआ। इससे भी जनतंत्र का थोड़ा ही विस्तार हुआ। अमरीकी क्रांति ने उद्घोषित किया : All Men are created equals (सभी लोग जन्मना बराबर हैं) पर यहां ‘मेन’ में ‘विमेन’ और अश्वेत मेन भी शामिल नहीं थे। फ्रांसीसी क्रांति में ‘समानता’, ‘स्वतंत्रता’ और ‘भ्रातृत्व’ की बात की गई। पर इसमें भी नारियां शामिल नहीं थीं। यह स्थिति थी तथाकथित जनतांत्रिक देशों में अग्रणी समाजों की, तो भारत जैसे पिछड़ गए औपनिवेशिक देशों का तो कहना ही क्या। 

बहरहाल, जनतंत्र का रथ आगे ही बढ़ता गया और उन्नीसवीं सदी में नारियों की आवाज भी उठने लगी। प्रथम विश्व युद्ध में पुरुषों के युद्धरत हो जाने के कारण नारियों को अवसर मिलने लगा और अमरीका तथा यूरोप में नारी मुक्ति आंदोलन तेज होने लगा। बीसवीं सदी में नारी मुक्ति के संदर्भ में दो महिलाओं का योगदान ऐतिहासिक कहा जा सकता है-1. फ्रांस में सिमोन द बोवुआर तथा 2. रूस में अलेक्जाद्रा कोलोन्नताई। इन दोनों ने नारी जाति को हर तरह से मुक्त करने के लिए हर तरह के प्रयास किए और साबित कर दिया कि नारी को गौण समझा जाता है जबकि वह किसी भी तरह द्वितीयक नहीं है। 

“प्रकृत्या नारी पुरुष से अधिक सामाजिक होती है। नारी अधिक आसानी से संवाद स्थापित कर लेती है और उसका औरों के प्रति, घर-मोहल्ले के प्रति सहज सरोकार होता है।” 

तब से नारियों ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और कौशल का परिचय देना शुरू कर दिया है। परंतु पुरुष मानसिकता आज भी पूरी तरह उन्हें बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं लगती। ऐसे में व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए तड़प रहे समाज को अगर यह अहसास हो जाए कि नारी सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावी कारक हो सकती है तो नारी और समाज की स्थिति में भारी परिवर्तन हो सकता है। 

अभी तक यह लगता है कि पुरुष अनुकम्पापूर्वक नारी को बराबर समझ रहा है। दूसरी ओर नारी भी थोड़े अधिकार पाकर कृतज्ञ महसूस करती है। यह सहज स्थिति नहीं है। अगर नारी की गुणवत्ता और विशिष्टता मान ली जाय तो सारे पूर्वाग्रह और कुंठाएं दूर हो सकती हैं और समाज में नारी और पुरुष के बीच सहज और सकारात्मक संबंध विकसित हो सकते हैं। 

वैसे भी हम देख सकते हैं कि प्रकृत्या नारी पुरुष से अधिक सामाजिक होती है। नारी अधिक आसानी से संवाद स्थापित कर लेती है और उसका औरों के प्रति, घर-मोहल्ले के प्रति सहज सरोकार होता है। यानी वह प्रकृत्या अधिक ‘आउट गोइंग’ होती है। इस प्राकृतिक गुणवत्ता को यदि शिक्षा से संवार दिया जाय और उसकी | सहज सामाजिकता को सोद्देश्य बना दिया जाए तो सोने में सुगंध जुड़  सकती है। 

इसीलिए नारी का शिक्षित होना और उसे सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय बनाना आवश्यक है। यह उजागर हो चुका है कि एक शिक्षित मां एक शिक्षक पिता से अधिक कारगर नागरिक होती है। हम देख सकते हैं कि जो भी महिलाएं आज नागरिक अधिकार आंदोलन में सक्रिय हैं, वे लोगों को जागृत करने तथा उन्हें सामाजिक मुद्दों पर लामबंद करने में काफी सफल हैं। मेधा पाटकर, अरुणा राय, कविता श्रीवास्तव आदि आज सामाजिक समर्पण के लिए सारे देश में जानी जाती हैं। 

यहां इस बात पर भी गौर कर लिया जाना चाहिए कि आज के सामाजिक माहौल में पुरुष नेतृत्व ने जनता का भरोसा खो दिया है। आज नारी नेतृत्व अपेक्षतया अधिक विश्वसनीय और भरोसेमंद माना जाता है। ऐसे में केवल नेतृत्व को नहीं, सामान्य नारी को भी इस तरह शिक्षित-प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वे अपने सामाजिक दायित्व को समझ कर उसके निर्वाह के लिए अपने को अच्छी तरह तैयार कर लें। हर घर समाज का एक मोर्चा होता है। अगर नारी अपने-अपने घर के मोर्चे को ही सम्हाल कर उसके रूपांतरण में जुट जाए तो धीरे-धीरे सारा समाज रूपांतरित हो सकता है। घर के बाद नंबर आता है पड़ोस का। आज भी ‘पड़ोस’ मुख्यतः नारियों के दम पर ही जिंदा है। अगर सामाजिक चेतना से लैस नारी अपना कार्य क्षेत्र | पड़ोस में भी बढ़ा दे तो क्या कहना। जो अधिक प्रबुद्ध और अनुभवी हैं वे अपने मोहल्ले या और बड़े क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बना सकती हैं |

अंत में यह मुद्दा विश्वास और आत्मविश्वास का है। समाज के अंदर विश्वास पैदा होना चाहिए कि नारी उतनी ही, या उससे भी अधिक, संभावना संपन्न होती है जितना पुरुष और स्वयं नारियों में यह आत्मविश्वास पैदा होना चाहिए कि वे वह सब कर सकती हैं, कुछ मामलों में और अधिक, जितना पुरुष कर सकता है। 

अंततः सामाजिक परिवर्तन एक ऐसा कार्यभार है जिसे पूरा करने में हर किसी को, जो जितना सक्षम है उतनी क्षमतानुसार, अपने सर्वोत्तम समष्टि को देना चाहिए क्योंकि उसमें ही सबके व्यक्तिगत हित भी चरितार्थ हो सकते हैं। 

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