शिक्षाप्रद कहानी इन हिंदी-लालची काजी,संगीत प्रेमी राक्षस

शिक्षाप्रद कहानी इन हिंदी-लालची काजी

शिक्षाप्रद कहानी इन हिंदी-लालची काजी

किसी गांव में एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह रोज सुबह जल्दी ही जंगल चला जाता और पूरे दिन कड़ी मेहनत करके लकड़ियां एकत्रित किया करता था। वह रोज शाम तक लकड़ियां इकट्ठी करता और देर रात उन्हें सिर पर लादकर घर लौटता। एक दिन लकड़हारे को बहुत तेज बुखार हो गया। उसने जंगल में लकड़ी लाने के लिए अपने पड़ोसी से घोड़ा गाड़ी मांगने का फैसला किया। लकड़हारे के पड़ोसी का नाम रामसिंह था। रामसिंह बहुत ही चालाक व्यक्ति था। वह हमेशा ही गरीब लकड़हारे को परेशान करना चाहता था। 

अब लकड़हारे ने रामसिंह से घोड़ागाड़ी मांगी, तो रामसिंह ने उससे कहा, “तुम मेरी गाड़ी शाम तक के लिए ले सकते हो, लेकिन इसमें कोई भी टूट-फूट नहीं होनी चाहिए।” 

लकड़हारा तुरंत गाड़ी लेकर जंगल की ओर चल दिया। उसने जल्दी-जल्दी लकड़ियां इकट्ठी की और वापस घर के लिए चल पड़ा। रास्ता बहुत खराब था और गाड़ी में वजन होने के कारण बहुत परेशानी हो रही थी। बार-बार सड़क पर झटके लगने से गाड़ी का पिछला पहिया टूट गया। लकड़हारे ने पहिया सही करने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह नाकाम रहा। उसने पहिये की थोड़ी मरम्मत की और आगे बढ़ गया, लेकिन वह गाड़ी को ज्यादा आगे नहीं ले जा पाया, क्योंकि पहिया दुबारा टूट गया। अब लकड़हारे की परेशानी बढ़ गई। वह किसी तरह रामसिंह के घर तक पहुंच गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसने सारी आपबीती रामसिंह को सुनाई, लेकिन रामसिंह का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ और उसने लकड़हारे से कहा कि अब फैसला काजी जी के पास ही होगा। गरीब लकड़हारे ने उसे बहुत समझाया, लेकिन रामसिंह ने उसकी एक न सुनी। 

अगले दिन सुबह जब लकड़हारा कोर्ट जाने के लिए चल दिया, तो रास्ते में उसका पैर फिसल गया और वह नीचे गिर गया। वह जहां गिरा उस जगह एक अन्य व्यक्ति की भैंसा गाड़ी खड़ी थी। लकड़हारे के गिरने से गाड़ी टूट गई, जिससे गाड़ी का मालिक चिल्लाने लगा और वह भी लकड़हारे को कोर्ट ले गया। 

कोर्ट में लकड़हारा रामसिंह से मिला। वह लकड़हारे को देखकर कुटिलता भरी हंसी हंसा और कहने लगा कि मैंने काजी से पहले ही पैसे की बात कर ली है, अब वह मेरे ही हक में निर्णय करेगा। लकड़हारा इस बात से बहुत दुखी हुआ और उसने वहीं सड़क से एक पत्थर उठाकर अपनी जेब में रख लिया। उसने सोचा कि यदि काजी मेरे खिलाफ फैसला सुनाएगा , तो मैं कोर्ट में ही उसके सिर पर पत्थर मार दूंगा, जिससे उसे अपनी करनी का फल मिल जाएगा। अब वे तीनों काजी के कमरे में पहुंच गए। जल्द ही रामसिंह और दूसरे गाड़ी वाले ने अपने-अपने केस काजी के सामने रखे। लकड़हारा अपनी जेब में पत्थर को बार-बार हिलाने लगा। जब काजी ने उसे बार-बार जेब में हाथ देते हुए देखा, तो उसने सोचा कि जरूर इसकी जेब में सोने के कुछ सिक्के हैं। ऐसा सोचकर काजी ने फैसला लकड़हारे के हक में दे दिया। काजी ने कहा कि दोनों ही केस में लकड़हारे की कोई गलती नहीं है। उसने किसी भी गाड़ी को जानबूझकर नुकसान नहीं पहुंचाया, जो भी हुआ अनजाने में हुआ। ऐसा कहकर काजी ने केस समाप्त कर दिया। केस का निर्णय सुनकर रामसिंह व दूसरा गाड़ी मालिक दोनों ही आश्चर्यचकित रह गए और काजी को बरा-भला कहते हुए कोर्ट से बाहर जाने लगे। 

अब कोर्ट में केवल काजी और लकड़हारा रह गए थे। काजी तुरंत लकड़हारे के पास आया और उससे सोने के सिक्के मांगने लगा। लकड़हारे ने उससे कहा कि मेरे पास सिक्के नहीं हैं। मेरे पास यह पत्थर है, जो मैंने तुम्हारे सिर पर मारने के लिए रखा था। 

यह कहकर लकड़ाहारा कमरे से बाहर निकल गया और काजी केवल उसकी तरफ बिना पलक झपकाए देखता रहा। उसने सोने के सिक्कों के लालच में आकर रामसिंह के पैसे भी छोड़ दिए थे। इस केस से काजी को बहुत बड़ी शिक्षा मिली और उसने प्रण किया कि वह आगे से कभी भी लालच नहीं करेगा और सभी केस में सही न्याय करेगा। 

शिक्षाप्रद कहानी-संगीत प्रेमी राक्षस

शिक्षाप्रद कहानी-संगीत प्रेमी राक्षस

एक ब्राह्मण था। उसे कोई ब्रह्मराक्षस मिला। ब्रह्मराक्षस यानी मृत्यु के बाद राक्षस बन जाने वाला ब्राह्मण। ब्रह्मराक्षस ने ब्राह्मण से कहा, “मेरी मदद करो।” 

“कैसे?” ब्राह्मण ने पूछा। 

“मैं मनुष्य जन्म में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ था, किंतु अपनी कला का ज्ञान किसी के साथ न बांटने के कारण मुझे शाप मिला और मैं ब्रह्मराक्षस बन गया। मैं इस कठोर दंड को भुगत रहा था कि मुझ पर एक नई विपत्ति टूट पड़ी जो दंड से कहीं अधिक दुखदायी है। विपत्ति यह है कि पास के किसी मंदिर में कोई आदमी सुबह-शाम नादस्वरम् बजाता है। वह इतना बेसुरा है कि उसका वादन सुनकर मैं पागल हो जाता हूं। प्रतिदिन उस बेसुरे वादन को सुनना मेरे लिए नरक की यातना से भी अधिक कष्टप्रद है।” 

राक्षस ने अपनी राम कहानी ब्राह्मण को सुनाई। फिर बोला, “तुम मुझे इस वाटिका से दूर ले जाकर किसी दूसरी वाटिका में बैठा दो ताकि मुझे इस घोर यंत्रणा से छुटकारा मिले। मैं तुम्हें भरपूर इनाम दूंगा।” 

ब्राह्मण मान गया और उसे दूसरी वाटिका में ले जाकर बैठा दिया। नए ठिकाने पर पहुंचकर राक्षस की बांछे खिल गईं। तब उसने ब्राह्मण को एक तरकीब सुझाई। उसने कहा, “मैं मैसूर की राजकुमारी के शरीर में प्रवेश कर जाऊंगा और केवल तुम्हारे कहने पर ही उसे छोडूंगा। जैसे ही तुम राजकुमारी की बीमारी का समाचार सुनो, तुरंत मैसूर पहुंच जाना। वहां राजकुमारी का उपचार करना और राजा से मुंहमांगा पुरस्कार प्राप्त करना। लेकिन हां, उसके बाद तुम मुझे कभी तंग मत करना।” 

सबकुछ योजना के मुताबिक हुआ। मैसूर के राजा ने ब्राह्मण को बहुत-सा इनाम दिया। किंतु थोड़े दिनों बाद उस ब्रह्मराक्षस ने तिरुवितांकुर की राजकुमारी के शरीर में बसेरा कर लिया, मैसूर के राजा की सिफारिश पर वहां के राजा ने उसी ब्राह्मण को बुला भेजा। ब्राह्मण को पता था कि राक्षस अबकी बार मानेगा नहीं। 

किंत वहां आने के अलावा कोई उपाय नहीं था। बेचारा डरते-डरते तिरुवितांकुर पहुंचा। 

उसने राजकुमारी के कमरे में कदम रखा ही था कि राक्षस गरजा, “मैंने कहा था न कि दुबारा मझे तंग मत करना। मदद के लिए तुझे भरपूर इनाम भी मिल चुका है। अब भाग यहां से वरना कच्चा चबा जाऊंगा।”

ब्राह्मण ने झटपट सोचा फिर दृढ़ स्वर में बोला, “भागना तो तुम्हें पड़ेगा यहां से। अगर नहीं गए तो उसी नादस्वरम्-वादक को यहां लिवा लाऊंगा और उसे आदेश दूंगा कि इस कक्ष के बाहर नादस्वरम् बजाए-केवल सुबह और शाम नहीं, बल्कि सुबह से शाम तक!” 

इतना सुनना था कि राक्षस के मुंह से चीख निकल पड़ी, “नहीं…नहीं, इतने क्रूर मत बनो। मैं यह चला।” यह कहकर राक्षस वहां से भाग गया। 

राजकुमारी का उपचार’ करने के लिए तिरुवितांकुर के राजा से भी ब्राह्मण को अनेक बहुमूल्य उपहार मिले। 

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