ब्रिटेन का गृहयुद्ध(अंग्रेज़ी गृहयुद्ध)| English Civil War History in hindi

English Civil War History in hindi

 ब्रिटेन का गृहयुद्ध (English Civil War) (1642-1651) 

ब्रिटेन का गृह युद्ध या इंग्लिश सिविल वार, विश्व इतिहास में किसी भी जनतांत्रिक व्यवस्था में ब्रिटिश सम्राट और पार्लियामेन्ट के बीच, सैनिक पक्षों के साथ होने वाला प्रथम गृह युद्ध था। सम्राट और पार्लियामेन्ट के बीच सैनिक पक्षों को लेकर होने वाला यह युद्ध प्रथम तो था ही तथा इसे अन्तिम भी कहा जा सकता है। 

सन् 1642 ई० में ब्रिटेन व्यवस्था में यह बात एकदम से सामने आयी कि ब्रिटेन का सम्राट बड़ा है या पार्लियामेन्ट? किंग चार्ल्स के उलटे-सीधे आदेशों को ब्रिटिश पार्लियामेन्ट द्वारा नकार दिए जाने को लेकर सम्राट-चार्ल्स इतना रुष्ट हुआ था कि उसने कुछ दिन पूर्व ही शपथ ग्रहण करने वाली पार्लियामेन्ट के बारे में 4 जनवरी, 1642 ई० को आदेश दिया कि उसके आदेश को नकारने वाले पांच सांसदों को गिरफ्तार कर लिया जाए। उन पांचों सांसदों के पक्ष में पूरी पार्लियामेन्ट लाभ्मबन्द खड़ी हो गयी। सम्राट के आदेश का पालन न हो सका। सम्राट ने राजसी सेना को उन पांचों सांसदों की गिरफ्तारी के लिए भेजा। परन्तु राजसी सेना को भी उन सांसदों को गिरफ्तार करने का अवसर न मिल सका। ब्रिटेन की सिविल सेना को अपने विशेषाधिकार के तहत पार्लियामेन्ट ने, राजसी सेना के विरोध में खड़े हो जाने का आदेश दे दिया। 

इंग्लैण्ड की सिविल सेना ने पार्लियामेन्ट के चारों ओर मजबूत घेरा और मोर्चाबन्दी कर दी। पार्लियामेन्ट ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए नई सैनिक भर्तियों का आदेश भी जारी कर दिया। 

पार्लियामेन्ट और सम्राट चार्ल्स के बीच दिनों-दिन विवाद गहराता गया। चार्ल्स ने अगस्त, 1642 को राजसी सेना को नाटिंघन में आक्रमक कार्रवाई का आदेश दे दिया। 

जनवरी से अगस्त, 1642 के बीच पार्लियामेन्ट ने भी युद्ध की पूरी तैयारी कर ली थी। राबर्ट डेवरोक्स्यु (Robert Devereux) को पार्लियामेन्टरी कमाण्डर (Parliamentary Commender), पार्लियामेन्ट की ओर से घोषित किया जा चुका था। राजसी सेना और पार्लियामेन्ट सेना के 13,000 सैनिकों के बीच युद्ध आरम्भ हुआ। 

पार्लियामेन्ट कमाण्डर को युद्ध छिड़ने के बाद भी पार्लियामेन्टरी सदस्यों की ओर से यह सुझाव था कि युद्ध चाहे जिस स्तर पर भी पहुंच जाए, परन्तु सम्राट की हत्या नहीं होनी है। यह सिर्फ अधिकार के फैसलों का युद्ध था। इस युद्ध से इस बात का निर्णय होना था कि भविष्य में किसे किस सीमा तक रहना है। पार्लियामेन्ट इस बात को नहीं चाहती थी कि राजशाही व्यवस्था खत्म हो या राजशाही के पर कुतरे जाएं-सिर्फ उस अधिकार को बचाना था; जिसे कुचलने के लिए सम्राट चार्ल्स ने कुचेष्टा की थी। 

दोनों ओर की सेनाओं में बाकायदा युद्ध छिड़ गया था। बावजूद इसके नागरिकों को उस युद्ध से तटस्थ रहने की हिदायत पार्लियामेन्ट की ओर से दी गयी। 

दोनों ओर की सेनाओं के बीच छिड़ चुके इस युद्ध में ब्रिटेन ने उत्तरी क्षेत्र तथा वेल्स (Wales) के पश्चिमी हिस्से से राजसी सेना को सहायता मिलने लगी थी तो पार्लियामेन्ट सेना को ब्रिटेन के दक्षिण और पूर्व के धनिक लोगों का समर्थन मिल रहा था। उसके साथ-साथ पूरा लंदन पार्लियामेन्ट सेना के पक्ष में था। पार्लियामेन्टरी सेना ने ब्रिटेन के समुन्द्री तटों के अधिकांश हिस्सों पर अपना प्रभाव बढ़ाकर, समुन्द्री व्यापारियों को इस बात का वचन दिया था कि उनकी जीत होने पर उन्हें व्यापार कर में पहले से अधिक छूट दी जाएगी। 

उधर, चार्ल्स के पास दान के धन के अलावा सेना के लिए शाही कोष में पहले से जुटा हुआ धन था। उस धन को सम्राट खुले हाथों से शाही सेना पर खर्च करने लगा था। 

यह गृह युद्ध 1642 से आरम्भ होकर 1646 तक चलता रहा। सन् 1646 के आरम्भ में सम्राट की सेना को बढ़त मिली और वह लंदन तक पहुंच पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में सफल रही। इस विजय से सम्राट पूरी तरह आशावान था कि उसे पूर्ण सफलता मिलने जा रही है, भविष्य में वह पार्लियामेन्ट पर अपना पूरा अंकुश रख सकेगा। 

23 अक्टूबर, 1642एड्जहिल (Edgehill) में दोनों सेनाओं के बीच जबरदस्त खूनी भिंड़त हुई। 

English Civil War History in hindi

अगली खूनी भिंड़त टर्नहम ग्रीन (Turnham Green) में हुई। यहीं से राजसी सेना (शाही सेना) को लंदन तक आधिपत्य स्थापित करने का अवसर मिल सका। चार्ल्स ने 1643 में अपना मुख्यालय आक्सफोर्ड (Oxford) में स्थानान्तरित कर लिया था। वह स्वयं शाही सेना के साथ युद्ध भूमि में उतर पड़ा था। शाही सेना को 1643 के बाद आगे भी बढ़त मिलती जा रही थी। शाही सेना के एडवाल्टन मूर (Adwalton Moor) को, यार्कशायर (Yarkshire) में भी जीत मिली थी। उसने लैन्सडाउन (Landsdown) और राउन्डवे डाउन (Roundway Down) पर भी अपनी अच्छी जीत दर्ज कर ली थी। जुलाई, 1643 में शाही सेना के अधिकार में ब्रिटेन के दक्षिणी और पश्चिमी सारे भू-भाग आ चुके थे। इन विजयों के बाद सम्राट ने राजकुमार रुपर्ट (Rupert) को युद्ध भूमि में उतारा जिसने ब्रिस्टल (Bristal) को अपने अधिकार में ले लिया। 

दूसरी ओर पार्लियामेन्ट सेना 11 अक्टूबर, 1643 में विन्सबाई (Wenceby) पर, लिंकोन (Lincoln) में विजय प्राप्त की। सितम्बर 1643 में उसने न्यूजबरी (Newsbruy) पर जीत दर्ज की। 

दोनों सेनाओं के बीच की खूनी भिन्ड़त बढ़ती ही जा रही थी। सुलह या शान्ति वार्ता का कोई मार्ग भी न सामने आ रहा था। पार्लियामेन्ट ने सोलमन लीग (Solemen Leauge) नामक संगठन तैयार कर अपने पक्ष में स्कॉट (Scots) के लोगों को लाने का प्रयास करते हुए वायदा किया कि यदि उन्होंने इस समय उनकी सहायता की तो उनके पक्ष में वे धार्मिक सुधार लागू कर देंगे। 

ब्रिटेन के कुछ उच्चवर्गीय लोगों ने मध्यस्थता का प्रयास करते हुए चार्ल्स से सीज़ फायर (युद्ध ठहराव) की अपील की, ताकि वे पार्लियामेन्ट से वार्ता कर सकें, परन्तु सीज फायर की अपील ठुकराते हुए शाही सेना 1644 में आयारलैण्ड (Ireland) पर कब्जा कर वहां से शत्रु सेना को निकाल बाहर किया। 

 

2 जुलाई, 1644 में पार्लियामेन्टरी सेना ने मार्सटन मूर (Marston Moor) को जीत लिया। स्काट के लोगों की सहायता प्राप्त कर यार्क (Yark) को भी कब्जे में कर लिया। उन्हें दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से में अभी भी असफलता मिल रही थी जोकि पूरी तरह से राजशाही सेना के अधिकार में था। इस इलाके के न्यूजबरी में 1645 ई० में नेसबाई (Nasebay) तथा 10 जुलाई, 1646 ई० को लांगपोर्ट (Longport) के मोर्चे पर उन्हें जबरदस्त सफलता मिली। उन दो बड़ी सफलताओं के परिणाम में सम्राट चार्ल्स की सारी शाही सेना युद्ध भूमि में काम आ गयी। शाही सेना के इस पतन के साथ ही पार्लियामेन्टरी सेना आक्सफोर्ड में जा घुसी। चार्ल्स को आक्सफोर्ड से भागकर उत्तरी क्षेत्रों में शरण पाने के लिए भागना पड़ा। उत्तर का क्षेत्र स्काटों का प्रभावशाली क्षेत्र था। सम्राट ने स्काटों सहायता की मांग की। परन्तु स्काट्स पहले से ही पार्लियामेन्टरी सेना का साथ दे रहे थे। स्काटों ने सम्राट की किसी भी तरह सहायता करने से इनकार कर दिया। 

सम्राट को अन्ततः युद्ध हारने की घोषणा करनी पड़ी। इसके बाद सम्राट पार्लियामेन्ट का बन्धक हो गया। उसे पार्लियामेन्ट ने होम्बी हाउस (Holmby House) में बन्धक के रूप में रहने की अनुमति दे दी। 

परन्तु, उस समय तक विजय के जोश में भारी हुई पार्लियामेन्टरी सेना, चार्ल्स के साथ जरा भी रियायत बरतने के मूड में न थी। पार्लियामेन्टरी सेना, अधिकांश सांसदों की इस राय की उपेक्षा करती हुई कि सम्राट चार्ल्स को इसी स्थिति में वहीं रहने दिया जाए-पार्लियामेन्ट सेना सम्राट का अपहरण करके, उससे मनमाने ढंग से समझौते हस्ताक्षर कराने के सोच में भरी हुई थी। 

पार्लियामेन्ट सेना के अपने आवास की ओर निरन्तर बढ़ने की खबर पाने के बाद चार्ल्स समझ गया था कि उसका क्या अंजाम होने वाला है, वह वहां से वेश बदलकर, चुपचाप निकल भागने में सफल हुआ। उसने ‘आइल ऑफ वेट’ (Isle of Wight) नामक स्थान पर जाकर चुपचाप शरण ली। 

उसे होम्बी हाउस में न पाकर सेना अगस्त, 1647 में लंदन में पहुंच गयी। पार्लियामेन्टरी सेना के लंदन पहुंचते के बाद सत्ता की व्यवस्था पर वार्ता होने लगी। सत्ता व्यवस्था को लेकर पार्लियामेन्ट के आपसी भेद सामने आने लगे। इस मतभेद की वजह से अगस्त, 1647 ई० से 28 दिसम्बर, 1647 ई० तक सत्ता सम्बन्धी सर्वसम्मति से कोई व्यवस्था न बन सकी। जिसका प्रत्यक्ष लाभ सम्राट चार्ल्स ने उठाया। उसने गुप्तरूप से स्काटों के सामन्ती परिवार के लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। स्काट का क्षेत्र उत्तरी क्षेत्र था। उत्तरी क्षेत्र में शाही परिवार के साथ आरम्भ से ही निष्ठा जुड़ी हुई थी। गुप्त समझौते में चार्ल्स ने उत्तर के सामन्तों से वायदा किया कि उसकी राजशाही बचते ही वह उनके लिए सुविधाओं के द्वार खोल देगा। उत्तरी क्षेत्र में सामन्तों को भी लगा कि वह राजशाही से कहीं अधिक लाभ पाने की स्थिति में होंगे। 

इस तरह रातों-रात स्कॉटों की सहायता पाते ही चार्ल्स के निर्देश में जुलाई, 1648 में उत्तर का विद्रोह आरम्भ हो गया। इस विद्रोह के उभरते ही पार्लियामेन्टरी सेना उन पार्लियामेन्ट सदस्यों पर भड़क उठी, जो चार्ल्स को छूट देने के हिदायत में आगे आए थे। पार्लियामेन्टरी सेना, पार्लियामेन्ट में घुस पड़ी। सर थोम्स प्राइड (Sir Thomas Pride) सेना का नेतृत्व कर रहा था। उसने 45 पार्लियामेन्ट के मेम्बरों (MPs) को गिरफ्तार कर लिया, 146 पार्लियामेन्ट के मेम्बरों की पार्लियामेन्ट सदस्यता खत्म करने का एलान करते हुए केवल 75 पार्लियामेन्ट सदस्यों को पार्लियामेन्ट चलाने की अनुमति दी। 

पार्लियामेन्ट के सदस्यों ने इस घटना के बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा कर न्याय की मांग की। कोर्ट ने चार्ल्स को दोषी करार दिया। 3 सितम्बर, 1651 को चार्ल्स की सत्ता पूरी तरह पार्लियामेन्टरी सेना ने उखाड़ फेंकी। 

स्कॉटलैण्ड से उभरे विद्रोह का पूरी तरह दमन कर दिया गया था। ओलिवर क्रोमवेल (Oliver Cromwell) को लार्डप्रोटेक्टर ऑफ इंग्लैण्ड (Lord Protector of Egland) नियुक्त किया गया।

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